यों तो हिंदी के साहित्यिक सोशल मीडिया हमेशा ही सनसनी, खलबली मची रहती है, इस बार कुछ ज़्यादा तेज़ और तीख़ी हो गई है. रूपम मिश्र की एक पीड़ाजन्य, ईमानदार और मार्मिक कविता के विरुद्ध किसी अज्ञातकुलशील ने एफआईआर दर्ज करवाई है. ज़ाहिर है कि उसकी भावनाएं आहत हुई हैं, इस कविता से. वैसे भी, इन दिनों, अक्सर कई तरह के गिरोह, बजरंगी या नारंगिया सतरंगी, भावनाओं के आहत होने के एक अहर्निश अभियान में लगे रहते हैं और एफआईआर दर्ज कराते रहते हैं. पुलिस भी, इन दिनों, इतनी भावसिक्त हो गई है कि अक्सर एफआईआर दर्ज करने में देर नहीं लगाती, न संकोच करती है.
एफआईआर दर्ज होने के बाद व्यक्ति-विशेष के खिलाफ़ कार्रवाई के अलावा, इस प्रथम सूचनारपट के आधार पर क़ानून व्यवस्था के बिगड़ जाने की आशंका जन्म लेती है और कई बार पुलिस धारा 144 लगाने पर मजबूर हो जाती है. उसका उल्लंघन करने पर फिर कार्रवाई होती है. एक रपट के नतीजे अनेक होते हैं.
अब इस नए मामले पर आएं. आम तौर पर किसी थाने के दारोगा के साहित्यप्रेमी होने की न तो अपेक्षा होती है, न ही संदेह. अगर शिकायत करने वाला अपनी जाति या उपजाति का हो या फिर शिकायत किसी मुसलमान के विरुद्ध हो तो रपट फ़ौरन दर्ज कर ली जाती है. इस बार क्या हुआ, यह पता नहीं. क़यास लगाना उचित नहीं माना जाएगा. पर इस मामले ने, निश्चय ही, सोशल मीडिया को अपनी अभिव्यक्ति के दायरे और प्रभाव को बढ़ाने का नया उत्साह दिया है.
अव्वल, यह कविता अगर सोशल मीडिया पर न आती तो जिन सज्जन ने थाने में रपट लिखवाई है वे कभी इस कविता को न पढ़ पाते. दूसरे, अगर सोशल मीडिया पर इतना बवाल न मचता तो उसकी ओर ध्यानाकर्षण न हो पाता. तीसरे, कुछ पगड़ी-कीचड़ उछाल लेखकों को अब यह उत्साह होगा कि उनके किए से कोई कवि भौतिक ख़तरे में पड़ सकता है तो यह उनके अदम्य परमीड़क चित्त को संतुष्ट करने की नई संभावना खोलने जैसा है.
यह एक नए संदर्भ और अर्थ में ‘अभिव्यक्ति का ख़तरा’ उठाना है. यह अपनी कीचड़उछाल को नई ऊंचाई देने का अवसर होगी. अन्य लेखक भी सतर्क हो जाएंगे कि वे ऐसा कुछ न करें या लिखें जो बवाल पैदा करे. आख़िर शांति और सद्भाव फैलाना साहित्य का एक भद्र लक्ष्य तो हमेशा से रहा है.
कम से कम एक दुष्परिणाम यह होने जा रहा है कि अब कई कवि अपनी कोई जोखिम उठाने, तीख़े प्रश्न पूछने वाली कविता को सोशल मीडिया पर डालने से संकोच करेंगे कि कहीं उन्हें थाने में तलब न कर लिया जाए. ऐसे संकोच से अगर खुद उनकी भावनाएं आहत होती हैं, तो इतना मोल तो उन्हें अपने कवि होने का चुकाना ही पड़ेगा.
साही समय
ऐसा कम होता है पर इस बार, सौभाग्य से, हुआ है कि पिछले महीने दो-तीन दिनों के अंतर्गत पहले तो ‘साखी’ पत्रिका का गोपेश्वर सिंह द्वारा अतिथि-संपादित लगभग पांच सौ पृष्ठों का साही विशेषांक मिला. फिर, लोकभारती द्वारा प्रकाशित और सुस्मिता साही श्रीवास्तव द्वारा संकलित, छह सौ पृष्ठों से अधिक आकार की पुस्तक मिली ‘सम्पूर्ण कविताएं’ जिसमें साही की सभी प्रकाशित-अप्रकाशित, पूरी-अधूरी कविताएं एकत्र हैं और सुस्मिता ने एक लंबी भूमिका मिली है.
फिर, देवीशंकर अवस्थी सम्मान समिति की बैठक में आनन्द पाण्डेय की आलोचना पुस्तक ‘आशंका के द्वीप में लघु मानव’ को इस वर्ष के सम्मान के लिए चुना गया जो साही की कविता, आलोचना, राजनीति आदि के आलोचनात्मक विवेचन पर एकाग्र है. यह जानकारी भी है कि साही का आलोचना-समग्र भी जल्दी ही प्रकाशित होने जा रहा है और उनकी जीवनी पर उनकी बेटी सुस्मिता काम कर रही हैं.
यह बात लक्ष्य करने की है कि हालांकि पिछली सदी के दो दशकों 60-70 के दशकों में परिदृश्य पर साही बहुत मुखर और दृश्य थे, स्वयं उन पर तब या उसके बाद बहुत कम लिखा गया. जब-तब उनका ज़िक्र तो होता रहा पर उनकी आलोचना-पुस्तक ‘जायसी’ को छोड़कर उनके आलोचनात्मक कृतित्व या उनकी कविताओं पर कोई ख़ास ध्यान नहीं दिया गया.
‘पूर्वाग्रह’ पत्रिका पुनर्प्रकाशित ने उन पर एक विशेषांक (जो उन पर किसी पत्रिका का पहला विशेषांक था) 1983 में निकाला था. हमारे जाने उसके बाद, यानी लगभग 42 वर्ष बाद, उन पर यह नया विशेषांक आया है. उसमें कुछ सामग्री है ‘पूर्वाग्रह’ के विशेषांक से. बहुत सारे नए-वरिष्ठ आलोचकों ने साही के विभिन्न पक्षों पर जतन और ध्यान से लिखा है.
एक तरह से ‘साखी’ का यह विशेषांक साही पर एक संदर्भ-ग्रंथ ही बन गया है. यह इसका भी प्रमाण है कि साही ने अपने समय में जो प्रश्न उठाए, जो बहसें छेड़ी थीं, जिस ढंग की प्रश्नाकुल कविता लिखी थी वह हमारे खौलते समय में प्रासंगिक हो उठे हैं. उनके एक वक्तव्य ‘साहित्य क्यों’ को हमारे हिंसक-हत्यारे समय में, कृत्रिम मेधा से बढ़ती चुनौती के चलते, फिर से पूछने समझने और नई जटिलताओं के बरक़्स विश्लेषित करने की ज़रूरत है.
साही की कविकीर्ति थोड़ी लंबी या मझोले आकार की कविताओं की है. उनके कविता-समग्र में उनकी कुछ छोटी कविताएं अलग चमक लिए हुए हैं:
तीसरे पहर का चित्र
पास के बँसवट से
अचानक चिड़ियों की चहचहाहट
शायद वह मोटी काली बिल्ली
जो कभी-कभी मुँडेर पर
पूँछ उठाये दिख जाती है
नाले को पार कर रही होगी.
सन्ध्या चित्र-एक
उत्तर में एक तारा
आधे आसमान तक
कत्थई प्राचीर-सी
रेखा
गहराती सन्ध्या की.
पच्छिम की दीप्त लालिमा में
अदृश्य कोई पक्षी
फेंकता है चीख़
कमन्द-सी
परकोटे पर.
पहली कविता 1961 की है, दूसरी 1960 की.
राजमुकुल
मुकुल शिवपुत्र आज के शास्त्रीय गायकों में एक किंवदंती पुरुष हैं. वे बहुत कम सार्वजनिक मंच पर आते हैं. कई बार वादा करके भी नहीं आते हैं. आ जाएं तो मंच पर बैठ जाएं तो अपना गायन शुरू करने में काफ़ी समय लगाते हैं. पर जो गाते हैं वह अनूठा होता है- वे भटकने लगते हैं पर इसी भटकने से उनके गायन का सौन्दर्य गठित होता है.
भीलवाड़ा फाउंडेशन ने दिल्ली के कमानी हाल में बीते 5 अप्रैल की शाम एक संगीत सभा आयोजित की. हॉल भरा हुआ था. इस बिरले गायक को सुनने बड़ी संख्या में धवलकेशी और युवा मौजूद थे. देर से सही मुकुल ने जमकर गाया- रूपाकार तो पारंपरिक ही था पर वह मानों नए रंग से गमक रहा था. लंबा आलाप जो कभी प्रार्थना लगता था, कभी विलाप और कभी सिर्फ़ आलाप. बिना किसी शब्द के सिर्फ़ स्वर-बिंब खिलते और लोप होते रहे. उपस्थिति और अनुपस्थिति का गुम्फन, ध्वनि और मौन का स्पन्दन, होते-होते न होने का विस्तार.
हस्तमुद्राओं से पूरे गायन में लगता रहा कि संगीत उपहार है, कहीं से फूलों की तरह निरंतर झर रहा है. प्रस्फुटन, स्थगन, पल्लवन सब बारी-बारी से पर अनिवार्यता में गुंथे हुए. कई बार लगा गायन मौन की ओर झुका हुआ सा है, कई बार मौन ही गा रहा है. मुकुल ने यहां राग खिलता है, खुलता है और मौन में लीन हो जाता है. राग स्वयं मुकुल है- दोनों को कुछ और होने की दरकार नहीं.
मुकुल ‘एक निरंजन’ को ध्याते हैं, किसी दूजे के संग नहीं जाते- राग भरपूर है, उसमें विपुल अंतर्ध्वनियां हैं और फिर भी, या कि इस सबको सहेजते हुए राग निरंजन है. कम से कम मुकुल के यहां.
(लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं.)
