आज, अपनी राजनीतिक पारी के अंत में ‘अजातशत्रु’ और कांग्रेस के दिनों में ‘युवा तुर्क’ कहलाने वाले, बहुचर्चित ‘भारत यात्री’ और आउटस्टैंडिंग पार्लियामेंटेरियन अवॉर्ड से सम्मानित देश के नवें प्रधानमंत्री स्मृतिशेष चंद्रशेखर का जन्मशती वर्ष आरंभ हो रहा है.
इस अवसर पर उन्हें याद करते हुए हम पाते हैं कि आज न उनके द्वारा गठित समाजवादी जनता पार्टी का हाल अच्छा रह गया है, न ही सामाजिक कार्य और चिंतन के लिए बनाए गए भारत यात्रा केंद्रों का. वे अपनी पार्टी के अंतिम संसद सदस्य थे और 08 जुलाई , 2007 को उनके इस दुनिया से जाने के बाद वह संसद कौन कहे, किसी प्रदेश की विधानसभा तक में प्रतिनिधित्व के लिए तरस रही है.
6 जनवरी, 1983 को कन्याकुमारी स्थित विवेकानंद स्मारक से शुरू और 25 जून, 1983 को राजधानी दिल्ली स्थित राजघाट पर समाप्त अपनी भारत यात्रा में करीब 4200 किलोमीटर की पदयात्रा के बाद उन्होंने हरियाणा में गुड़गांव जिले के भोंडसी और महाराष्ट्र में पुणे जिले के परंदवाड़ी गांव में जो भारत यात्रा केंद्र स्थापित किए थे (और जो समय के साथ उनके साथी पदयात्रियों की पहलों से देश भर में 14 स्थानों पर स्थापित हो गए थे) विभिन्न कारणों से वे भी बहुत पीछे छूट गए हैं और उन्हें लेकर देखे गए सपनों को साकार करने को कौन कहे, उनकी बात को आगे बढ़ाने की हालत में भी नहीं हैं.
फिर भी वे (चंद्रशेखर) विस्मृति के गर्त में नहीं जा डूबे हैं और गाहे बगाहे याद व उद्धृत किए जाते रहते हैं तो इसका सबसे बड़ा कारण चार महीने की अल्पावधि के अपने प्रधानमंत्री काल में उनके द्वारा देशवासियों पर छोड़ी गई वह छाप है, जो वक्त के साथ मिट जाने को तैयार नहीं है. इसके बावजूद कि उन्होंने अलोकप्रिय होने के खतरे भी कुछ कम नहीं उठाए.
यों, उन पर यह तोहमत भी चस्पां है कि प्रधानमंत्री पद हासिल करने के लिए उन्होंने उस कांग्रेस का समर्थन लेने से भी परहेज़ नहीं किया था, साल भर पहले जिसके खिलाफ चुनाव लड़े और जीते थे. वह भी तब, जब अयोध्या मामले को लेकर सोमनाथ से अयोध्या तक रथयात्रा कर रहे भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी को बिहार में गिरफ्तार कर लिया गया था और भाजपा ने खफा होकर विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार से समर्थन वापस लेकर उसे गिरा दिया था.
तदुपरांत सत्तारूढ़ जनता दल में फूट पड़ गई थी और उसके सांसदों के एक गुट ने चंद्रशेखर को अपना नेता चुनकर कांग्रेस के ‘बाहरी समर्थन’ से सरकार बना ली थी.
चंद्रशेखर का आधी शताब्दी लंबा राजनीतिक जीवन
इस सिलसिले में कुछ लोग यह भी कहते हैं कि उनके प्रधानमंत्री बनने से कहीं ज्यादा महत्व उनके आधी शताब्दी लंबे राजनीतिक जीवन का है, जिसमें आए अनेक आरोह-अवरोह समय-समय पर अनेक चर्चित वाकयों को जन्म देते रहे हैं. इन लोगों की निगाह में इस यात्रा के आगे उनका वह प्रधानमंत्रीकाल नगण्य है, जो आधे साल का भी नहीं था और सिर्फ चार महीनों में खत्म हो गया था. भले ही, उसके बाद कुछ समय तक वे कार्यवाहक प्रधानमंत्री बने रहे थे.
लेकिन उनकी पार्टी की उत्तर प्रदेश इकाई के अध्यक्ष अशोक श्रीवास्तव यह कहकर इन महानुभावों से असहमति जताते हैं कि एवरेस्ट विजय करने वाले किसी पर्वतारोही की उपलब्धि को इस आधार पर नहीं आंका जाता कि वह विजय के बाद कितनी देर उस चोटी पर रहा या टिका.
वे कहते हैं कि इसी तरह चंद्रशेखर के प्रधानमंत्री काल का मूल्यांकन उसकी अवधि के आधार पर नहीं बल्कि इस आधार पर किया जाना चाहिए कि वे जितने भी दिन प्रधानमंत्री रहे, उन्होंने देश के लिए क्या किया.
दरअसल, चंद्रशेखर को प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने के दिन (10 नवंबर, 1990) से ही अंदेशा था कि कांग्रेस किसी भी समय उनकी सौ से भी कम (महज चौंसठ) लोकसभा सदस्यों वाली पार्टी की सरकार से समर्थन वापस लेकर उनको ‘दूसरा चौधरी चरण सिंह’ बना सकती है. (अंततः कांग्रेस ने उनको सही भी सिद्ध किया और तत्कालीन राष्ट्रपति वेंकटरमण को दिया गया यह आश्वासन कि वह चंद्रशेखर सरकार को कम से कम एक साल नहीं गिराएगी, तोड़ दिया. )
इसलिए वे पद संभालते ही अपने प्रधानमंत्रीकाल के पल-पल का सदुपयोग कर उन दिनों की देश की जटिल से जटिल समस्याओं को फौरन से पेश्तर सुलझाने के प्रयत्नों में लग गए थे. ताकि उन्हें प्रधानमंत्री के रूप में जितना भी समय मिल जाए, उसी में अपनी छाप छोड़ सकें.
उन्होंने अयोध्या, पंजाब और कश्मीर से जुड़ी समस्याओं पर सबसे पहले ध्यान केंद्रित किया और उन्हें समाधान की दिशा में ले जाने में कुछ भी उठा नहीं रखा. इसीलिए आज की तारीख में उनके आलोचक भी कहते हैं कि उनकी सरकार को थोड़ा और समय मिलता तो उनके ये प्रयत्न अवश्य सार्थक सिद्ध होते.
नवाज़ शरीफ़ को ‘चुप’ कराया
जानकारों के अनुसार प्रधानमंत्री बनते ही वे कामनवेल्थ देशों के मालदीव में हो रहे शिखर सम्मेलन में भाग लेने गए तो वहां पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ से उनकी बेहद दिलचस्प अनौपचारिक बातचीत हुई.
वरिष्ठ पत्रकार व पूर्व सांसद संतोष भारतीय ने अपनी ‘वीपी सिंह, चंद्रशेखर, सोनिया गांधी और मैं’ नामक पुस्तक में इस बाबत विस्तार से लिखा है. उनके अनुसार चंद्रशेखर ने सम्मेलन में अपने संबोधन के बाद देखा कि नवाज़ उनकी ही तरफ चले आ रहे हैं तो आमना-सामना होते ही उन्होंने उनसे पूछ लिया, ‘यह आप कश्मीर में इतनी बदमाशियां क्यों करते रहते हैं?’ इस पर नवाज़ ने भी तुर्की-ब-तुर्की उनसे पूछा, ‘आप कश्मीर हमें देकर बदमाशियों की जड़ ही क्यों खत्म नहीं कर देते?’ उन्होंने सोचा होगा कि उनके इस सवाल से चंद्रशेखर असहज हो जाएंगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ.
चंद्रशेखर बोले, ‘चलिए, आपकी बात मान ली, कश्मीर आपको दिया. इसके लिए आप बस, एक छोटी-सी घोषणा कर दीजिए कि आप कश्मीर के साथ भारत के पंद्रह करोड़ मुसलमानों को भी ले लेंगे.’
बेचारे नवाज़ फंसकर रह गए! तब चंद्रशेखर ने उनसे पूछा, ‘धर्म और संख्या के जिस तर्क पर आप हमसे कश्मीर ले लेना चाहते हैं, कभी सोचा है आपने कि उसको स्वीकृति मिल गई तो उसका नतीजा क्या होगा? ये पंद्रह करोड़ भारत में कैसे रहेंगे?’ फिर तो नवाज़ बस, ‘भाई साहब-भाई साहब’ ही कहते रहे.
‘बार-बार फैसले नहीं बदलता’
वे प्रधानमंत्री बने तो देश की अर्थव्यवस्था की हालत बेहद खस्ता थी. एक समय विदेशी मुद्रा भंडार इतना खाली हो गया था कि उसे पूरी तरह खाली करके भी सिर्फ 20 दिनों के आयात बिल भरे जा सकते थे. दूसरे शब्दों में कहें, तो देश दिवालिया होने के कगार पर जा पहुंचा था और उसकी साख बचाने के लिए 21 से 31 मई के बीच देश का बीस हजार टन सोना स्विट्जरलैंड के यूबीएस बैंक में गिरवी रखना पड़ा था.
चंद्रशेखर ने इस विकट स्थिति का बहुत दृढ़ होकर सामना किया. एक दिन वे उससे निपटने के उपायों पर वित्त विभाग के अधिकारियों से विचारविमर्श कर रहे थे, तो वित्त सचिव बिमल जालान ने उन्हें बताया कि अब विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष की शर्तें मानने और उन पर निर्भर रहने के अलावा कोई रास्ता नहीं है.
इस पर चंद्रशेखर ने उनसे पूछा कि क्या यह स्थिति एक दिन में पैदा हो गई है? अगर नहीं तो पिछले दिनों इसे बदलने के लिए आपने कौन-कौन से कदम उठाए? अगर कोई कदम नहीं उठाया तो अब आपको अपनी कुर्सी पर क्यों रहना चाहिए? जालान समुचित जवाब नहीं दे पाए तो उन्होंने अगले दिन उन्हें पद से बर्खास्त कर दिया.
लेकिन बाद में यह पता चलने पर कि उन्होंने इस बाबत पुराने प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री को भी आगाह किया और उनसे उपयुक्त कदम उठाने का अनुरोध किया था तो उन्हें यह हिदायत देकर बख्श दिया कि उनका जो भी फर्ज है, उसे ईमानदारी से निभाएं. बाद में उन्होंने उनको राज्यमंत्री का दर्जा भी दिया.
और अब एक वाकया प्रधानमंत्री पद से उनके इस्तीफ़े के बाद का, जिसे राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के नेता शरद पवार ने ‘अपनी शर्तों पर’ शीर्षक अपनी आत्मकथा में लिखा है.
दरअसल, जैसे ही कांग्रेस ने अपने नेता राजीव गांधी की कथित जासूसी की आड़ में चंद्रशेखर को नीचा दिखाने की कोशिशें शुरू कीं, चंद्रशेखर ने प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया. दांव उल्टा पड़ता दिखा तो राजीव ने उन्हें इस्तीफा वापस ले लेने के लिए मनाने हेतु पवार को उनके पास भेजा.
तब पवार ने चंद्रशेखर से कहा, ‘कुछ गलतफहमी हो गई है, लेकिन कांग्रेस आपकी सरकार गिराना नहीं चाहती. कृपया आप अपना इस्तीफा वापस ले लें.’
इस पर चंद्रशेखर का दो टूक जवाब था: वापस जाओ और राजीव गांधी से कह दो कि चंद्रशेखर बार-बार अपना निर्णय नहीं बदलता. … मैंने एक बार निर्णय कर लिया तो उसे लागू करता हूं… मैं अपने इस्तीफे पर पुनर्विचार नहीं करूंगा. क्योंकि यह मेरी व्यक्तिगत प्रतिष्ठा से ही नहीं, प्रधानमंत्री पद के सम्मान और गरिमा से जुड़ा प्रश्न भी है.
सांसदी का सपना भी नहीं देखा था!
अपनी आत्मकथा ‘जीवन जैसा जिया’ में प्रधानमंत्री बनने से पहले के अपने जीवन का जिक्र करते हुए चंद्रशेखर ने लिखा है कि प्रधानमंत्री तो क्या, संसद सदस्य बनना भी उनके सपने में नहीं था. उन्हें लगता था कि सांसद जब भी आपस में मिलते होंगे, देश और समाज की गंभीर समस्याओं को हल करने पर ही विचार-विमर्श करते होंगे. लेकिन बाद में यह पता चलने पर उन्हें बहुत निराशा हुई कि ऐसा नहीं था और सांसदों को आमतौर पर अपने घरों की चमक-दमक की ही ज्यादा फिक्र रहती थी.
08 जुलाई, 2007 को अपने निधन से कुछ महीने पहले 10 अक्टूबर, 2006 को अस्वस्थ होने के बावजूद वे आखिरी बार ट्रेन से अपनी जन्मभूमि बलिया पहुंचे तो सहानुभूति जताने आए लोगों का अपने प्रति स्नेह देखकर भावुक हो उठे और ट्रेन के गेट पर ही सुबकने व फफकने लगे थे. इसके बाद तो वहां शायद ही कोई रहा हो, जिसकी आंखें द्रवित न हो गई हों.
गौरतलब है कि बलिया ने 1984 को छोड़कर (जब इंदिरा गांधी की हत्या से उपजी सहानुभति की लहर में कांग्रेस के प्रत्याशी ने उन्हें शिकस्त दे दी थी) उन्हें 1977 से आठ बार अपना सांसद चुना था. 1989 में वे बिहार की महाराजगंज सीट से भी लोकसभा का चुनाव लड़े और जीते थे.
जानकारों के अनुसार, वे जीवनभर पूरी तरह निर्भय रहे और अपनी बात को लेकर सत्ता के शिखर पर बैठे लोगों से टकराने में अपनी दोस्ती तक को दांव पर लगा देते थे. अटल बिहारी वाजपेयी को वे सार्वजनिक तौर पर गुरु कहते थे, लेकिन उनके जिन कदमों को गलत समझते थे, उनकी निर्मम आलोचना किया करते थे.
इससे भी बड़ी बात यह कि इस आलोचना में वे अपने प्रति भी उतने ही निर्मम थे.
वरिष्ठ पत्रकार रामबहादुर राय ने उन पर लिखी अपनी ‘रहबरी के सवाल’ नामक पुस्तक में उन्हें यह कहते हुए उद्धृत किया है कि ‘झूठ बोलने की मेरी आदत नहीं है’. यह स्वीकार करते हुए भी कि वे {प्रधानमंत्री रहते} कमीशनखोरी पर रोक लगाने का कोई प्रयास नहीं कर पाए. अलबत्ता ‘एक बार उन्होंने कमीशन में मिलने वाले पैसे के जरिए एक नेशनल रिकंस्ट्रक्शन फंड बनाने का प्रस्ताव रखा था, ताकि कमीशन के पैसों को कानूनी रूप दिया जा सके.
हां, बहुचर्चित बोफोर्स मामले में जब उन्होंने यह कह दिया था कि ‘दिस इज़ ए पुलिस सब-इंस्पेक्टर्स जॉब, प्राइम मिनिस्टर हैज़ नथिंग टू डू विद इट’ तो उस पर व्यापक प्रतिक्रिया हुई थी.
उत्तर प्रदेश के ऐतिहासिक जिले बलिया के इब्राहिमपट्टी गांव में एक किसान परिवार में जन्मी और ‘क्रांतिकारी जोश’ व ‘गर्म स्वभाव की’ बताई जाने वाली इस ‘आदर्शवादी’ शख्सियत से जुड़ा एक रोचक तथ्य यह भी है कि प्रधानमंत्री बनने से पहले उन्होंने मुख्यमंत्री कौन कहे, किसी राज्य या केंद्र में मंत्री पद तक नहीं संभाला था. अलबत्ता, 1977 से 1988 तक वे जनता पार्टी के अध्यक्ष पद पर आसीन रहे थे.
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)
