नई दिल्ली: सामाजिक कार्यकर्ताओं, शिक्षाविदों, पूर्व सिविल सेवकों और नागरिक समाज के सदस्यों के एक समूह ने संसद के आगामी विशेष सत्र में महिला आरक्षण और परिसीमन से जुड़े अहम विधेयकों को लाए जाने के ‘गोपनीय और गैर-लोकतांत्रिक’ तरीके पर चिंता जताते हुए एक बयान जारी किया है.
250 से अधिक हस्ताक्षरकर्ताओं ने इन मसौदा विधेयकों को लेकर सार्वजनिक परामर्श और पारदर्शिता की कमी पर सवाल उठाए हैं. उनका कहना है कि ये विधेयक ‘भारत की चुनावी लोकतांत्रिक व्यवस्था को पुनर्गठित कर सकते हैं और हर मतदाता को प्रभावित करेंगे.’
हस्ताक्षरकर्ताओं ने मांग की है कि किसी भी विधायी कार्रवाई से पहले इस प्रक्रिया को सार्वजनिक किया जाए. उन्होंने कहा कि ‘इतिहास के इस स्तर के महत्वपूर्ण सुधार के लिए पारदर्शी बहस, सार्वजनिक समीक्षा और विविध आवाज़ों की भागीदारी जरूरी है.’
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हम संसद के बजट सत्र के तीन दिवसीय विशेष विस्तार (16 से 18 अप्रैल 2026) के दौरान पेश किए जाने वाले प्रस्तावित विधेयकों के मसौदों को लेकर पूर्ण पारदर्शिता के अभाव पर अपनी गहरी चिंता व्यक्त करने के लिए यह पत्र लिख रहे हैं. मीडिया में आई ख़बरों के अनुसार, कैबिनेट ने तीन विधेयकों को मंजूरी दी है, जिनका उद्देश्य कथित तौर पर 2029 से लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण का मार्ग प्रशस्त करना है, जिसमें महिला आरक्षण अधिनियम (नारी शक्ति वंदन अधिनियम) में संशोधन, एक परिसीमन विधेयक और केंद्र शासित प्रदेशों तक आरक्षण का विस्तार करने के लिए एक अलग विधेयक शामिल है.
ख़बरों के मुताबिक, इन मसौदा विधेयकों में लोकसभा और राज्य विधानसभाओं की सीटों में समान रूप से 50% की वृद्धि का प्रस्ताव भी शामिल है, जिसके तहत लोकसभा की सीटें 543 से बढ़ाकर 816 और विधानसभाओं की कुल सीटें 4,123 से बढ़ाकर 6,186 की जा सकती हैं.
ये कानून भारत की चुनावी लोकतांत्रिक व्यवस्था को मूल रूप से पुनर्गठित करेंगे और देश के हर मतदाता को प्रभावित करेंगे. इन विधेयकों के दूरगामी प्रभावों को देखते हुए यह बेहद चिंताजनक है कि देश के नागरिकों को इनके मसौदे, प्रभाव और ऐसे संवैधानिक व विधायी संशोधन लाने के औचित्य के बारे में पूरी तरह अंधेरे में रखा गया है.
प्रस्तावित कानूनों से संबंधित जानकारी लोगों तक केवल ‘सूत्रों’ के हवाले से आई मीडिया रिपोर्ट्स के जरिए ही पहुंच रही है. यह नागरिकों के सूचना के मूल अधिकार और पूर्व-विधायी परामर्श नीति के सिद्धांतों का स्पष्ट उल्लंघन है.
केंद्र सरकार द्वारा 2014 में अपनाई गई पूर्व-विधायी परामर्श नीति के तहत यह अनिवार्य है कि मसौदा विधेयकों को कम से कम 30 दिनों के लिए सार्वजनिक पटल पर रखा जाए, जनता से टिप्पणियां आमंत्रित की जाएं और प्राप्त सुझावों/टिप्पणियों का सार संबंधित मंत्रालय की वेबसाइट पर कैबिनेट की मंजूरी से पहले उपलब्ध कराया जाए.
इसके साथ ही, परामर्श प्रक्रिया और मसौदा विधेयकों का व्यापक प्रचार-प्रसार प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया या अन्य उपयुक्त माध्यमों से किया जाना भी आवश्यक है, ताकि प्रभावित लोगों तक इसकी जानकारी पहुंच सके.
संसद के आगामी सत्र में प्रस्तावित इन तीन विधेयकों के लोकतंत्र पर पड़ने वाले व्यापक प्रभाव को देखते हुए हम सरकार से मांग करते हैं कि:
- मसौदा विधेयकों को तुरंत सार्वजनिक किया जाए और उन्हें विभिन्न माध्यमों व कई भाषाओं में व्यापक रूप से प्रसारित किया जाए;
- पूर्व-विधायी परामर्श नीति के अनुरूप इन मसौदा विधेयकों पर व्यापक सार्वजनिक परामर्श सुनिश्चित किया जाए.
हालांकि, हम महिलाओं के लिए आरक्षण का पूर्ण समर्थन करते हैं और हममें से कई लोग इसके लिए लंबे समय से चल रहे अभियान का हिस्सा रहे हैं, लेकिन इन प्रस्तावित विधेयकों को जिस गोपनीय और गैर-लोकतांत्रिक तरीके से लाया जा रहा है, हम उसका कड़ा विरोध करते हैं.
यह गहरी विडंबना और लोकतांत्रिक प्रक्रिया के साथ गंभीर अन्याय है कि महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए कानून लाया जा रहा है, जबकि स्वयं महिलाओं को ही इस प्रक्रिया से बाहर रखा जा रहा है. इतने बड़े ऐतिहासिक महत्व के सुधार के लिए पारदर्शी बहस, सार्वजनिक समीक्षा और विविध आवाज़ों की भागीदारी आवश्यक है, ताकि यह वास्तव में लोगों को सशक्त करे, न कि इसे जारी राज्य चुनावों के बीच एक राजनीतिक औजार के रूप में जल्दबाजी में पारित किया जाए.
पूरा बयान और हस्ताक्षरकर्ताओं के नाम नीचे पढ़ सकते हैं.
