‘कविता क्या है?’ इस शीर्षक का एक लंबा निबंध आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने 1908 में प्रकाशित किया था. इस निबंध पर वे बाइस वर्ष काम करते रहे और 1930 में इसका अंतिम प्रारूप प्रकाशित हुआ. काशी नागरी प्रचारिणी सभा का जो पुनरूद्धार हुआ है उसी के अंतर्गत इस ऐतिहासिक निबंध के चारों प्रारूप एकत्र कर प्रकाशित हुए हैं.
इससे पहले किसी और आलोचनात्मक निबंध के ऐसे कई प्रारूप कभी प्रकाशित नहीं हुए हैं. बल्कि हम तो यह जानते ही नहीं हैं कि अनेक प्रसिद्ध कृतियों के कितने प्रारूप बनाए और अंततः मुक़म्मल हुए. शोध में संभवतः ऐसी कुछ जानकारी और ब्यौरे होंगे पर सामान्य पाठक के सामने नहीं.
अपने संशोधित-परिवर्द्धित-परिवर्तित अंतिम प्रारूप के पहले ही पैराग्राफ में शुक्ल जी दो महत्वपूर्ण स्थापनाएं करते हैं: पहली कि हृदय की मुक्तावस्था रसदशा कहलती है और हृदय की इस मुक्ति की साधना के लिए मनुष्य की वाणी जो शब्द-विधान करती आई है, उसे कविता कहते हैं. दूसरी, ‘इस साधना को हम भावयोग कहते हैं और कर्मयोग और ज्ञानयोग के समकक्ष’ मानते हैं.
पहली पर बहुत चर्चा हुई है पर दूसरी पर ध्यान कम गया है. भारतीय आलोचना की परंपरा में शायद शुक्ल जी पहले आचार्य हैं जिन्होंने कविता को कर्म और ज्ञान के समकक्ष माना है. कविता को अपने आप में ज्ञान मानने में तो आज भी व्यापक हिचक है और उसे कर्म को हम मान ही नहीं पाए हैं. साहित्य से अलग अनुशासनों में ऐसी अस्वीकृति है जो समझ में आती है पर स्वयं साहित्य में इसे स्वीकार किया गया या जाता है इसका विशेष प्रमाण नहीं है.
हिंदी आधुनिकता के दौरान साधारण जीवन और साधारण मनुष्य की जो केंद्रीयता साहित्य में आई, उसके लगभग प्रथम आलोचक-प्रस्तोता, इस निबंध को ध्यान से पढ़ने के बाद, लगता है कि शुक्ल जी ही हैं. वे अनेक सामान्य वस्तुओं और क्रियाओं की एक सूची देकर कहते हैं कि
‘ऐसे आदिम रूपों और व्यापारों में, वंशानुगत वासना की दीर्घ-परंपरा के प्रभाव से, भावों के उद्बोधन की गहरी शक्ति संचित है.’
उनके अनुसार, ‘ज्यों-ज्यों हमारी वृत्तियों पर सभ्यता के नए-नए आवरण चढ़ते जाएंगे त्यों-त्यों एक ओर तो कविता की आवश्यकता बढ़ती जाएगी, दूसरी ओर कविकर्म कठिन होता जाएगा.’
वे कविता के लिए मूर्त और गोचर रूप आवश्यक समझते हैं. काव्य में अर्थग्रहण मात्र से काम नहीं चलता, बिंबग्रहण अपेक्षित होता है. यह बिंबग्रहण निर्दिष्ट, गोचर और मूर्त विषय का ही हो सकता है. उन भावों को, जिनके विषय अमूर्त तक होने लगें, शुक्ल जी ‘अरूपराग’ कहते हैं.
उनके अनुसार, कविता बाह्य प्रकृति के साथ मनुष्य की अंतःप्रकृति का सामंजस्य करती है. वे कविता की तीन जगहें मानते हैं: नरक्षेत्र, मनुष्येतर बाह्य सृष्टि और समस्त चराचर. वे इस सूक्ष्म सचाई को सामने लाते हैं कि अगर जगत् अनेक-रूपात्मक है तो हृदय अनेक-भावात्मक. जो केवल अपने विलास या शरीर-सुख की सामग्री ही प्रकृति में ढूंढा करते हैं उनमें शुक्ल जी को लगता है कि ‘रागात्मक सत्व की कमी’ है.
शुक्ल जी के लिए विश्व ही महाकाव्य है. उनके यहां जीवन किसी भव्यता या दिव्यता से प्रेरित-प्रकाशित नहीं है- वे सामान्य जीवन की सामान्य क्रियाओं और कर्म को कविता के केंद्र में रखते हैं. अनेक प्रसंगों का, जो सामान्य जीवन में आते रहते हैं, उल्लेख करते हुए वे कहते हैं कि अगर कोई उनसे क्षण भर लीन न हुआ, योग न किया, न लिखा, उसने विसर्जन न किया, वह न पसीजा, न तिलमिलाया, न हंसा तो उसके जीवन में रह क्या गया!
उनका मत है कि ‘जिस प्रकार यह जगत् रूपमय और गतिमय है उसी प्रकार मन भी सौन्दर्य की भावना में मग्न होकर मनुष्य अपनी पृथक् सत्ता का विसर्जन कर देता है. वे मनुष्य का जगत् से पूण्र तादात्म्य संभव मानते हैं और कविता द्वारा जब ‘हृदय का बंधन खुलता’ है तो मनुष्यता की ‘उच्च भूमि’ प्राप्त होती है.
शुक्ल जी ने इतना पहले सजगता और तीक्ष्णता से यह सचाई देख ली थी: ‘अर्वाचीन राष्ट्रनीति के गुरुघंटाल जिस समय अपनी किसी गहरी चाल से किसी देश की जनता का सर्वनाश करते हैं उस समय वे दया आदि दुर्बलताओं से निर्लिप्त, केवल बुद्धि के कठपुतले दिखाई पड़ते हैं. पर उनके भीतर यदि छानबीन की जाए तो कभी अपने देशवासियों सुख की उत्कंठा, कभी अन्य जाति के प्रति घोर विद्वेष, कभी अपनी जातीय श्रेष्ठता का नया या पुराना घमंड, इशारे करता हुआ मिलेगा.’
इस परिनिबंध का समापन यों होता है:
‘बात यह है कि मनुष्य अपने ही व्यापारों का ऐसा सघन और जटिल मंडल बांधता चला आ रहा है जिसके भीतर बंधा-बंधा वह शेष सृष्टि के साथ अपने हृदय का संबंध भूला-सा रहता है. इस परिस्थिति में मनुष्य को अपनी मनुष्यता खोने का डर बराबर रहता है. इसी से अंतःप्रकृति में मनुष्यता को समय-समय पर जगाते रहने के लिए कविता मनुष्यजाति के साथ लगी चली आ रही है और चली चलेगी. जानवरों को इसकी ज़रूरत नहीं.’
शुक्ल जी के बाद कविता में बहुत कुछ बदला और अलग हुआ है. लेकिन अगर ध्यान दें तो स्पष्ट होगा कि मनुष्यता, साधारण जीवन, मूर्त और गोचर रूप पर उनका आग्रह आदि का समयोचित विस्तार ही हुआ है. कविता की सांसारिकता या लौकिकता की उनकी समझ आज की कविता को समझने में बहुत प्रासंगिक है.
फ़िलिस्तीनी कवि महमूद दरवेश की एक कविता, जो उनके जीवन के आख़िरी समय की कविताओं में से एक ‘दूसरों का सोचो’ हिंदी अनुवाद में यों लगती है:
जब अपना सुबह का नाश्ता तैयार करो तो दूसरों का सोचो
(कबूतरों का खाना मत भूलो)
जब तुम अपने युद्ध लड़ रहे हो, दूसरों का सोचो
(जो शान्ति चाहते हैं उन्हें मत भूलो)
जब तुम अपना पानी का बिल चुकाते हो, दूसरों का सोचो
(उनके बारे में जो बादलों से भरा पानी पीते हैं)
जब तुम घर लौटते हो, अपने घर, दूसरों का सोचो
(कैम्प के लोगों को मत भूलो)
जब तुम सोते हो और तारे गिनते हो, दूसरों का सोचो
(उनका जिनके पास सोने की कोई जगह नहीं)
जब तुम अपने को उपमाओं में व्यक्त करते हो, दूसरों का सोचो
(उनका जो बोलने का हक गंवा चुके है)
जब तुम बहुत दूर के दूसरों के बारे में सोचते हो, अपने बारे में सोचो
(मसलन अगर मैं सिर्फ़ अंधेरे में एक मोमबत्ती हो पाता)
(लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं.)
