गृह मंत्रालय ने राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम के तहत सोनम वांगचुक की हिरासत रद्द की, जोधपुर जेल से रिहा

केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम के तहत हिरासत में लिए गए जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की हिरासत रद्द कर दी है. सितंबर 2025 से जोधपुर जेल में बंद वांगचुक को रिहा कर दिया गया. सरकार ने कहा कि यह फैसला लद्दाख में शांति, स्थिरता और संवाद का माहौल बनाने के लिए लिया गया है.

सोनम वांगचुक. (फ़ाइल फोटोः पीटीआई)

नई दिल्ली: केंद्रीय गृह मंत्रालय ने शनिवार (14 मार्च) को राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (रासुका) के तहत जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की हिरासत रद्द कर दी, जिसके बाद उन्हें जोधपुर सेंट्रल जेल से रिहा कर दिया गया है.

रिपोर्ट के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट पिछले सितंबर से उनकी पत्नी गीतांजलि आंगमो की हिरासत को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई कर रहा है. इस मामले में अगली सुनवाई 17 मार्च को होनी थी.

वांगचुक की हिरासत रद्द करते हुए गृह मंत्रालय ने एक बयान जारी कर कहा कि यह फैसला राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम के तहत मिले अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए लिया गया है. सरकार का कहना है कि यह फैसला लद्दाख में शांति और स्थिरता का माहौल बनाने के लिए लिया गया है और सोनम वांगचुक उक्त अधिनियम के तहत हिरासत की अवधि का लगभग आधा समय बिता चुके हैं.

रेमन मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक कड़े राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत सितंबर 2025 से जेल में थे. उन्हें उस समय हिरासत में लिया गया था जब लद्दाख को राज्य का दर्जा देने और संविधान की छठी अनुसूची में शामिल करने की मांग को लेकर हुए प्रदर्शन हिंसक हो गए थे.

इस संंबंध में गृह मंत्रालय ने कहा है कि केंद्र सरकार लद्दाख में शांति, स्थिरता और आपसी भरोसा कायम रखने के लिए प्रतिबद्ध है, ताकि सभी पक्षों के साथ सार्थक और रचनात्मक बातचीत हो सके. इसी उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए वांगचुक की हिरासत खत्म करने का फैसला लिया गया है.

इसके अलावा गृह मंत्रालय का कहना है कि हाल के समय में हड़ताल और विरोध प्रदर्शनों की वजह से समाज के शांतिपूर्ण माहौल पर असर पड़ा है. इसका प्रभाव छात्रों, नौकरी की तैयारी कर रहे युवाओं, व्यापारियों, टूर ऑपरेटरों, पर्यटकों और क्षेत्र की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ा है.

सरकार का कहना है कि वह लद्दाख के अलग-अलग समुदायों, नेताओं और संगठनों से लगातार बातचीत कर रही है, ताकि क्षेत्र के लोगों की चिंताओं और मांगों का समाधान निकाला जा सके.

इस मामले में सरकार ने फिर से भरोसा दिलाया कि लद्दाख के लिए सभी जरूरी सुरक्षा उपाय किए जाएंगे. साथ ही उम्मीद जताई कि क्षेत्र से जुड़े मुद्दों का समाधान संवाद और बातचीत के जरिए निकलेगा. इसके लिए बनाई गई उच्च स्तरीय समिति और अन्य मंचों का भी इस्तेमाल किया जाएगा.

उधर, लद्दाख के उपराज्यपाल कार्यालय की ओर से दी गई जानकारी में कहा गया है कि उपराज्यपाल विनय कुमार सक्सेना ने सोनम वांगचुक की हिरासत समाप्त करने के फैसले का स्वागत किया है. उन्होंने कहा कि यह केंद्र सरकार का एक सकारात्मक कदम है, जो लद्दाख में शांति, स्थिरता और आपसी विश्वास का माहौल बनाने में मदद करेगा.

उपराज्यपाल ने कहा है कि लद्दाख में आंदोलन और हिंसा के लिए कोई जगह नहीं है. उन्होंने भरोसा दिलाया कि यहां के लोगों की आकांक्षाओं और चिंताओं से जुड़े सभी मुद्दों को बातचीत के जरिए सुलझाया जाएगा.

उन्होंने यह भी कहा कि सरकार विभिन्न हितधारकों, सामुदायिक नेताओं और आम नागरिकों के साथ संवाद करके लद्दाख से जुड़े मुद्दों का समाधान निकालने की दिशा में काम करेगी.

गौरतलब है कि पिछले महीने फरवरी में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से सोनम वांगचुक के खराब स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए उनकी हिरासत पर पुनर्विचार करने को कहा था.

उल्लेखनीय है कि वांगचुक राजस्थान के जोधपुर केंद्रीय जेल में बंद थे, जो उनके घर लेह से लगभग 1,400 किलोमीटर दूर है. बार-बार पेट दर्द की शिकायत के बाद उनकी पत्नी गीतांजलि आंगमो ने वांगचुक की विशेषज्ञ डॉक्टर से जांच कराने के लिए आवेदन दिया था. उन्होंने अदालत से मासिक स्वास्थ्य रिपोर्ट भी मांगी थी.

तब पीठ ने टिप्पणी की थी कि यदि हिरासत आदेश में कानूनी खामियां हैं, तो इसे रद्द किया जा सकता है और इसके साथ ही राज्य और सलाहकार बोर्ड के सभी बाद के आदेश भी रद्द हो जाएंगे.

इस पर अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल केएम नटराज ने तर्क दिया था कि हिरासत एक वैध आधार पर भी मान्य हो सकती है, और कपिल सिब्बल के इस दावे का खंडन किया था कि आदेश में कोई विचार-विमर्श नहीं किया गया था और यह केवल पुलिस की सिफारिशों की कॉपी था.

केंद्र सरकार ने इससे पहले सर्वोच्च न्यायालय को बताया था कि वांगचुक ने युवाओं से आग्रह किया था कि यदि लद्दाख की छठी अनुसूची का दर्जा देने की मांग को अस्वीकार कर दिया जाता है, तो वे नेपाल, बांग्लादेश और श्रीलंका में युवा नेतृत्व वाले आंदोलनों से प्रेरणा लें. सरकार ने यह भी दावा किया कि वांगचुक द्वारा सरकार को ‘वे’ और लद्दाख के लोगों को ‘हम’ कहना ही राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (एनएसए) लागू करने के लिए ‘पर्याप्त’ था.