नई दिल्ली: करीब छह साल पहले चीनी कंपनियों के निवेश पर लगाए गए प्रतिबंधों के बाद और दोनों देशों के संबंधों में जारी नरमी के बीच भारत ने मंगलवार (10 मार्च) को इन पाबंदियों में ढील देने का फैसला किया.
सरकार ने कहा कि व्यापक प्रतिबंध निवेश के प्रवाह पर नकारात्मक असर डाल रहे थे.
अब ऐसी कंपनियां जिनमें चीनी संस्थाओं की 10% तक गैर-नियंत्रणकारी लाभकारी हिस्सेदारी है, वे सेक्टर-विशिष्ट निवेश सीमाओं के अधीन रहते हुए बिना सरकारी मंजूरी के निवेश कर सकेंगी. इसके अलावा, पूंजीगत वस्तुओं, इलेक्ट्रॉनिक पूंजीगत वस्तुओं, इलेक्ट्रॉनिक घटकों, पॉलीसिलिकॉन और इंगट-वेफर क्षेत्रों में प्रस्तावित चीनी निवेशों को भारत 60 दिनों के भीतर मंजूरी देगा, बशर्ते निवेश प्राप्त करने वाली कंपनी का बहुमत स्वामित्व और नियंत्रण भारत के रेसिडेंट संस्थाओं के पास हो.
मंत्रिमंडल ने मंगलवार को कहा कि इस कदम से भारत में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) बढ़ने की संभावना है, साथ ही घरेलू कंपनियों के विस्तार में मदद मिलेगी, वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं के साथ एकीकरण मजबूत होगा और निवेश तथा विनिर्माण केंद्र के रूप में भारत की प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ेगी.
हालांकि, जैसे अप्रैल 2020 में प्रतिबंध लगाए जाने के समय हुआ था, सरकार ने इस बार भी चीन का नाम सीधे तौर पर नहीं लिया और केवल ‘स्थल-सीमा से सटे देशों’ (एलबीसी) का उल्लेख किया. लेकिन यह व्यापक तौर पर माना जाता है कि ये प्रतिबंध विशेष रूप से चीनी कंपनियों को ध्यान में रखकर लगाए गए थे.
अपने बयान में मंत्रिमंडल ने कहा कि इन प्रतिबंधों का लागू होना उन स्थितियों में भी निवेश को प्रभावित कर रहा था, जहां ‘एलबीसी निवेशकों’ यानी चीनी कंपनियों की केवल ‘गैर-रणनीतिक और गैर-नियंत्रणकारी हिस्सेदारी’ थी. इससे वैश्विक प्राइवेट इक्विटी और वेंचर कैपिटल फंडों से आने वाला निवेश भी बाधित हो रहा था.
भारत के एफडीआई नियमों में संशोधन के बाद अब ऐसे निवेशक, जिनमें किसी एलबीसी संस्था की 10% तक गैर-नियंत्रणकारी लाभकारी हिस्सेदारी है, ‘ऑटोमैटिक रूट’ के तहत निवेश कर सकेंगे, जिसके लिए सरकारी मंजूरी की आवश्यकता नहीं होगी.
पूंजीगत वस्तुओं, इलेक्ट्रॉनिक पूंजीगत वस्तुओं, इलेक्ट्रॉनिक घटकों, पॉलीसिलिकॉन (जो मुख्य रूप से सौर सेल बनाने में इस्तेमाल होने वाला सिलिकॉन का एक रूप है) और इंगट-वेफर (जो सेमीकंडक्टर तथा सौर सेल और मॉड्यूल से जुड़ा होता है) क्षेत्रों में एलबीसी निवेश से जुड़े प्रस्तावों पर दो महीने के भीतर निर्णय लिया जाएगा.
हालांकि, ऐसे मामलों में निवेश प्राप्त करने वाली कंपनियों का बहुमत स्वामित्व और नियंत्रण भारतीय निवासियों के पास होना आवश्यक होगा.
यह बदलाव लगभग छह साल बाद आया है, जब अप्रैल 2020 में नई दिल्ली ने एफडीआई की आधिकारिक जांच को बांग्लादेश और पाकिस्तान से आगे बढ़ाकर सभी ‘स्थल-सीमा से सटे देशों’ तक लागू कर दिया था. उस समय सरकार ने कहा था कि कोविड-19 महामारी के दौरान भारतीय कंपनियों के ‘अवसरवादी अधिग्रहण या अधिग्रहण प्रयासों’ को रोकने के लिए यह कदम उठाया गया है.
इसके एक महीने बाद पूर्वी लद्दाख में भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच झड़प हुई थी, जो जून में गलवान घाटी में हुए घातक टकराव तक पहुंची थी. इसके बाद दोनों देशों के रिश्तों में ठहराव आ गया था. यह ठहराव अक्टूबर 2024 में सीमा के पश्चिमी क्षेत्र में ‘गश्त व्यवस्था’ पर सहमति बनने के बाद धीरे-धीरे कम होना शुरू हुआ.
इस दौरान इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग से जुड़ी संस्थानों ने निवेश और वीजा प्रतिबंधों के कारण हाथ से निकले अवसरों की शिकायत की थी. वित्त मंत्रालय ने जुलाई 2024 में आर्थिक सर्वेक्षण में तर्क दिया था कि ‘चीनी कंपनियों का भारत में निवेश करना और यहां उत्पाद बनाकर उन्हें अमेरिकी और यूरोपीय बाजारों में निर्यात करना अधिक प्रभावी है, बजाय इसके कि चीन से सामान आयात किया जाए, उसमें न्यूनतम मूल्य जोड़ा जाए और फिर दोबारा निर्यात किया जाए.’
बाद में दोनों देशों के रिश्तों में आई नरमी के बीच – जिसमें सीमा व्यापार फिर से शुरू करने, सीधी उड़ानों की बहाली और भारत द्वारा चीनी कारोबारियों के लिए वीजा मंजूरी आसान बनाने जैसे कदम शामिल हैं – नीति आयोग ने कथित तौर पर निवेश प्रतिबंधों में ढील देने की सिफारिश की थी.
वहीं, रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, वित्त मंत्रालय ने भारतीय सरकारी ठेकों के लिए बोली लगाने वाली चीनी कंपनियों पर अतिरिक्त जांच खत्म करने पर भी विचार किया था. हालांकि, यह भी ध्यान दिलाया गया है कि मंगलवार को घोषित किए गए ढील का दायरा उन सिफारिशों की तुलना में सीमित है.
दुनिया में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के प्रमुख स्रोतों में शामिल होने के बावजूद एक अनुमान के अनुसार पिछले साल तक भारत में कुल एफडीआई भंडार में चीनी निवेश की हिस्सेदारी केवल लगभग 0.3% थी.
