राम मंदिर चढ़ावा चोरी: आरएसएस-विहिप की खींचतान में बंटी अयोध्या

अयोध्या और दिल्ली में साधु-संतों व अन्य लोगों के साथ हुई विस्तृत बातचीत से पता चलता है कि चंपत राय को अपनी शक्ति और प्रभाव का आधार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ उनकी निकटता से मिलता था. यही वजह है कि अब शीर्ष स्तर पर जवाबदेही तय करने की मांग तेज़ होती जा रही है.

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उत्तर प्रदेश के अयोध्या में राम मंदिर परिसर के बाहर का दृश्य, जून 2026. (फोटो: आकांक्षा कुमार.)

अयोध्या से की गई रिपोर्टिंग के आधार पर लिखी गई दो भागों की श्रृंखला का यह पहला हिस्सा है, जिसमें स्थानीय निवासियों की नज़र से राम मंदिर ट्रस्ट के कामकाज की पड़ताल की गई है. ये वे लोग हैं, जिन्होंने ट्रस्टियों के साथ बातचीत की है, ट्रस्ट की कार्यप्रणाली से परिचित हैं और इसके पूर्व सचिव चंपत राय के कामकाज को क़रीब से जानते हैं.

अयोध्या (उत्तर प्रदेश): ‘गलती कर दिए, विश्वास कर लिए ज़्यादा..’ ये बात उत्तर प्रदेश में दो दशकों से भी अधिक समय से विहिप (विहिप) से जुड़े एक कार्यकर्ता ने अयोध्या में राम मंदिर की देखभाल करने वाले ट्रस्ट के द्वारा इसके महासचिव चंपत राय और ट्रस्टी अनिल मिश्रा का इस्तीफा स्वीकार करने के हफ़्तों पहले इस रिपोर्टर को कही थी. 

विहिप का यह कार्यकर्ता दरअसल 7 जून 2026 से विवादों के घेरे में आए राम मंदिर में चढ़ावे की चोरी में मुख्य रूप से आरोपित चंपत राय की बात कर रहा था. इस मामले में अभी तक ट्रस्ट के आठ कर्मचारियों कि गिरफ़्तारी हो चुकी है, लेकिन आरोपों की उंगली बड़ी तेज़ी से 2020 में स्थापित श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ ट्रस्ट पर ही उठ रही है. 

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के अंतरराष्ट्रीय संगठन विश्व हिंदू परिषद (विहिप) की स्थापना 1964 में आरएसएस और उसके राजनीतिक सहयोगी, सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) से जुड़े नेताओं द्वारा की गई थी. अतीत में विहिप की 2002 में हुए गुजरात दंगों में कथित तौर पर केंद्रीय भूमिका रही है, और ‘धर्म परिवर्तन के उद्देश्य से मुस्लिम युवक हिंदू लड़कियों को फांसते हैं’ जैसे दक्षिणपंथी दुष्प्रचार पर आधारित ‘घर वापसी’ जैसे सांप्रदायिक रूप से विघटनकारी अभियान का इसने नेतृत्व किया है. 

विहिप ने ही उन लाखों कारसेवकों को लामबंद किया था, जिन्होंने अयोध्या स्थित 16वीं सदी में निर्मित बाबरी मस्जिद को 06 दिसंबर 1992 को ढहाया था.  

विहिप के एक पदाधिकारी, जो चंपत राय के पक्ष में बोल रहे थे, कहते हैं, ‘वो (चंपत राय) तो ज़्यादातर फर्श पर ही सोते हैं और रात के भोजन में खिचड़ी खाना पसंद करते हैं. कभी-कभी जब वो भोजन नहीं कर पाते हैं, तब उनके लिए शाम 04 बजे के आसपास दलिया पकाया जाता है. जो भी घटना हुई उसमें कर्मचारियों (मंदिर के) का हाथ है. इससे उनका (चंपत राय) कोई लेना देना नहीं है.’

उल्लेखनीय है कि चंपत राय श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव होने के साथ-साथ विहिप के अंतरराष्ट्रीय उपाध्यक्ष भी हैं.

जब चंपत राय ने 6 जुलाई को एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर एक हस्तलिखित पत्र साझा कर ‘मौन’ धारण करने की घोषणा की, तो कुछ टीवी एंकर भी उसके प्रभाव में आ गए. उन्होंने यह तर्क देना शुरू कर दिया कि 1991 से विहिप के प्रचारक रहे 80 वर्षीय चंपत राय पर ‘संदेह नहीं किया जा सकता’. कुछ एंकरों ने तो यहां तक कह दिया कि उनकी स्थिति पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जैसी है, जिन्हें भी भ्रष्टाचार के आरोपों का सामना करना पड़ा था.

ऐसे सरलीकृत निष्कर्षों की सबसे बड़ी समस्या यह है कि वे असहमति की उन आवाज़ों को नज़रअंदाज़ कर देते हैं, जो अब अयोध्या के संत-समाज से उठ रही हैं और लगातार मुखर होती जा रही हैं. ये आवाज़ें उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार द्वारा 13 जून 2026 को गठित विशेष जांच दल (एसआईटी) की जांच के बाद और तेज़ हुई हैं. एसआईटी का गठन कथित धोखाधड़ी और चोरी के आरोपों की जांच के लिए किया गया था.

प्रधानमंत्री की लगातार उपस्थिति 

5 फरवरी 2020 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोकसभा में जानकारी दी कि केंद्रीय मंत्रिमंडल ने श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के गठन का फैसला किया है. उसी दिन केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने एक्स पर इस निर्णय का स्वागत करते हुए लिखा कि ट्रस्ट में 15 ट्रस्टी होंगे, जिनमें एक दलित सदस्य भी शामिल होगा. उन्होंने इसे सामाजिक समरसता को मज़बूत करने वाला अभूतपूर्व निर्णय बताते हुए इसके लिए प्रधानमंत्री को बधाई भी दी.

तीन साल बाद अक्टूबर 2023 में, मोदी एक आधिकारिक फोटो में ट्रस्ट के तब के महासचिव, चंपत राय और तीन अन्य ट्रस्टी के साथ 22 जनवरी 2024 को होने वाले प्राण प्रतिष्ठा के लिए आमंत्रण स्वीकार करते खड़े नज़र आते हैं. इस बहुचर्चित समारोह से कुछ समय पहले चंपत राय ने कहा था कि नरेंद्र मोदी ‘भगवान विष्णु के अवतार’ हैं, न कि ऐसे ‘यजमान’ जिन्हें आठ दिनों तक धार्मिक अनुष्ठान करने की आवश्यकता हो.

दो रामभक्तों के बीच इस निकटता से परे एक महत्वपूर्ण सवाल मौजूद है: चढ़ावा घोटाले में अंतिम जवाबदेही प्रधानमंत्री की ही क्यों बनती है? 

राम मंदिर ट्रस्ट के कामकाज से नाराज़ फ़ैज़ाबाद के पूर्व सांसद और बजरंग दल के संस्थापक विनय कटियार ने कथित चढ़ावा चोरी के मामले में ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय, ट्रस्टी अनिल मिश्रा और प्रशासनिक अधिकारी गोपाल राव का नाम लेते हुए कहा कि ‘इन लोगों को जेल जाना पड़ सकता है.’ उन्होंने यह भी दावा किया कि इस मुद्दे पर उनकी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से सीधे फोन पर बातचीत हुई थी.

इस बीच, कांग्रेस ने अपने ताज़ा हमले में प्रधानमंत्री से यह कहते हुए माफ़ी मांगने की मांग की है कि उन्होंने ‘ट्रस्ट के लिए गलत लोगों का चयन किया.’

चंपत राय को विहिप के पूर्व अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष अशोक सिंघल का भी करीबी माना जाता था. सिंघल हिंदुत्व की कट्टर विचारधारा के प्रमुख नेताओं में गिने जाते थे और राम जन्मभूमि भूमि विवाद को लेकर हिंदुओं को संगठित करने के लिए निकाली गई रथ यात्राओं, शिलान्यास और अन्य अभियानों की परिकल्पना में उनकी केंद्रीय भूमिका रही थी.

अयोध्या के पुराने लोग बताते हैं कि राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद मामले में कानूनी दस्तावेज़ों की तैयारी, फाइलों की भागदौड़ और वकीलों के साथ समन्वय का अधिकांश काम चंपत राय ही संभालते थे. 2015 में अशोक सिंघल के निधन के बाद विहिप और राम मंदिर आंदोलन में चंपत राय की भूमिका और अधिक प्रभावशाली हो गई.

रामजन्मभूमि आंदोलन के दौरान अशोक सिंघल (बाएं). (फोटो: आकांक्षा कुमार)

उत्तर प्रदेश में सक्रिय विहिप के एक पदाधिकारी ने याद करते हुए कहा, ‘जब प्रवीणभाई तोगड़िया संगठन से अलग हो गए, तभी चंपत जी को यह जिम्मेदारी मिली.’

उन्होंने दावा किया कि 2018 में विहिप के अहम संगठनात्मक चुनाव के दौरान चंपत राय ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के समर्थन वाले खेमे का साथ देकर ‘वफादारी की परीक्षा’ पास की थी. उसी चुनाव के बाद गुजरात के रहने वाले विहिप के तत्कालीन अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष और मोदी के आलोचक प्रवीण तोगड़िया संगठन से बाहर हो गए. इसके बाद चंपत राय ने यह पद संभाला, जिस पर वे 6 जुलाई 2026 तक रहे.

2014 में प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी ने तोगड़िया जैसे नेताओं को भड़काऊ भाषण देने को लेकर फटकार भी लगाई थी. वहीं, तोगड़िया ने सार्वजनिक रूप से आरोप लगाया था कि प्रधानमंत्री उनके ‘एनकाउंटर की साजिश’ रच रहे हैं.

अयोध्यावासियों के मन में गहरा आक्रोश

इस बीच, अयोध्या के स्थानीय लोगों के बीच भी असंतोष की चर्चा सुनाई देने लगी है. द वायर की रिपोर्ट के अनुसार, जून के अंतिम सप्ताह में राम मंदिर आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या में करीब 50 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई, जिसका असर स्थानीय लोगों की आजीविका पर पड़ा है.

फ़ैज़ाबाद से अयोध्या के बीच किराये का ऑटो चलाकर आजीविका कमाने वाले एक चालक ने कहा, ‘पहले रोज़ 400 रुपये तक की कमाई हो जाती थी, लेकिन अब घटकर सिर्फ़ 40 रुपये रह गई है.’

‘हनुमानगढ़ी मंदिर के पास मिठाई की दुकान लगाने वाले एक विक्रेता पूछते हैं, ‘क्या हम बस जूते चप्पलों की देखभाल और प्रसाद बेचने के लिए ही हैं?’, उनका गुस्सा उन बाहरी व्यक्तियों को लेकर है जो राम मंदिर ट्रस्ट के महत्वपूर्ण पदों पर आसीन हैं, जबकि स्थानीय लोगों को या तो नज़रअंदाज़ किया गया या श्रद्धालुओं के जूते-चप्पलों की देखभाल करने, मंदिर के बाहर प्रसाद और अन्य धार्मिक सामग्री बेचने तथा तीर्थयात्रियों की आवाजाही में सहयोग करने जैसे कामों तक सीमित कर दिया गया है.

फ़ैज़ाबाद बार एसोसिएशन के सदस्य और अधिवक्ता राज कपूर सिंह ने कहा, ‘अयोध्या में जो कुछ हो रहा है, उसके बाद लोग अब हमें तिरस्कार की नज़र से देखने लगे हैं. हमारी अयोध्या के साथ हमेशा छल हुआ है और आज भी हम खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं. इन गुजरातियों ने ऐसा क्या किया है कि अयोध्यावासियों को इतनी पीड़ा झेलनी पड़ रही है?’

यहां ‘गुजराती’ शब्द का इस्तेमाल उस राजनीतिक धारणा की ओर संकेत करने के लिए किया गया है, जिसका उल्लेख इस बहस में बार-बार होता रहा है. इससे आशय भाजपा के उस प्रभाव से है, जिसने अब नई दिल्ली की सत्ता के गलियारों में अपनी मजबूत पकड़ बना ली है, और जिसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गृह राज्य गुजरात से भी जोड़ा जाता है.

फ़ैज़ाबाद बार एसोसिएशन ने हाल ही में राम जन्मभूमि थाने में चौथी शिकायत देकर चंपत राय, अनिल मिश्रा और गोपाल राव के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की मांग की है.

इस पूरे विवाद में कई तरह की आवाज़ें उभरकर सामने आई हैं, एक ओर नाराज़ बार एसोसिएशन है, तो दूसरी ओर असंतुष्ट भगवाधारी संत हैं, जिन्हें लगता है कि सुप्रीम कोर्ट के राम मंदिर के पक्ष में फैसले के बाद से उनका उचित हिस्सा और प्रभाव उनसे छीन लिया गया है.

यहीं अयोध्या की असली कहानी छिपी है, एक ऐसा शहर, जो लगातार अवनति की ओर बढ़ रहा है और जिसे सत्तारूढ़ भाजपा तथा उससे जुड़े संगठन विहिप और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) मानो एक ख़ज़ाने की तरह देखते हैं. यही वजह है कि वे उस ‘सोने के अंडे देने वाली मुर्गी’, राम मंदिर ट्रस्ट, पर अपना नियंत्रण छोड़ने को तैयार नहीं हैं.

विवाद खड़ा होने और उसके बाद हुई गिरफ़्तारियों के दो हफ़्ते बाद, द वायर ने अयोध्या में एक दर्जन से भी अधिक लोगों से बात की, जिसमें वहां के महंत, फैज़ाबाद के सिविल सोसाइटी के सदस्य और आरोपियों के संबंधी भी शामिल थे, ताकि ये समझ आए कि आखिर चंपत राय और उनके सहयोगी उस ट्रस्ट को चलाते कैसे थे जिसे आलोचक 2024 के प्राणप्रतिष्ठा समारोह के बाद से राम मंदिर की जागीर कहते थे. 

1990 के राम जन्मभूमि आंदोलन की अवहेलना 

अयोध्या के नया घाट क्षेत्र के पास स्थित तुलसी उद्यान के पीछे एक संकरी कच्ची गली में 1970 के दशक में बने मकानों की कतार के बीच, सीता को समर्पित एक मंदिर का निर्माण हो रहा है.

एक शाम एक खाली प्लॉट के बीच में रेत और ईटों के ढेर को छोड़ जब मजदूर अपना दिनभर का काम समाप्त कर चले गए, हम करपात्री महाराज से मिले. 1990 के राम जन्मभूमि आंदोलन से जुड़ा ये पुजारी नए मंदिर परिसर के नज़दीक एक नई इमारत के छोटे से कमरे, ‘करपात्री कोठरी’ में रहता है, जिसके कुछ हिस्से अभी भी निर्माणाधीन हैं. 

करपात्री महाराज, जो मूलतः उत्तर प्रदेश के बस्ती जनपद के रहने वाले हैं, उन लाखों कारसेवकों में से एक हैं जो राम मंदिर निर्माण के आंदोलन में शामिल थे. उस दौर को याद करते हुए वे कहते हैं, ‘राम की सेवा में चोट खाई है.’ यह कहते हुए उन्होंने अपने दाहिने गाल पर मौजूद एक निशान की ओर इशारा किया और दावा किया कि दिसंबर 1992 में बाबरी मस्जिद ढहाए जाने के दौरान उन्हें यह चोट लगी थी.

राम मंदिर ट्रस्ट को जिस तरह से चलाया जा रहा है उसे लेकर वह बहुत गुस्से में हैं, लेकिन उनका गुस्सा इस बात को लेकर ज़्यादा है कि चंपत राय ने अयोध्या के साधुओं के बीच मतभेद का बीज बोया. 

द वायर से बातचीत में उन्होंने कहा, ‘विहिप और आरएसएस ने जो भी किया वो पुजारियों को आगे रखकर किया. और एक बार जब उनका मतलब निकल गया, उन्होंने हमें किनारे कर दिया.’

उन्होंने कहा, ‘सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद उन्हें लगा कि अब संतों की कोई ज़रूरत नहीं रह गई है. उन पर तानाशाही का भाव हावी हो गया. यहां तक कि राम विवाह के आयोजन के दौरान जब सुझाव दिया गया कि महाराजा दशरथ की भूमिका किसी संत को निभानी चाहिए, तब भी चंपत राय ने किसी साधु को नहीं बुलाया, बल्कि खुद ही महाराजा दशरथ बन गए.’

उन्होंने कहा, ‘यही उनकी औकात है कि वे खुद ही दशरथ बनकर जनकपुर चले गए. चंपत राय ने असल में अयोध्या के संतों के बीच फूट डालने का काम किया है. राम के सच्चे भक्त संत आज उनके खिलाफ़ आवाज़ उठा रहे हैं.’

अयोध्या स्थित अपनी कोठरी में करपात्री महाराज. (फोटो: आकांक्षा कुमार)

करपात्री महाराज जिस घटना का जिक्र कर रहे थे, वह 2024 की है, जब चंपत राय ने श्री राम बारात यात्रा में भाग लिया था. इस धार्मिक आयोजन के तहत वे अयोध्या से नेपाल के जनकपुर गए थे, जिसे सीता का जन्मस्थान माना जाता है. इस यात्रा में लगभग 300 संत-महात्मा, विहिप के पदाधिकारी, अयोध्या के महापौर और भाजपा नेता गिरीश पति त्रिपाठी भी शामिल हुए थे.

करपात्री महाराज का कहना है कि लगातार उपेक्षा और अपमान का सामना करने की भावना ने ही उन्हें मंदिर के चढ़ावे की कथित चोरी के मामले के सामने आने के बाद खुलकर बोलने के लिए प्रेरित किया.

इससे पहले भी करपात्री महाराज ने द वायर से कहा था कि राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की मौजूदगी वाले एक कार्यक्रम के लिए उन्हें प्रवेश-पास तक जारी नहीं किया गया. उन्होंने आरोप लगाया था कि पास जारी करने की व्यवस्था में ‘दलाल’ सक्रिय थे, जो इसी व्यवस्था के जरिए लाखपति बन गए हैं.

राम मंदिर ट्रस्ट के शीर्ष पदों पर बैठे लोगों के प्रति करपात्री महाराज का आक्रोश उनके अपने जीवन-आदर्शों से भी जुड़ा है. वे मिट्टी के पात्र में भोजन को 18 छोटे-छोटे हिस्सों में ग्रहण करते हैं, केवल एक भगवा लंगोट पहनते हैं और 15×10 फुट के एक छोटे से कमरे में रहते हैं. उनका आरोप है कि इसके विपरीत विहिप-आरएसएस से जुड़े प्रभावशाली लोगों का सफर कहीं अधिक सुविधाजनक रहा है और उन्होंने पर्याप्त संपत्ति अर्जित की है. यही कारण है कि वे उनसे जवाबदेही की मांग करते हैं.

करपात्री महाराज ने इस संवाददाता से कहा, ‘हमारी भगवान से बस यही प्रार्थना है कि अभी तो सिर्फ़ छोटी मछलियां फंसी हैं, बड़ी मछलियां कब पकड़ी जाएंगी? अगर कैंसर पूरे हाथ में फैल गया हो, तो सिर्फ़ उंगलियां काटने से काम नहीं चलेगा, पूरा हाथ काटना पड़ेगा.’

केवल संघ और विहिप के करीबियों की नियुक्ति संदेह पैदा करती है 

अयोध्या के निवासियों में आम चर्चा है कि मंदिर परिसर के दान पात्रों के पैसे गिनने वालों की नियुक्ति कैसे हुई और इसमें कोई सावधानी बरती भी गई या नहीं.

करपात्री महाराज ने आरोप लगाया, ‘भर्तियों के लिए कभी कोई विज्ञापन जारी नहीं किया गया. चंपत राय, गोपाल (राव) या किसी अन्य ट्रस्टी के करीबी लोगों को सीधे बुलाकर नौकरी दे दी गई. टिन्नू यादव पहले चंपत राय का ड्राइवर था. वह कभी साइकिल चलाता था, बाद में ऑटो चलाने लगा. आज उसके पास करोड़ों रुपये की संपत्ति है.’

लंबे समय से अयोध्या के घटनाक्रम पर नज़र रखने वाले पत्रकार इंदु भूषण पांडेय ने भी कुछ इसी तरह की बात कही.

राम मंदिर चढ़ावा चोरी और गबन मामले के आरोपी सुभाष श्रीवास्तव (बाएं). (फोटो: आकांक्षा कुमार)

पांडेय ने कहा, ‘मुख्य मंदिर परिसर के भीतर सात-आठ छोटे मंदिर हैं. उनके लिए 18-20 पुजारियों की नियुक्ति का फैसला किया गया था. इसके लिए अखबारों में विज्ञापन प्रकाशित किए गए, जिनमें आवेदन की प्रक्रिया और पद के लिए आवश्यक सनातनी योग्यताओं का स्पष्ट उल्लेख था. आवेदनों की जांच के लिए एक चयन समिति और प्रशिक्षण समिति भी बनाई गई थी. लेकिन जब उस जगह के लिए कर्मचारियों की भर्ती की बात आई, जहां करोड़ों रुपये का चढ़ावा आता है, तो नोटों की गिनती करने वाले कर्मचारियों की नियुक्ति के लिए कभी कोई विज्ञापन जारी नहीं किया गया.’

उन्होंने कहा, ‘इस तरह से यह मामला वित्तीय घोटाले के साथ-साथ भर्ती घोटाले में भी बदल गया.’

इस तरह की बातें द वायर की उन ज़मीनी रिपोर्ट्स से भी मेल खाती हैं, जो अयोध्या के मीनापुर फगौली गांव और मिल्कीपुर तहसील में की गई थीं. ये दोनों इलाके उस समय चर्चा में आए थे, जब मंदिर में चढ़ावे की गिनती करने वाली टीम में शामिल दो स्थानीय निवासियों की गिरफ्तारी हुई थी.

द वायर ने बसावन गांव में ग्राम प्रधान पति धर्मेंद्र कुमार यादव से भी मुलाकात की. इसी गांव में मामले के एक आरोपी अनुकल्प मिश्रा के दादा-दादी रहते हैं.

धर्मेंद्र यादव ने अनुकल्प का जिक्र करते हुए कहा कि वह ‘चंपत राय के करीबी थे, जो दो साल पहले राम कथा के एक कार्यक्रम में गांव आए थे.’ यादव के मुताबिक, उस कार्यक्रम से करीब दो-तीन महीने पहले से ही अनुकल्प का चंपत राय से संपर्क था.

अनुकल्प की सोशल मीडिया गतिविधियां भी चंपत राय के साथ उनकी नजदीकी की ओर इशारा करती हैं. उनके फेसबुक प्रोफाइल पर चंपत राय के साथ कई तस्वीरें और कार्यक्रमों की झलकियां मौजूद हैं. इनमें अप्रैल 2026 में बसावन में आयोजित भागवत कथा का कार्यक्रम और नवंबर 2025 का एक अन्य कार्यक्रम शामिल है, जिसमें वे भाजपा नेता और अयोध्या के महापौर गिरीश पति त्रिपाठी के साथ एक ही मंच पर दिखाई देते हैं.

30 अप्रैल 2026 को अनुकल्प मिश्रा द्वारा आयोजित भागवत कथा में चंपत राय (बाएं). (फोटो: अनुकल्प मिश्रा का फ़ेसबुक)

उसकी फेसबुक प्रोफाइल से पता चलता है कि वह बजरंग दल (विहिप की एक इकाई) का सक्रिय कार्यकर्ता, और आरएसएस की शाखा  का सक्रिय भागीदार भी है.

इस संवाददाता ने जब अयोध्या की अंजनीपुरम कॉलोनी में आरोपी सुभाष श्रीवास्तव के घर का दौरा किया, तब वहां भी संघ और स्थानीय भाजपा नेताओं से उनकी नजदीकी के संकेत मिले.

हालांकि, सुभाष का घर बंद मिला, लेकिन उनके पड़ोसियों ने बताया कि उनका आरएसएस से जुड़ाव था. सुभाष राम मंदिर में चढ़ावे की गिनती करने वाले कर्मचारियों के प्रभारी थे.

एसआईटी की प्रारंभिक रिपोर्ट के अनुसार, वह ‘दानपात्रों (हुंडियों) की चाबियां अनौपचारिक रूप से सौंपने और टिन्नू यादव जैसे अनधिकृत व्यक्तियों को हुंडियों तक पहुंच देने की व्यवस्था की अनुमति देने के लिए जिम्मेदार थे.’

श्रीवास्तव के पड़ोसी संजय पांडेय ने बताया कि ‘पहले वो नियमित रूप से पास के राम लीला मैदान में और बाद में अपने घर में शाखा का आयोजन किया करता था. प्रतिभागियों के रूप में हमें मंदिर में प्रधानमंत्री के आगमन से पहले घर-घर जाकर अक्षत बांटने का काम दिया गया था’

संजय पांडे के अनुसार, सुभाष सिंडिकेट बैंक में काम करते थे और उन्हें कुछ वर्षों के लिए निलंबित कर दिया गया था. इसके बाद 2010 से 2012 के बीच किसी समय उन्हें दोबारा बहाल कर दिया गया. वह 2017 में सेवानिवृत्त हुए और इसके बाद उन्होंने मंदिर में काम करना शुरू कर दिया.

मंदिर पर नियंत्रण के लिए संघ के भीतर ही घमासान? 

लेकिन फैज़ाबाद स्थित वरिष्ठ पत्रकार इंदु भूषण पांडेय के अनुसार, ये घटना केवल प्रकाश में आए कुछ चुनिंदा व्यक्तियों के बारे में नहीं है; यह ट्रस्ट पर नियंत्रण को लेकर आरएसएस और विहिप के उस आंतरिक कलह के बारे में है जो अब खुलकर बाहर आ रही है.  

वह इसकी तुलना विहिप के 2018 में हुए पहले आंतरिक चुनाव से करते हैं. 1964 में गठन के 52 साल बाद हुए इस चुनाव ने तोगड़िया और मोदी समर्थक खेमे के बीच टकराव को जन्म दिया था. पांडे के अनुसार, मौजूदा घटनाक्रम भी उसी तरह के आंतरिक संघर्ष की ओर इशारा करता है.

उन्होंने कहा, ‘जब उन चुनावों की घोषणा हुई थी, तो सबसे पहले तोगड़िया पर हमला हुआ. नरेंद्र मोदी खेमे का अपना उम्मीदवार था, जबकि तोगड़िया और विहिप का अपना उम्मीदवार था. प्रधानमंत्री विहिप पर नियंत्रण हासिल करना चाहते थे.’

उनके अनुसार, चंपत राय ने विहिप के उम्मीदवार का समर्थन करने के बजाय मोदी समर्थित खेमे के उम्मीदवार का समर्थन कर उसे ‘धोखा’ दिया.

तोगड़िया के उम्मीदवार की हार हुई, जबकि प्रतिद्वंद्वी खेमे के उम्मीदवार विष्णु सदाशिव कोकजे चुनाव जीत गए. 2019 में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद केंद्र सरकार को श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के गठन का अधिकार मिला. मंदिर के लिए 40 वर्षों तक संघर्ष करने वाली विहिप खुद को हाशिये पर खड़ा महसूस करने लगी.

इंदु भूषण पांडे ने कहते हैं, ‘इस बार भी लड़ाई विहिप और सरकार के बीच है, या विहिप और आरएसएस के बीच है, या फिर विहिप और ट्रस्ट के बीच है.’

6 जुलाई को चंपत राय द्वारा एसआईटी को लिखे गए पत्र में यह अंदरूनी कलह खुलकर सामने आई. इस पत्र में उन्होंने दावा किया कि फरवरी 2025 में मंदिर में नकदी गिनने की प्रक्रिया को मंजूरी दिए जाने से पहले उनकी सहमति के तौर पर उनके हस्ताक्षर नहीं लिए गए थे. इस पत्र पर ट्रस्टी अनिल मिश्रा और भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) के एक अधिकारी के हस्ताक्षर भी हैं.

(मूल अंग्रेजी से कुमार निशांत द्वारा अनूदित)