नीतीश कुमार के पद छोड़ने के साथ ही बिहार की राजनीति एक नए दौर में प्रवेश कर गई है. हालांकि, इस अंत की पटकथा बहुत पहले लिखी जा चुकी थी. अब पहली बार बिहार की कमान पूरी तरह भाजपा के हाथ में आई है.
तीन दशक पहले राष्ट्रीय जनता दल (राजद) से राजनीतिक सफर की शुरुआत कर जदयू के रास्ते मात्र नौ साल पहले भाजपा में शामिल होने वाले सम्राट चौधरी ने 15 अप्रैल, 2026 को राज्य के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली. और इस तरह पार्टी की स्थापना के बाद पहली बार कोई ‘कमल छाप’ नेता बिहार में सत्ता के शीर्ष पर पहुंच गया है.
ध्यान रहे, बिहार विधानसभा चुनाव-2025 एनडीए ने नीतीश के नाम पर लड़ा था. नारा था- पच्चीस से तीस, फिर से नीतीश. लेकिन नतीजों के महज़ पांच महीने बाद ही जनादेश को पुनर्परिभाषित कर दिया गया. यह कहना अतिशयोक्ति न होगी कि कभी भाजपा और उसके इस सपने के बीच डटकर खड़े ‘सुशासन बाबू’ ने ही भाजपा को उस स्वप्न तक पहुंचने की सीढ़ी प्रदान की.
क्या भाजपा ने सम्राट को जातीय समीकरण साधने के लिए चुना?
सम्राट बिहार में राजनीतिक रूप से प्रभावशाली कोइरी/कुशवाहा समुदाय से आते हैं, जो 2023 में नीतीश कुमार सरकार द्वारा कराए गए जाति सर्वेक्षण के अनुसार राज्य की आबादी का लगभग 4.3 प्रतिशत हिस्सा है.
परंपरागत रूप से कृषि से जुड़ा यह समुदाय, बिहार में यादवों के बाद सबसे बड़ा अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) समूह माना जाता है.
नीतीश कुमार एक अन्य प्रभावशाली ओबीसी समूह- कुर्मी समुदाय से आते हैं. कुर्मी समाज को कोइरी समाज से मिलती जुलती जाति बताई जाती है. ऐसे में क्या नीतीश के बाद भाजपा किसी ऐसे समुदाय के नेता को सरकार का मुखिया बनाना चाहती थी, जो कुर्मी-कोइरी समेत ओबीसी की अन्य जातियों को अपनी ओर खींच सके. और सम्राट इस कसौटी पर खरे उतरते हैं?
सम्राट चौधरी का कोइरी समाज का नेता बनने के सवाल पर वरिष्ठ पत्रकार नलिन वर्मा कहते हैं, ‘सम्राट को उनके क्षेत्र शेखपुरा के कोइरी समाज के अलावा कहीं का भी कोइरी समाज अपना नेता नहीं मानता. यह धारणा की उनके मुख्यमंत्री बनने से कोइरी वोटर भाजपा के पाले में आ जाएंगे, गलत है. बिहार में इस समाज के सबसे बड़े नेता आज भी उपेंद्र कुशवाहा हैं.’
वह जोड़ते हैं, ‘यह नैरेटिव मीडिया द्वारा गढ़ा जा रहा है.’
सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री बनने की योग्यता पर सवाल उठाते हुए नलिन वर्मा ने कहा, ‘बिहार में जितने भी मुख्यमंत्री अब तक बने हैं वो सारे जनता के नेता रहे हैं, सम्राट ऐसे मुख्यमंत्री हैं जिनकी जनता के बीच कोई पकड़ नहीं है.’ उन्होंने यह भी जोड़ा की भाजपा के अंदर कई ऐसे काबिल नेता मौजूद हैं जो सम्राट के ऊपर मुख्यमंत्री बन सकते थे.
‘कम उम्र’ से राजनीति सफर की शुरुआत
राजनीतिक परिवार से ताल्लुक़ रखने वाले सम्राट चौधरी ने बहुत कम उम्र में राजनीतिक जीवन में कदम रख दिया था. वर्ष 1999 में राबड़ी देवी के नेतृत्व वाली सरकार में उन्हें पहली बार मंत्रिमंडल में शामिल किया गया और उन्होंने बागवानी, वजन और माप मंत्री के रूप में काम किया. इसके बाद उन्होंने 2000 और 2010 के विधानसभा चुनावों में परबत्ता सीट से उन्होंने जीत हासिल की. हालांकि, दो बार उन्हें हार का भी सामना करना पड़ा.
जदयू में शामिल होने के बाद वे जीतन राम मांझी की सरकार में कैबिनेट मंत्री रहे. जून 2014 में उन्होंने मंत्री पद की शपथ ली और शहरी विकास एवं आवास विभाग का कार्यभार संभाला. 2014 से 2016 तक और फिर 2020 से 2025 के बीच वे बिहार विधान परिषद के सदस्य (एमएलसी) रहे.)
2017 में भाजपा में शामिल होने से पहले सम्राट समता पार्टी, राजद, जदयू, और हम पार्टी में भी रह चुके हैं. उनका सबसे लंबे ताल्लुक़ात राजद के साथ रहा, जहां उन्होंने करीब 15 साल गुज़ारे.
2025 के चुनाव में सम्राट चौधरी ने अपने पारिवारिक गढ़ तरापुर विधानसभा क्षेत्र में जीत दर्ज की.
उनके पिता शकुनी चौधरी तरापुर से छह बार विधायक रहे, जिन्होंने अपने राजनीतिक जीवन में कांग्रेस, जनता दल और बाद में राजद जैसे दलों से जुड़कर राजनीति की. जबकि उनकी मां पार्वती देवी ने 1998 में इसी सीट से तत्कालीन समता पार्टी के टिकट पर जीत दर्ज की थी.
बाद के वर्षों में सम्राट चौधरी मार्च 2023 से जुलाई 2024 तक भारतीय जनता पार्टी के बिहार प्रदेश अध्यक्ष रहे. इसके अलावा, वे राज्य सरकार में महत्वपूर्ण विभागों की जिम्मेदारी भी संभाल चुके हैं. जनवरी 2024 में नीतीश कुमार के दोबारा एनडीए में शामिल होने के बाद से मुख्यमंत्री बनने तक सम्राट चौधरी बिहार के उपमुख्यमंत्री रहे.
नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री के पद से हटाने की ली थी शपथ
नीतीश कुमार के साथ सम्राट चौधरी का रिश्ता खट्टा-मीठा ही रहा है. अपने राजनीतिक करिअर की शुरुआत में सम्राट नीतीश की समता पार्टी के साथ जुड़े थे. इसके बाद 2017 में भाजपा में शामिल होने से पहले साल 2014 में राजद को छोड़ कर वह फिर से नीतीश कुमार की पार्टी में शामिल हो गए थे.
जब नीतीश वर्ष 2022 में एनडीए को छोड़कर महागठबंधन में शामिल हुए थे, तब कई बार सार्वजनिक मंच या फिर किसी साक्षात्कार में सम्राट खुले तौर पर कह चुके हैं कि उनका ‘सिर्फ़ एक ही मकसद है, और वो है नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री की कुर्सी से हटाना.’
उन्होंने अपने सिर पर एक पगड़ी बांधी थी, और वे कहते थे कि इस ‘मुरेठा’ को वह तभी खोलेंगे जब मुख्यमंत्री पद से नीतीश कुमार को उतार देंगे. हालांकि आज की परिस्थितियां अलग हैं, लेकिन उन्होंने अपना वादा पूरा किया है. भले ही अपना मुरेठा वे तभी खोल चुके थे, जब नीतीश दोबारा वर्ष 2024 एनडीए के साथ आ गए थे.
तब से अब तक सम्राट नीतीश के साये की तरह उनके साथ रहते हैं. किसी सार्वजनिक मंच या कार्यक्रम में अधिकांश समय वह नीतीश के साथ होते हैं. एक वर्ग का मानना है कि अपने बाद भाजपा की ओर से मुख्यमंत्री के उम्मीदवार के रूप में नीतीश की पसंद सम्राट ही थे.
इस पर नलिन वर्मा का कहना है कि ‘पिछले दो साल से नीतीश कुमार क्या चाहते हैं यह किसी को नहीं पता है. उनके स्वास्थ्य को लेकर भी कोई स्पष्टता नहीं है. ऐसे में यह नहीं माना जा सकता है कि सम्राट नीतीश की पसंद थे.’
वह कहते हैं, ‘जिस तरह के नेता नीतीश कुमार रहे हैं और जैसा उनका व्यक्तित्व है, उसमे वो सम्राट जैसे नेता उनकी मुख्यमंत्री के लिए पसंद कभी नहीं हो सकते.’

गृह मंत्री के रूप में काम, ‘योगी मॉडल के समर्थक’
2024 में एनडीए की सरकार बनने के बाद सम्राट चौधरी को गृह मंत्रालय सौंपा गया था. नीतीश कुमार ने करीब 20 साल बाद यह मंत्रालय छोड़ा था. गृह मंत्री बनने के बाद उनके भाषणों और उनके द्वारा उठाए गए कदमों में यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ की झलक मिल रही थी. जैसे स्कूलों कॉलेजों के बाहर एंटी रोमियो स्क्वाड द्वारा पेट्रोलिंग करवाना, अपराधियों को राज्य छोड़ने की धमकी देना भी आदित्यनाथ की शैली से मिलती जुलती है.
विधानसभा चुनाव के प्रचार के दौरान भी सम्राट लव जिहाद, घुसपैठियों, बांग्लादेशियों जैसे तमाम मुद्दों का ज़िक्र करते थे. इसके बाद से अटकलें लगाईं जाने लगी की सम्राट योगी मॉडल के तहत काम करेंगे. उनके मुख्यमंत्री बनने के बाद ये बातें फिर से शुरू हो गई हैं.
इस पर नलिन वर्मा कहते हैं, ‘भले ही सम्राट योगी मॉडल के कितने भी बड़े समर्थक क्यों ना हो, लेकिन बिहार में जिस तरह का राजनीतिक परिवेश है, उसमे वह मॉडल वहां नहीं चलेगा.’
वह आगे जोड़ते हैं, ‘उत्तर प्रदेश और गुजरात में जिस तरह की मुसलमान विरोधी राजनीति भाजपा करती है वो बिहार में संभव नहीं हो पाएगी, क्यूंकि भाजपा के साथ सरकार में जदयू भी है, और जदयू की विचारधारा भाजपा से अलग है. इसके अलावे उनकी अपनी पार्टी के अंदर भी उनके कई चिर प्रतिद्वंद्वी हैं.’
डिग्री पर सवाल
सम्राट चौधरी की शैक्षणिक योग्यता को लेकर सवाल उठते रहे हैं, और उन सवालों के जवाब देने में वे असहज नज़र आते हैं. ऐसी बातें उठती हैं कि उन्होंने दसवीं तक की पढ़ाई नहीं की है.
वहीं, उनके चुनावी हलफनामों के अनुसार, उन्होंने तमिलनाडु की कामराज यूनिवर्सिटी से प्री-फाउंडेशन कोर्स (पीएफसी) किया है. इसके अलावा, वे इसी विश्वविद्यालय से डॉक्टर ऑफ लेटर्स (डीलिट) मानद उपाधि होने का दावा भी करते हैं.
बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान प्रशांत किशोर ने कई मौकों पर उनकी डिग्री को लेकर सवाल उठाए थे. एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में किशोर ने कहा था, ‘अपने चुनावी हलफनामे में सम्राट चौधरी ने डीलिट डिग्री होने का दावा किया है, लेकिन बिहार बोर्ड ने अदालत को बताया कि उन्होंने कक्षा 10वीं पास नहीं की है,’
प्रश्न किशोर ने चुनाव आयोग से सम्राट के 10वीं के प्रमाणपत्र का सबूत मांगने की मांग की थी.
उम्र पर सवाल
बिहार विधानसभा चुनाव से पहले जन सुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर ने राज्य सरकार से मांग की थी कि उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को तुरंत पद से हटाया जाए और हत्या के आरोपों में उनकी गिरफ्तारी की जाए. किशोर ने सम्राट की उम्र पर भी सवाल उठाया था.
एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में किशोर ने कहा, ‘1995 में मुंगेर के तारापुर में छह लोगों की हत्या हुई थी, जो सभी कुशवाहा समुदाय से थे. केस संख्या 44/1995 में मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी (सीजेएम) की अदालत में जो दस्तावेज़ पेश किए गए, उनमें राकेश कुमार उर्फ सम्राट चंद्र मौर्य उर्फ सम्राट चौधरी – शकुनी चौधरी के पुत्र – की जन्मतिथि 1 मई 1981 बताई गई थी. इसी आधार पर सम्राट ने खुद को नाबालिग बताते हुए जमानत हासिल की.’
किशोर ने आगे आरोप लगाया कि ‘लेकिन 2020 में चुनाव आयोग को दिए गए हलफनामे में सम्राट ने अपनी उम्र 51 वर्ष बताई. इस हिसाब से 1995 में उनकी उम्र 26 वर्ष होती है, यानी तब वे नाबालिग नहीं थे. इसके बावजूद अदालत ने उन्हें आरोपी होने के बावजूद रिहा कर दिया. जब तक अदालत उन्हें इस मामले में क्लीन चिट नहीं देती, तब तक उन्हें जेल में होना चाहिए.’
हालांकि, सम्राट ने इन सभी आरोपों से इंकार करते हुए कहा था कि ‘प्रशांत किशोर के पास अब कुछ भी नहीं बचा है तो ऐसा प्रतीत हो रहा है कि वह एक खोजी पत्रकार बन गए हैं.’
आपराधिक मामले
चुनावी हलफनामे के अनुसार, सम्राट चौधरी पर दो आपराधिक मामले दर्ज हैं, जिनमें अभी तक किसी में भी सजा नहीं हुई है. पहले मामले में उनके खिलाफ आईपीसी की धाराएं 341, 323, 324, 504 और 34 के तहत आरोप दर्ज हैं, जबकि दूसरे मामले में 341, 323, 504 और 34 की धाराएं लगी हैं. दोनों ही मामले फिलहाल विचाराधीन हैं.

भाजपा की बिहार में आगे की राह
बिहार में भाजपा के सामने महिलाओं का विश्वास जीतने की चुनौती रहेगी. महिलाएं नीतीश कुमार की ‘कोर और साइलेंट’ वोटर मानी जाती हैं. नीतीश कुमार ने अपनी नीतियों में महिलाओं को प्राथमिकता दी है, सरकारी स्कूलों में साइकिल वितरण योजना के बाद लड़कियां अपने गांव कस्बों से दूर स्थित स्कूलों में जाने लगीं थीं. सरकारी नौकरियों में महिलाओं के लिए आरक्षण का भी प्रावधान नीतीश सरकार ने लाया था.
इसके अलावा, बिहार की महिलाओं का यह मानना है कि नीतीश कुमार के आने के बाद से बिहार में उनकी सुरक्षा सुनिश्चित हो पाई है. अब नीतीश के जाने के बाद महिलाओं के भीतर यह आशंका पैदा होने लगी है कि क्या नए मुख्यमंत्री उनकी सुरक्षा के लिए वो काम करेंगे जो उनके मुताबिक नीतीश कुमार ने उनके लिए किया था.
बिहार के पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय में एमए की छात्रा अनीता कुमारी (बदला हुआ नाम) आशंकित हैं कि क्या वे अब भी लोकल ट्रेन में सफ़र कर के सुरक्षित महसूस करते हुए अपनी पढ़ाई जारी कर पाएंगी. साथ ही उन्हें यह भी आशंका है कि नीतीश कुमार जिस तरह की योजनाएं महिलाओं के लिए लाते थे, क्या नई सरकार उन्हें जारी रखेंगी?
नई सरकार के लिए इस साइलेंट वोटर को अपने पाले में लाना एक गंभीर चुनौती होगी.
सम्राट के मुख्यमंत्री बनने के बाद से यह सवाल भी खूब सुर्खियों में है कि क्या वह भाजपा को बिहार में वैसे ही स्थापित कर पाएंगे जैसे अन्य भाजपा शासित प्रदेशों में है.
इस पर द वायर में प्रकाशित एक लेख में नलिन वर्मा लिखते हैं, ‘यह कहना अभी जल्दबाज़ी होगी कि सम्राट चौधरी के रूप में मुख्यमंत्री का चेहरा मिलने के बाद भाजपा बिहार में उसी तरह सत्ता स्थापित कर पाएगी, जैसा उसने पड़ोसी उत्तर प्रदेश में किया है.’
वह लिखते हैं, ‘चाहे वंचित वर्गों के बीच नीतीश कुमार की पकड़ हो या खुद भाजपा की संरचनात्मक कमजोरियां, हिंदुत्व की राजनीति करने वाली यह पार्टी अब तक बिहार में उस तरह प्रमुख राजनीतिक ताकत बनती नहीं दिखी है, जैसी वह उत्तर प्रदेश में बन चुकी है.’
द वायर हिंदी से उन्होंने कहा, ‘पार्टी ने 2010 में 91 और 2025 में 89 सीटें जीतीं, लेकिन दोनों ही मौकों पर उसने नीतीश कुमार की जदयू के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ा था. 2015 में जब उसने राजद-जदयू-कांग्रेस के महागठबंधन के खिलाफ अकेले चुनाव लड़ा, तब उसकी सीटें घटकर 53 रह गई थीं. ऐसे में आज भी यह मानने का कोई ठोस आधार नहीं दिखता कि भाजपा अपने दम पर इस आंकड़े से बहुत आगे निकल पाएगी.’
