बंगाल में ‘अनिर्णय’ की उलझन में फंसी महिलाएं: वो प्रत्याशी हैं, पर नहीं जानतीं ख़ुद वोट दे सकती हैं या नहीं

चुनाव आयोग की एसआईआर प्रक्रिया के तहत बंगाल में लाखों लोगों को एडजुडिकेशन (जांच/लंबित निर्णय) की स्थिति में रखा गया है. इसमें कुछ चुनाव लड़ने वाली महिलाएं भी शामिल हैं. इसके असर सिर्फ़ चुनावी भागीदारी तक सीमित नहीं हैं. कई मामलों में सामाजिक कल्याण योजनाओं का लाभ- सीधे या परोक्ष रूप से - मतदाता पहचान से जुड़ा होता है. इन अधिकारों के खोने का डर प्रभावित महिलाओं में असुरक्षा को और गहरा कर रहा है.

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कलिता माझी (बाएं) और स्वाति खंडोकर. (तस्वीरें: आधिकारिक फेसबुक पेज से)

कोलकाता: चुनाव आयोग की विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) प्रक्रिया के तहत लाखों लोगों को ‘एडजुडिकेशन’ (Adjudication) यानी जांच या निर्णय लंबित की स्थिति में रखा गया है. इससे एक गहरी समस्या उभर रही है – जो विशेष रूप से महिलाओं को प्रभावित कर रही है, यहां तक कि चुनाव लड़ रही महिलाओं को भी.

कालिता माझी पूर्व बर्धमान जिले के औशग्राम से भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की उम्मीदवार हैं. हुगली के चंडीताला से मौजूदा विधायक स्वाति दत्ता खंडोकर, तृणमूल कांग्रेस के टिकट पर उसी सीट से दोबारा चुनाव लड़ रही हैं.

चुनाव लड़ने और महिला होने के अलावा इन दोनों में एक और समानता है – उम्मीदवारी घोषित होने के बाद भी ये अपने मतदाता होने की स्थिति को लेकर अनिश्चित हैं.

चुनाव आयोग द्वारा 23 मार्च की आधी रात के बाद पूरक मतदाता सूची जारी करने के कदम में कई तकनीकी खामियां और भ्रम देखने को मिले.

जब द वायर  ने पिछले सप्ताह इन दोनों से संपर्क किया, तो वे दोनों ‘न्यायिक निर्णय’ की स्थिति में थीं और चिंतित थीं.

‘मुझे कभी डर नहीं लगा’

37 साल की माझी ने पिछले हफ़्ते फ़ोन पर कहा था, ‘अगर मेरा नाम लिस्ट से हटा दिया गया, तो मुझे बुरा लगेगा, लेकिन मुझे चुनाव आयोग पर पूरा भरोसा है. ज्ञानेश कुमार ने वादा किया है कि वे इन ‘एडजुडिकेशन’ वाले मामलों को सुलझा देंगे; मैंने यह बात ख़बरों में सुनी है.’

माजी पहली बार चुनाव लड़ रही हैं और एक साधारण परिवार से आती हैं. वह पहले घरेलू सहायिका के रूप में काम कर चुकी हैं. जब उनकी उम्मीदवारी को लेकर अनिश्चितता के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने धीरे से कहा, ‘पार्टी (भाजपा) सब जानती है. मुझे भरोसा है कि वे इसका ध्यान रखेंगे.’

कलिता माझी (बाएं से दूसरी). (फोटो: फ़ेसबुक)

अब उन्हें राहत मिली है. उनका नाम चुनाव आयोग द्वारा जारी पहली पूरक सूची में शामिल हो गया है.

इस सप्ताह उन्होंने फोन पर कहा, ‘मुझे कभी डर नहीं लगा. हम सात भाई-बहन हैं; 28 फरवरी को जारी एसआईआर सूची में मेरे अलावा सभी के नाम थे. इसलिए मुझे कुछ हद तक भरोसा था कि मेरा नाम नहीं हटेगा.’

‘मैंने एक मुस्लिम व्यक्ति से शादी की है’

59 वर्षीय स्वाति खंडोकर, जिनके पिता बैद्याबती नगर पालिका के अध्यक्ष थे, अभी भी मतदाता के रूप में अपने भविष्य का इंतजार कर रही हैं. उनके दिवंगत पति अकबर अली खंडोकर चंडीताला से तृणमूल कांग्रेस के विधायक थे. 2005 में उनके असामयिक निधन के बाद स्वाति ने राजनीति में कदम रखा.

2006 में चंडीताला विधानसभा सीट से अपने पहले चुनाव में वे भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के उम्मीदवार भक्तराम पान से हार गई थीं, लेकिन 2011 से उन्होंने लगातार तीन बार जीत हासिल की है. अब वे चौथी बार जीत की कोशिश कर रही हैं, लेकिन एसआईआर के कारण उनका मतदाता होने का दर्जा अनिश्चित बना हुआ है.

चुनाव प्रचार के दौरान स्वाति खंडोकर. (फोटो: फेसबुक)

उन्होंने कहा, ‘हमारा पुश्तैनी घर सात पीढ़ियों से यहीं है. मेरा जन्म और परवरिश यहीं हुई है.’ सूची में ‘अभी फैसला होना बाकी’ (Under adjudication) के तौर पर दर्ज खांडोकर ने बताया कि बैद्यबाटी से गहरी जड़ें जुड़ी होने के बावजूद वह खुद को अनिश्चितता में क्यों पा रही हैं.

उन्होंने 19 मार्च को फोन पर कहा, ‘मैंने एक मुस्लिम व्यक्ति से शादी की है. मेरा मायके का सरनेम दत्ता है और शादी के बाद खंडोकर हो गया. चुनाव आयोग इस तर्क को स्वीकार नहीं कर रहा है.’

उनका कहना है कि उन्होंने सभी आवश्यक दस्तावेज, जिनमें उनके पिता का मृत्यु प्रमाणपत्र भी शामिल है, चुनाव आयोग को जमा कर दिए हैं. उनका आरोप है कि ‘तार्किक असंगतियों’ के नाम पर आम लोगों को परेशान किया जा रहा है.

माझी के विपरीत, खंडोकर का नाम पूरक सूची में नहीं है. वे नाराज हैं, लेकिन डरी हुई नहीं.

25 मार्च को उन्होंने कहा कि वे चार दशकों से अधिक समय से मतदाता हैं और जल्द ही कलकत्ता हाईकोर्ट द्वारा गठित न्यायाधिकरण में अपील करेंगी, जिसे सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर बनाया गया है.

लेकिन उनकी चिंता सिर्फ अपनी नहीं है. उन्होंने कहा, ‘मैं चंडीताला की मौजूदा विधायक हूं. जिन लोगों का नाम पहली पूरक सूची में नहीं है, वे मेरे पास आ रहे हैं. लेकिन सूची स्पष्ट नहीं है. मुझे दुख होता है कि लोग परेशान हो रहे हैं और मेरे पास उनके लिए कोई जवाब भी नहीं है.’

कानून क्या कहता है

अगर किसी उम्मीदवार का नाम मतदाता सूची से हट जाता है, तो क्या होगा? इस पर मोस्तारी बानो के मामले में पैरवी कर रहे वकील सब्यसाची चटर्जी ने कहा, ‘यदि किसी उम्मीदवार को मतदाता नहीं माना जाता, तो उसकी उम्मीदवारी अपने आप रद्द हो जाएगी.’

संविधान के अनुच्छेद 84 में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि निर्वाचित प्रतिनिधि बनने के लिए व्यक्ति का इस देश का नागरिक होना आवश्यक है.

जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 के अनुसार, ‘कोई भी व्यक्ति किसी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश का प्रतिनिधि बनने के लिए तब तक योग्य नहीं होगा, जब तक वह उस राज्य या क्षेत्र के किसी संसदीय निर्वाचन क्षेत्र का मतदाता न हो.’

जहां माझी निश्चिंत हैं और खांडोकर बेसब्री से शुक्रवार को आने वाली पूरक सूची में अपना नाम आने का इंतज़ार कर रही हैं, वहीं मोस्तारी बानो का फैसला इसी कानून के तहत कर दिया गया.

46 साल की मोस्तारी ने सुबह के घरेलू कामों के बीच फोन पर कहा, ‘इस ‘एडजुडिकेशन’ (कानूनी फैसले) से जुड़े मसले की वजह से मैं चुनाव नहीं लड़ पा रही हूं.’

वे मुर्शिदाबाद के भगबानगोला से भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) (सीपीआई-एम) की उम्मीदवार बनने वाली थीं, लेकिन ऐसा नहीं हो सका. क्या उन्हें दुख नहीं हुआ? उन्होंने कहा, ‘हां, बिल्कुल हुआ, हालांकि उसकी वजह कुछ और थी.’

करीब 60 लाख मतदाता न्यायिक निर्णय सूची में हैं, जिनमें 31 लाख से अधिक महिलाएं हैं. उनके अनुसार, यह अपने आप में महिला मतदाताओं की हार है.

पहली याचिकाकर्ता मोस्तारी बानो, नई दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट में चुनाव आयोग के ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (एसआईआर) कवायद को चुनौती देने वाली अपनी याचिका पर सुनवाई के दौरान. (फोटो: पीटीआई)

उन्होंने कहा, ‘मैं और मेरे जैसे कई लोग 2002 से पहले से वोट करते आ रहे हैं. अब हमें नहीं पता कि हम इस बार वोट दे पाएंगे या नहीं, क्योंकि हम चुनाव आयोग की जांच के दायरे में हैं. अगर इतने सालों से वोट दे रहे लोगों के नाम अचानक सूची से गायब हो जाएं, तो यह सबके लिए बड़ा झटका होगा.’

बानो का मानना है कि एसआईआर के नाम पर चुनाव आयोग राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) जैसी प्रक्रिया चला रहा है. उन्होंने कहा, ‘कानूनी मतदाताओं के नाम हटाकर उन्हें घुसपैठिया दिखाने की कोशिश की जाएगी.’

इसके असर सिर्फ़ चुनावी भागीदारी तक सीमित नहीं हैं. कई मामलों में सामाजिक कल्याण योजनाओं का लाभ – सीधे या परोक्ष रूप से – मतदाता पहचान से जुड़ा होता है. इन अधिकारों के खोने का डर प्रभावित महिलाओं में असुरक्षा को और गहरा कर रहा है.