दिल्ली: कोर्ट ने 14 जेएनयू छात्रों की तत्काल रिहाई का आदेश दिया

दिल्ली की एक अदालत ने जेएनयू में एक प्रदर्शन के बाद गिरफ़्तार किए गए 14 छात्रों को तुरंत रिहा करने का आदेश देते हुए कहा कि ज़मानत दिए जाने के बाद सत्यापन की प्रक्रिया आरोपियों को जेल में रखने का कारण नहीं बन सकती.

जेएनयू छात्रों का प्रदर्शन. (फोटो साभार: X/@Dipankar_cpiml)

नई दिल्ली: दिल्ली की एक अदालत ने रविवार (1 मार्च) को पिछले सप्ताह हुए विरोध प्रदर्शन के बाद गिरफ्तार किए गए जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के 14 छात्रों को तत्काल रिहा करने का निर्देश दिया. अदालत ने कहा कि जमानत दिए जाने के बाद प्रक्रियागत औपचारिकताओं के कारण उनकी हिरासत जारी नहीं रखी जा सकती.

इन छात्रों को शुक्रवार (27 फरवरी) को जमानत दे दी गई थी. उन्हें जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्रसंघ (जेएनयूएसयू) द्वारा कुलपति शांतिश्री धूलिपुड़ी पंडित की टिप्पणियों के खिलाफ आयोजित विरोध प्रदर्शन के दौरान गिरफ्तार किया गया था. हालांकि अदालत द्वारा तय की गई शर्तों में शामिल उनके स्थायी पते के सत्यापन की प्रक्रिया पूरी न होने के कारण उनकी रिहाई में देरी हुई.

पटियाला हाउस अदालत के न्यायिक मजिस्ट्रेट (प्रथम श्रेणी) रवि ने कहा कि सत्यापन की प्रक्रिया जमानत मिलने के बाद आरोपियों को जेल में रखने का कारण नहीं बन सकती.

समाचार एजेंसी पीटीआई के अनुसार न्यायाधीश ने कहा, ‘हालांकि उक्त निर्णय अंतरिम जमानत दिए जाने के बाद जेल प्रशासन और पुलिस द्वारा जमानती बॉन्ड के सत्यापन से संबंधित था, लेकिन इसके पीछे का संवैधानिक सिद्धांत स्पष्ट है कि प्रक्रियागत औपचारिकताओं को इतना लंबा नहीं खींचा जा सकता कि जमानत का न्यायिक आदेश ही निरर्थक हो जाए.’

बुधवार को हुए विरोध प्रदर्शन के दौरान 14 छात्रों की गिरफ्तारी, छात्रों और जेएनयू प्रशासन के बीच कई दिनों से चल रहे टकराव के बाद हुई. यह मार्च प्रस्तावित ‘रोहित एक्ट’ को लागू करने, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के समानता संबंधी नियमों को बहाल करने और विश्वविद्यालयों में की गई फंडिंग कटौती को वापस लेने की मांगों को लेकर आयोजित किया गया था.

छात्रों ने उन टिप्पणियों को लेकर कुलपति पंडित के इस्तीफे की भी मांग की, जिन्हें व्यापक रूप से अपमानजनक और जातिवादी बताया गया. उन्होंने हाल ही में एक साक्षात्कार में दलितों और पिछड़े वर्गों द्वारा सम्मान और अधिकारों की मांग को ‘विक्टिम कार्ड खेलना’ बताया था.

अदालत ने शुरुआत में छात्रों की रिहाई के लिए उनके स्थायी पते के सत्यापन को अनिवार्य शर्त बनाया था, क्योंकि कुछ आरोपियों ने अपने पते का खुलासा नहीं किया था. लेकिन चूंकि कई छात्र देश के अलग-अलग हिस्सों से हैं, उनके वकीलों ने कहा कि सत्यापन की प्रक्रिया में काफी समय लग रहा है और इससे जमानत मिलने के बावजूद उनकी रिहाई में देरी हो रही है. जमानती बॉन्ड अभी दाखिल नहीं किए जाने के कारण छात्रों को 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया था.

बाद में बचाव पक्ष ने बिना पते के सत्यापन की प्रतीक्षा किए तत्काल रिहाई की मांग करते हुए आवेदन दाखिल किया. छात्रों की ओर से अधिवक्ता अभिक चिमनी और सिद्धार्थ गणेशन के नेतृत्व में वकीलों ने दलील दी कि केवल इसलिए आरोपियों को अनिश्चितकाल तक जेल में नहीं रखा जा सकता क्योंकि पुलिस को जमानतदारों के सत्यापन के लिए अधिक समय चाहिए.

अभियोजन पक्ष ने इस मांग का विरोध करते हुए अदालत को बताया कि सत्यापन के लिए अधिकारियों को देशभर में छात्रों के संबंधित पतों पर भेजा जा चुका है और प्रक्रिया पूरी किए बिना उन्हें रिहा करने से आरोपियों के जमानत का उल्लंघन कर फरार होने का खतरा है.

हालांकि अदालत ने माना कि पता सत्यापन एक महत्वपूर्ण प्रक्रियात्मक कदम है, लेकिन इसे न्यायिक हिरासत को लंबा करने वाली बाधा बनने की अनुमति नहीं दी जा सकती.

न्यायाधीश ने यह भी उल्लेख किया कि जांच अधिकारी ने स्वीकार किया था कि सत्यापन में देरी यात्रा संबंधी कठिनाइयों और बैंक अवकाश जैसे बाहरी कारणों से हुई, न कि आरोपियों की किसी गलती के कारण.

अदालत ने यह भी कहा कि छात्र युवा हैं और आदतन अपराधी नहीं हैं, इसलिए जमानत मिलने के बावजूद उन्हें जेल में रखना उनके शैक्षणिक भविष्य के लिए हानिकारक होगा.