नई दिल्ली: पूर्वोत्तर के प्रभावशाली छात्र संगठन नगा स्टूडेंट्स फेडरेशन (एनएसएफ) के बैनर तले हजारों छात्रों और नागरिकों ने सोमवार (16 मार्च) को एक रैली निकाली और केंद्र सरकार के उस निर्देश का विरोध किया जिसमें राज्य सरकार को आधिकारिक कार्यों और शैक्षणिक संस्थानों में वंदे मातरम का गायन अनिवार्य बनाया गया है.
खबरों के अनुसार, प्रदर्शनकारियों ने ‘गृह मंत्रालय का 28 जनवरी का निर्देश धर्मनिरपेक्षता पर हमला है’, ‘नगा अधिकारों से कोई समझौता नहीं’, ‘जबरदस्ती नीतियां बंद करें’ और ‘निर्देश हमारी आस्था पर सीधा हमला है’ लिखी तख्तियां लेकर कोहिमा टाउन से लोक भवन तक मार्च किया.
सभा को संबोधित करते हुए एनएसएफ के अध्यक्ष मतेइसुडिंग हेरांग ने कहा कि यह रैली इस बात की सामूहिक घोषणा है कि नगा लोगों की पहचान और आस्था को प्रशासनिक आदेशों से निर्धारित नहीं किया जा सकता.
उन्होंने कहा कि यह विरोध किसी राष्ट्र या समुदाय के खिलाफ नहीं है, बल्कि ऐसी प्रतीकात्मक प्रथाओं को थोपने के खिलाफ है जो लोगों की अंतरात्मा और विश्वास से टकराती हैं. हेरांग ने आगे कहा कि विविधता और सह-अस्तित्व नगा समाज की पहचान रहे हैं, जहां विभिन्न धर्मों और समुदायों ने शांतिपूर्वक साथ रहकर जीवन बिताया है.
समाचार एजेंसी पीटीआई के अनुसार, प्रदर्शनकारियों ने नगालैंड के राज्यपाल के माध्यम से द्रौपदी मुर्मू को संबोधित एक ज्ञापन भी सौंपा. ज्ञापन में राष्ट्रपति से अनुरोध किया गया कि नगा क्षेत्र में सरकारी कार्यक्रमों और शैक्षणिक संस्थानों में ‘वंदे मातरम’ को अनिवार्य करने वाले निर्देश को वापस लिया जाए.
ज्ञापन में यह भी कहा गया कि ऐसी नीतियों को लागू करने से पहले नगा लोगों के प्रतिनिधियों से संवाद किया जाना चाहिए, क्योंकि वे क्षेत्र की सांस्कृतिक और सामाजिक संरचना को प्रभावित कर सकती हैं.
एनएसएफ ने यह भी कहा कि वंदे मातरम के संशोधित संस्करण में एक विशेष देवी-देवता की पूजा से जुड़ी भक्तिपूर्ण छवियां शामिल हैं, जो नगा लोगों की धार्मिक और सांस्कृतिक संवेदनशीलताओं से टकराती हैं.
फेडरेशन का कहना था कि शैक्षणिक संस्थान बौद्धिक स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक मूल्यों के स्थान होने चाहिए, न कि ‘प्रतीकात्मक आज्ञाकारिता या वैचारिक एकरूपता थोपने के मंच.’
रैली में नगा पीपुल्स मूवमेंट फॉर ह्यूमन राइट्स, नगालैंड जॉइंट क्रिश्चियन फोरम, नगालैंड क्रिश्चियन रिवाइवल चर्चेज और कैथोलिक एसोसिएशन ऑफ नगालैंड के प्रतिनिधियों ने भी संबोधित किया और नगा लोगों की सांस्कृतिक व धार्मिक संवेदनशीलताओं की रक्षा की आवश्यकता पर जोर देते हुए इस विरोध का समर्थन किया.
ज्ञात हो कि इससे पहले छात्र संगठन नगा स्टूडेंट्स फेडरेशन (एनएसएफ) ने कड़ा विरोध किया था.
एनएसएफ ने 20 फरवरी को जारी बयान में कहा था, ‘यह निर्देश एक सख्त प्राथमिकता क्रम निर्धारित करता है और सबसे जरूरी बात इसे स्कूलों पर लागू करता है. ऐसा निर्देश थोपना नगा समाज की ऐतिहासिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक वास्तविकताओं की अनदेखी करता है. हम भारतीय संविधान के ढांचे, जिसमें अनुच्छेद 51A(क) भी शामिल है, से अवगत हैं, लेकिन हम स्पष्ट रूप से कहते हैं कि कोई भी प्राधिकरण नगा मातृभूमि पर इस तरह से सांस्कृतिक या विचारधारा के हिसाब से चलने के लिए मजबूर नहीं कर सकती जो हमारे खास इतिहास और पहचान की अनदेखी करे.’
केंद्रीय गृह मंत्रालय ने 28 जनवरी को दस पन्नों का एक निर्देश जारी किया था. इसमें कहा गया था कि वंदे मातरम के छह छंदों वाला, तीन मिनट दस सेकेंड का संस्करण आधिकारिक अवसरों पर बजाया या गाया जाना अनिवार्य होगा. इसमें भारतीय ध्वज फहराने के समय, कार्यक्रमों में राष्ट्रपति के आगमन पर, उनके भाषणों से पहले और बाद में, राष्ट्र के नाम उनके संबोधन के पहले और बाद में, तथा राज्यपालों के आगमन और भाषणों से पहले और बाद में इसे बजाने या गाने की बात कही गई है.
बता दें कि हाल ही में नगालैंड विधानसभा ने आपत्तियों के बीच ‘वंदे मातरम’ पर गृह मंत्रालय के निर्देश को जांच के लिए चयन समिति को भेजा था. 2 मार्च को राज्यपाल के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के विधायकों को छोड़कर लगभग सभी दलों के सदस्यों ने राष्ट्रीय गान जन गण मन से पहले वंदे मातरम बजाने या गाने को लेकर आपत्ति जताई थी.
