पश्चिम बंगाल में नई विधानसभा के लिए चुनाव संपन्न हो गए हैं. इस समय ऐसा अंदाज़ा लगाया जा रहा है कि ममता बनर्जी यह चुनाव हार चुकी हैं. जिस तरह चुनाव संपन्न करवाया गया, उसे देखते हुए यही स्वाभाविक है. नतीजा तो 4 मई को आएगा. अभी तो हम यही देख सकते हैं कि यह चुनाव किस तरह लड़ा गया और उसके मायने बंगाल और भारत के लिए क्या हो सकते है.
चुनाव में दो मुख्य प्रतिद्वंद्वी थे: भारतीय जनता पार्टी और तृणमूल कांग्रेस. भाजपा के सहयोगी के तौर पर चुनाव आयोग ने अपने सारे संसाधन भाजपा के लिए इस्तेमाल किए. सर्वोच्च न्यायालय ने भी चुनाव आयोग को पूरी छूट देकर परोक्ष रूप से भाजपा का साथ दिया. यह मॉडल अगर जनता ने स्वीकार कर लिया तो भारत में चुनाव स्टालिन के रूस में होने वाले चुनावों की तरह हो जाएंगे जिनका नतीजा सबको वोट देने के पहले ही पता है.
कुछ अख़बार इस चुनाव ममता बनर्जी के जीवन का सबसे बड़ा युद्ध बतला रहे हैं. युद्ध यह निश्चय ही था अगर हम चुनाव के पहले से राज्य में केंद्रीय सशस्त्र बलों की तैनाती पर नज़र डालें. लोगों ने आश्चर्य व्यक्त किया कि पश्चिम बंगाल में वायु सेना और जल सेना को तैनात नहीं किया गया था. यह तैनाती निष्पक्ष और शांतिपूर्ण चुनाव आयोजित करने के लिए जितना नहीं उतना ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस के सदस्यों को आतंकित करने और मतदाताओं पर मनोवैज्ञानिक दबाव डालने के लिए की गई थी.

चुनाव प्रचार और मतदान के दिन इन सुरक्षा बलों के व्यवहार से भी स्पष्ट था कि वे एक पार्टी के ख़िलाफ़ और एक पार्टी की मदद करने के लिए वहां भेजे गए हैं. लुंगी पहनकर मतदान केंद्र आए मतदाताओं को लौटा देना उसी मानसिकता का परिचायक था जो कपड़े देखकर आदमी पहचानती है.
चुनाव आयोग ने तो पहले ही अपने धमकी भरे बयानों से साफ़ कर दिया था कि वह इस चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के रास्ते की सारी बाधाओं को दूर करके उसकी जीत के लिए राह हमवार कर रहा है. मतदाता सूची के शुद्धिकरण के नाम पर कोई 27 लाख से अधिक जीवित मतदाताओं का मताधिकार छीनकर चुनाव आयोग ने बतला दिया था कि उसकी रुचि मात्र चुनाव आयोजित करने में नहीं बल्कि ऐसे मतदाताओं की छंटनी करने में है जो भारतीय जनता पार्टी के लिए असुविधाजनक हो सकते हैं.
मतदाताओं का नाम मतदाता सूची से जिन तर्कों के सहारे हटाया गया, उन्हें समझने में सर्वोच्च न्यायालय भी असमर्थ था. जिस ‘तार्किक विसंगति’ का सहारा लेकर लाखों मतदाताओं का नाम काट दिया गया, उसे सर्वोच्च न्यायालय तक ने अभूतपूर्व और अतार्किक बतलाया. लेकिन सर्वोच्च न्यायालय को भी इन मतदाताओं के मताधिकार को बहाल करने में कोई हड़बड़ी न थी.
‘इस चुनाव में अगर वोट नहीं ही दिया तो कौन सी आफ़त टूट पड़ेगी’, यह थी सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणी. जैसे चुनाव आयोग नहीं चाहता था कि वे इस चुनाव में वोट डालें, वैसे ही ‘इस चुनाव’ में उनके वोट न डालने से सर्वोच न्यायालय को कोई ऐतराज़ न था.
मतदान पदाधिकारियों तक के नाम मतदाता सूची से काट डाले गए थे. लेकिन सबसे बड़ी अदालत के लिए यह भी कोई ख़ास बात न थी. उसने कहा कि वे पहले वोट डलवा लें, अगले चुनाव में अपने वोट डाल लें! सबने ध्यान दिया कि जो नाम काटे गए थे, उनमें मुसलमानों के नाम आबादी के लिहाज़ से ग़ैर आनुपातिक थे. वैसी सीटों पर, जहां वे निर्णायक हो सकते हैं, भारी संख्या में उनके नाम हटा दिए गए थे.
इसके साथ ही तृणमूल कांग्रेस के लिए चुनाव प्रचार अभियान का काम देख रही संस्था पर केंद्रीय जांच संस्थाओं ने छापा मारा और उनके अधिकारियों को गिरफ़्तार कर लिया. यह कार्रवाई सिर्फ़ और सिर्फ़ तृणमूल पार्टी के चुनाव प्रचार को पंगु कर देने के लिए थी. यह बात इससे प्रमाणित होती है कि चुनाव ख़त्म होते ही इस गिरफ़्तार अधिकारी को जमानत मिल गई और प्रवर्तन निदेशालय ने जमानत को विरोध भी नहीं किया.
चुनाव प्रचार के दौरान लगातार तृणमूल कांग्रेस के नेताओं और कार्यकर्ताओं के ख़िलाफ़ दंडात्मक कार्रवाई की जाती रही. यह इतना निर्लज्ज था कि दो बार कलकत्ता उच्च न्यायालय को चुनाव आयोग को शास्ति देनी पड़ी. उच्च न्यायालय के आदेश के बावजूद चुनाव आयोग तृणमूल कांग्रेस के लोगों को गिरफ़्तार करता रहा. इन बातों को अगर ध्यान में रखें तो कहा जा सकता है कि निष्पक्ष चुनाव कराने की ज़िम्मेदारी जिन संस्थाओं की है, उन्होंने इस चुनाव को भारतीय जनता पार्टी के लिए आसान बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी.
तृणमूल कांग्रेस के हाथ पीठ के पीछे बांध दिए गए. किसी के लिए यह देखना मुश्किल न था कि यह ऐसी प्रतियोगिता है जिसमें दोनों दल समान धरातल पर नहीं खड़े हुईं. यह बात अलग है कि कुछ लोगों के लिए यह चिंता का विषय है लेकिन बहुत सारे लोगों को इसमें बहुत मज़ा आ रहा है.
चुनाव अभियान में भाजपा ने परिवर्तन का नारा दिया. यह उसी तरह का पर्दा था जैसा ‘सबका साथ सबका विकास’ का नारा भाजपा के सांप्रदायिक प्रचार के लिए एक पर्दा था. परिवर्तन के नारे के पर्दे की आड़ में भाजपा ने जिस शब्द का सबसे ज़्यादा इस्तेमाल किया,वह था घुसपैठिया. ममता बनर्जी घुसपैठियों की नेता हैं और भाजपा हर घुसपैठिए को एक-एक कर खदेड़ देगी, यह बार-बार अमित शाह ने कहा. इसका मतलब हर किसी के लिए साफ़ था.
संदेशखाली में भूमि हड़प और हिंसा के आरोपी तृणमूल के नेता शाहजहां शेख़ को बार-बार घुसपैठिया कहा गया. उसे अपराधी कहा जा सकता था,लेकिन गृहमंत्री अमित शाह ने जान बूझकर उसे घुसपैठिया कहा. सारे मुसलमान घुसपैठिया हैं, यही भाजपा के नेता कह रहे हैं.
हुमायूं कबीर नामक नेता ने बाबरी मस्जिद बनाने का ऐलान चुनाव के ठीक पहले किया. अमित शाह ने इसे भी मुद्दा बनाया: ‘ममता बनर्जी अपने प्यादे हुमायूं कबीर के जरिए बाबरी मस्जिद बनाने की कोशिश कर रही हैं. लेकिन वह कान खोलकर सुन लें: बंगाल भारत का हिस्सा है, और जब तक भाजपा का एक भी कार्यकर्ता जीवित है, हम यहां किसी को बाबरी मस्जिद नहीं बनाने देंगे.’
बंगाल में हर कोई, ख़ासकर मुसलमान, कह रहा है कि हुमायूं कबीर भाजपा का आदमी है. वह बाबरी मस्जिद बनाने की बात करेगा और भाजपा उसके ख़िलाफ़ हिंदू भावनाओं को गोलबंद करेगी, भाजपा की रणनीति यही है. नरेंद्र मोदी ने अपने भाषणों में अपनी कूट भाषा में हिंदुओं को मुसलमानों के ख़िलाफ़ भड़काने का काम किया. ममता बनर्जी दुर्गा पूजा में बाधा डालती हैं और वोट बैंक की राजनीति करती हैं, मोदी ने अपने भाषणों में इसे बार बार दोहराया.
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने कहा कि बंगाल में उर्दू नहीं बोलने देंगे. उन्होंने तृणमूल पर आरोप लगाया कि वह बंगाल को हिंदू शून्य बना देना चाहती है. हिमंता बिस्वा शर्मा ने भी इस चुनाव को बाहरी के ख़िलाफ़ भीतरी लोगों का संघर्ष बतलाया.
बंगाल भाजपा के सबसे बड़े नेता सुवेंदु अधिकारी का मुख्य नारा ही था ‘जय श्रीराम.’ ‘मैं पूजा कर रहा हूं, ममता नमाज़ पढ़ रही है’: क्या इसका मतलब समझाने की ज़रूरत है?
भाजपा ने यह चुनाव प्रचार पूरी तरह हिंदुत्व की भाषा में किया. वह बंगाल में हिंदुओं की बाहरी, घुसपैठिया मुसलमानों से रक्षा के लिए सरकार बनाना चाहती है. स्पष्ट है, वह मुसलमानों का वोट नहीं चाहती थी और हिंदुओं का वोट उनके ख़िलाफ़ चाहती थी.
चुनाव आयोग के सांप्रदायिक एसआईआर के बाद भाजपा के इस घोर सांप्रदायिक चुनाव प्रचार ने बंगाल के समझदार लोगों को चिंतित किया है. इस सांप्रदायिक प्रचार के आधार पर अगर भाजपा सरकार बनाती है, तो वह आगे क्या करेगी, क्या इसका अनुमान करना कठिन है?
(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाते हैं.)
