28 अप्रैल, 2026 को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने जामिया मिल्लिया इस्लामिया में अपनी 100वीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में ‘युवा कुंभ’ नाम से एक कार्यक्रम आयोजित किया. इस कार्यक्रम के दौरान कुलपति ने कथित तौर पर कहा, ‘हमारे डीएनए में महादेव का डीएनए है.’
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार के तहत उच्च शिक्षा संस्थानों के पुनर्गठन के संदर्भ में देखें तो कुलपति का यह बयान एक स्पष्ट पैटर्न उजागर करता है: विश्वविद्यालयों को दक्षिणपंथी शासन के संकुचित हिंदू-राष्ट्रवाद के आक्रामक एजेंडे में तेजी से समेटा जा रहा है.
बुनियादी मूल्यों का क्षरण
जामिया अपनी स्थापना के एक सदी से भी अधिक समय बाद, एकरूपता, संस्थागत कब्ज़े और बौद्धिकता-विरोधी सोच की चपेट में नज़र आता है. औपनिवेशिक शासन विरोधी संघर्ष के दौरान स्थापित जामिया में विविधता, समता, आज़ादी और देश-निर्माण की गहरी भावना समाई हुई थी. इसकी नींव उन लोगों ने रखी थी जिन्होंने जामिया को बौद्धिक आज़ादी और वर्चस्व के विरोध के केंद्र के तौर पर देखा था. आज यह विरासत दक्षिणपंथी ताक़तों की वजह से ख़तरे में है, जो इसे एक ऐसी जगह में बदलना चाहती हैं, जो विचारधारा के लिहाज़ से उनके अनुकूल हो.
सरोजिनी नायडू ने जामिया के संस्थापकों के बारे में कहा था कि उन्होंने जामिया को ‘एक-एक पत्थर और एक-एक कुर्बानी’ से बनाया था. यदि आज जामिया के संस्थापक जीवित होते तो निश्चित रूप से वहां चल रहे प्रशासनिक दमन से नाराज़ होते. कई अन्य विश्वविद्यालयों की तरह, इस संस्थान का स्वरूप भी बदल रहा है; अब यहां एक जैसी सोच रखने वालों को बढ़ावा दिया जाता है, असहमति जताने वालों को अलग-अलग तरीक़े से सज़ा दी जाती है और धीरे-धीरे संस्थान की आज़ादी को तथाकथित राष्ट्रवाद के अधीन किया जा रहा है.
असहमति से अनुशासन तक: संस्थागत पाबंदियों का एक तरीक़ा
28 अप्रैल को हुए इस वाकिये को अलग-थलग करके नहीं देखा जा सकता. इसमें आए नकारात्मक बदलाव को समझने के लिए पिछले दशक के राजनीतिक घटनाक्रमों पर व्यापक नज़र डालनी होगी.
2019 में सीएए-एनआरसी विरोधी प्रदर्शनों के दौरान जामिया प्रशासन ने जो रवैया अपनाया, उससे इस बदलते माहौल का साफ़ पता चलता है. अपने विद्यार्थियों के लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा करने के बजाय, प्रशासन प्रदर्शनकारियों को बेरहमी से दबाने में शामिल हो गया. समय के साथ, यह रवैया लगभग हर तरह की प्रगतिशील या आलोचनात्मक गतिविधि पर लागू होने लगा, चाहे वह रीडिंग सर्कल हों, विद्यार्थियों के नेतृत्व में होने वाले प्रदर्शन हों, या फिर विद्यार्थियों या अध्यापकों द्वारा उठाए गए सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर विरोध-प्रदर्शन.
जामिया टीचर्स एसोसिएशन (जेटीए) को भंग करना (जिसे बाद में दिल्ली हाईकोर्ट ने रद्द कर दिया था), विरोध कर रहे विद्यार्थियों को सस्पेंड करना, उन्हें हिरासत में लेना और उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज करना, सोशल वर्क के एक प्रोफेसर को सस्पेंड करना और कैंपस के अंदर शांतिपूर्ण तरीके से इकट्ठा होने और अपनी बात कहने की आज़ादी पर लगातार रोक लगाना, ये सभी बातें मिलकर दमन के एक बड़े माहौल को साबित करती हैं.
ये प्रशासनिक रवैया संविधान के अनुच्छेद 19(1)(अ) और 19(1)(ब) के तहत मिली आज़ादी के कमज़ोर होने को लेकर गंभीर संवैधानिक चिंताएं भी खड़ी करता है. शायद सबसे चिंताजनक बात यह है कि यूनिवर्सिटी में दक्षिणपंथी-चरमपंथी संगठनों को धीरे-धीरे मान्यता मिल रही है, जिससे वे असल में खुद संस्थान की ओर से बोलने की स्थिति में आ गए हैं.
हालांकि इन दबावों और तमाम असंवैधानिक नीतियों के बावजूद जामिया के विद्यार्थियों ने सत्ता को चुनौती देकर और दमन का विरोध करके विश्वविद्यालय की असहमति की ऐतिहासिक विरासत को बनाए रखा है. भारत भर के विश्वविद्यालयों में, विद्यार्थी बार-बार विभाजनकारी और जन-विरोधी नीतियों के खिलाफ खड़े हुए हैं और मुश्किल होते हालात में भी मज़बूत सत्ता-संरचनाओं का सामना किया है.
साथ ही, यह साफ़ होता जा रहा है कि भारत में विद्यार्थी आंदोलनों को एक गंभीर संस्थागत दमन झेलना पड़ रहा है. संस्थागत बाधाओं, राजनीतिक दबाव और प्रशासनिक कार्रवाई ने मिलकर ऐसे हालात पैदा कर दिए हैं जो असहमति को व्यवस्थित रूप से दबाते हैं.
बहुसंख्यकवादी राजनीति को संस्थागत मान्यता
कैंपस में ‘संघ’ की शताब्दी जैसे कार्यक्रमों का आयोजन अति-समस्यापूर्ण है, क्योंकि इससे यूनिवर्सिटी के माहौल और उसकी विचारधारा को लेकर गंभीर सवाल उठते हैं, खासकर जामिया के संदर्भ में. साथ ही, यह यूनिवर्सिटी के ऐसे संगठन से जुड़ाव पर भी सवाल खड़े करता है, जिसके सहयोगी संगठन पर महात्मा गांधी की हत्या का आरोप था; वही गांधी जिन्होंने कभी जामिया को आर्थिक संकट से निकालने के लिए समर्थन जुटाया था. रवींद्रनाथ टैगोर ने कभी जामिया को ‘भारत के सबसे प्रगतिशील शिक्षण संस्थानों में से एक’ बताया था.
कुलपति के सार्वजनिक बयानों ने संस्थान की वैचारिक दिशा को लेकर चिंताएं और बढ़ा दी हैं. यूनिवर्सिटी में हर व्यक्ति-चाहे वह विद्यार्थी हों, प्रोफेसर हों या स्टाफ़ के अन्य सदस्य, उन पर लगातार नज़र रखी जाती है. जिन छात्रों ने स्टडी सर्कल या प्रदर्शन आयोजित करने की कोशिश की, उन्हें प्रॉक्टर ऑफिस से लगातार ‘कारण बताओ नोटिस’ और धमकियां मिलती रही हैं जो कि अब भी जारी हैं.
इससे भी ज़्यादा चिंता की बात है, यूनिवर्सिटी से जुड़े मामलों में दिल्ली पुलिस और स्पेशल सेल का दख़ल, जिनका इस्तेमाल विद्यार्थियों और सरकार के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने की हिम्मत करने वाले किसी भी व्यक्ति को डरा-धमकाकर, फर्जी एफआईआर आदि करके चुप कराने के लिए किया जाता है.
2021-22 के दौरान, जब मैं और मेरे कई साथी विद्यार्थी कार्यकर्ता, कोरोना काल के बाद ‘जामिया खोलो अभियान’ में शामिल थे, तो हमें कई तरह की संस्थागत निगरानी और धमकियों का सामना करना पड़ा. जो चीज़ शुरू में फैकल्टी सदस्यों की तरफ़ से अनौपचारिक निगरानी जैसी लग रही थी, वह धीरे-धीरे जामिया पुलिस स्टेशन और दिल्ली पुलिस स्पेशल सेल से आने वाली धमकी भरे फ़ोन कॉल में बदल गई.
बाद में मुझे एहसास हुआ कि जो व्यक्ति मेरे पास एक साथी छात्र बनकर आया था, वह असल में विद्यार्थी संगठनों और छात्रों द्वारा आयोजित कार्यक्रमों, जैसे कैंपस में होने वाले ‘रीडिंग सर्कल’ आदि के बारे में जानकारी इकट्ठा कर रहा था. दरअसल वह छात्र था ही नहीं. दूसरे छात्रों के अनुसार, वह इंटेलिजेंस ब्यूरो (आईबी) का एजेंट लग रहा था. जामिया से कोर्स पूरा करने के बाद भी, मुझे दिल्ली पुलिस के स्पेशल सेल से मेरी राजनीतिक गतिविधियों और करियर के बारे में फ़ोन आते रहे.
ऐसे अनुभव मिशेल फूको (Michel Foucault) के ‘पैनॉप्टिसिज़्म’ या ‘सर्व-दृश्यता’ (Panopticism) के सिद्धांत को दर्शाते हैं, जहां निगरानी की महज संभावना ही अनुशासन और आत्म-नियमन का एक साधन बन जाती है, जिससे विश्वविद्यालय परिसरों का रोज़मर्रा का राजनीतिक माहौल बदल जाता है.
यह कोई इकलौता बदलाव नहीं है
जामिया में हो रहा लगातार बदलाव कोई इकलौती घटना नहीं है. दिल्ली यूनिवर्सिटी कॉलेजों, आईआईटी दिल्ली तक में ये ‘भजन क्लबिंग’ जैसे बेतुके कार्यक्रम आयोजित किए गए हैं. आज दिल्ली विश्वविद्यालय एक ऐसे कुलपति के अधीन है जो राष्ट्रीय शिक्षण मंडल के गर्वित सदस्य हैं.
यह मंडल संघ से जुड़ा शिक्षकों का एक संगठन है. उन्होंने कैंपस के अंदर आरएसएस की ‘शाखा’ लगाने की भी इजाज़त दी है और विचारधारा के हिसाब से मेल खाने वाले लोगों को स्थायी फैकल्टी के तौर पर भर्ती करने में मदद की है, जिससे अकादमिक मानक और भर्ती की प्रक्रियाओं को लेकर गंभीर चिंताएं पैदा हो गई हैं.
28 अप्रैल को आयोजित ‘युवा कुंभ’ में जामिया कुलपति ने यहां तक कह दिया कि, ‘हमने समाजवाद, पूंजीवाद तथा गांधीवाद सब देख लिया, अब हमें सनातनवाद को भी देखना पड़ेगा, एक मौका इसे भी देना होगा’ . यह बयान प्रथम दृष्टया ही असंवैधानिक है तथा संविधान के मूल ढांचे में निहित धर्मनिरपेक्षता की भावना की विपरीत है.
यही हाल जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (जेएनयू) और भारत के दूसरे विश्वविद्यालयों में भी देखा जा सकता है. जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की कुलपति का हाल ही में दिया गया दलित-पिछड़ा-आदिवासी विरोधी बयान जेएनयू के संस्थागत तथा बौद्धिक पतन को उजागर करता है.
ये कदम विश्वविद्यालयों पर विचारधारा के कब्ज़े को मुमकिन बनाते हैं, अकादमिक जगत में संघ के कैडर्स की कमी को पूरा करते हैं और साथ ही सरकारी विश्वविद्यालयों में नव-उदारवाद को बढ़ावा देते हैं. फीस में भारी बढ़ोतरी, सेल्फ फाइनेंस कोर्स की बढ़ती संख्या और देश भर में तेज़ी से खुल रहे प्राइवेट विश्वविद्यालय, ये सभी इसी सच्चाई की ओर इशारा करते हैं.
दांव पर क्या है?
विश्वविद्यालय कैंपस में ऐसे संगठनों का जश्न मनाना चिंताजनक है, जो ऐतिहासिक रूप से भेदभावपूर्ण और बांटने वाली राजनीति से जुड़े रहे हैं. जामिया, जिसे कभी रबींद्रनाथ टैगोर ने भारत के सबसे प्रगतिशील संस्थानों में से एक बताया था, आज एक अहम मोड़ पर खड़ा है.
महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या विश्वविद्यालय आलोचनात्मक सोच, असहमति और समावेशी राष्ट्र-निर्माण की जगह के तौर पर काम करना जारी रख सकते हैं? कुछ साल पहले, शिक्षक और विद्यार्थी दोनों मिलकर बांटने वाली राजनीति का विरोध कर रहे थे. अब यह एकजुटता गायब है; फैकल्टी सदस्य लगातार निगरानी या नौकरी खोने के डर से बोलने से बच रहे हैं.
यह बात जेटीए के प्रेसिडेंट के निलंबन से साफ़ हो गई, जो मौजूदा सरकार और एडमिनिस्ट्रेशन की आलोचना करते रहे थे. अकादमिक समुदाय की चुप्पी एक चिंताजनक लापरवाही है, जिससे जामिया की बौद्धिक विरासत के कमज़ोर होने का ख़तरा है.
जैसा कि जवाहरलाल नेहरू ने दिसंबर 1947 में इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में अपने भाषण में चेतावनी दी थी कि जब विश्वविद्यालय ‘संकीर्ण कट्टरता और छोटे-मोटे मक़सदों का अड्डा’ बन जाते हैं, तो वे देश की सेवा करना बंद कर देते हैं. उच्च शिक्षा का यही लोकतांत्रिक और आज़ादी दिलाने वाला नज़रिया तेज़ी से कमज़ोर पड़ रहा है, क्योंकि भारत के शिक्षा संस्थानों में दक्षिणपंथी ताक़तें आगे बढ़ रही हैं. इसके बावजूद, छात्र असहमति और सामूहिक संघर्ष के ज़रिए जामिया की असहमति की विरासत को बनाए हुए हैं.
(लेखक चेवनिंग स्कॉलर हैं, बर्कबेक यूनिवर्सिटी (लंदन) और जामिया मिल्लिया इस्लामिया (दिल्ली) के पूर्व छात्र हैं तथा अखिल भारत शिक्षा अधिकार मंच (AIFRTE) के सचिवालय के सदस्य हैं.)
(इस लेख को तैयार करने के दौरान ज़ीशान और विद्यासागर से मिली अहम जानकारियों और संपादकीय सहयोग के लिए उनका आभार. यज्ञेश और वंशज ने हिंदी अनुवाद में संपादकीय सहयोग किया. )
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