‘नए भारत’ में अभिव्यक्ति की आज़ादी की रक्षा करने में सुप्रीम कोर्ट की अनिच्छा को इस हफ्ते की शुरुआत में अली खान महमूदाबाद मामले के निराशाजनक अंत से बेहतर कुछ नहीं दिखाता.
अशोका यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर की उस फेसबुक पोस्ट, जो सामान्य तौर पर ही नहीं, बल्कि ध्यान से पढ़ने पर भी किसी कानून का उल्लंघन नहीं करती, के पक्ष में खड़े होने के बजाय, सुप्रीम कोर्ट ने हरियाणा सरकार को दुर्भावनापूर्ण चार्जशीट और गिरफ्तारी के बावजूद बच निकलने दिया. इतना ही नहीं, अदालत ने महमूदाबाद को दी गई एक अनावश्यक ‘चेतावनी’ को भी यह कहकर परोक्ष रूप से सही ठहराया कि प्रोफेसर ‘भविष्य में विवेकपूर्ण तरीके से व्यवहार करेंगे.’
ऐसे में ‘विवेकपूर्ण’ यही होगा कि हम खुद को याद दिलाएं कि महमूदाबाद ने आखिर लिखा क्या था.
8 मई 2025 की उनकी पूरी पोस्ट अब भी फेसबुक पर मौजूद है और उसमें तीन बातें कही गई थीं. पहली दो में उन्होंने लिखा कि भारत अब गैर-सरकारी समूहों (जैसे आतंकी या मिलिटेंट संगठन) और पाकिस्तानी सेना के बीच फर्क करने को तैयार नहीं है, यह टकराव पाकिस्तान की देन है और बड़े युद्ध की अंधाधुंध वकालत उस समस्या का हल नहीं है, जो मूल रूप से राजनीतिक है.
लेकिन उनका तीसरा बिंदु, जिसमें ऑपरेशन सिंदूर के दौरान आधिकारिक ब्रीफिंग के लिए भारतीय सेना की एक मुस्लिम अधिकारी के इस्तेमाल का जिक्र था, ही भारतीय जनता पार्टी को सबसे ज्यादा खटका और नाराज़ कर गया:
‘मुझे यह देखकर खुशी होती है कि कई दक्षिणपंथी टिप्पणीकार कर्नल सोफिया कुरैशी की तारीफ कर रहे हैं, लेकिन शायद वे उतनी ही जोर से यह भी मांग कर सकते हैं कि मॉब लिंचिंग, मनमानी बुलडोज़र कार्रवाई और भाजपा की नफरत भरी राजनीति के शिकार लोगों को भी भारतीय नागरिक के तौर पर सुरक्षा मिले. दो महिला सैनिकों का सामने आकर अपनी जानकारी देना अहम है, लेकिन यह सिर्फ दिखावे तक सीमित नहीं रहना चाहिए, इसे जमीन पर भी दिखना चाहिए, वरना यह पाखंड ही लगेगा.
मेरे लिए यह प्रेस कॉन्फ्रेंस बस एक झलक भर थी, शायद एक ऐसा इशारा, उस भारत का, जो उस सोच को चुनौती देता है जिस आधार पर पाकिस्तान बना था. जैसा कि मैंने कहा, आम मुसलमानों की जमीनी हकीकत सरकार की दिखाई तस्वीर से अलग है, लेकिन साथ ही यह प्रेस कॉन्फ्रेंस यह भी दिखाती है कि विविधता में एकता वाला भारत विचार के रूप में पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है.’
महमूदाबाद की इस पोस्ट के बाद हरियाणा पुलिस ने दो एफआईआर दर्ज कीं, एक राज्य स्तर के भाजपा नेता की शिकायत पर और दूसरी हरियाणा राज्य महिला आयोग की प्रमुख की शिकायत के आधार पर. आरोप गंभीर थे और इनमें भारतीय न्याय संहिता के तहत राजद्रोह जैसे प्रावधान (धारा 152) सहित अन्य धाराएं भी शामिल थीं. इन एफआईआर के आधार पर प्रोफेसर को हिरासत में ले लिया गया.
ऊपरी तौर पर यह थोड़ा हैरान करने वाला है कि भाजपा महमूदाबाद द्वारा मॉब लिंचिंग और मनमानी तोड़फोड़ की घटनाओं की याद दिलाने पर नाराज हो गई. आखिरकार, पार्टी के कई वरिष्ठ नेता खुले तौर पर सांप्रदायिक बयान देते हैं और मुसलमानों के खिलाफ अपनी राजनीति को छिपाते भी नहीं हैं. मध्य प्रदेश के एक भाजपा मंत्री तो इतने आगे बढ़ गए कि उन्होंने कर्नल कुरैशी का अपमान तक कर दिया, लेकिन इसके बावजूद उन्हें पुलिस हिरासत में एक दिन भी नहीं बिताना पड़ा.
हरियाणा भाजपा की सोच जो भी रही हो, महमूदाबाद के खिलाफ दो बेबुनियाद शिकायतें दर्ज की गईं और हरियाणा पुलिस को समझ जाना चाहिए था कि कोई मामला नहीं बनता. इसके बावजूद उसने एफआईआर दर्ज कीं और उससे भी आगे बढ़कर उन्हें गिरफ्तार कर लिया, जो उनके अभिव्यक्ति की आज़ादी के संवैधानिक अधिकार का साफ उल्लंघन था.
जब यह मामला पिछले साल सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, तो प्रोफेसर को जमानत मिल गई. लेकिन एफआईआर रद्द करने और हरियाणा पुलिस व सरकार को उनकी गैरकानूनी कार्रवाई के लिए फटकार लगाने के बजाय, जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने एक ‘स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम’ (एसआईटी) बनाने का निर्देश दिया, ताकि फेसबुक पोस्ट में इस्तेमाल की गई भाषा और कुछ अभिव्यक्तियों को ‘पूरी तरह समझा’ जा सके.
जब महमूदाबाद की पोस्ट की इस तथाकथित ‘जटिल भाषा’ की जांच में एसआईटी को कुछ भी आपत्तिजनक नहीं मिला, तो उसने दायरा बढ़ा दिया. इसके तहत उनके कंप्यूटर में मौजूद फाइलें, विदेश यात्राएं आदि खंगाली जाने लगीं. महमूदाबाद के वकील के अनुरोध पर अदालत को पुलिस को इस दिशा में आगे बढ़ने से रोकना पड़ा.
इस पूरी कवायद के अंत में न तो एसआईटी, न हरियाणा पुलिस और न ही उसके वकील अदालत के सामने ऐसा कोई सबूत रख पाए, जिससे इन दो एफआईआर को सही ठहराया जा सके. ऐसे में, जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ को सीधे तौर पर इस मामले को रद्द कर देना चाहिए था. इतना ही नहीं, वह एक कदम आगे बढ़कर हरियाणा सरकार को भी फटकार लगा सकती थी कि उसने अभिव्यक्ति की आज़ादी का इस्तेमाल करने वाले एक व्यक्ति को परेशान करने के लिए कानून की प्रक्रिया का गलत इस्तेमाल किया.
लेकिन इसके बजाय 6 जनवरी को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने सुझाव दिया कि हरियाणा सरकार चाहे तो महमूदाबाद के खिलाफ मुकदमा चलाने की मंजूरी न दे, ताकि मामला अपने आप खत्म हो जाए. हरियाणा सरकार ने 16 मार्च को ठीक यही रास्ता अपनाया. इस तरह उसने न सिर्फ अदालत के किसी प्रतिकूल फैसले से बचाव कर लिया, बल्कि भविष्य में भी कानून के दुरुपयोग की अपनी गुंजाइश को पूरी तरह बरकरार रखा.
सुप्रीम कोर्ट के आदेश में कहा गया है:
06.01.2026 के आदेश के सम्मान में हरियाणा राज्य की ओर से पेश हुए अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एसवी राजू ने बताया कि राज्य सरकार ने इस मामले में अभियोजन की मंजूरी न देने का फैसला किया है. इसके परिणामस्वरूप, सोनीपत के प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत में लंबित कार्यवाही, जहां पहले ही चार्जशीट दाखिल की जा चुकी है, अभियोजन की मंजूरी न होने के कारण बंद की जाती है.
इस पूरी प्रक्रिया के जरिए सुप्रीम कोर्ट आखिर क्या संदेश देना चाहता है?
जरा इस विडंबना पर गौर कीजिए. महमूदाबाद, जिन्होंने कुछ भी गलत नहीं किया, उनके साथ ऐसा व्यवहार किया गया मानो उन्होंने कोई बेहद आपत्तिजनक या राजद्रोह जैसी बात लिख दी हो, जबकि अदालत द्वारा गठित एसआईटी ऐसा कुछ भी साबित नहीं कर सकी.
इससे भी आगे बढ़कर, मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने खुली अदालत में ऐसी टिप्पणियां कीं, जो बिना किसी ठोस आधार या प्रक्रिया के प्रोफेसर पर सवाल उठाती हैं.
6 जनवरी की सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने कहा, ‘हम यह भी नहीं चाहते कि वह यह कहने लगें कि अब मैं कुछ भी लिखूंगा… उन्हें भी बहुत जिम्मेदारी से व्यवहार करना होगा… अगर राज्य उदारता दिखाता है, तो हमें भी उतना ही जिम्मेदार होना चाहिए.’
यह अनावश्यक टिप्पणी अदालत के अंतिम आदेश में भी दिखाई देती है, जहां कहा गया है, ‘हमें कोई कारण नहीं दिखता कि यह संदेह किया जाए कि याचिकाकर्ता, जो एक बेहद विद्वान प्रोफेसर और अपने क्षेत्र के विशेषज्ञ हैं, भविष्य में अधिक सावधानी बरतेंगे और विवेकपूर्ण तरीके से व्यवहार करेंगे.’
आदेश में कहीं भी हरियाणा सरकार के लिए कोई चेतावनी नहीं है, न ही यह कहा गया है कि जब नागरिक अपने मौलिक अधिकारों का इस्तेमाल करें, तो उसका पुलिस विभाग भविष्य में जिम्मेदारी से काम करे.
उल्टा, सुप्रीम कोर्ट की इस ‘उदारता’ के बाद देशभर के पुलिस विभाग और राज्य सरकारें शायद यही समझेंगी कि वे सत्ता की आलोचना करने वालों के खिलाफ झूठे और दुर्भावनापूर्ण मामले दर्ज कर कानून का दुरुपयोग जारी रख सकते हैं. उन्हें भरोसा रहेगा कि अगर कभी उनका यह कदम अदालत के सामने चुनौती बनकर आया, तो वे उसी समय आरोप वापस लेकर कानूनी जिम्मेदारी से बच निकल सकते हैं.
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