नई दिल्ली: पूर्व वित्त और आर्थिक मामलों के सचिव सुभाष चंद्र गर्ग ने डेक्कन हेराल्ड में प्रकाशित एक लेख में वैश्विक भू-राजनीतिक उथल-पुथल के दौर में भारत की रक्षा तैयारी पर हो रहे खर्च को लेकर सवाल उठाए हैं.
उनका कहना है कि कागज़ों पर रक्षा व्यय बड़ा दिखाई देता है, लेकिन ‘घातक क्षमताओं (lethal capacities) में वास्तविक निवेश अभी भी अपर्याप्त है.’
गर्ग के अनुसार बजट में रक्षा आवंटन बढ़ा जरूर है, लेकिन विस्तृत आंकड़ों से पता चलता है कि यह अतिरिक्त खर्च उन क्षेत्रों में नहीं जा रहा है जो भारत की वास्तविक सैन्य क्षमता को मजबूत करें. पेंशन को छोड़कर ‘वास्तविक’ रक्षा खर्च 2024-25 से 2025-26 के बीच लगभग 18% बढ़ा. यह वृद्धि ऑपरेशन सिंदूर के बाद हुई थी और उस समय विशेषज्ञों को उम्मीद थी कि इसमें और अधिक बढ़ोतरी होगी.
हालांकि, गर्ग के अनुसार वास्तविक प्रभावी बढ़ोतरी लगभग 10% ही रही, जो क्षेत्रीय सुरक्षा चुनौतियों को देखते हुए काफी कम है.
उन्होंने बताया कि 2025-26 में केंद्र सरकार ने 361.31 अरब रुपये अपने ही दूरसंचार विभाग को स्पेक्ट्रम शुल्क के रूप में चुकाए. पहले रक्षा स्पेक्ट्रम मुफ्त था, इसलिए यह खर्च पहले नहीं लगता था. गर्ग के अनुसार यह भुगतान रक्षा क्षमता बढ़ाने वाला खर्च नहीं माना जा सकता.
उन्होंने यह सवाल भी उठाया कि 2025-26 के बजट में 316.31 अरब रुपये और 2026-27 के बजट में 98 अरब रुपये – कुल 414.3 अरब रुपये (लगभग 4.6 अरब डॉलर) – को टेक्नोलॉजी इन नेशनल सिक्योरिटी फंड के तहत क्यों रखा गया, जबकि इसे रक्षा बजट में शामिल नहीं किया गया.
गर्ग के मुताबिक यह राशि संभवतः एस‑400 वायु रक्षा प्रणाली से जुड़ी हो सकती है. उन्होंने सवाल उठाया कि क्या यह रूस से रक्षा खरीद में ‘कम पारदर्शी व्यवस्था’ का संकेत है.
पूर्व वित्त सचिव ने स्वदेशी रक्षा तकनीक के विकास में हो रही देरी पर भी चिंता जताई. उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि कावेरी एयरो‑इंजन परियोजना में अभी तक अपेक्षित प्रगति नहीं हुई है और तेजस लड़ाकू विमान की डिलीवरी भी लगातार देरी से हो रही है.
