नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (10 मार्च) को ‘फर्जी और भ्रामक’ ऑनलाइन सामग्री से देश की सुरक्षा और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार की रक्षा के बीच संतुलन बनाने की मांग की, जबकि केंद्र सरकार ने कहा कि उसका सूचना प्रौद्योगिकी नियम के जरिए हास्य, व्यंग्य या सरकार की आलोचना पर अंकुश लगाने का कोई ईरादा नहीं है.
रिपोर्ट के मुताबिक, एडिटर्स गिल्ड और कॉमेडियन कुणाल कामरा ने सवाल उठाया कि कोई ऑनलाइन सामग्री ‘फर्जी या भ्रामक’है, इसे कौन तय करता है. इस पर सरकार ने जानकारी दी कि जब वे इस देखते हैं, उन्हें पता चल जाता है.
इंडिया टुडे ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ को बताया कि सवाल फर्जी और भ्रामक सूचनाओं का है और सरकार का हास्य, व्यंग्य या आलोचना को दबाने का कोई इरादा नहीं है.
द हिंदू के अनुसार, इस सुनवाई के दौरान खास बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे हाईकोर्ट के उस फैसले पर रोक लगाने से इनकार कर दिया, जिसमें प्रेस सूचना ब्यूरो के नेतृत्व वाली विवादित फैक्ट-चेक यूनिट (एफसीयू) की स्थापना के लिए जारी अधिसूचना को रद्द कर दिया गया था.
उल्लेखनीय है कि केंद्र सरकार द्वारा मार्च 2024 में प्रेस सूचना ब्यूरो के माध्यम से अधिसूचित एफसीयू विवादों के घेरे में है. कई मीडिया संस्थानों ने इसके कार्यक्षेत्र और कार्यप्रणाली पर गंभीर आपत्तियां उठाई हैं.
द हिंदू के मुताबिक, इस फैक्ट चेक यूनिट का उद्देश्य केंद्र के अनुसार कामकाज से संबंधित फर्जी खबरों या गलत सूचनाओं के निर्माण और प्रसार को रोकना था.
इससे पहले बॉम्बे उच्च न्यायालय ने एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया और स्टैंड-अप कॉमेडियन कुणाल कामरा द्वारा दायर याचिकाओं के बाद इस मामले पर फैसला सुनाते हुए सितंबर 2024 में एफसीयू अधिसूचना को रद्द कर दिया था.
इसके साथ ही न्यायालय ने संशोधित आईटी नियम 2023 को ‘असंवैधानिक’ और संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), 19 (वाक्य और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) और 19(1)(जी) (पेशा करने की स्वतंत्रता और अधिकार) का उल्लंघन बताया था.
नियमों में प्रयुक्त ‘फ़र्ज़ी, झूठे और भ्रामक’ शब्दों को उनकी परिभाषा के अभाव में ‘अस्पष्ट और इसलिए गलत’ माना गया था. उच्च न्यायालय ने कहा था कि सरकार ‘सत्य की एकमात्र निर्णायक’ की भूमिका नहीं निभा सकती.
केंद्र सरकार ने उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में अपील दाखिल की है.
एडिटर्स गिल्ड, एसोसिएशन ऑफ इंडियन मैगजीन्स, न्यूज ब्रॉडकास्टर्स ऑफ डिजिटल एसोसिएशन और कुणाल कामरा की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद दातार और एनए सीरवाई ने पूछा, ‘एफसीयू का संचालन कौन करता है? अधिसूचना के आधार पर ऐसी इकाई का गठन कैसे हो सकता है? उच्च न्यायालय ने तो सरकार को केवल उचित नियम बनाने के लिए कहा था.’
केंद्र सरकार की ओर से तुषार मेहता ने बीच में ही कहा, ‘इसे देखकर ही पता चलता है कि यह फर्जी है.’
सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय ने कहा, ‘याचिकाकर्ताओं द्वारा उठाया गया सवाल अत्यंत महत्वपूर्ण है और कोर्ट इस मुद्दे पर कानून की स्पष्ट व्याख्या करेगा. उच्च न्यायालय द्वारा उठाए गए मुद्दे इस प्रश्न की ओर ले जाते हैं कि व्यक्तिगत संवैधानिक अधिकारों को नष्ट किए बिना अधिकारों में संतुलन कैसे स्थापित किया जाए.’
मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने मध्यस्थों की कार्रवाइयों पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा, ‘आप किसी व्यक्ति के जीवन को नुकसान पहुंचा सकते हैं… आप राष्ट्र को नुकसान पहुंचा सकते हैं… मैं राष्ट्र पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर चिंतित हूं.’
मुख्य न्यायाधीश ने आगे कहा, ‘स्पष्ट दिशानिर्देश होने चाहिए, लेकिन साथ ही गड़बड़ी करने वालों पर कोई दायित्व डाले बिना सारा दोष सरकारी तंत्र पर डालना गहन विचार-विमर्श की मांग करता है.’
गौरतलब है कि इससे पहले द वायर ने केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा सहयोग पोर्टल के लिए तैयार किए गए उन मैनुअलों पर रिपोर्ट किया था, जो त्वरित सेंसरशिप को सक्षम बनाने के लिए एक खाके की तरह हैं. ये मैनुअल बिना ज्यादा सोचे-समझे बड़ी संख्या में सामग्री को हटाना आसान बनाते हैं.
