‘सुधार नहीं, पीछे ले जाने वाला क़दम’: लोकसभा में ट्रांस विधेयक पारित होने पर विपक्ष का वॉकआउट

सरकार द्वारा विधेयक को संसदीय समिति को भेजने से इनकार किए जाने के विरोध में विपक्ष के वॉकआउट के बीच लोकसभा ने मंगलवार को ट्रांसजेंडर व्यक्तियों (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन विधेयक, 2026 को ध्वनिमत से पारित कर दिया. एलजीबीटीक्यूआईए+ समुदाय इसके प्रावधानों का लगातार विरोध कर रहा है और विभिन्न दलों के सांसदों ने भी संसद में इसे लेकर विरोध जताया.

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लोकसभा में मंगलवार, 24 मार्च को ट्रांसजेंडर व्यक्तियों (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन विधेयक, 2026 के पारित होने के दौरान सदस्य हाथ उठाते हुए. (फोटो: संसद टीवी/पीटीआई)

नई दिल्ली: लोकसभा ने मंगलवार (24 मार्च) को ट्रांसजेंडर व्यक्तियों (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन विधेयक, 2026 को ध्वनिमत से पारित कर दिया. विपक्ष ने विधेयक को चयन समिति को भेजने की मांग को नज़रअंदाज़ किए जाने के विरोध में सदन से वॉकआउट किया.

करीब ढाई घंटे चली चर्चा के बाद विधेयक पारित किया गया. विपक्षी सदस्यों ने इस बिल को जल्दबाजी में पास न करने और संसदीय समिति को भेजने की मांग की, लेकिन संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने स्पष्ट कर दिया कि विधेयक मंगलवार को ही पारित किया जाएगा.

रिजिजू ने यह नहीं बताया कि जिस विधेयक को उन्होंने ‘महत्वपूर्ण’ बताया, उसे इतनी जल्दबाजी में क्यों लाया गया, और तत्काल पारित करने की जरूरत क्या थी. उन्होंने यह भी स्पष्ट नहीं किया कि वित्त विधेयक, 2026 पर चल रही चर्चा को बीच में रोककर ट्रांसजेंडर विधेयक क्यों लिया गया.

करीब शाम 4:20 बजे चर्चा के लिए लाया गया यह विधेयक विपक्ष की गैरमौजूदगी में शाम 6:45 बजे ध्वनिमत से पारित हो गया. चर्चा में केंद्रीय सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री वीरेंद्र कुमार सहित कुल 15 सांसदों ने हिस्सा लिया. विपक्ष ने इसे ‘पिछड़ा कदम’ बताते हुए कहा कि यह गरिमा, निजता और लैंगिक आत्मनिर्णय के अधिकार का उल्लंघन करता है.

करीब दो मिनट के अपने जवाब में मंत्री वीरेंद्र कुमार ने विपक्ष की चिंताओं पर कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिया. उन्होंने केवल इतना कहा कि विधेयक का ‘एकमात्र उद्देश्य’ उन लोगों की रक्षा करना है जो ‘बायोलॉजिकल स्थिति के कारण गंभीर सामाजिक बहिष्कार का सामना करते हैं.’

यह विधेयक 2019 के ट्रांसजेंडर अधिनियम में संशोधन करता है, जिसे सुप्रीम कोर्ट के 2014 के ऐतिहासिक नालसा फैसले के बाद लाया गया था. ट्रांसजेंडर समूहों, विपक्षी दलों और कानूनी विशेषज्ञों ने इस विधेयक का विरोध करते हुए कहा कि यह लैंगिक आत्मनिर्णय के सिद्धांत को कमजोर करता है और ट्रांसजेंडर की परिभाषा को सीमित करता है.

विधेयक का विरोध करने वालों का कहना है कि यह ट्रांस व्यक्तियों और नॉन-बाइनरी व्यक्तियों, जो इन श्रेणियों में नहीं आते, को प्रभावी रूप से बाहर कर देता है. साथ ही, यह मानकर कि ट्रांस पहचानें जबरन थोपी जाती हैं, ट्रांसजेंडर समुदाय के समूहों और उनके चुने हुए परिवारों को भी अपराध की श्रेणी में डालता है.

वित्त विधेयक पर चर्चा के दौरान शाम करीब 4:15 बजे रिजिजू ने ट्रांसजेंडर विधेयक को चर्चा के लिए लेने का प्रस्ताव रखा. उन्होंने कहा कि वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण अगले दिन जवाब देंगी. उस समय सीतारमण सदन में मौजूद थीं और उनके बगल में बैठीं थीं.

रिजिजू ने यह भी कहा कि बिजनेस एडवाइजरी कमेटी (बीएसी) में विपक्ष ने बिल को लेकर आपत्ति जताई थी, लेकिन फिर भी विधेयक मंगलवार को ही पारित करना आवश्यक है. उन्होंने कहा, ‘यह विधेयक किसी के खिलाफ नहीं है. चर्चा के दौरान सभी शंकाएं दूर हो जाएंगी.’

विपक्ष ने इसका विरोध करते हुए कहा कि विधेयक को जल्दबाजी में पारित नहीं किया जाना चाहिए और इसे संसदीय समिति को भेजा जाना चाहिए.

एनसीपी (शरद पवार) की सांसद सुप्रिया सुले ने कहा, ‘हम सहयोग को तैयार हैं, लेकिन हमारी मांग है कि इसे जल्दबाजी में न लाया जाए और समिति को भेजा जाए.’

कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के विरोध के बावजूद रिजिजू ने विधेयक पर तत्काल चर्चा और पारित कराने पर जोर दिया. उन्होंने यह भी नहीं बताया कि सरकार बिल को समिति को भेजने से क्यों बच रही है, जबकि उन्होंने यह स्वीकार किया कि विपक्ष की यह मांग है. 

इसके बजाय, रिजिजू ने कहा कि विधेयक में कोई बड़ा बदलाव शामिल नहीं है, जबकि ट्रांसजेंडर समुदाय के सदस्यों और कार्यकर्ताओं का कहना है कि इसके प्रावधान उनकी पहचान को मिटाने वाले हैं और दशकों में हासिल किए गए अधिकारों को कमजोर करते हैं.

विधेयक में व्यापक बदलाव प्रस्तावित किए गए हैं, जिनमें आत्म-पहचान की व्यवस्था को समाप्त करते हुए ट्रांसजेंडर व्यक्ति की परिभाषा को नया रूप देना शामिल है. यह ट्रांस पुरुषों और नॉन-बाइनरी व्यक्तियों को भी बाहर कर देता है और मेडिकल बोर्ड तथा जिला मजिस्ट्रेट को व्यापक नए अधिकार प्रदान करता है.

रिजिजू ने कहा, ‘यह सही है कि बिजनेस एडवाइजरी कमेटी में कांग्रेस, टीएमसी और एनसीपी (एसपी) ने संयुक्त रूप से अनुरोध किया था. हमने तब भी कहा था कि यह कोई बड़ा संशोधन नहीं है. इस पर पहले ही विस्तृत चर्चा हो चुकी है. इस संशोधन पर एक साल तक स्थायी समिति में भी विचार-विमर्श हुआ है. सरकार किसी के खिलाफ नहीं है, हम केवल कमियों को दूर करना चाहते हैं. चर्चा के दौरान आप अपनी सभी चिंताएं उठा सकते हैं. हमने आपके विरोध को दर्ज कर लिया है, लेकिन यह बहुत महत्वपूर्ण विधेयक है, इसे टाला नहीं जाना चाहिए और आज ही पारित किया जाना चाहिए.’

विधेयक पेश करते हुए कुमार ने कहा कि ‘यह सुनिश्चित करने के लिए कि ट्रांसजेंडर व्यक्ति इस अधिनियम के लाभ उठा सकें, उनके लिए एक स्पष्ट परिभाषा निर्धारित करना आवश्यक है.’ उन्होंने बताया कि इस विधेयक के तहत एक मेडिकल बोर्ड का गठन किया जाएगा, जबकि जिला मजिस्ट्रेट ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को पहचान पत्र जारी करेंगे।

‘पिछड़ा कदम, निजता का उल्लंघन’

बहस के दौरान विपक्ष ने विधेयक को ‘पिछड़ा कदम’ बताते हुए कहा कि इसे बिना पर्याप्त परामर्श के लाया गया है. कांग्रेस सांसद जोथिमणि ने कहा, ‘वे कह रहे हैं कि यह विधेयक महत्वपूर्ण है, तो बिना किसी परामर्श के इसे संसद में कैसे लाया गया? यह सुधार नहीं, बल्कि पीछे ले जाने वाला कदम है. यह संविधान और सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए अधिकारों को खत्म करता है.’

जोथिमणि ने कहा कि नालसा फैसले ने लैंगिक पहचान को आत्मनिर्णय का विषय माना था, जबकि यह विधेयक मेडिकल बोर्ड और जिला मजिस्ट्रेट की मंजूरी को शामिल करके नागरिक और राज्य के बीच संबंध को बुनियादी रूप से बदल देता है.

डीएमके सांसद टी. सुमति ने कहा कि यह विधेयक ‘नैतिक रूप से पीछे ले जाने वाला’ है और पहचान को सीमित करता है. उन्होंने कहा, ‘यह विधेयक सुरक्षा का दावा करता है, लेकिन असल में निगरानी बढ़ाता है और व्यक्ति की पहचान पर राज्य का नियंत्रण स्थापित करता है.’

सुमति ने कहा कि यह संशोधन विधेयक दर्शाता है कि राज्य ट्रांसजेंडर व्यक्तियों पर भरोसा नहीं करता और मानता है कि पहचान को प्रमाणित किया जाना चाहिए तथा स्वायत्तता पर समझौता किया जा सकता है. उन्होंने कहा कि यह विधायी नीति भले ही गंभीर भेदभाव झेलने वालों की सुरक्षा के लिए लाई गई हो, लेकिन ‘जैविक क्या है, यह कौन तय करेगा? ‘गंभीर’ क्या है, यह कौन तय करेगा? क्या कोई जैविक चेकलिस्ट है? क्या ट्रांस पुरुष और नॉन-बाइनरी लोग कम पीड़ा झेलते हैं? सरकार को पहचान तय करने का अधिकार कब मिला? गरिमा कब चयनात्मक हो गई?’ 

विपक्षी सदस्यों ने यह भी आपत्ति जताई कि जेंडर-अफर्मिंग सर्जरी करने वाले अस्पतालों को अपने मरीजों का विवरण राज्य प्राधिकरणों को देना होगा और ट्रांस पहचान के कथित रूप से जबरन होने के मामलों में नए आपराधिक प्रावधान बनाए गए हैं.

सुले ने कहा कि ऐसे संवेदनशील चिकित्सीय प्रक्रियाओं की रिपोर्टिंग ‘निजता में हस्तक्षेप’ है.

उन्होंने कहा, ‘सरकार को इसे वापस लेना चाहिए. यही वजह है कि हम चाहते थे कि विधेयक को चयन समिति को भेजा जाए, क्योंकि यह हर नागरिक की निजता और निजी जीवन के खिलाफ है. आप एनजीओ द्वारा दी जाने वाली मदद को अपराध क्यों बना रहे हैं? इसमें बहुत अस्पष्टता है. क्या हम इसे समावेशी विधेयक बना रहे हैं या उन्हें बाहर कर रहे हैं?’

एनडीए का समर्थन

भाजपा के सहयोगी दल- तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी) और जनता दल (यू) ने विधेयक का समर्थन किया. हालांकि टीडीपी सांसद बिरेड्डी शबरी ने कहा कि सरकार को समुदाय की चिंताओं पर ध्यान देना चाहिए.

जदयू सांसद आलोक कुमार सुमन ने कहा कि 2019 का कानून ऐतिहासिक था, लेकिन उसमें कुछ कमियां थीं, जिसके कारण स्माइल जैसी कल्याणकारी योजनाओं का लाभ एलजीबीटीक्यूआईए+ समुदाय के वास्तविक लाभार्थियों तक नहीं पहुंच पा रहा था.

मंत्री का जवाब

अपने जवाब में मंत्री वीरेंद्र कुमार ने कहा कि संशोधन का उद्देश्य ‘जैविक स्थिति के कारण सामाजिक बहिष्कार झेलने वाले लोगों की रक्षा’ करना है. 

उन्होंने कहा, ‘इस संशोधन के बाद मेडिकल बोर्ड की सिफारिश के आधार पर जिला मजिस्ट्रेट ट्रांसजेंडर व्यक्ति के रूप में पहचान प्रमाण पत्र जारी करेंगे.’

उन्होंने यह भी कहा कि विधेयक बच्चों को अपहरण और जबरन हार्मोन थेरेपी से बचाने के लिए है. हालांकि उन्होंने आत्मनिर्णय के अधिकार, निजता के उल्लंघन या मेडिकल बोर्ड की भूमिका जैसे मुद्दों पर कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिया.

वोटिंग के लिए विधेयक को रखे जाने से पहले उनका जवाब मुश्किल से दो मिनट ही चला. उनके जवाब के दौरान विधेयक को समिति के पास भेजने की मांग कर रहे विपक्षी सदस्यों ने सदन से वॉकआउट किया, जिसके बाद विधेयक ध्वनिमत से पारित कर दिया गया.

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