2021 का चमोली हिमस्खलन और 2024 में हुआ वायनाड भूस्खलन रोका जा सकता था: एनडीएमए

राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण ने कहा है कि 2021 में हुआ चमोली हिमस्खलन और 2024 में केरल के वायनाड में हुए भूस्खलन जैसी घटनाओं के साथ-साथ कई अन्य आपदाएं रोकी जा सकती थीं. एनडीएमए ने कहा है कि इन घटनाओं ने दीर्घकालिक जोखिम न्यूनीकरण योजना और सामुदायिक तैयारी के उपायों में मौजूद ख़ामियों को उजागर किया है.

उत्तराखंड के चमोली ज़िले के जोशीमठ में ग्लेशियर टूटने से धौली गंगा नदी में आई भीषण बाढ़ के बाद पूरी तरह बंद हो चुकी तपोवन सुरंग को खोलने के लिए आईटीबीपी के जवान 7 फरवरी 2021 को खुदाई करते हुए. (फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) ने कहा है कि 2021 का चमोली हिमस्खलन और 2024 में हुए वायनाड भूस्खलन जैसी घटनाओं ने दीर्घकालिक जोखिम न्यूनीकरण योजना और सामुदायिक तैयारी के उपायों में मौजूद खामियों को उजागर किया है.  

हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, एनडीएमए द्वारा तैयार एक संकलन में इन घटनाओं का आकलन किया गया है. इसमें कहा गया है कि चमोली हादसा हिमालयी क्षेत्र में पारंपरिक परियोजना मूल्यांकन पद्धतियों की अपर्याप्तता को सामने लाया.

अख़बार के अनुसार, एनडीएमए ने कहा कि इन दोनों घटनाओं के साथ-साथ कई अन्य आपदाएं भी रोकी जा सकती थीं. संकलन में सिलक्यारा सुरंग का उदाहरण दिया गया है, जिसकी निर्माण प्रक्रिया पहले से ही समस्याग्रस्त रही थी और कई चेतावनी के संकेत मिले थे, जिन्हें सही ढंग से संबोधित नहीं किया गया. इसका परिणाम 2023 में सुरंग के ध्वस्त होने के रूप में सामने आया.

निर्माण कार्य शुरू होने के बाद से अब तक सुरंग में अलग-अलग स्तर की गंभीरता वाली 21 घटनाएं आधिकारिक रूप से दर्ज की जा चुकी थीं.

एनडीएमए के आकलन में कहा गया है कि चमोली आपदा, जिसमें दो जलविद्युत परियोजनाएं नष्ट हो गई थीं, यह दर्शाती है कि हिमालयी क्षेत्र में मानवीय गतिविधियां ऐसे संयुक्त जोखिम पैदा करती हैं जो पारंपरिक इंजीनियरिंग आकलनों से कहीं अधिक होते हैं. इन क्षेत्र में भूगर्भीय अस्थिरता और जलवायु परिवर्तन का प्रभाव प्रमुख चिंताएं हैं.

रिपोर्ट के अनुसार, एनडीएमए ने कहा है कि भविष्य में इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने की योजनाओं में ऐसी गतिशील जोखिम मॉडलिंग को शामिल करना अनिवार्य होगा, जो बदलती पर्यावरणीय परिस्थितियों और एक साथ उत्पन्न होने वाले बहु-आपदा परिदृश्यों को ध्यान में रख सके.

एनडीएमए ने यह भी कहा कि व्यापक और गहन भूगर्भीय, भूकंपीय तथा जलवायु जोखिम का आकलन करना अनिवार्य है.