टॉक्सिक मैस्कुलिनिटी महज़ नारीवादियों का मुद्दा नहीं रहा, वैश्विक संकट का रूप ले चुका है

टॉक्सिक मैस्कुलिनिटी पुरुषों पर कोई व्यक्तिगत आक्षेप नहीं है बल्कि उस सामाजिक व्यवस्था के बारे में है जो शक्ति के विनाशकारी रूप को बढ़ावा देती है. जेफ़्री एपस्टीन से जुड़े नेटवर्क ने उजागर किया कि किस तरह एंटाइटलमेंट, शोषण और सज़ा से छूट जाने की संस्कृति काम करती है. ये घटनाएं छिटपुट नहीं थीं. इन्हें उन व्यवस्थाओं ने संभव बनाया जो सत्ता की जवाबदेही को सुनिश्चित नहीं करतीं.

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(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रवर्ती/द वायर)

यूं तो किसी कॉलेज परिसर में हत्या होना अब कोई नई बात नहीं रह गई है, ऐसी घटनाएं आमतौर पर कुछ ही दिनों तक सुर्खियां बनती हैं और फिर धीरे-धीरे भुला दी जाती हैं. वाराणसी के प्रसिद्ध उदय प्रताप कॉलेज में 20 मार्च 2026 को एक छात्र की हत्या हुई, जो बकौल रिपोर्ट्स, छात्र समूहों के बीच प्रभुत्व स्थापित करने की प्रतिस्पर्धा का परिणाम थी. असली सवाल यह नहीं है कि यह घटना कितनी असामान्य है, बल्कि यह कि क्या हम इसे एक व्यापक और गंभीर सामाजिक प्रवृत्ति के एक लक्षण के रूप में समझने को तैयार हैं?

यह हिंसा एक ऐसे पैटर्न का हिस्सा है, जिसकी जड़ें स्व-अधिकार (एंटाइटलमेंट) की भावना, असहमति को स्वीकार न कर पाने की प्रवृत्ति और दूसरों की स्वायत्तता को खारिज़ करने में है. यह पैटर्न सीधे तौर पर विकृत मर्दानगी (टॉक्सिक मैस्कुलिनिटी) से जुड़ा है, जहां ‘मर्दानगी’ को प्रभुत्व, नियंत्रण और आक्रामकता के साथ जोड़ा जाता है और किसी भी चुनौती या अस्वीकृति के लिए हिंसात्मक रवैया अपनाया जाता है.

अक्सर जब हम ऐसी घटनाओं को एक सामाजिक समस्या के रूप में समझने के बजाय छिट-पुट अपराध मानकर टाल देते हैं तो हम अपराध को सामान्य स्वीकृति दिलवाने में ही मदद करते हैं. यदि यह हमें समाज की दिशा पर गंभीरता से सोचने के लिए विवश नहीं करता, तो यह केवल हमारी लापरवाही ही नही-बल्कि हमारी मौन सहभागिता भी है.

हालांकि यह मानसिकता ख़ुद पैदा नहीं होती बल्कि इसे समाज द्वारा निर्मित, पोषित और सामान्यीकृत किया जाता है. हमारे रोज़मर्रा के जीवन में आक्रामकता को आज भी शक्ति से जोड़कर देखा जाता है और नियंत्रण को परवाह या देखभाल का रूप दे दिया जाता है.

लोकप्रिय संस्कृति इन विकृतियों को और मजबूत करती है. कई बार फिल्में, जैसे हाल के कुछ बरसों में आईं कबीर सिंह (2019) एनिमल (2023) और धुरंधर(2025) न केवल हिंसक पुरुषों को दिखाती हैं बल्कि उनका महिमामंडन करती हैं. उनके नायक हिंसक, वर्चस्ववादी और भावनात्मक रूप से अस्थिर होते हैं, फिर भी उन्हें आकर्षक और मर्दानगी से भरपूर दिखाया जाता है. इस तरह के प्रतिनिधित्व के संदेश स्पष्ट है- वर्चस्व आकर्षक है और उसके परिणाम चाहे जितने भी हिंसक हों, मायने नहीं रखते.

यहां यह समझना भी महत्वपूर्ण है कि इन कथाओं में न केवल महिलाएं, बल्कि ऐसे पुरुष भी लगभग अनुपस्थित हैं जो आक्रामक नहीं हैं और जीवन को समानता के दृष्टिकोण से देखते हैं. महिलाएं- विशेषकर वे, जो आत्मविश्वासी, सजग और ऐसे विषाक्त मर्दानगी पूर्ण व्यवहार को चुनौती देने में सक्षम हैं- लगातार हाशिए पर धकेल दी जाती हैं. इन फिल्मों में वह अक्सर केवल आकर्षण की वस्तु, भावनात्मक सहारा या पुरुष पात्रों की कहानी को आगे बढ़ाने का माध्यम बनकर रह जाती हैं.

बहुत कम ही उन्हें ऐसे स्वतंत्र व्यक्तियों के रूप में दिखाया जाता है जो विरोध या संवाद करती हैं या रिश्तों को नए सिरे से परिभाषित करती हैं. उनकी यह अनुपस्थिति संयोगवश नहीं है बल्कि यह उन महिलाओं, जो पुरुषवादी वर्चस्व की स्थापित धारणाओं को चुनौती देती हैं, के प्रति हमारी गहरी सामाजिक असहजता का परिणाम है.

यह समस्या केवल भारतीय सिनेमा तक सीमित नहीं है. हॉलीवुड ने भी लंबे समय तक अपने कथानकों को ऐसे ही हिंसक पुरुषों के इर्द-गिर्द बुना है, जो बल प्रयोग के माध्यम से संघर्ष का समाधान करते हैं. भले ही कुछ बदलाव अब दिखाई देने लगे हों, लेकिन व्यापक सांस्कृतिक परिदृश्य अब भी विकृत मर्दानगी के छद्म आदर्शों से भरा हुआ है.

इसके साथ ही विभिन्न उद्योगों में दृढ़ और विचारवान स्त्रियों की उपस्थिति अब भी सीमित है जिससे न केवल प्रतिनिधित्व प्रभावित होता है, बल्कि जीवन और संबंधों की एक वैकल्पिक संरचना की संभावना भी संकुचित हो जाती है.

बहरहाल, विकृत मर्दानगी, अब केवल नारीवादियों का मुद्दा नहीं रह गई है. यह उस दायरे से बाहर निकलकर एक सामाजिक तथा वैश्विक संकट का रूप ले चुकी है, जो हमारे रोज़मर्रा के संबंधों, सांस्कृतिक कल्पनाओं और यहां तक कि राजनीतिक व्यवहार को भी प्रभावित कर रही  है. जब हम सत्ता की संरचनाओं की ओर देखते हैं तो वहां भी इस मानसिकता की गहरी जड़ें दिखलाई पड़ती हैं.

जेफ़्री एपस्टीन से जुड़े नेटवर्क ने यह उजागर किया कि किस तरह एंटाइटलमेंट, शोषण और सजा से छूट जाने की संस्कृति उच्चतम स्तरों पर काम करती है. ये घटनाएं छिटपुट नहीं थीं. इन्हें उन व्यवस्थाओं ने संभव बनाया जो सत्ता की जवाबदेही को सुनिश्चित नहीं करतीं. इन संरचनाओं के भीतर महिलाओं का न केवल शोषण हुआ, बल्कि उन्हें सत्ता के विरुद्ध बोलने से चुप भी कराया गया.

अंतरराष्ट्रीय राजनीति के स्तर पर भी सत्ता की भाषा और व्यवहार कहीं-न कहीं विकृत मर्दानगी की रूपरेखा को ही दोहराते हैं. संयुक्त राज्य अमेरिका और इज़रायल से जुड़े संघर्षों में दिखाई देने वाली सैन्य आक्रामकता लगभग वही स्थिति है जहां संवाद की बजाय प्रभुत्व और संयम की बजाय प्रतिशोध को प्राथमिकता दी जाती है.

इसी के समानांतर, ईरान में भी असहमति की आवाज़-विशेषकर सजग और सचेत महिलाओं की आवाज़-को बार-बार दबाया गया है, जो यह सिद्ध करता है कि सत्ता संरचनाएं किस तरह नियंत्रण बनाए रखने के लिए किसी भी प्रकार के प्रतिरोध को खत्म करने में जुटी होती हैं. इस दृष्टि से, युद्ध और दमन दोनों ही टॉक्सिक मैस्कुलिनिटी के चरम प्रदर्शन बन जाते हैं.

देखा जाए तो युद्ध, शांति और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े निर्णय लेने वाले मंच अब भी मुख्यतः पुरुष-प्रधान हैं. इसीलिए संवाद, संरक्षण और दीर्घकालिक मानवीय सुरक्षा जैसे संरचनात्मक सिद्धांत अंतरराष्ट्रीय रणनीतियों का हिस्सा नहीं बन पाते.

इन स्थानों पर महिलाओं और नारीवादी दृष्टिकोण, दोनों की अनुपस्थिति स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है. इसलिए नहीं कि उनमें मूल्य की कमी है, बल्कि इसलिए कि उन्हें लगातार कमतर आंका जाता है. नारीवादी अंतरराष्ट्रीय संबंध की विद्वान जेएन टिकनर लंबे समय से यह तर्क देती रही हैं कि वैश्विक राजनीति और सुरक्षा की संस्थाएं मूलतः पुरुष-केन्द्रित मूल्यों पर आधारित हैं, जहां शक्ति, नियंत्रण तथा सैन्य क्षमता को प्राथमिकता दी जाती है, जबकि सहयोग और मानवीय सुरक्षा को हाशिए पर रखा जाता है.

इसी तरह वैलेंटाइन मोग़दाम यह दिखाती हैं कि संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाओं में महिलाओं की उपस्थिति बढ़ने के बावजूद, वास्तविक निर्णय लेने की शक्ति अब भी सीमित दायरों में ही सिमटी रहती है. इसलिए जहां महिलाएं उपस्थित भी हैं वहां भी सत्ता की शर्तें तय करने जैसे निर्णय उन्हें नहीं लेने दिए जाते.

इन सभी पहलुओं का अंततः विकृत मर्दानगी की चेतना से जुड़ना कोई संयोग नहीं हैं बल्कि यह एक स्पष्ट पैटर्न है, जिसके कुछ आधारभूत लक्षण हैं- संवेदनशीलता का दमन, नियंत्रण और प्रभुत्व का महिमामंडन.

टॉक्सिक मैस्कुलिनिटी पुरुषों पर कोई व्यक्तिगत आक्षेप नहीं है बल्कि एक व्यापक स्तर पर यह उस सामाजिक व्यवस्था के बारे में है जो शक्ति के सबसे विनाशकारी रूपों को बढ़ावा देती है और किसी भी प्रकार की भावनात्मक संवेदनशीलता को पौरुषहीन मानकर खारिज़ करती है. आक्रामकता का महिमामंडन यह उतनी ही दृढ़ता से करती है जितना कि उसके बरअक्स किसी अन्य वैकल्पिक व्यवस्था का विरोध.

पर अब वह समय आ गया है जहां हम इसे दूर ढकेलकर नज़रअंदाज़ करना बंद करें. यह कोई साधारण बात नहीं है. यह तय कर रहा है कि युवा पुरुष स्वयं को किस प्रकार देखते-समझते हैं, महिलाएं स्वयं को कितना सुरक्षित समझती हैं और राष्ट्र अपनी शक्ति का प्रयोग कैसे करते हैं. विकृत मर्दानगी को अनदेखा करना इसे समाप्त नहीं करेगा बल्कि इसके परिणामों को और अधिक हिंसक, स्पष्ट और अपरिवर्तनीय बना देगा.

(लेखिका डीएवी पीजी कॉलेज, वाराणसी में प्राध्यापिका हैं.)