नई दिल्ली: केंद्र सरकार द्वारा फर्जी स्कूलों, फर्जी लाभार्थियों और धन की हेराफेरी से जुड़े कथित धोखाधड़ी के मामलों का हवाला देते हुए अपनी प्रमुख अल्पसंख्यक छात्रवृत्ति योजनाओं को रोक देने के तीन साल बाद भी इन मामलों की जांच लंबित है और यह स्पष्ट नहीं है कि योजनाएं कब दोबारा शुरू होंगी.
द प्रिंट की रिपोर्ट के अनुसार, सामाजिक न्याय और अधिकारिता पर संसदीय स्थायी समिति, जिसकी अध्यक्षता भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के सांसद पी.सी. मोहन कर रहे हैं, ने शुक्रवार (13 मार्च) को अल्पसंख्यकों के कल्याण से जुड़ी योजनाओं में लगातार बजट कटौती, धन के कम उपयोग और क्रियान्वयन में कमियों पर चिंता जताई.
समिति ने कहा कि अल्पसंख्यक छात्रों के लिए प्री-मैट्रिक और पोस्ट-मैट्रिक छात्रवृत्ति योजनाओं को 2021-22 के बाद मंजूरी नहीं दी गई है और 2022-23 से इन योजनाओं के तहत छात्रवृत्ति का वितरण नहीं किया गया है. इसका कारण ‘गंभीर अनियमितताएं’ बताया गया है.
समिति ने यह भी कहा कि संस्थानों द्वारा कथित रूप से गबन किए गए 144 करोड़ रुपये की वसूली के नाम पर योजना को रोक देना ‘अल्पसंख्यक छात्रों के साथ अन्याय’ है, क्योंकि इसमें उनकी कोई गलती नहीं है.
समिति ने मंत्रालय से आग्रह किया कि जिन राज्यों में अनियमितताएं कम हैं, वहां इन योजनाओं को लागू किया जाए ताकि अल्पसंख्यक छात्रों को शिक्षा के लिए मिलने वाली छात्रवृत्ति से वंचित न होना पड़े.
स्वतंत्र आर्थिक नीति अनुसंधान संस्था नेशनल काउंसिल ऑफ अप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च (एनसीएईआर) ने 2023 में पाया था कि नेशनल स्कॉलरशिप पोर्टल (एनएसपी) पर पंजीकृत कम-से-कम 830 अल्पसंख्यक संस्थान या तो फर्जी थे या काम ही नहीं कर रहे थे. इससे छात्रवृत्ति योजनाओं में लगभग 144.33 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ.
यह मामला पहली बार नवंबर 2020 में सामने आया था, जब मीडिया रिपोर्टों में कहा गया था कि बैंक कर्मचारियों, बिचौलियों, स्कूल कर्मचारियों और सरकारी अधिकारियों के गठजोड़ द्वारा छात्रवृत्ति की राशि में हेराफेरी की जा रही है. इसके बाद अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय ने असम, बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़ और पंजाब से जांच करने को कहा था. बाद में एनसीएईआर की रिपोर्ट के आधार पर यह मामला केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) को सौंप दिया गया.
हालांकि, इसके बाद भी जांच में बहुत कम प्रगति हुई है.
फरवरी 2025 में 6,055 संस्थानों को सत्यापन के लिए राज्य सरकारों को भेजा गया था, लेकिन समिति की रिपोर्ट के अनुसार, इनमें से 5,046 मामलों में ही भौतिक निरीक्षण पूरा हुआ है, जबकि 1,009 मामले अभी भी लंबित हैं. जिन संस्थानों की जांच की गई, उनमें से 609 को पूरी तरह या आंशिक रूप से फर्जी पाया गया.
विभिन्न राज्यों में अब तक 193 एफआईआर दर्ज की गई हैं, 33 विभागीय कार्रवाई शुरू हुई है और लगभग 29 लाख रुपये की वसूली की गई है.
द प्रिंट की रिपोर्ट के अनुसार, हालांकि यह वसूली उस राशि से संबंधित है जो पोर्टल द्वारा चिन्हित मामलों से जुड़ी थी. एनसीएईआर के मूल नमूने में शामिल 830 संस्थानों के खिलाफ कितनी राशि वसूल की गई, इसका उल्लेख समिति की रिपोर्ट में नहीं है.
द वायर पहले भी रिपोर्ट कर चुका है कि इस वर्ष के केंद्रीय बजट में अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय को कागज़ों पर अधिक आवंटन दिखने के बावजूद वर्षों से इस मंत्रालय के वित्तपोषण में पारदर्शिता और निरंतरता की कमी रही है.
2025-26 में मेरिट-कम-मीन्स छात्रवृत्ति के लिए 7.34 करोड़ रुपये आवंटित किए गए थे. इस वर्ष यह राशि घटाकर केवल 0.06 करोड़ रुपये कर दी गई है, जिससे यह योजना लगभग समाप्त ही हो गई है.
2024-25 में इस योजना के लिए 33.80 करोड़ रुपये आवंटित किए गए थे, जिसे बाद में घटाकर 19.41 करोड़ रुपये कर दिया गया।.वास्तविक खर्च केवल 3.51 करोड़ रुपये ही हुआ. इसके मुकाबले 2014-15 में इसी छात्रवृत्ति योजना के लिए 302 करोड़ रुपये का बजट आवंटित हुआ था, 317 करोड़ रुपये जारी किए गए थे और 381.38 करोड़ रुपये खर्च हुए थे.
इसी तरह मौलाना आज़ाद नेशनल फेलोशिप, जो उच्च शिक्षा में अल्पसंख्यकों – खासकर मुसलमानों – की कम भागीदारी को दूर करने के लिए शुरू की गई थी, उसे 2022-23 शैक्षणिक वर्ष से आधिकारिक रूप से बंद कर दिया गया. हालांकि यह आश्वासन दिया गया था कि पहले से चयनित छात्रों को उनकी अवधि पूरी होने तक फंड मिलता रहेगा.
फिर भी अल्पसंख्यक छात्र लगातार शिकायत करते रहे हैं कि भुगतान या तो पूरी तरह बंद हो गया है या लंबे और बिना किसी स्पष्ट कारण के विलंब के बाद जारी किया जा रहा है.
इन आंकड़ों के बीच का अंतर सरकारी नीति की दिशा में आए स्पष्ट बदलाव को दर्शाता है.
