शिक्षा विधेयक में प्रस्तावित केंद्रीकरण के विरोध में आए एनडीए शासित राज्य और शीर्ष विश्वविद्यालय

प्रस्तावित विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान (वीबीएसए) विधेयक, 2025 पर भाजपा शासित राज्यों, प्रमुख विश्वविद्यालयों और विपक्ष के नेताओं ने अत्यधिक केंद्रीकरण का हवाला देते हुए कड़ी आपत्ति जताई है. वहीं, शिक्षा मंत्रालय ने विवादित प्रावधानों का बचाव करते हुए कहा है कि ये 'आधुनिक नियामक ढांचों' के अनुरूप हैं.

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय. (फोटो साभार: Wikimedia Commons/GS Meena/CC BY-SA 3.0)

नई दिल्ली: देश के कई राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) शासित राज्यों और प्रमुख विश्वविद्यालयों ने विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान (वीबीएसए) विधेयक, 2025 पर कड़ी आपत्ति जताई है.

उन्होंने संसदीय समिति को चेतावनी दी है कि इस प्रस्तावित कानून से उच्च शिक्षा के नियमन संबंधी अत्यधिक शक्तियां केंद्र सरकार के हाथों में केंद्रित हो सकती हैं.

द हिंदू की रिपोर्ट के अनुसार, यह विधेयक भारत की उच्च शिक्षा व्यवस्था में व्यापक बदलाव का प्रस्ताव करता है. इसके तहत विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी), अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (एआईसीटीई) और राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद (एनसीटीई) को समाप्त कर उनकी जगह वीबीएसए नामक एक एकल सर्वोच्च नियामक संस्था स्थापित करने का प्रस्ताव है.

इस विधेयक की फिलहाल भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की सांसद डी. पुरंदेश्वरी की अध्यक्षता वाली संयुक्त संसदीय समिति द्वारा समीक्षा की जा रही है.

भाजपा सहयोगी राज्यों ने भी जताई आपत्तियां

द हिंदू के अनुसार, सबसे तीखी आपत्तियों में से एक आंध्र प्रदेश सरकार की ओर से आई, जहां भाजपा की सहयोगी तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी) की सरकार है. राज्य सरकार ने समिति से कहा कि विधेयक के कई प्रावधान उच्च शिक्षा पर राज्य की विधायी शक्तियों को व्यावहारिक रूप से निष्प्रभावी बना सकते हैं.

राज्य ने विशेष रूप से धारा 11 पर आपत्ति जताते हुए कहा कि इससे नियामक परिषद राज्य विश्वविद्यालयों को दरकिनार कर सीधे डिग्री प्रदान करने में सक्षम हो सकती है, जिससे ‘संवैधानिक टकराव’ की स्थिति पैदा होगी. आंध्र प्रदेश ने यह भी मांग की कि राज्य के विश्वविद्यालयों को प्रभावित करने वाली किसी भी केंद्रीय कार्रवाई से पहले राज्यों से अनिवार्य रूप से परामर्श किया जाए.

भाजपा शासित मध्य प्रदेश ने प्रस्तावित नियामक परिषद में राज्यों के अपर्याप्त प्रतिनिधित्व पर चिंता व्यक्त की.

वहीं, मेघालय में नेशनल पीपुल्स पार्टी (एनपीपी) के नेतृत्व वाली सरकार ने केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों का स्पष्ट बंटवारा करने का सुझाव दिया.

द हिंदू के अनुसार, उसने मानकों और मान्यता (एक्रेडिटेशन) का अधिकार केंद्र के पास रखने, जबकि विश्वविद्यालयों के प्रशासन, कर्मचारियों की नियुक्ति और वित्तीय प्रबंधन को राज्यों के अधिकार क्षेत्र में बनाए रखने का प्रस्ताव दिया.

कांग्रेस शासित तेलंगाना ने इससे भी आगे बढ़ते हुए धारा 11 को पूरी तरह हटाने की मांग की. राज्य सरकार ने तर्क दिया कि यह विधेयक शिक्षा शुल्क में वृद्धि को बढ़ावा दे सकता है.

द हिंदू के अनुसार, सरकार ने धारा 45 को विधेयक का ‘सबसे अधिक केंद्रीकरण करने वाला’ प्रावधान बताया और कहा कि यह राज्यों के अपने विश्वविद्यालयों से जुड़े विवादों में भी अंतिम निर्णय का अधिकार केंद्र को दे देता है, जबकि राज्यों की संबंधित संस्थाओं को समान अधिकार नहीं दिए गए हैं.

विश्वविद्यालयों ने कहा- अत्यधिक केंद्रीकरण

बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू), राजस्थान केंद्रीय विश्वविद्यालय, भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईआईटी), चित्तूर, असम, महाराष्ट्र और जम्मू-कश्मीर के कई राज्य विश्वविद्यालयों ने भी विधेयक के केंद्रीकरण संबंधी प्रावधानों का विरोध किया.

द हिंदू के अनुसार, बीएचयू ने समिति से कहा कि धारा 45, जो नीतिगत निर्णयों पर केंद्र को बाध्यकारी अधिकार देती है, नियामक संस्था को कार्यपालिका के अधीन कर देती है. विश्वविद्यालय ने यह भी कहा कि धारा 47, जो केंद्र को वीबीएसए को भंग करने या उसके अधिकारों को अपने हाथ में लेने की अनुमति देती है, इस संस्था को ‘उस समय की सरकार का एक अंग’ बना देने का जोखिम पैदा करती है.

धारा 47 के तहत केंद्र सरकार आयोग को अधिकतम छह महीने तक निलंबित कर सकती है और जरूरत पड़ने पर इस अवधि को छह महीने और बढ़ाया जा सकता है.

आईआईआईटी, चित्तूर ने कहा कि धारा 45 लागू होने की स्थिति में केंद्र सरकार का प्रभाव विधेयक के तहत प्रस्तावित तीनों परिषदों तक फैल सकता है, जिससे वह संभावित रूप से ‘शैक्षणिक संस्थानों के अकादमिक संचालन को प्रभावित’ कर सकेगी.

पुणे स्थित श्रीमती नाथीबाई दामोदर ठाकरसी महिला यूनिवर्सिटी ने कहा कि अगर पर्याप्त नियंत्रण एवं संतुलन (चेक्स एंड बैलेंस) और संसदीय निगरानी नहीं होगी, तो विधेयक के प्रावधान ‘अत्यधिक केंद्रीकरण’ का कारण बन सकते हैं.

राजनीतिक नेताओं की आलोचना

द हिंदू के अनुसार, संयुक्त संसदीय समिति की सदस्य तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की सांसद सागरिका घोष और राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के सांसद संजय कुमार झा ने भी इस विधेयक के जरिए केंद्र को दिए जा रहे व्यापक अधिकारों की आलोचना की.

सागरिका घोष ने कहा कि वीबीएसए के अध्यक्ष की नियुक्ति की प्रक्रिया में न तो पर्याप्त पारदर्शिता है और न ही स्वतंत्रता. वहीं, संजय कुमार झा ने कहा कि धारा 18, 20, 21, 45 और 47 मिलकर केंद्र सरकार को सभी परिषदों पर ‘पूर्ण अधिकार’ प्रदान करती हैं.

घोष ने यह भी कहा कि अध्यक्ष के चयन के लिए बनाई जाने वाली सर्च कमेटी में केंद्र सरकार द्वारा नामित सदस्यों का वर्चस्व है और उसमें शिक्षकों के समुदाय, राज्य सरकारों, संसद और न्यायपालिका का पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है.

समिति के अन्य सदस्य, जैसे कांग्रेस के दिग्विजय सिंह, ने इससे भी आगे बढ़ते हुए आरोप लगाया कि धारा 4, जिसमें वीबीएसए के उद्देश्य और कार्य निर्धारित किए गए हैं, राज्य सूची के विषयों में ‘असंवैधानिक अतिक्रमण’ करती है. सिंह ने कहा कि संस्थानों के गठन, विनियमन और समाप्ति (वाइंडिंग अप) संबंधी शक्तियां केंद्र को देना संघ सूची के दायरे से भी आगे जाता है.

सरकार ने विधेयक का बचाव किया

‘द हिंदू’ की रिपोर्ट के अनुसार, व्यापक आलोचना पर प्रतिक्रिया देते हुए शिक्षा मंत्रालय ने विवादित प्रावधानों का बचाव किया और कहा कि ये ‘आधुनिक नियामक ढांचों’ के अनुरूप हैं.

मंत्रालय ने कहा कि किसी नियामक संस्था को अपने नियंत्रण में लेने (सुपरसेशन) की शक्ति एक मानक आपातकालीन सुरक्षा व्यवस्था है और इसका इस्तेमाल मनमाने ढंग से नहीं किया जाएगा.

मंत्रालय ने आगे दावा किया कि यह व्यवस्था ‘जवाबदेही की संतुलित प्रणाली’ को बनाए रखेगी, जो नियामक संस्था की स्वतंत्रता को बरकरार रखते हुए ‘असाधारण परिस्थितियों में सीमित हस्तक्षेप’ की अनुमति देगी.

राज्य सरकारों और विश्वविद्यालयों द्वारा उठाई गई चिंताओं के जवाब में मंत्रालय ने कहा कि यूजीसी (विश्वविद्यालय अनुदान आयोग), एआईसीटीई (अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद) और एनसीटीई (राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद) से संबंधित वर्तमान कानूनों में भी ऐसे ही प्रावधान मौजूद हैं.

मंत्रालय ने इन्हीं पूर्व उदाहरणों का हवाला देते हुए नए वीबीएसए विधेयक में समान प्रावधानों को उचित ठहराया.