यूपी हेट क्राइम: योगी से लेकर अख़लाक़ के हत्यारों तक आरोपियों को सरकारी राहत मिली

योगी आदित्यनाथ की पहचान भारत के सबसे ज़्यादा आबादी वाले राज्य के मुख्यमंत्री के तौर पर इस वजह से विशेष रही कि उन्होंने एक अभियान चलाकर नफ़रती भाषण और नफ़रती अपराधों के सभी आरोपियों को बरी कर दिया- और इस अभियान की शुरुआत मुख्यमंत्री ने ख़ुद से ही की. वे देश के सबसे ज़्यादा ध्रुवीकरण करने वाले, लेकिन साथ ही बेहद लोकप्रिय कट्टरपंथी हिंदुत्ववादी नेताओं में से एक हैं.

योगी आदित्यनाथ. (फोटो साभार: फेसबुक)

भगवाधारी अजय सिंह बिष्ट, जो उत्तर प्रदेश के गोरखपुर से भाजपा के टिकट पर पांच बार सांसद चुने जा चुके हैं, 2017 से भारत के सबसे बड़े राज्य के मुख्यमंत्री हैं. जब वे साधु बने और फिर गोरखपुर में स्थित एक हिंदू मंदिर, गोरखनाथ मठ के महंत या मुख्य पुजारी बने, तो उन्होंने योगी आदित्यनाथ नाम अपना लिया.

उनके लोकसभा प्रोफाइल में उन्हें ‘धर्म प्रचारक और समाज सेवक’ बताया गया है. उन्होंने ‘हिंदू युवा वाहिनी’ नाम के एक युवा संगठन की स्थापना की और उसका नेतृत्व किया; इस संगठन पर अक्सर सांप्रदायिक हिंसा भड़काने और हिंसा में भाग लेने का आरोप लगता रहा है. वे देश के सबसे ज़्यादा ध्रुवीकरण करने वाले, लेकिन साथ ही बेहद लोकप्रिय कट्टरपंथी हिंदुत्ववादी नेताओं में से एक हैं.

भारत के सबसे ज़्यादा आबादी वाले राज्य के मुख्यमंत्री के तौर पर इस वजह से उनकी विशेष पहचान बनी कि उन्होंने एक अभियान चलाकर नफ़रती भाषण और नफ़रती अपराधों के सभी आरोपियों को बरी कर दिया- और इस अभियान की शुरुआत मुख्यमंत्री ने ख़ुद से ही की.

कट्टरपंथी साधु का उदय

धीरेंद्र झा ने ‘कारवां’ और ‘अल जज़ीरा’ में आदित्यनाथ के साधु जीवन और राजनीतिक जीवन का एक दिलचस्प ब्योरा पेश किया है. उनका जन्म 5 जून 1972 को मसलगांव के एक ठाकुर परिवार में हुआ था. यह गांव अब उत्तराखंड के उत्तरकाशी ज़िले में पड़ता है. उनके पिता एक फ़ॉरेस्ट रेंजर थे और मां एक गृहिणी थीं. उन्होंने विज्ञान विषय में स्नातक की डिग्री हासिल की. ​​वे आरएसएस की छात्र शाखा, ‘अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद’ में शामिल हो गए और छात्र संघ चुनाव में सचिव पद के लिए चुनाव लड़ा, लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली.

मास्टर्स की पढ़ाई के दौरान 1992 में गोरखपुर स्थित ‘गोरखनाथ मठ’ में उनकी मुलाक़ात महंत अवैद्यनाथ से हुई. अगले ही साल अवैद्यनाथ ने उन्हें साधु के रूप में दीक्षा दी, उनका नाम ‘आदित्यनाथ’ रखा और उन्हें अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया.

आदित्यनाथ से भी पहले से कट्टरपंथी और हिंसक हिंदुत्व की राजनीति में शामिल होने की गोरखनाथ मंदिर की एक लंबी परंपरा रही थी. अवैद्यनाथ के पूर्ववर्ती और गुरु, दिग्विजय नाथ, 1937 में ‘हिंदू महासभा’ में शामिल हुए थे. उस समय इसके अध्यक्ष वी.डी. सावरकर थे. गांधीजी की हत्या के बाद सावरकर को नौ महीने की जेल की सज़ा हुई थी. सावरकर पर यह आरोप था कि उन्होंने गांधीजी की हत्या के लिए लोगों को उकसाया था.

जेल से बाहर आने के बाद उन्हें हिंदू महासभा का महासचिव बना दिया गया. उन्होंने घोषणा की थी कि यदि उनकी पार्टी सत्ता में आती है तो वह मुसलमानों से पांच से दस साल तक वोट देने का अधिकार छीन लेगी. जून 1950 में ‘द स्टेट्समैन’ अख़बार ने इस बारे में लिखा था कि इस दौरान मुसलमानों द्वारा सरकार को यह विश्वास दिलाना होगा कि उनके हित और उनकी भावनाएं भारत-समर्थक हैं.

1969 में दिग्विजय की मृत्यु के बाद अवैद्यनाथ ने गोरखनाथ मंदिर के महंत का पद संभाला. वे बाबरी मस्जिद आंदोलन के एक प्रमुख चेहरा बन गए. 1 फ़रवरी 1989 को ‘द स्टेट्समैन’ अख़बार ने उनके हवाले से लिखा था कि, ‘संघर्ष से बचने के लिए मंदिर को किसी दूसरी जगह बनाने के लिए कहना ठीक वैसा ही है जैसे भगवान राम से कहना कि रावण के साथ युद्ध से बचने के लिए किसी दूसरी सीता से विवाह कर लें.’ अवैद्यनाथ भाजपा में शामिल हो गए और 1991 में गोरखपुर से सांसद चुने गए. गोरखपुर से ही 1996 में फिर से सांसद चुने गए थे.

मुंडेरा में एक हिंदू लड़की के साथ बलात्कार और हत्या

2014 में उनका निधन हो गया, और महंत की ज़िम्मेदारी आदित्यनाथ के कंधों पर आ गई. 1998 में आदित्यनाथ गोरखपुर से सांसद चुने गए और सबसे कम उम्र के सांसद बन गए. वे इस सीट से लगातार पांच बार सांसद चुने गए.

2002 के गुजरात दंगों के बाद उन्होंने ‘हिंदू युवा वाहिनी’ नामक एक मिलिशिया (निजी सेना) की स्थापना की. जिसने एक कट्टरपंथी संत के रूप में उनकी छवि को और मज़बूत किया. आदित्यनाथ और उनकी वाहिनी द्वारा कई सांप्रदायिक झगड़ों को बढ़ावा दिया गया जिसके बाद हिंसा हुई. वाहिनी के गठन के तीन महीने बाद ऐसी ही एक घटना हुई थी.

गोरखपुर से लगभग 30 मील दूर स्थित मुस्लिम-बहुल गांव मुंडेरा में एक हिंदू लड़की के साथ बलात्कार किया गया और उसकी हत्या कर दी गई. लड़की के परिवार ने एक मुस्लिम परिवार के नौकर पर हत्या और बलात्कार का आरोप लगाया, जिसे गिरफ़्तार कर लिया गया.

आदित्यनाथ और उनकी मिलिशिया उस गांव में पहुंची और उन्होंने एक भड़काऊ भाषण दिया. इससे हिंसा भड़क उठी और 47 मुस्लिम घरों को जला दिया गया. छह महीने के भीतर ही गोरखपुर और उसके पड़ोसी ज़िलों में कम से कम छह बड़े सांप्रदायिक दंगे और कई छोटे-मोटे झगड़े हुए.

अल जज़ीरा ने इस प्रक्रिया को रेखांकित किया, ‘हालांकि इसे एक सांस्कृतिक संगठन के तौर पर रजिस्टर किया गया था, लेकिन हिंदू युवा वाहिनी ने एक हिंदू राष्ट्रवादी मिलिशिया की तरह काम किया, जिसका मक़सद बहुसंख्यक हिंदुओं के बीच अल्पसंख्यकों- ख़ासकर मुसलमानों का डर पैदा करना था. इसकी पसंदीदा रणनीति यह थी कि हिंदू और मुसलमान के बीच होने वाली हर बहस और झगड़े को धार्मिक रंग दिया जाए और उसे छोटे-मोटे सांप्रदायिक दंगे में बदल दिया जाए.’

हिंदू युवा वाहिनी की मदद से उन्होंने गोरखपुर और आस-पास के इलाक़ों में खुलकर सांप्रदायिक और मुस्लिम-विरोधी राजनीति का नेतृत्व किया. हिंदू युवा वाहिनी ने ‘हिंदू और मुसलमान के बीच होने वाली हर बहस और झगड़े को धार्मिक रंग दिया’, और हर घटना को एक बड़े सांप्रदायिक दंगे में बदल दिया. 2002-07 के बीच कम से कम 22 सांप्रदायिक दंगे हुए, जिससे आदित्यनाथ का राजनीतिक क़द और लोकप्रियता बहुत ज़्यादा बढ़ गई.

2007  का वह भड़काऊ भाषण, जिसकी वजह से आदित्यनाथ मुश्किल में आए

27 जनवरी 2007 को भारतीय जनता पार्टी के गोरखपुर से सांसद आदित्यनाथ ने एक भड़काऊ भाषण दिया. यह भाषण तब दिया गया जब मुहर्रम के जुलूस के दौरान हुई एक झड़प में एक हिंदू लड़का घायल हो गया और बाद में उसकी मौत हो गई. निषेधाज्ञा का उल्लंघन करते हुए आदित्यनाथ ने गोरखपुर रेलवे स्टेशन के बाहर एक भाषण दिया, जो टेप पर रिकॉर्ड हो गया:

‘अगर एक हिंदू का ख़ून बहेगा तो एक हिंदू के ख़ून के बदले हम आने वाले समय में प्रशासन से एफआईआर दर्ज नहीं करवाएंगे, बल्कि कम से कम दस ऐसे लोगों की हत्या उससे करवाएंगे जो लोग… अगर हिंदू घरों और दुकानों में आग लगता है तो मैं यह नहीं मानता हूं कि आपको इन सब कृत्यों को करने से कोई रोक सकता है.’

आदित्यनाथ और उनके समर्थकों की गिरफ़्तारी

पहले से ही जोश से भरी हुई भीड़ जैसे किसी के इशारे पर अचानक दंगा करने लगी, जिसमें दो लोगों की जान चली गई. मुसलमानों की करोड़ों रुपये की संपत्ति नष्ट कर दी गई. हालांकि, पुलिस ने मोहर्रम के ताज़ियों को जलाने की साज़िश को नाकाम किया और आदित्यनाथ तथा उनके समर्थकों को गिरफ़्तार कर लिया गया. 11 दिन जेल में बिताने के बाद वे लोग रिहा हुए.

झा बताते हैं कि यह पहला और एकमात्र ऐसा मौक़ा था जब स्थानीय प्रशासन ने आदित्यनाथ के ख़िलाफ़ सख़्त कार्रवाई की थी. इसके विपरीत, मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व वाली उत्तर प्रदेश सरकार ने उनके साथ नरमी से पेश आने का फ़ैसला किया.

लेकिन जेल में बंद होने और राज्य सरकार द्वारा सुरक्षा गार्ड को वापस लेने के फ़ैसले से ऐसा लगा कि आदित्यनाथ अंदर तक हिल गए. मार्च महीने में संसद में बोलते हुए सबके सामने रो पड़े और रोते हुए कहा, ‘मैंने अपने समाज के लिए अपना जीवन त्याग दिया है, मैंने अपना परिवार छोड़ दिया है, मैंने अपने माता-पिता को छोड़ दिया है, लेकिन मुझे एक अपराधी बनाया जा रहा है.’ लंबे समय से जो उनकी ‘क़द्दावर नेता’ वाली छवि बनी थी, इस तरह रोने से उसे गहरा धक्का लगा.’

वाहिनी के समर्थन से उनकी नफ़रत फैलाने की मुहिम जारी रही, हालांकि कुछ सालों तक इसका दायरा सीमित रहा. 2014 के चुनावों के क़रीब और उसके बाद, उनकी नफ़रत की राजनीति ने फिर से अपना पुराना ज़हरीला रूप अख़्तियार कर लिया.

मिसाल के तौर पर दिसंबर 2013 में आदित्यनाथ ने ऐलान किया: ‘मुसलमान आतंकवादियों को अपना रक्षक मानते हैं. हिंदुओं को एकजुट होना चाहिए और जहां भी मुसलमान रहते हैं, वहां सतर्क रहना चाहिए, और अगर हालात की मांग हो तो उनका मुक़ाबला करना चाहिए.’

भाजपा की जीत के बाद वाहिनी ने ‘लव जिहाद’ के ख़िलाफ़ एक बड़े हिंदू राष्ट्रवादी अभियान में ज़ोर-शोर से हिस्सा लेकर… (और) ‘मुसलमानों को ज़बरदस्ती हिंदू धर्म में वापस लाने के अभियान’ के ज़रिये सांप्रदायिक माहौल को गरमाए रखा. जनवरी 2015 में, वाहिनी के लोगों ने पूर्वी उत्तर प्रदेश के कुशीनगर ज़िले के ग़ाज़ीपुर गांव के लगभग 300 मुसलमानों को ज़बरदस्ती हिंदू धर्म अपनाने पर मजबूर किया.

फ़रवरी 2015 में, उन्होंने कुशीनगर के भिभवानी गांव के 82 मुसलमानों को धर्म बदलने पर मजबूर किया. अगस्त 2014 में अपलोड किए गए विडियो में, जिसमें कोई तारीख़ नहीं है, उन्होंने कहा, ‘अगर (मुसलमान) एक हिंदू लड़की ले जाएंगे, तो हम 100 मुस्लिम लड़कियां ले जाएंगे. अगर वे एक हिंदू को मारेंगे, तो हम 100 मुसलमानों को मारेंगे.’

2015 में उन्होंने कहा कि अगर उन्हें मौक़ा मिला, तो वे हर मस्जिद में हिंदू देवी-देवताओं की मूर्तियां स्थापित करेंगे.

योगी आदित्यनाथ. (फोटो साभार: फेसबुक)

सांप्रदायिक हिंसा में आदित्यनाथ की भूमिका की जांच की मांग

अब सीधे 2017 पर आते हैं, जब भाजपा-आरएसएस नेतृत्व ने एक ऐसे साधु को उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाने का चौंकाने वाला फ़ैसला किया, जो अपनी हिंसक और नफ़रत भरी राजनीति के लिए जाना जाता था.

उनका अतीत, यानी 2007 की घटना, तुरंत उनके सामने आ गई. परवेज़ परवाज़ नाम के एक स्थानीय पत्रकार ने पहले एक स्थानीय अदालत में याचिका दायर कर आदित्यनाथ की भूमिका की जांच की मांग की थी. परवेज़ 2007 की भड़काऊ भाषण और उसके बाद भड़की हिंसा के गवाह थे.

उन्होंने आरोप लगाया था कि आदित्यनाथ ने ही इस सांप्रदायिक हिंसा को भड़काया था. मजिस्ट्रेट ने इस याचिका को यह कहते हुए ख़ारिज कर दिया था कि इस मामले में पहले से ही एक एफआईआर दर्ज है. हालांकि, इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इस आदेश को रद्द कर दिया. कोर्ट ने परवाज़ की इस दलील को सही माना कि पहले वाली एफआईआर सिर्फ़ एक घटना से जुड़ी थी- जिसमें एक मुस्लिम की दुकान को नुक़सान पहुंचाया गया था.

उस एफआईआर में पूरी हिंसा और उसमें आदित्यनाथ की भूमिका का उल्लेख नहीं था. सुप्रीम कोर्ट तक याचिका के लंबे और पेचीदा सफ़र के बाद 2017 में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों की वोटों की गिनती से ठीक एक दिन पहले इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार से 2007 के उस मामले की मौजूदा स्थिति पर रिपोर्ट मांगी.

इस तरह, आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के कुछ ही समय बाद राज्य पुलिस की तरफ़ से एक फाइल उनकी मेज़ पर पहुंची. इस फाइल में उस व्यक्ति पर मुक़दमा चलाने की अनुमति मांगी गई थी, जो अब ख़ुद मुख्यमंत्री बन चुका था. इस मामले में आरोपी के तौर पर केंद्रीय वित्त राज्य मंत्री शिव प्रताप शुक्ला, भाजपा विधायक शीतल पांडे और 12 अन्य लोग भी शामिल थे.

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने पूछा कि सरकार ने इतनी लंबी अवधि तक मंज़ूरी देने में देरी क्यों की, और मुख्य सचिव को अपने सामने पेश होने का आदेश दिया.

रिपोर्ट्स के अनुसार, मुख्य सचिव ने कहा कि फ़ॉरेंसिक सबूतों से पता चलता है कि भाषण की टेपों के साथ छेड़छाड़ की गई थी. इसलिए उन्होंने उच्च न्यायालय को सूचित किया कि राज्य सरकार ने आदित्यनाथ और एफआईआर में नामज़द अन्य लोगों पर मुक़दमा चलाने की मंज़ूरी देने से इनकार कर दिया है.

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इस मामले को बंद कर दिया और परवाज़ की याचिका को ख़ारिज कर दिया.

विडंबना

अगर आप इसे विडंबना कहना चाहें – यह है कि तीन साल पहले राष्ट्रीय टेलीविज़न पर टेप से छेड़छाड़ का आरोप लगाने के बजाय आदित्यनाथ ने अगस्त 2014 में इंडिया टीवी के शो ‘आपकी अदालत’ के एक एपिसोड में (गर्व के साथ) यह स्वीकार किया था कि वह भाषण उन्होंने ही दिया था.

अगस्त 2014 में इंडिया टीवी के शो ‘आपकी अदालत’ के एक एपिसोड में, एंकर रजत शर्मा ने रिकॉर्ड किया हुआ वीडियो दिखाने के बाद, उनसे कथित भड़काऊ भाषण के बारे में पूछा था. क्या उत्तर प्रदेश सरकार यह तर्क देगी कि यह वीडियो भी छेड़छाड़ करके बनाया गया था?

रजत शर्मा: ‘महंत जी, आप पूरे फ़्लो में बोल रहे हैं. भगवा वस्त्र पहन के, साधु का रूप धारण करके इस तरह की नफ़रत की बात करना क्या ठीक है?’

आदित्यनाथ: देखिए मैं उस बात को कंडीशनल कहा है. अगर कोई आपको मारेगा तो मुझे लगता है कि सामने कोई मानव होगा तो उस मानव को आप मान सकते हैं कि आपने थप्पड़ मारा आप दूसरा थप्पड़ भी सहन कर सकते हैं लेकिन अगर दानव है तो एक हाथ से मारता है तो दूसरे हाथ से जवाब भी दिजिए. मैं एक संन्यासी हूं. अगर हमें शास्त्र का प्रशिक्षण दिया गया है तो शास्त्र के साथ-साथ शस्त्र का भी. अगर हमारे एक हाथ में माला है दूसरे हाथ में भाला भी लेकर चलते हैं. उससे समाज को शिष्ट भी किया जा सके और दुष्टों को उनके कृत्य की सज़ा भी दी जा सके…’

रजत शर्मा: मोदी जी कहते हैं सबका साथ, सबका विकास. आप कहते हैं एक मारोगे मैं दस मारूंगा.’

आदित्यनाथ: (मुस्कुराते हुए) मैंने कहा है भाई एक को मारोगे तो उसका…भाई…ये तो होगा ही…अगर आप मारेंगे तो ये उम्मीद मत करिए आप सुरक्षित रहेंगे.’

और परवेज़ परवाज़ का क्या हुआ? अपनी याचिका ख़ारिज होने के ख़िलाफ़ उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में अपील की. ​​लेकिन केस की सुनवाई शुरू होने से पहले ही परवेज़ पर रेप का आरोप लगा दिया गया.

जुलाई 2020 में एक ज़िला अदालत ने उन्हें उम्रक़ैद की सज़ा सुनाई. ये पंक्तियां लिखे जाने तक इन दोनों ही आदेशों के ख़िलाफ़ अपीलें अभी भी लंबित हैं.

मुख्यमंत्री के तौर पर लगातार ज़हरीले नफ़रती भाषण

अगर किसी को यह उम्मीद रही हो कि 2007 में गोरखपुर में दिए गए नफ़रती भाषण के लिए कुछ समय की जेल और लंबी क़ानूनी लड़ाई, और सच तो यह है कि मुख्यमंत्री जैसे ऊंचे पद की संवैधानिक ज़िम्मेदारियों की वजह से भारत के मुसलमानों के प्रति उनकी ज़बरदस्त नफ़रत और उसके सार्वजनिक प्रदर्शन में नरमी आएगी, तो आदित्यनाथ ने इस उम्मीद को जल्द ही ख़त्म कर दिया.

उनका कार्यकाल लगातार दिए गए नफ़रती भाषणों के लिए जाना जाता है. उदाहरण के तौर पर नीचे मैं कुछ ऐसे ख़तरनाक नफ़रती भाषणों की सूची दे रहा हूं, जिन्हें सीपीजे ने मुख्यमंत्री के तौर पर उनके पहले कार्यकाल के महज़ दो साल के भीतर ही दर्ज किया था.

‘इस देश के अंदर इस प्रकार की स्थिति पैदा करिए, जो कि सिर्फ़ हिंदू का संगठन करे, हिंदू समझ को एक सूत्र में जोड़ सके, आक्रामकता के साथ अपनी कार्रवाई को अंजाम दे सके’

‘कांग्रेस को सपा और बसपा को अली पर भरोसा है, हमें भी सिर्फ़ बजरंगबली पे विश्वास है’

‘हिंदुत्व पर जो प्रहार करेगा, वह महाप्रलय को स्वयं आमंत्रित करेगा और किसी को कोई ग़लतफ़हमी नहीं होनी चाहिए’

‘हम प्रशासन से एफआईआर नहीं दर्ज करवाएंगे बल्कि कम से कम 10 ऐसे लोगों की हत्या उनसे करवाएंगे जो लोग…’

‘हम लोगों ने तय कर रखा है कि अगर वो लोग 1 हिंदू बालिका को ले गए तो कम से कम 100 मुस्लिम लड़कियां उनसे छीन लेंगे’

‘हिंदू अलग-अलग संस्कृति है, मुस्लिम अलग-अलग संस्कृति है, दोनों साथ नहीं रह सकते, टकराव होगा ज़रूर होगा’

‘योगी न्याय लाया है, हिंदुस्तान हमारा है’

बीबीसी ने दिल्ली के शाहीन बाग में नागरिकता संशोधन क़ानून के ख़िलाफ़ 2019-20 के विरोध प्रदर्शन के दौरान उनकी टिप्पणी को रिपोर्ट की: ‘एक विशेष समुदाय के पुरुष, जो कायर हैं, अपनी रज़ाइयों में बैठे हैं और महिलाओं और बच्चों को इस क़ानून के विरोध में अपने घरों से बाहर भेज रहे हैं.’

उन्होंने 2024 के महाराष्ट्र चुनाव प्रचार में यह भड़काऊ भाषण दिया:

‘जब भी हम बंटेंगे तो गणपति पूजा पर हमला होगा, जब हम बंटेंगे, तो ‘लव जिहाद’ या ‘लैंड जिहाद’ के नाम पर यहां पे ज़मीनों पे क़ब्ज़ा होगा, बेटियों की सुरक्षा भी ख़तरे में पड़ेगी, जब भी बंटे तो ये गुंडे अलग-अलग ग्रुपों में जाकर गुमराह करने का प्रयास करेंगे, जो भी होना है आर-पार होना है.’

आदित्यनाथ सरकार द्वारा 20,000 आपराधिक मामले वापस लेना

मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के महज़ कुछ ही महीनों बाद, अपने चिर-परिचित अंदाज़ में आदित्यनाथ ने राज्य विधानसभा में घोषणा की कि राज्य सरकार जल्द ही विभिन्न दलों के राजनेताओं और राजनीतिक कार्यकर्ताओं के ख़िलाफ़ दर्ज लगभग 20,000 आपराधिक मामले वापस ले लेगी. उन्होंने कहा कि इस क़दम का उद्देश्य लंबित मामलों की संख्या को कम करना है.

उनकी सरकार ने इस घोषणा को लागू करने के लिए राज्य विधानसभा में ‘उत्तर प्रदेश दंड विधि (अपराधों का शमन एवं मुक़दमों का समापन) (संशोधन) विधेयक, 2017’ पेश किया. ठीक एक दिन पहले ही राज्य सरकार ने मुख्यमंत्री के ख़िलाफ़ 2007 में गोरखपुर में दिए गए उनके भड़काऊ भाषण से जुड़े आपराधिक मामले को वापस लेने का आदेश दिया था.

सोशल मीडिया पर मीम्स की बाढ़ आ गई. एक मीम जिसने मेरा ध्यान खींचा, वह था: ‘योगी ने योगी को बख़्श दिया!’

अगले ही दिन किसी भी पार्टी के विरोध के बिना यह क़ानून पारित हो गया. विधेयक पेश करते समय आदित्यनाथ ने सदन को बताया था कि पूरे राज्य में धरने और प्रदर्शनों को लेकर 20,000 ‘राजनीति से प्रेरित’ और ‘कम गंभीर’ मामले दर्ज किए गए थे, और उनका मानना ​​था कि अब उन्हें वापस लेने का समय आ गया है. ‘Yogi govt to drop Yogi case’ शीर्षक के तहत, ‘द टेलीग्राफ़’ ने एक रिपोर्ट प्रकाशित की, जिस रिपोर्ट में बताया गया कि समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव ने पत्रकारों से कहा कि यह फ़ैसला ‘मुख्यमंत्री को माफ़ी देने’ के लिए लिया गया था.

लेकिन उन्होंने यह नहीं बताया कि उन्होंने या उनकी पार्टी के नेताओं ने सदन में इस विधेयक का विरोध क्यों नहीं किया. उत्तर प्रदेश के गृह विभाग ने राज्य के सभी 75 ज़िलाधिकारियों से 31 दिसंबर, 2015 तक राजनेताओं के ख़िलाफ़ दर्ज 20,000 से अधिक ‘राजनीतिक मामलों’ को वापस लेने की प्रक्रिया शुरू करने को कहा है.

टाइम्स ऑफ इंडिया में लिखे अपने एक विश्लेषनात्मक लेख में जिबी जे. कट्टकायम ने इस क़ानून की वैधता पर सवाल उठाए हैं. आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 321 पब्लिक प्रॉसिक्यूटर को यह छूट देती है कि वह अदालत की मंज़ूरी से अपराधों के मुक़दमों से पीछे हट सकता है. लेकिन एक दूसरे मामले में, इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने यह फ़ैसला दिया था कि राज्य सरकार आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 321 के तहत अपनी शक्ति का इस्तेमाल मनमाने ढंग से या अपनी मर्ज़ी से, या बाहरी बातों को ध्यान में रखकर नहीं कर सकती; इसके लिए सिर्फ़ सही और ठोस वजहें ही होनी चाहिए.

आखिर में, वह ज़ोर देकर कहते हैं कि किन मामलों में आगे बढ़ना है और किन्हें रद्द करना है, इसका फ़ैसला पूरी तरह से प्रॉसिक्यूटर और जजों के हाथ में होना चाहिए, न कि सरकार के. वह कहते हैं कि वही आदमी राजनेताओं को ग़लत इरादे से दायर मामलों से छूट दिलाने की कोशिश कर रहा है, जिसने एनकाउंटर में हत्याओं और पुलिस के सामने दिए गए बयान को सबूत मानने वाले क़ानून की वकालत की है.

यूपी में विचाराधीन क़ैदियों की संख्या देश में सबसे ज़्यादा

उत्तर प्रदेश में विचाराधीन क़ैदियों की संख्या देश में सबसे ज़्यादा है, यहां 55,000 क़ैदी हैं, जो कुल विचाराधीन क़ैदियों का लगभग एक-चौथाई हिस्सा है. नेशनल ज्यूडिशियल डेटा ग्रिड के मुताबिक़, उत्तर प्रदेश में 13% मामले 10 साल से ज़्यादा समय से और 24% मामले 5 से 10 साल के बीच से अटके हुए हैं. असल समस्या यह है जिन पर आदित्यनाथ को ध्यान देना चाहिए था.

सूत्रों के अनुसार, गवर्नर राम नाइक ने राज्य में सत्ताधारी भाजपा की सिफ़ारिशों के आधार पर ‘कई मामलों’ को वापस लेने की मंज़ूरी दे दी. इनमें से कम से कम आठ मामले मुख्यमंत्री के ख़िलाफ़ थे.

इस असामान्य और विवादित क़ानून के तहत वापस लिए गए 20,000 मामलों का कोई भी विस्तृत आधिकारिक ब्योरा हमें नहीं मिल पाया. लेकिन मीडिया में हमें इसके कई अहम उदाहरण मिले. सिर्फ़ आदित्यनाथ ही नहीं, बल्कि उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य को भी एक दशक पहले कौशांबी में दर्ज इसी तरह के एक मामले में बरी कर दिया गया. सरकार ने आगरा से भाजपा सांसद राम शंकर कठेरिया के ख़िलाफ़ 12 मामले वापस लेने की प्रक्रिया शुरू की.

कठेरिया राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के अध्यक्ष भी थे. इसके अलावा, राज्य सरकार ने 2013 के मुज़फ़्फ़रनगर दंगों के आरोपियों के ख़िलाफ़ दायर 131 मामले वापस ले लिए. मैं अगले हिस्से में इस बारे में बात करूंगा.

एक सनसनीख़ेज़ मामला बलात्कार और अपहरण के अपराध से जुड़ा है, जिसे एक महिला ने पूर्व केंद्रीय मंत्री स्वामी चिन्मयानंद के ख़िलाफ़ दर्ज कराया था. चिन्मयानंद द्वारा चलाए जा रहे मुमुक्षु आश्रम की पूर्व शिष्या और मैनेजर रही इस महिला ने 30 नवंबर, 2011 को उनके ख़िलाफ़ एक एफआईआर दर्ज कराई थी.

महिला ने आरोप लगाया था कि उसे कई सालों तक बंधक बनाकर रखा गया, उसके साथ बलात्कार किया गया और उसे प्रताड़ित किया गया. उसने यह मामला शाहजहांपुर के कोतवाली पुलिस स्टेशन में दर्ज कराया था. चिन्मयानंद ने इलाहाबाद हाईकोर्ट का रुख़ किया और हाईकोर्ट ने उनकी गिरफ़्तारी पर रोक लगा दी. महिला ने आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 164 के तहत एक न्यायिक मजिस्ट्रेट के सामने अपना बयान दर्ज कराया, लेकिन पुलिस द्वारा कोई कार्रवाई नहीं की गई.

महिला ने आरोप लगाया कि हरिद्वार में उनके आश्रम में उसके साथ बलात्कार किया गया, और उसे धमकी दी गई कि अगर इसकी शिकायत करेगी तो उसे जान से मार दिया जाएगा. हालांकि, इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने चिन्मयानंद की गिरफ़्तारी पर रोक लगा दी. तब से यह मामला लंबित था. मार्च 2018 में उत्तर प्रदेश सरकार ने शाहजहांपुर के ज़िला प्रशासन को पत्र लिखकर इस मामले को वापस लेने को कहा. पीटीआई ने कुछ अज्ञात अधिकारियों के हवाले से बताया कि तीन दिन बाद प्रशासन ने सरकारी वकील से ऐसा करने को कहा.

‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ ने उस पत्र का हवाला देते हुए लिखा है, ‘प्रशासन ने दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 321 के तहत इस मामले को वापस लेने का फ़ैसला किया है, और वरिष्ठ सरकारी वकील से अनुरोध किया जाता है कि वे यह आवेदन अदालत के सामने पेश करें.’

मामला वापस लेने का यह कदम ऐसे समय में उठाया गया, जब शाहजहांपुर की अदालत ने बलात्कार पीड़िता के आवेदन पर सुनवाई के लिए 15 मई की तारीख़ तय की थी; पीड़िता ने अपने आवेदन में पूर्व मंत्री की गिरफ़्तारी की मांग की थी. दो हफ़्ते पहले ही आदित्यनाथ ने शाहजहांपुर में चिन्मयानंद से मुलाक़ात की थी.

मोहम्मद अख़लाक़ के हत्यारों को सज़ा से बचाने की कोशिश

नफ़रती अपराधों के लिए सज़ा न मिलने की कहानी तब तक अधूरी रहेगी, जब तक हम उत्तर प्रदेश सरकार के उस चौंकाने वाले क़दम का ज़िक्र न करें. राज्य की यह सरकार एक ऐसे व्यक्ति के नेतृत्व में चल रही है जो अतीत में अपने भड़काऊ भाषणों और नफ़रती हिंसा भड़काने के लिए बदनाम रहा है.

इस सरकार ने अदालत से यह सिफ़ारिश की थी कि उन 18 लोगों के ख़िलाफ़ सभी आरोप वापस ले लिए जाएं, जिन पर दस साल पहले उत्तर प्रदेश के दादरी ज़िले के बिसाहड़ा में एक मुस्लिम किसान मोहम्मद अख़लाक़ की बेरहमी से पीट-पीटकर हत्या करने का आरोप था.

इस क़दम से बड़े पैमाने पर लोगों में ग़ुस्सा भड़क उठा, और राज्य सरकार की आरोपियों के ख़िलाफ़ मुक़दमा वापस लेने की इस कोशिश को 23 दिसंबर, 2025 को अदालतों ने ख़ारिज कर दिया.

मुझे इस हिस्से का समापन इसी कहानी के साथ करना होगा, क्योंकि इससे बहुत साफ़ तरीक़े से यह ज़ाहिर होता है कि आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली भजपा सरकार किसके पक्ष में खड़ी है और किसका विरोध करती है. हम एक ऐसी सरकार के गवाह हैं जो इस क्रूर नफ़रती अपराध के आरोपियों को बचाने के लिए बेताब है, और उस व्यक्ति के परिवार को न्याय मिलने की हर संभावना को ख़त्म कर देना चाहती है जिसकी दस साल पहले उसके ही पड़ोसियों ने हत्या कर दी थी.

(फाइल फोटो: पीटीआई)

अख़लाक़ की हत्या और भाजपा नेताओं का खुला समर्थन

राष्ट्रीय राजधानी से महज़ एक घंटे की दूरी पर हुए इस भयानक नफ़रती अपराध का एक संक्षिप्त ब्योरा. 28 सितंबर, 2015 को बिसाहड़ा गांव के मंदिर में लगे लाउडस्पीकर से एक घोषणा की गई कि अख़लाक़ ने कुछ दिन पहले ईद-उल-अज़हा के त्योहार के दौरान एक बछड़े की हत्या कर दी थी. लाठियों, ईंटों और पत्थरों से लैस एक भीड़ ने उनके घर पर धावा बोल दिया, उनके फ़्रिज में रखी चीज़ों की जांच की, और उन्हें तथा उनके बेटे दानिश को घसीटकर घर से बाहर निकाल लिया.

उनकी बेटी याद करती है कि उनके पिता का सिर घर की सीढ़ियों से टकराया गया था. अख़लाक़ को तुरंत नोएडा के एक अस्पताल ले जाया गया. गंभीर रूप से चोटिल होने के कारण उनकी मौत हो गई. कई घंटे चली ब्रेन सर्जरी के बाद 22 वर्षीय दानिश बच पाया.

आरोपियों को भाजपा नेताओं का खुला समर्थन मिला. अक्टूबर 2016 में 22 वर्षीय आरोपी रवि सिसोदिया की जेल में चिकनगुनिया या डेंगू बुख़ार से मौत हो गई. उसके बाद यह समर्थन स्पष्ट रूप से ज़ाहिर हुआ. केंद्रीय मंत्री महेश शर्मा ने रवि की मौत के तुरंत बाद उसके परिवार से मुलाक़ात की, और उसके शव को (ग़ैर-क़ानूनी तरीक़े से) भारतीय तिरंगे में लपेटा गया, मानो वह कोई राष्ट्रीय नायक हो.

तत्कालीन भाजपा विधायक संगीत सोम ने आरोपियों के परिवारों से वादा किया कि वह ‘दादरी के आरोपियों को ज़मानत दिलाने की कोशिश करेंगे.’

केंद्रीय संस्कृति (बाद में पर्यटन) मंत्री महेश शर्मा ने इस लिंचिंग को एक सोची-समझी साज़िश के बजाय एक ‘दुर्भाग्यपूर्ण हादसा’ बताकर सही ठहराया, और पीड़ित के परिवार के बजाय आरोपियों के परिवारों को आर्थिक मदद दी. 31 मार्च 2019 को, इस मामले के एक मुख्य आरोपी, विशाल, को बिसाहड़ा में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की भाजपा रैली में पहली क़तार में बैठे देखा गया.

जान मोहम्मद सैफ़ी ने ‘द क्विंट’ को बताया कि आरोपियों के परिवारों ने उन पर दबाव डालने की कोशिश की थी कि वे इस मामले को ‘सुलझा लें’ और इसे यहीं रफ़ा-दफ़ा करें. जब उन्होंने मना कर दिया, तो कुछ पड़ोसियों ने मिलकर पीड़ितों के ख़िलाफ़ ही एक केस दर्ज करवा दिया. अख़लाक़ के परिवार के ख़िलाफ़ गो-हत्या का एक मामला दर्ज किया गया, जिसमें जान और उनके परिवार के कई अन्य सदस्यों पर गो-हत्या का आरोप लगाया गया, जिनमें उनके भाई का नाम भी शामिल था, जिनकी हत्या दर दी गई थी. यह मामला अभी भी उत्तर प्रदेश की एक अदालत में लंबित है.

जान ने बताया कि मॉब लिंचिंग की घटना से पहले हिंदू और मुसलमान भाई-बहनों की तरह मिल-जुलकर रहते थे. गांव के जिस हिस्से में अख़लाक़ का परिवार रहता था, वहां उनके अलावा कोई और मुस्लिम परिवार नहीं था; उनके चारों ओर ठाकुरों और राजपूतों के परिवार बसे हुए थे. लेकिन मॉब लिंचिंग की घटना के बाद यह स्थिति पूरी तरह से बदल गई. उनमें से एक ने कहा, ’17 अक्टूबर 2015 को, हम सभी ने अपना सारा सामान समेटा और हमेशा के लिए वहां से चले गए. मैं इस तारीख़ को कभी नहीं भूलूंगा.’

सितंबर 2017 तक सभी आरोपी पुरुषों को ज़मानत मिल गई. आरोप तय होने में लगभग पांच साल लग गए. मुक़दमा 26 मार्च, 2021 को शुरू हुआ, लेकिन सुनवाई में लगातार देरी होती रही. 14-16 जून, 2022 को अख़लाक़ की बेटी और मुख्य चश्मदीद गवाह, शाइस्ता ने गवाही दी. उसने सभी आरोपियों की पहचान की और लिंचिंग की घटनाओं के क्रम की पुष्टि की. जो मुक़दमा फ़ास्ट-ट्रैक कोर्ट में कुछ ही महीनों में पूरा हो जाना चाहिए था, वह एक दशक बाद भी गवाहों की गवाही का इंतज़ार कर रहा था.

कोर्ट से मुक़दमा वापस लेने का अनुरोध

इससे पहले कि यह पूरा होता और कोर्ट अपना फ़ैसला सुना पाता (जिसमें दोषी ठहराए जाने की काफ़ी संभावना थी), आदित्यनाथ सरकार ने अभियोजन पक्ष को निर्देश दिया कि वह कोर्ट से मुक़दमा वापस लेने का अनुरोध करे. यह पूरी तरह साफ़ था कि राज्य सरकार उन पुरुषों को बचाना चाहती थी जिन पर एक मुस्लिम व्यक्ति को पीट-पीटकर उसकी हत्या करने का आरोप था. यह लिंचिंग कथित रूप से गौ हत्या का आरोप लगाते हुए की गई थी.

हालांकि, राज्य सरकार की यह कोशिश नाकाम रही. सूरजपुर फ़ास्ट-ट्रैक कोर्ट के जज सौरभ द्विवेदी ने मुक़दमा वापस लेने की अर्ज़ी को सख़्ती से ख़ारिज कर दिया. उन्होंने एक सराहनीय फ़ैसले में कहा कि इस अर्ज़ी का कोई क़ानूनी आधार नहीं था और यह ‘बेबुनियाद और अप्रासंगिक’ थी.

उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि क़ानून केवल ठोस क़ानूनी आधारों पर कोर्ट की सहमति से ही मुक़दमा वापस लेने की इजाज़त देता है. यह ‘पहले से ही स्वीकार्य सबूतों पर आधारित अभियोजन को पटरी से उतारने का कोई प्रक्रियात्मक शॉर्टकट’ नहीं हो सकता.

उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि ‘हत्या समाज के ख़िलाफ़ एक अपराध है’ और राज्य ऐसे मामलों में मुक़दमा इसलिए चलाता है ताकि समाज में क़ानून-व्यवस्था का डर बना रहे. कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसलों का हवाला देते हुए इस बात पर ज़ोर दिया कि हत्या जैसे गंभीर अपराधों में मुक़दमा वापस लेने के लिए असाधारण परिस्थितियों और कार्यपालिका के इरादों की कड़ी जांच की ज़रूरत होती है.

उन्होंने इस मामले को ‘बेहद महत्वपूर्ण’ माना और रोज़ाना सुनवाई करके जल्द से जल्द इसका निपटारा करने का आदेश दिया. उन्होंने राज्य के अधिकारियों को यह भी निर्देश दिया कि वे गवाहों की पर्याप्त सुरक्षा और सबूतों की हिफ़ाज़त सुनिश्चित करें.

इस बीच, अख़लाक़ का परिवार एक दशक पहले हुई उसकी लिंचिंग के दुख और सदमे से जूझता रहा है. अख़लाक़ के भाई जान मोहम्मद ने ‘द क्विंट’ से कहा, ‘जिन्होंने अख़लाक़ को मारा, उन्होंने इतनी बेरहमी से मारा कि आज कोई भी दूसरा व्यक्ति बिना किसी सज़ा के ऐसा कर सकता है.’

अख़लाक़ का परिवार गांव छोड़कर चला गया. दानिश ने कहा, ‘जब भी मेरी मां और बहन उस रात को याद करती हैं, तो उनकी आंखों से आंसू बहने लगते हैं. हम अभी तक उस सदमे से उबर नहीं पाए हैं.’

(हर्ष मंदर सामाजिक कार्यकर्ता और लेखक है. लेख के लिए सुमैय्या फ़ातिमा ने शोध सहायता की है. इस लेख के लिए डायसपोरा इन एक्शन फॉर डेमोक्रेसी एंड ह्यूमन राइट्स से सहयोग मिला है.)

(मूल अंग्रेज़ी से ज़फ़र इक़बाल द्वारा अनूदित. ज़फ़र भागलपुर में हैंडलूम बुनकरों की ‘कोलिका’ नामक संस्था से जुड़े हैं.)