विभाजन अध्ययन में गंभीर अकादमिक कार्य प्रायः अंग्रेजी में मिलते हैं और हिंदी समेत अन्य भारतीय भाषाओं में इसकी एक कमी निस्संदेह खलती है. ऐसे में हाल ही में दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रोफेसर, आलोचक और अनुवादक बलवंत कौर का विभाजन पर आया शोधपरक कार्य ‘स्मृति और दंश: विभाजन, निरंतरता और तीसरी पीढ़ी’ विभाजन अध्ययन के विशद आयाम में एक ज़रूरी पक्ष जोड़ता है.
यह किताब इतिहास लेखन नहीं है. कौर यहां निजी/पारिवारिक/सामुदायिक अनुभवों, साक्षात्कारों और विभाजन पर अब तक हुए कार्यों के आधार पर अपना सैद्धांतिक ढांचा निर्मित करती हैं और विभाजन-साहित्य के विश्लेषण से इतिहास की पुनर्परीक्षा करती हैं. यह किताब एक मानीख़ेज कोलाज है. यहां इतिहास, साहित्य, राजनीति, समाज, सब मिलकर एक ऐसे अनुशासन का निर्माण करते हैं जहां आप उन विमर्शों को भली-भांति समझ सकते हैं जो अंग्रेजी की जटिल शब्दावली में बस बौद्धिक इंद्रजाल बन कर रह जाते हैं.
यह किताब एक गंभीर अकादमिक शोध होने के बावजूद एक आत्मीय पाठ है. कौर स्वयं किताब की भूमिका में यह स्वीकार करती हैं कि कैसे न तो वह कोई इतिहासकार है और न ही स्मृति अध्ययन की विशेषज्ञ, पर फिर भी वह इन ऐतिहासिक क्षणों पर अपनी प्रतिक्रिया दर्ज करना चाहती हैं. और इन क्षणों को देखने और समझने के लिए वह तीसरी पीढ़ी के अवचेतन में बसे स्मृति भंडार को तो प्रयोग में लाती ही हैं, पर इसके साथ ही हिन्दी, उर्दू, पंजाबी, सिन्धी, बांग्ला इन सबके साहित्य को अपना आधार बनाती हैं जो इतिहास को सामाजिक अनुभवों से सिद्ध करने में वस्तुतः कारगर साबित होता है. साहित्य इस प्रकार से उन अनुभवों को समेट पाने का एक अच्छा माध्यम बनता है, जहां किसी घटना पर फ़ौरी प्रतिक्रिया से अधिक विचार हैं.
विभाजन अध्ययन के विशद अनुशासन में यह किताब मूलतः हिंसक घटनाओं के केंद्र में कार्य करने वाली चेतना की पड़ताल करते हुए उसके प्रभावों पर विचार करती है. यह चेतना प्रायः देश को या व्यक्तियों को सांस्कृतिक रूपकों में बदल देती है और हिंसा को अवश्यम्भावी और तर्कसंगत ठहराने लगती है.
मसलन, कैसे चौरासी की हिंसा को इस तर्क पर जायज़ ठहराया जाने लगा था कि देश की प्रधानमंत्री की हत्या देश की ‘मां’ की हत्या है और दंगाई, जो कि एक हिंसक उग्र भीड़ थे, वह अपने आप में पूरे देश के प्रतिनिधि. किताब के पहले अध्याय में साल 1984 में हुए जनसंहार के संदर्भ में कौर का किया गया यह विश्लेषण हमें कई धरातलों पर विचार के बिंदु देता है.
बहरहाल, छह अध्यायों में संकलित इस किताब में शीर्षकों की योजना मानीखेज़ है. ‘बेवतनी से बदवतनी तक’ चौरासी की हिंसक स्मृतियों से संवाद है, तो ‘बुल्ला की जाणा मैं कौन’ पहचान और अन्यता की पड़ताल करता है. इसी प्रकार ‘अज्ज अक्खां वारिस शाह नूँ’ स्त्रियों पर हुई दुहरी हिंसा और ‘यूँ उठे आह उस गली से हम’ परिवार और राष्ट्र के बर-अक्स स्त्रियों के बेघर होने का जायज़ा लेते हैं. ‘लम्हा-ए-हिजरत’ शरणार्थी की पहचान और नागरिकता से जुड़े मसलों को रेखांकित करते हैं तो अंतिम अध्याय ‘चराग-ए-आखिर ए शब’ हिंसा के बीच बची रह गई मानवता की शिनाख्त करते हुए इस निष्कर्ष पर पहुंचती हैं कि ‘हिंसा के दौर में बचाव करने वाले लोग मुख्यधारा के इतिहास में मौजूद नहीं हैं लेकिन अगर वे आज भी लोगों की स्मृतियों का हिस्सा हैं तो वह अंधेरे हिंसक समय के विरुद्ध एक बयान है’.
स्मृति और दंश विभाजन की निरंतरता को स्वातंत्र्योत्तर परिप्रेक्ष्य में उन सभी महत्त्वपूर्ण पड़ावों पर देखती है, जो हमारे वर्तमान की दुश्चिंताओं के निर्माण में उत्तरदायी हैं और यह देखना मुख्यतः तीसरी पीढ़ी के द्वारा हुआ है जो 1947 के भुक्तभोगियों से प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े हुए हैं. एक ऐतिहासिक दौर को देखने का यह वह विशिष्ट स्थान है जो बिना किसी भय या अतिरिक्त दबाव के उन समयों को देख पाने में अधिक समर्थ है.
कौर आधुनिक भारत के कुछ हिंसात्मक क्षणों के संदर्भ में अपनी संकल्पनाओं को एक आलोचनात्मक रुख के साथ प्रस्तावित करती हैं. मसलन, कैसे स्मृतियों का विभाजन, राष्ट्र की चेतना के विभाजन में बदल चुका है और यह भारतीय अल्पसंख्यकों के निजी, रोजमर्रा के अनुभवों में आए परिवर्तनों में लक्ष्य किया जाता है. चौरासी के हादसों के बाद सिखों में घर कर गए असुरक्षा बोध का एक आयाम यह था कि वह इस बात से तारतम्य बिठा पाने में असफल थे कि कैसे यही वो मुहल्ले हैं, यही वो लोग हैं जिनके बीच वो हमेशा से रहते आए थे.
उनकी एक विशिष्ट पहचान इन नई परिस्थितियों में राष्ट्र के लिए एक समस्यामूलक अवधारणा थी. पहचान और अन्यता के पीछे काम करने वाले सामाजिक-सांस्कृतिक-धार्मिक समीकरणों की बात करते हुए कौर, एरिक हॉब्सबॉम के राष्ट्रवाद की अवधारणा के अनुसार, उस समीकरण के सभी कारकों को एक वृहत्तर निकाय ‘राष्ट्रवाद’ से जोड़ देती हैं. और इस प्रकार यह दिखलाती हैं कि कैसे न केवल इतिहास के उन क्षणों में धर्म को राष्ट्रवादी विचारधारा से जोड़ा गया बल्कि आज भी यह गठबंधन बहुलतावाद को, भारतीय समाजों की सांकृतिक विविधता को एकसार करने, सपाट करने पर तुला हुआ है.
यह धर्म आधारित अति-राष्ट्रवाद (hyper-nationalism) ही ‘एक धर्म, एक भाषा, एक संस्कृति का राग आलाप कर’ किसी भी प्रकार के प्रतिरोध को, विरोध को, आवाज़ों को चुप करवाना चाहता है.
पहचान के ही संदर्भ में एक और उल्लेखनीय बात की तरफ़ कौर हमारा ध्यान दिलाती हैं कि कैसे विस्थापितों को एक नए परिवेश में सांस्कृतिक-राजनीतिक वैधता प्राप्त करने के लिए कई बार अपनी वास्तविक और पुरानी पहचान से खुद को अलग भी करना पड़ता है. वह सिंधी शरणार्थियों के संदर्भ में इस बात को अधिक विस्तार से स्पष्ट करती हैं कि कैसे पाकिस्तान से आए इन सिंधियों की संस्कृति जिन पर सूफ़ी मत और सिख मत का अधिक प्रभाव था, ‘शुद्धता और मुख्यधारा का हिस्सा बनने के दबाव ने’ उन्हें एक नई सिंधी पहचान बनाने के लिए बाध्य किया जहां वह उन पुरानी परंपराओं के प्रभाव से निकल कर हिंदू परंपराओं के नज़दीक होते गए.
पुस्तक कुछ प्रचलित स्थापनाओं या शब्दावलियों पर भी एक प्रश्नात्मक रुख़ अपनाती है. मसलन, शरणार्थी शब्द अपने आप में एक विवादित संकल्पना है. निवासित, शरणार्थी, प्रवासी यह सब शब्द अपने अलग-अलग संदर्भों के कारण अलग अर्थवत्ता रखते हैं. एड्वर्ड सईद अगर ‘रिफ़्यूजी’ शब्द को एक राजनीतिक शब्द मानते हुए उसे बीसवीं सदी के राष्ट्र-राज्यों की उपज मानते हैं तो वहीं यूनाइटेड नेशंस कन्वेन्शन ऑन रिफ़्यूजी, अपनी राष्ट्रीयता के देश से बाहर रहने वाले लोगों की इस श्रेणी में रखता है.
पर हन्ना आरेंट इसके विपरीत इस प्रचलित परिभाषा से अपनी असहमति जताते हुए शरणार्थी होने को राज्यविहीनता की एक स्थिति समझती हैं. पर कौर इन प्रचलित परिभाषाओं पर सवाल उठाते हुए यह विचार करती हैं कि कैसे विभाजन के शरणार्थियों के साथ राज्यविहीनता की शर्तें औपचारिक रूप से लागू नहीं होतीं बल्कि शरणार्थियों को अपनाना और उन्हें पुनर्वासित करना दोनों ही नवनिर्मित संप्रभु राष्ट्र-राज्य की नैतिक और संवैधानिक कर्तव्य और इच्छाशक्ति थी.
कौर ने विभाजन के पूरे विमर्श में ‘स्थान’ या ‘संबद्धता’ की अवधारणा को एक नारीवादी नज़रिए से देखा है. ‘यूँ उठे आह उस गली से हम’ में अपने मूल स्थानों से उखड़ कर नए राष्ट्र-राज्यों में ज़बरन बसने के लिए विवश लोगों के लिए स्थान एक भौगोलिक नहीं बल्कि मानसिक निर्मिति (mental construct) है. किसी स्थान विशेष से संबद्धता के पूरे प्रश्न को महिलाओं के नज़रिए से देखने के पीछे मुख्य वजह यह है कि ‘घर’ स्त्री का एक ऐसा सामाजिक स्पेस है जहां वह अपने को विस्तार देती है. इस पूरे संदर्भ को वह विभाजन आधारित साहित्य में स्त्रियों के अनुभव से समझाती हैं.
यह किताब चूंकि इन हिंसक क्षणों को साहित्य के माध्यम से संश्लेषित करने का एक उपक्रम है, वह इस माध्यम की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठाती है. जिस प्रकार इतिहास लिखने वाले व्यक्ति या संस्था के पूर्वाग्रहों की चर्चा अकादमिक जगत के विमर्श का एक हिस्सा रही है, उसी प्रकार एक साहित्यकार की प्रतिबद्धता या उसके अपने पूर्वाग्रहों की बात आम तौर पर साहित्यिक आलोचना के रडार पर नहीं आती.
कौर इस कमी को लेकर सजग हैं और कहती हैं कि ‘साम्प्रदायिकता, विशेष रूप से विभाजन तथा दंगों पर लिखे साहित्य पर इस संदर्भ में अब तक कोई चर्चा नज़र नहीं आती’. पर यहीं पर हमें स्वयं इस किताब में एक कमी जो खलती है वह यह कि लेखिका ने सैंतालिस पर लिखे गए साहित्य को तो समुचित स्थान अपने विमर्शों के परीक्षण में दिया है, पर चौरासी के आधार पर लिखे साहित्य से विश्लेषित अंश बहुत कम हैं. पर किताब यह दिखला पाने में सफल हुई है कि कैसे विभाजन की तमाम नृशंसताओं के आख्यानों के बीच भी कुछ ऐसी कहानियां जीवित रह जाती हैं जो उनकी होतीं हैं जिन्होंने कठिन समय में भी अपने नैतिक विवेक को बनाए रखा.
उन बचाने वालों की कहानियां जिनके दम पर सिर्फ़ मनुष्य नहीं बल्कि कई पीढ़ियों के लिए ही मानवीयता की इबारतें बचाई जा सकती हैं. कौर उन कहानियों को साहित्य में भी ढूंढती हैं और अपनी निजी संस्मरणों में भी.
बहरहाल, स्मृति और दंश एक बड़ा सवाल उठाती है और वह यह कि हिंसक अनुभवों की व्यक्तिगत या सामुदायिक स्मृति क्या राष्ट्र की सामूहिक स्मृति का हिस्सा बन सकती है या नहीं ? कहने का अर्थ यह कि किसी समुदाय विशेष द्वारा झेली गई हिंसा और उसकी त्रासद स्मृतियां क्या सिर्फ उस समुदाय द्वारा ताउम्र, पीढ़ी-दर-पीढ़ी झेली जानी चाहिए या उन स्मृतियों को राष्ट्र के संपूर्ण सामाजिक-सांस्कृतिक नैरेटिव का एक हिस्सा बनना चाहिए. ताकि इतिहास की ज़्यादतियों को झेलने के लिए कोई एक समुदाय अभिशापित न हों और पूरे राष्ट्र की सांस्कृतिक-सामूहिक स्मृतियां उन क्षणों के लिए एक जवाबदेही महसूस करे.
आज के राजनीतिक-सामाजिक-सांस्कृतिक ध्रुवीकरण के माहौल में इस तरह की किताबें हमें अपने विवेक और दृष्टि के संकुचित कर लेने के ख़तरों के प्रति आगाह करती हैं और इस लिहाज़ से स्मृति और दंश, बहुसंख्यकवादी आख्यानों की भीड़ में एक ज़रूरी हस्तक्षेप है.
(अदिति भारद्वाज गद्यकार हैं, जो साहित्य और सिनेमा में रुचि रखती हैं.)
