अलविदा आशा ताई: जो ख़त्म हो किसी जगह, ये ऐसा सिलसिला नहीं…

भारतीय संगीत जगत की लीजेंड आशा भोसले का रविवार को मुंबई के एक अस्पताल में निधन हो गया. वे 92 वर्ष की थीं. कच्ची उम्र में गायन की शुरुआत करने वाली आशा जी अपनी प्रयोगधर्मी प्रतिभा और शोख़ आवाज़ से कई दशकों तक सुनने वालों की प्रिय बनी रहीं. वो भले देह से दुनिया में न रही हों, पर उनके गीत अमर रहेंगे.

आशा भोसले. (फोटो साभार: विकिपीडिया)

नई दिल्ली: भारतीय संगीत जगत की मशहूर गायिका, ‘पद्म विभूषण’ आशा भोसले का रविवार (12 अप्रैल) को मुंबई के ब्रीच कैंडी अस्पताल में 92 साल की उम्र में निधन हो गया. उन्हें दिल का दौरा पड़ने के बाद शनिवार को अस्पताल में भर्ती कराया गया था.

रिपोर्ट के मुताबिक, उनके बेटे आनंद भोसले ने रविवार दोपहर पत्रकारों से उनकी मृत्यु की पुष्टि की और बताया कि उनका अंतिम संस्कार सोमवार को मुंबई के शिवाजी पार्क में किया जाएगा.

उन्होंने कहा, ‘मेरी मां का आज निधन हो गया. लोग कल सुबह 11 बजे लोअर परेल स्थित कासा ग्रांडे में उन्हें अंतिम श्रद्धांजलि दे सकते हैं, जहां वे रहती थीं. अंतिम संस्कार कल शाम 4 बजे शिवाजी पार्क में किया जाएगा.’

हिंदी पार्श्व गायन की जानी-मानी हस्तियों में शुमार आशा भोसले का करिअर में कई यादगार गानों से सजा रहा है. संगीत से आशा जी का नाता बचपन में ही जुड़ गया था. 8 सितंबर 1933 को जन्मीं आशा भोसले ने 1943 में महज 10 साल की उम्र में मराठी फिल्म ‘माझ बल’ के लिए अपना पहला गीत गाया था. इसके बाद वह 90 साल की उम्र तक गाती रहीं.

साल 1948 में फिल्म ‘चुनरिया’ के ज़रिए आशा ने पार्श्व गायन की दुनिया में कदम रखा. उन्होंने गीता दत्त और शमशाद बेगम के साथ अपना पहला गीत ‘सावन आया रे’ गाया. इसके साल भर बाद 1949 में फिल्म ‘रात की रानी’ से उन्हें अपना पहला सोलो (एकल) गीत मिला.

उनकी दिल को छू लेने वाली आवाज़, ‘नया दौर’ से ‘तीसरी मंज़िल’, ‘हरे रामा हरे कृष्णा’ से ‘उमराव जान’ और ‘इजाज़त’ से होते हुए ‘रंगीला’ तक… पीढ़ियां बदलने के बाद भी हमेशा ताज़ा बनी रही.

हालांकि, आशा भोसले का जीवन संघर्षों से भरा रहा. उनके संगीतकार पिता दीनानाथ मंगेशकर का निधन तब हो गया था जब वह महज 9 वर्ष की थीं. इसके बाद परिवार के ख़िलाफ़ जाकर 16 साल की उम्र में उन्होंने अपने से काफी बड़े गणपतराव भोसले से विवाह किया, जो उस समय 31 वर्ष के थे. फिर उन्हें वैवाहिक जीवन में भी काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ा.

संगीत का सफ़र, ओपी नैयर के साथ साझेदारी

वहीं, संगीत जगत की बात करें, तो उनकी अपनी बहन लता मंगेशकर, शमशाद बेगम और गीता दत्त जैसी अन्य गायिकाओं के वर्चस्व वाली दुनिया में आशा भोसले को पैर जमाने के लिए शुरू में दूसरे और तीसरे दर्जे के संगीत निर्देशकों के साथ काम करना पड़ा.

यह आशा की ज़िद और संघर्ष का नतीजा था कि उन्हें 1952 में ओपी नैयर के साथ साझेदारी का मौका मिला, जिसने उन्हें प्रसिद्धि दिलाई. नैयर संगीत जगत में नए थे और उन्होंने नए और ताज़गी भरे संगीत की रचना की, जिससे वे युवा पीढ़ी के बीच लोकप्रिय हो गए. उन्होंने कसम खाई थी कि वे लता मंगेशकर के साथ कभी काम नहीं करेंगे क्योंकि उन्होंने एक बार उन्हें ठुकरा दिया था. उन्होंने ऐसे गीत रचे जो आज भी बहुत याद किए जाते हैं, और वे सभी उनकी प्रेरणास्रोत आशा भोसले के साथ थे.

अन्य प्रमुख संगीत निर्देशकों में एसडी बर्मन, रवि (रवि शंकर शर्मा) और उस समय के उभरते सितारे आरडी बर्मन शामिल थे.

1972 में नैयर के साथ उनका संगीत संबंध समाप्त होने के बाद उन्होंने युवा बर्मन के साथ ही साझेदारी की थी. खय्याम के निर्देशन में उमराव जान फिल्म में उर्दू ग़ज़लों के गायन से उन्हें अपार प्रसिद्धि मिली. इस फिल्म में अपने काम के लिए उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला.

तब तक वह 7 फिल्मफेयर पुरस्कार जीत चुकी थीं. 2000 में उन्हें दादासाहेब फाल्के पुरस्कार मिला. 2008 में उन्हें देश के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया. 2011 में उन्हें गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड्स द्वारा संगीत इतिहास में सबसे अधिक रिकॉर्डिंग करने वाली कलाकार के रूप में मान्यता दी गई.

भोसले को दो ग्रैमी पुरस्कारों के लिए भी नामांकित किया गया था.

उन्होंने मराठी और बांग्ला के अलावा कई भारतीय भाषाओं में भी गाने रिकॉर्ड किए हैं, जिनमें तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम और पंजाबी शामिल हैं. वे बेहद साहसी थीं.

1980 और 1990 के दशक में उन्होंने बॉय जॉर्ज, क्रोनोस क्वार्टेट और ब्रिटिश समूह कॉर्नरशॉप जैसे अंतरराष्ट्रीय सितारों के साथ काम किया. हाल ही तक वे लाइव कॉन्सर्ट में गाती थीं.

भोसले का आखिरी गाना, ‘द शैडोई लाइट’, अंग्रेजी बैंड गोरिल्लाज़ के साथ मिलकर बनाया गया था. यह गाना 27 फरवरी, 2026 को रिलीज़ हुआ था.

शोक की लहर

उनके निधन पर देश और दुनिया के उनके तमाम प्रशंसक दुख ज़ाहिर कर रहे हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने एक्स अकाउंट पर मराठी और अंग्रेज़ी में आशा भोसले के निधन पर दुख ज़ाहिर किया है.

उन्होंने लिखा, ‘आशा भोसले जी के निधन से बेहद दुख हुआ. वह भारत की मशहूर और प्रतिभाशाली आवाज़ों में से एक थीं. दशकों तक चले उनके ज़बरदस्त म्यूज़िकल सफ़र ने हमारी सांस्कृतिक विरासत को बेहतर बनाया और दुनिया भर में अनगिनत दिलों को छुआ.’

वहीं, महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने कहा है कि पूरे भारत और विश्व के संगीत प्रेमियों के लिए यह दुख का समय है, उन्हें सबसे बहुमुखी कलाकार के रूप में जाना गया.

उन्होंने पत्रकारों, ‘भारत के इतिहास में उन्होंने और मंगेशकर परिवार ने संगीत की सेवा की है. बाल्य अवस्था से संगीत की सेवा करते-करते 92 साल की उम्र तक लगातार उन्होंने सेवा की. वो अपने 90वें जन्मदिन पर तीन घंटे कॉन्सर्ट करने वालीं एकमात्र गायिका हैं.’

आशा भोसले के निधन पर संगीतकर शंकर महादेवन ने कहा है कि आज का दिन सबसे दुखद है.

उन्होंने कहा, ‘यह हम सभी के लिए बहुत दुखद दिन है और भारतीय संगीत के लिए भी बेहद दुखद दिन है. मुझे यकीन ही नहीं हो रहा कि हमारी प्यारी आशा ताई अब हमारे बीच नहीं हैं.’

उन्होंने आगे कहा, ‘मैं अपने दुख और इस समय जो महसूस कर रहा हूं, उसे शब्दों में बयां नहीं कर पा रहा हूं. एक संगीतकार के रूप में, दीदी के भक्त के रूप में, एक बहुत करीबी पारिवारिक मित्र के रूप में और उन्हें मां सरस्वती की तरह मानते हुए, मुझे यकीन है कि हर एक भारतीय का दिल टूटा हुआ है.’

संगीतकार एआर रहमान ने आशा भोसले के साथ अपनी तस्वीर साझा करते हुए लिखा है, ‘वह अपनी आवाज के जरिए हमेशा जीवित रहेंगी. क्या कमाल की कलाकार थीं!’

 

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गायिका श्रेया घोषाल ने आशा भोसले के निधन पर उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि आज हमने एक ऐसी आवाज खो दी, जिसने कई पीढ़ियों को परिभाषित किया.

 

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गौरतलब है कि आशा भोसले ने अपनी जिद से दुनिया को दिखा दिया कि वे हर रंग में ढल जाने वाली एक मुकम्मल कलाकार हैं जिनकी आवाज़ भाषा या उम्र के बंधनों से दूर शुरुआत से अंत तक एक उत्साह से भरी और दशकों तक हर दौर की रूह को छूती रही. वो भले देह से दुनिया में न रही हों, पर उनकी आवाज़ की शोखियां और चुलबुले गीत हमेशा गूंजते रहेंगे.