नई दिल्ली: ईरान पर संभावित बड़े हमले की अपनी समयसीमा खत्म होने से महज़ एक घंटे पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अचानक रुख बदलते हुए दो हफ्तों के लिए सैन्य कार्रवाई रोकने की घोषणा कर दी. जिस हमले को वे पहले व्यापक और विनाशकारी अभियान के रूप में पेश कर चुके थे, उसी के बीच उन्होंने ईरान के 10 सूत्रीय शांति प्रस्ताव को ‘कारगर’ बताया.
ईरान ने ट्रंप के इस फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि यदि उसके खिलाफ हमले रोके जाते हैं, तो वह भी अपनी ‘रक्षात्मक कार्रवाई’ बंद कर देगा. साथ ही, तेहरान ने संकेत दिया कि वह दो हफ्तों के लिए स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से जहाज़ों की सुरक्षित आवाजाही की अनुमति देगा और इस दौरान अमेरिका के साथ बातचीत आगे बढ़ाएगा. अमेरिका की ओर से भी 15 बिंदुओं का एक अलग प्रस्ताव सामने रखा गया है.
इज़रायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के कार्यालय ने ट्रंप के फैसले का समर्थन किया है, लेकिन स्पष्ट किया है कि यह विराम लेबनान में हिज़्बुल्लाह के खिलाफ चल रहे युद्ध पर लागू नहीं होगा.
ईरान के 10 सूत्रीय प्रस्ताव में कई अहम मांगें शामिल हैं- अस्थायी युद्धविराम के बजाय स्थायी रूप से युद्ध का अंत, भविष्य में हमले न होने की गारंटी, लेबनान में हिज़्बुल्लाह पर इज़रायली हमलों को रोकना, पूरे क्षेत्र में सभी प्रकार के हमलों पर रोक (जिसमें ईरान की ओर से होने वाली कार्रवाई भी शामिल हो), और ईरान पर लगे सभी अमेरिकी व अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों को पूरी तरह हटाना.
इसके बदले ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को फिर से खोलने, वहां सुरक्षित आवाजाही के लिए एक प्रोटोकॉल बनाने और हर जहाज़ से लगभग 20 लाख डॉलर का ट्रांज़िट शुल्क लेने का प्रस्ताव रखा है. यह शुल्क ओमान के साथ साझा किया जाएगा. साथ ही, अमेरिका और इज़रायल द्वारा नष्ट किए गए ढांचे के पुनर्निर्माण की भी मांग की गई है.
दिलचस्प बात यह है कि ईरान के इस प्रस्ताव के फ़ारसी संस्करण में उसके परमाणु कार्यक्रम के लिए ‘यूरेनियम संवर्धन की स्वीकृति’ का जिक्र है, जबकि अंग्रेज़ी में जारी दस्तावेज़ों में यह बिंदु शामिल नहीं था. ट्रंप पहले ही साफ कर चुके हैं कि ईरान के परमाणु कार्यक्रम को पूरी तरह खत्म करना इस युद्ध का एक प्रमुख उद्देश्य है.
ईरान की सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद ने इस घटनाक्रम पर अपेक्षाकृत सख्त लहजे में प्रतिक्रिया दी है और इसे अपनी ‘ऐतिहासिक जीत’ बताया है. परिषद ने कहा कि ‘अन्यायपूर्ण, अवैध और आपराधिक युद्ध’ में दुश्मन को करारी हार मिली है. हालांकि, उसने यह भी स्पष्ट किया कि युद्ध का अंत तभी माना जाएगा जब उसके 10 सूत्रीय प्रस्ताव के सभी बिंदुओं पर अंतिम सहमति बन जाए.
परिषद ने अमेरिका पर अविश्वास जताते हुए कहा कि बातचीत ‘पूरी सतर्कता और अविश्वास’ के साथ आगे बढ़ेगी. इसने यह भी चेतावनी दी कि ‘हमारी उंगलियां ट्रिगर पर हैं और दुश्मन की जरा सी चूक का भी पूरी ताकत से जवाब दिया जाएगा.’ बातचीत शुक्रवार से इस्लामाबाद में शुरू होने की बात कही गई है और आपसी सहमति से दो हफ्तों की अवधि बढ़ाई भी जा सकती है.
इस बीच, ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘ट्रुथ सोशल’ पर ईरान की सर्वोच्च सुरक्षा परिषद के बयान को ‘फर्जी’ करार दिया. उन्होंने आरोप लगाया कि यह बयान एक नकली वेबसाइट से उठाया गया और मीडिया ने इसे बिना जांच के चला दिया. हालांकि, सीएनएन ने इस दावे को खारिज करते हुए कहा है कि यह बयान आधिकारिक स्रोतों से प्राप्त हुआ है.
राजनयिक स्तर पर इस पहल के पीछे पाकिस्तान की भूमिका भी सामने आई है. आधिकारिक तौर पर कहा गया कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के अनुरोध के बाद यह प्रगति संभव हो पाई. हालांकि, उनके एक पहले के ड्राफ्ट ट्वीट में ऐसे संकेत मिले थे कि इस अपील के पीछे बाहरी दबाव या पहल भी रही हो सकती है.

बाद में शहबाज शरीफ ने एक और ट्वीट में कहा कि यह संघर्षविराम दोनों पक्षों के ‘सहयोगी समूहों’ पर भी लागू होगा, जिसमें लेबनान में जारी टकराव शामिल है.

इसी क्रम में, ईरान समर्थित इराकी मिलिशिया के समूह ‘इस्लामिक रेज़िस्टेंस इन इराक’ ने भी घोषणा की है कि वह इराक और क्षेत्र में अपनी सैन्य कार्रवाई दो हफ्तों के लिए रोक देगा.
कुल मिलाकर, जहां एक ओर दो हफ्तों के इस विराम ने तत्काल टकराव को कुछ समय के लिए थाम दिया है, वहीं दूसरी ओर गहरे अविश्वास, कड़े बयान और जटिल शर्तों के चलते यह स्पष्ट है कि स्थिति अब भी बेहद नाजुक बनी हुई है.
