नई दिल्ली: अप्रैल के मध्य नोएडा के फैक्ट्री मज़दूरों ने वेतन वृद्धि, बेहतर कामकाजी परिस्थितियों और श्रम अधिकारों की मांग को लेकर जो आंदोलन शुरू किया था, उसे अब ‘साज़िश’, ‘हिंसा’ और ‘मास्टरमाइंड’ जैसे आरोपों में बदल दिया गया है.
उत्तर प्रदेश पुलिस ने जिन लोगों को इस आंदोलन से जोड़कर गिरफ्तार किया है, उनके परिवार, वकील और सहयोगी दावा कर रहे हैं कि यह केवल कानून-व्यवस्था का मामला नहीं है, बल्कि असहमति को अपराध घोषित करने की एक बड़ी कार्रवाई है.
मई दिवस के मौके पर यह सवाल और अहम हो जाता है कि जिन लोगों पर हिंसा भड़काने, षडयंत्र रचने और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के आरोप लगाए गए हैं, वे कौन हैं? क्या वे सचमुच हिंसा के सूत्रधार हैं या मज़दूरों के साथ खड़े होने की कीमत चुका रहे हैं?
आदित्य आनंद: इंजीनियर से ‘मास्टरमाइंड’ तक
पुलिस ने आदित्य आनंद को इस कथित साज़िश का मुख्य अभियुक्त बताया है. उन्हें 19 अप्रैल को तिरुचिरापल्ली रेलवे स्टेशन से गिरफ्तार किया गया. यूपी एसटीएफ ने प्रेस नोट जारी कर कहा कि श्रमिक आंदोलन की आड़ में हिंसा और आगजनी की साज़िश रचने वालों में से एक प्रमुख आरोपी को पकड़ा गया है.
लेकिन परिवार की कहानी बिल्कुल अलग है.
आदित्य के भाई केशव आनंद कहते हैं कि गिरफ्तारी के आधार तक परिवार को नहीं बताए गए. केवल एक फोन कॉल के जरिए सूचना दी गई. उनका आरोप है कि अदालत ने 28 अप्रैल को दो दिन की कस्टडी दी, लेकिन उसके बाद आदित्य को कहां रखा गया, इसकी जानकारी न परिवार को दी गई, न वकीलों को.
केशव का कहना है कि अदालत के आदेश में वकीलों को पूछताछ देखने की अनुमति थी, फिर भी उन्हें जानकारी नहीं दी गई. उनके शब्दों में, ‘उत्तर प्रदेश पुलिस कानून और न्यायिक प्रक्रिया की धज्जियां उड़ा रही है.’ केशव आनंद का दावा है कि पुलिस के पास मामले में कोई ठोस सबूत नहीं है और उन्हें केवल राजनीतिक दबाव में हिरासत में रखा गया है.
पुलिस का आरोप है कि आदित्य उस व्हाट्सऐप ग्रुप के एडमिन थे, जिसमें प्रदर्शन के दौरान हिंसा भड़काने की साज़िश रची जा रही थी. हालांकि, परिवार इस दावे को खारिज करता है. उनका कहना है कि जैसे ही ग्रुप में भड़काऊ संदेश आने लगे, अन्य सदस्यों ने उनका विरोध किया. परिवार के मुताबिक, उसी ग्रुप में आदित्य के ऐसे वीडियो भी साझा किए गए थे, जिनमें वे लोगों से पूरी तरह शांतिपूर्ण ढंग से आंदोलन जारी रखने की अपील करते दिखाई देते हैं.
परिवार के मुताबिक, आदित्य आनंद 10 और 11 अप्रैल को केवल एक जागरूक नागरिक के तौर पर मजदूरों के प्रदर्शन में एकजुटता जताने पहुंचे थे. यह आंदोलन 9 अप्रैल से चल रहा था. परिजनों का दावा है कि जब आदित्य को लगा कि पुलिस कार्रवाई से माहौल बिगड़ सकता है, तब उन्होंने लोगों से शांतिपूर्ण ढंग से धरना जारी रखने की अपील की और शपथ दिलवाई कि आंदोलन अहिंसक रहेगा.

परिवार का कहना है कि 10 और 11 अप्रैल तक, जब आदित्य और रूपेश रॉय प्रदर्शन स्थल पर मौजूद थे, तब तक कोई हिंसा नहीं हुई. उनके अनुसार, हालात उनकी गिरफ्तारी के बाद बिगड़े.
परिवार ने आरोप लगाया कि उत्तर प्रदेश लाए जाने के बाद आदित्य के साथ मारपीट की गई. उनके मुताबिक, वाहन में बैठाते ही पिटाई शुरू कर दी गई और बाद में एक अज्ञात स्थान पर ले जाकर कई लोगों ने घंटों तक उन्हें पीटा. इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है.
आदित्य आनंद ने 2016-19 बैच में एनआईटी जमशेदपुर से बीटेक किया था. वे एक बहुराष्ट्रीय कंपनी जेनपैक्ट में कार्यरत रहे और नोएडा में रहते थे. परिवार के मुताबिक, वे शुरू से पढ़ाई में मेधावी रहे और 12वीं में बिहार बोर्ड से अपने जिले के टॉपर रहे थे.
उनके भाई केशव आनंद का कहना है कि आदित्य के पास विदेशों से नौकरी के प्रस्ताव भी थे और वे ऊंचे वेतन वाली नौकरी चुन सकते थे, लेकिन उन्होंने वंचित तबकों के साथ काम करने का रास्ता चुना. नौकरी के साथ-साथ वे बच्चों को पढ़ाते थे और सामाजिक गतिविधियों में सक्रिय रहते थे.
आदित्य मूल रूप से बिहार के हाजीपुर के रहने वाले हैं. उनके पिता, जिनका 2024 में निधन हो गया, एक इंटर कॉलेज में शिक्षक थे, जबकि उनकी मां निजी शिक्षिका रही हैं.
परिवार के अनुसार, आदित्य नौजवान भारत सभा से जुड़े रहे हैं. वे भगत सिंह की जयंती पर बच्चों के लिए कार्यक्रम आयोजित करते थे और मेडिकल कैंप जैसे सामाजिक कार्यों में हिस्सा लेते थे. केशव आनंद कहते हैं, ‘जो व्यक्ति भगत सिंह की जयंती मनाता है और समाज के लिए काम करता है, उसे आज देशद्रोही बताया जा रहा है.’
हिमांशु ठाकुर: पीएचडी की तैयारी से जेल तक
24 वर्षीय हिमांशु ठाकुर को 18 अप्रैल को हिरासत में लिया गया. उनकी बहन नेहा के मुताबिक, परिवार को लगभग 24 घंटे बाद सूचना दी गई. उनका आरोप है कि गिरफ्तारी के दौरान न वारंट दिखाया गया, न गिरफ्तारी के आधार बताए गए.
परिवार का कहना है कि पुलिस ने फोन, डायरी और आईपैड जब्त किए, लेकिन कोई जब्ती सूची नहीं दी. 28 अप्रैल के कोर्ट आदेश के बाद उन्हें कहां ले जाया गया, यह भी नहीं बताया गया.
नेहा आरोप लगाती हैं कि पुलिस हिरासत में हिमांशु के साथ मारपीट हुई. उनका कहना है कि हिमांशु का प्रदर्शन से कोई लेना-देना नहीं था, उन्हें केवल आदित्य आनंद से संपर्क के आधार पर जोड़ा गया.
हिमांशु ठाकुर की गिरफ्तारी का असर उनके परिवार पर भी पड़ा है. उनकी बहन नेहा के अनुसार, गिरफ्तारी के बाद से उनके पिता की तबीयत बिगड़ गई और उन्हें अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा. नेहा का कहना है कि उनके पिता सुन नहीं पाते, जिससे उन्हें पूरी स्थिति समझाना मुश्किल है, और इस पूरे घटनाक्रम ने उन्हें मानसिक रूप से गहराई से प्रभावित किया है.
हिमांशु दिल्ली विश्वविद्यालय के हंसराज कॉलेज से इतिहास में स्नातक हैं, डीयू से ही स्नातकोत्तर कर चुके हैं, नेट क्वालिफाइड हैं और पीएचडी में दाखिले की तैयारी कर रहे थे.
आकृति: ‘विचारधारा’ ही आरोप?
आकृति की ओर से पेश वकील रजनीश चंद यादव कहते हैं कि पुलिस अब तक स्पष्ट नहीं कर सकी है कि उन्हें किन धाराओं में गिरफ्तार किया गया. उनका कहना है कि हर स्तर पर जिम्मेदारी एक-दूसरे पर डाली जा रही है.
वकील के अनुसार, पुलिस का मौखिक आरोप यह है कि आकृति वामपंथी विचारधारा से जुड़ी हैं और मजदूरों को भड़का रही थीं.
वे सवाल उठाते हैं कि यदि आकृति को 11 अप्रैल को हिरासत में ले लिया गया था, तो 13 अप्रैल की घटना में उनकी भूमिका कैसे संभव है?
वकील के अनुसार, आकृति 10 अप्रैल को हुए एक शांतिपूर्ण प्रदर्शन में शामिल थीं. रजनीश यादव ने कहा, ‘यह किस संविधान में लिखा है कि धरना-प्रदर्शन करना गैरकानूनी है? लोगों की अलग-अलग विचारधाराएं हो सकती हैं- किसी की कम्युनिस्ट, किसी की सोशलिस्ट, किसी की भाजपा से जुड़ी, लेकिन इससे किसी को अपराधी नहीं ठहराया जा सकता.’
आकृति दिल्ली विश्वविद्यालय से पढ़ी हैं और सोशल वर्क में पीएचडी की तैयारी कर रही हैं. वे पश्चिम बंगाल के दुर्गापुर की रहने वाली हैं. उनके पिता गणशक्ति नामक अख़बार में कार्यरत हैं.
रूपेश रॉय: हिरासत में यातना
रूपेश रॉय पेशे से ऑटोचालक हैं और मजदूर मुद्दों पर काम करने वाली पत्रिका मज़दूर बिगुल से जुड़े रहे हैं. संगठन ने दावा किया है कि रूपेश को 11 अप्रैल को ही हिरासत में ले लिया गया था, यानी 13 अप्रैल की हिंसा से पहले. रुपेश के एक साथी ने बताया कि जब उन्हें पुलिस में हिरासत में लिया, तब वह मज़दूर बिगुल के लिए रिपोर्टिंग कर रहे थे.
25 अप्रैल को परिवार और दोस्तों द्वारा जारी प्रेस नोट में कहा गया कि उनके वकीलों ने उत्तर प्रदेश पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों को शिकायत भेजकर हिरासत में यातना, फर्जी रिकवरी और सबूत गढ़ने के आरोप लगाए हैं.
प्रेस नोट में रूपेश के हवाले से कहा गया कि उन्हें शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना झेलनी पड़ी और मेडिकल जांच के दौरान चोटों का समुचित परीक्षण नहीं किया गया. उन्होंने आरोप लगाया कि पुलिस उन्हें नोएडा के एनएसईज़ेड क्षेत्र में एक जगह ले गई, जहां पहले से केरोसिन की बोतलें और मशालें रखी थीं, और उन्हें ये सामान उठाने के लिए मजबूर कर वीडियो बनाया गया.
वकीलों का कहना है कि मामले में दर्ज करीब 14 एफआईआर में से अब तक केवल एक की प्रति मिली है, जबकि गिरफ्तारी, तलाशी और जब्ती से जुड़े जरूरी दस्तावेज़ भी उपलब्ध नहीं कराए गए हैं. शिकायत में इन आरोपों की स्वतंत्र जांच की मांग की गई है.
सत्यम वर्मा: पत्रकार की गिरफ्तारी पर सवाल
28 अप्रैल को नई दिल्ली स्थित प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में ‘सत्यम वर्मा रिहाई मंच’ ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस कर वरिष्ठ पत्रकार और अनुवादक सत्यम वर्मा समेत कई गिरफ्तार लोगों की रिहाई की मांग की. मंच का कहना था कि सत्यम वर्मा को नोएडा मजदूर आंदोलन से जुड़े हिंसा मामले में ‘ग़ैरक़ानूनी तरीके से’ फंसाया गया है, जबकि उनका इस पूरे आंदोलन से कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं था.
मंच की संयोजक कविता कृष्णपल्लवी ने आरोप लगाया कि सत्यम वर्मा को उनकी ‘आलोचनात्मक आवाज़’ के चलते निशाना बनाया गया और मामले में आरोपी बनाकर दबाव बनाने की कोशिश की गई. उनके अनुसार, 11 अप्रैल से ही बिना वारंट पूछताछ और दबाव की प्रक्रिया शुरू हो गई थी, और बाद में बिना उचित कानूनी प्रक्रिया के तलाशी व जब्ती की कार्रवाई की गई, जिसमें इलेक्ट्रॉनिक उपकरण और दस्तावेज़ बिना सीज़र मेमो के ले लिए गए.
कृष्णपल्लवी ने यह भी कहा कि सत्यम वर्मा ने इस दौरान नोएडा में कदम भी नहीं रखा और न ही उनका मजदूरों या एक्टिविस्टों से कोई प्रत्यक्ष संपर्क था.
प्रेस कॉन्फ्रेंस में आगे आरोप लगाया गया कि गिरफ्तारी के बाद सत्यम वर्मा को दो दिनों तक अदालत में पेश नहीं किया गया, उन्हें वकीलों से संपर्क करने और आवश्यक दवाएं लेने तक की अनुमति नहीं दी गई.
वक्ताओं ने दावा किया कि इस पूरे मामले में पुलिस और प्रशासन मजदूर आंदोलन से जुड़ी असहमति की आवाज़ों को भी “षड्यंत्र” के फ्रेम में रखकर दमन की कोशिश कर रहे हैं. मंच ने सभी गिरफ्तार लोगों की निष्पक्ष जांच और तत्काल रिहाई की मांग की.
एफआईआर में भी गड़बड़ियां
द वायर हिंदी को इस मामले की तीन एफआईआर प्रतियां मिलीं. इनमें दर्ज जांच अधिकारियों के मोबाइल नंबर गलत पाए गए. नोएडा फेज-3 थाने में दर्ज इन तीनों एफआईआर में जहां अधिकारियों के मोबाइल नंबर होने चाहिए थे, वहां केवल 9 अंकों के नंबर दर्ज मिले, जबकि सामान्यतः मोबाइल नंबर 10 अंकों के होते हैं. इतना ही नहीं थाना प्रभारी अवधेश प्रताप का भी नंबर गलत दर्ज मिला.
प्रशासन से नहीं मिला जवाब
द वायर हिंदी ने इस मामले में दर्ज एफआईआर, गिरफ्तारियों और हिरासत में बंद लोगों के परिजनों द्वारा लगाए गए आरोपों पर उत्तर प्रदेश पुलिस का पक्ष जानने के लिए संबंधित अधिकारियों से संपर्क किया.
सबसे पहले नोएडा फेज-2 थाने के एसएचओ से बात की गई. उन्होंने कहा कि वे इस मामले पर टिप्पणी करने के लिए अधिकृत नहीं हैं और कमिश्नर कार्यालय के पेशकार से संपर्क करने को कहा.
इसके बाद कमिश्नर कार्यालय में पेशकार अभिनाश त्यागी से संपर्क किया गया, लेकिन उन्होंने भी इस मामले में टिप्पणी करने से इनकार करते हुए मीडिया सेल से बात करने की सलाह दी.
मीडिया सेल से संपर्क करने पर एक अधिकारी विजय ने भी किसी प्रकार की जानकारी देने से मना कर दिया और कहा कि इस मामले में आधिकारिक जानकारी केवल जॉइंट कमिश्नर ही दे सकते हैं.
इसके बाद जॉइंट कमिश्नर राजीव नारायण मिश्रा से संपर्क करने की कोशिश की गई, लेकिन उनसे बात नहीं हो सकी. उन्हें सवाल भेजे गए हैं और जवाब मिलने पर रिपोर्ट को अपडेट किया जाएगा.
जब फूटा मजदूरों का गुस्सा!
पिछले माह नोएडा के औद्योगिक क्लस्टरों में काम करने वाले हजारों मजदूर अप्रैल में सड़कों पर उतर आए थे. ये वे श्रमिक हैं जो ऑटो पार्ट्स, इलेक्ट्रॉनिक्स, कपड़ा और छोटे विनिर्माण उद्योगों में काम करते हैं. वर्षों से उन्हें लगभग 10,000 से 15,000 रुपये मासिक वेतन मिल रहा था. महंगाई बढ़ती गई, लेकिन उनकी आय लगभग स्थिर रही.
इनमें बड़ी संख्या प्रवासी मजदूरों की है, जो शहर के बाहरी इलाकों में तंग कमरों में रहते हैं, अपने परिवारों को पैसे भेजते हैं और सीमित आय में जीवन चलाते हैं. इसी दौरान घरेलू कामगार महिलाओं ने भी नोएडा की पॉश सोसाइटियों के बाहर वेतन बढ़ाने की मांग को लेकर प्रदर्शन किया.
13 अप्रैल को हुए टकराव से पहले मजदूरों ने दो दिन तक शांतिपूर्ण धरना दिया था. राज्य सरकार ने 11 अप्रैल को कुछ श्रमिक कल्याण उपायों की घोषणा की, जिनमें ओवरटाइम का दोगुना भुगतान और न्यूनतम मजदूरी में 21 प्रतिशत वृद्धि शामिल थी. लेकिन प्रदर्शनकारी इसे अपर्याप्त बता रहे थे.
हिंसा कैसे भड़की, इसे लेकर दो दावे हैं. प्रदर्शनकारियों का कहना है कि पुलिस ने बिना उकसावे बल प्रयोग किया. पुलिस का कहना है कि भीड़ हिंसक हो गई थी, इसलिए कार्रवाई जरूरी थी.

इसके बाद नोएडा पुलिस कमिश्नर लक्ष्मी सिंह ने सात एफआईआर और 300 से अधिक गिरफ्तारियों की जानकारी दी. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने घटना को राज्य के विकास को पटरी से उतारने की ‘साज़िश’ बताया.
मजदूर आंदोलन से ‘आंतरिक सुरक्षा’ तक
यह मामला केवल कुछ गिरफ्तारियों का नहीं है. यह उस व्यापक प्रवृत्ति का हिस्सा दिखता है जिसमें मजदूरों की मांगों, छात्र-कार्यकर्ताओं की एकजुटता, पत्रकारों की मौजूदगी और सामाजिक संगठनों की भागीदारी को एक ही फ्रेम में ‘साज़िश’ के रूप में पेश किया जाता है.
जो सवाल मजदूरी, श्रम अधिकार और असमानता से शुरू हुआ था, वह अब नागरिक स्वतंत्रताओं, पुलिस कार्रवाई और न्यायिक प्रक्रिया तक पहुंच चुका है.
