इज़्ज़त, ख़ून और प्रेम: ‘लव जिहाद’ की साज़िशें और ‘सम्मान’ के नाम पर हत्या

1947 में भारत से पाकिस्तान का अलग होना सिर्फ़ ज़मीन के लिए लड़ी गई लड़ाई नहीं थी, यह औरतों के शरीर और समुदाय की 'इज़्ज़त' के लिए भी उतनी ही बड़ी लड़ाई थी. यह टकराव आज भी दक्षिण एशियाई मूल के लोगों के बीच जारी है. इस स्त्री-द्वेषी दृष्टि की वजह से महिलाओं को आज भी यह चुनने की आज़ादी नहीं है कि वे किससे दोस्ती करें, किससे प्रेम या किसके साथ संबंध बनाएं और किससे शादी करें.

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(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रबर्ती/द वायर)

(यह लेख ‘लव जिहाद’ के नाम पर हो रही ज़्यादतियों को दर्ज करने वाली चार लेखों की श्रृंखला का पहला भाग है.)

मेरे परिवार की विरासत में बंटवारे की यादें गहराई तक समाई हुई हैं. मेरे माता-पिता का पुश्तैनी गांव कहूटा था, जो 1947 में पाकिस्तान का हिस्सा बन गया था. नई सीमा के दोनों ओर का पूरा पंजाब आग की लपटों में घिरा हुआ था. जब हत्यारी भीड़ लोगों की तलाश में इधर-उधर घूम रही थी, तो हमारे गांव की पूरी सिख और हिंदू आबादी ने गांव के गुरुद्वारे में पनाह ले रखी थी. भीड़ गुरुद्वारे के क़रीब पहुंच गई और उसकी ऊंची, मज़बूत दीवारों को तोड़ने लगी. तभी गांव के पुरुषों ने एक बेहद मुश्किल और जानलेवा फ़ैसला किया. फ़ैसला यह था कि औरतों और लड़कियों की इज़्ज़त बचानेके लिए, उन्हें गुरुद्वारे में बने कुएं में कूदकर अपनी जान देने के लिए मजबूर किया जाए. जिन्होंने कूदने से इनकार किया, उन्हें उनके अपने ही पिता, भाई, पति और बेटों ने अपनी कटारों से काट डाला.

इज़्ज़तके नाम पर होने वाले इस ख़ौफ़नाक तांडव के अलग-अलग रूप पंजाब के कई हिस्सों में देखने को मिले. बंटवारे की घटनाओं को दर्ज करने वाली भारत की जानी-मानी लेखिका उर्वशी बुटालिया एक ऐसे सिख व्यक्ति से अपनी मुलाक़ात का ज़िक्र करती हैं, जिसने अपने ही परिवार की 18 औरतों को मार डाला था. अनगिनत लड़कियों और औरतों को अगवा किया गया और उनके साथ बलात्कार हुआ; ठीक उसी समय पुरुष अपनी ज़मीनों को दुश्मनसमझे जाने वाले दूसरेलोगों से मुक्तकरने में लगे हुए थे.

जब हमारे दोनों देशों को आज़ादी मिली, उस समय मेरे माता-पिता के गांव में जो कुछ हुआ, वह एक बहुत पुराने विचार का हिंसक परिणाम था- कि औरतें अपने परिवारों, अपने धार्मिक समुदायों और अपने देशों की संपत्ति होती हैं. लड़ाई के समय उनके शरीर ही युद्ध का मैदान बन जाते हैं, अपने परिवारों, समुदायों और राष्ट्रों की ‘इज़्ज़त’ बचाने के लिए पुरुषों को जिनकी रक्षा करनी पड़ती है.

इन लड़ाइयों के दौरान औरतों पर भरोसा नहीं किया जा सकता कि वे अपनी मर्ज़ी से फ़ैसले ले सकें या अपनी आज़ादी का इस्तेमाल कर सकें. सिर्फ़ पुरुषों को ही ये तय करने का हक़ है कि औरतें अपने शरीर के साथ या ये कहें कि अपनी ज़िंदगी के साथ क्या करेंगी. जब ‘इज़्ज़त’ से जुड़े कहीं ज़्यादा बड़े और अहम सवाल दांव पर लगे हों, तब औरतों की पसंद, उनकी ख़ुशी, प्यार के बारे में उनके विचार, और आख़िर में तो उनकी अपनी जान की भी कोई ख़ास अहमियत नहीं रह जाती!

आज़ादी मिलने के कई दशकों बाद भी ये विचार न तो ख़त्म हुए हैं और न ही फीके पड़े हैं. ये विचार एक नई भाषा के साथ आज भी प्यार-मोहब्बत, यौन-संबंधों और शादी-ब्याह से जुड़े सामाजिक रीति-रिवाजों पर हावी हैं. जिस ‘दूसरे’ पक्ष से नफ़रत की जाती है, उस पक्ष के पुरुषों को आज भी एक यौन-शिकारी के तौर पर ही देखा जाता है. ‘अपनी’ औरतों को इस तरह से बड़ा करना, अनुशासित और क़ाबू में रखा जाना ज़रूरी है, ताकि वे उस शिकारी की बदनीयती का शिकार न बन जाएं.

अगर कोई औरत अपने परिवार और समुदाय के पुरुषों द्वारा बनाए गए नियमों को तोड़ती है, तो समाज में एक ‘नैतिक घबराहट’ और ग़ुस्सा फैल जाता है. तब उस शिकारी का ख़ून बहना लाज़मी हो जाता है, और ज़रूरत पड़ने पर ‘अपनी ही’ औरत का ख़ून भी. दूसरी तरफ़, ‘उनकी’ औरतें यानी उस नफ़रत भरे ‘दूसरे’ पक्ष की औरतें इस पक्ष की संपत्ति मानी जाती हैं. उस संपत्ति पर क़ब्ज़ा कर लेना जीत की निशानी और जायज़ इनाम समझा जाता है.

इस स्त्री-द्वेषी और हैरान करने वाली विश्वदृष्टि की वजह से महिलाओं को आज भी यह चुनने की आज़ादी नहीं है कि वे किससे दोस्ती करेंगी, किससे प्रेम संबंध रखेंगी, किसके साथ शारीरिक संबंध बनाएंगी और किससे शादी करेंगी.

इस निबंध में, मैं संक्षेप में विभाजन के उस संघर्ष को याद करूंगा जो महिलाओं के शरीर को लेकर लड़ा गया था. मैं भारत की संविधान सभा में हुई उन चर्चाओं को भी याद करूंगा, जो भले ही लागू न हो पाईं, लेकिन असाधारण रूप से दूरदर्शी थीं. जिनमें महिलाओं को अपना जीवनसाथी चुनने की आज़ादी को एक मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता देने की मांग की गई थी.

और, स्त्री-द्वेष के इस अशांत इतिहास के साथ-साथ, दमित और ‘अन्य’ (othered) मानी जाने वाली नस्ल, जाति और धार्मिक पहचान वाले पुरुषों को कलंकित करने के इतिहास पर भी चर्चा करूंगान केवल भारत के बारे में, बल्कि जिम क्रो के अमेरिका, नाज़ी जर्मनी और रंगभेद वाले दक्षिण अफ्रीका के बारे में भी. मैं भारत में ‘लव जिहाद’ की साज़िशों और ‘ऑनर किलिंग’ (इज़्ज़त के नाम पर हत्या) के दावों से जुड़े समकालीन सामाजिक आंदोलनों, राजनीति, क़ानूनों और नीतियों का विस्तार से वर्णन करूंगा.

(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रवर्ती/द वायर)

बंटवारा, परिवार और समुदाय की इज़्ज़त, और औरतों के शरीर

जब 1947 में नई सीमा के दोनों तरफ़ के मर्दों ने ‘दूसरे’ धर्मों के लोगों पर जानलेवा हमले करने के लिए अपनी-अपनी सेनाएं जुटाईं, तो औरतों का शरीरजैसा कि मैंने कहापरिवार, समुदाय और देश की ‘इज़्ज़त’ के लिए सबसे बड़ा युद्ध का मैदान बन गया; और इस प्रक्रिया में औरतों की अपनी मर्ज़ी, और प्यार, सेक्स तथा शादी के उनके अपने चुनाव के लिए कोई जगह नहीं बची.

जैसा कि सनी हुंदल कहते हैं, 1947 में भारत से पाकिस्तान का अलग होना सिर्फ़ ज़मीन के लिए लड़ी गई लड़ाई नहीं थी. यह औरतों के शरीर और समुदाय की ‘इज़्ज़त’ के लिए भी उतनी ही बड़ी लड़ाई थी. यह टकराव आज भी दक्षिण एशिया में, और हुंदल के अनुसार दक्षिण एशियाई मूल के लोगों के बीच भी जारी है. वे कहते हैं, ‘पितृसत्तात्मक और सामंती समाजों में औरतों को लगभग हमेशा ही संस्कृति और इज़्ज़तकी वाहक के तौर पर देखा जाता है.’

वे आगे कहते हैं कि दक्षिण एशिया की पारंपरिक और रूढ़िवादी संस्कृति औरतों को एक पवित्र वस्तु‘ (fetish) बना देती है. जहां एक तरफ़ सरकारी तौर पर यह कहा जाता है कि औरतों को बहुत ऊंचा दर्जा और सम्मान दिया जाता है, वहीं असलियत में उन्हें सिर्फ़ उस इज़्ज़त को ढोने वाला एक पात्रही समझा जाता है, और उनकी पूरी ज़िंदगी सिर्फ़ उस इज़्ज़त को बचाए रखने में गुज़र जाती है. उन्हें ऐसा कुछ भी करने की इजाज़त नहीं होती जिससे उन आदर्शों पर कोई आंच आए, जबकि मर्दों को इस तरह के बोझ से पूरी तरह आज़ाद कर दिया जाता है.

सनी हुंदल बताते हैं कि कैसे बंटवारे ने गहराई से जड़ जमा चुकी स्त्री-द्वेष की भावना को बेहद क्रूरता के साथ उजागर किया. जब मुस्लिम, हिंदू और सिख पुरुष अपने साथियों की हत्या का बदला लेना चाहते थे, तो वे जान-बूझकर दूसरे धर्मों की महिलाओं को खोजने निकलते थे, ताकि उनका बलात्कार कर सकें और उन्हें अगवा कर सकें. जब ग़ुस्से से भरी हिंसक भीड़ गांवों पर हमला करती थी तो महिलाओं से कहा जाता था कि वे दूसरेपक्ष के चंगुल में फंसने के बजाय अपनी भलाई के लिए कुएं में कूदकर आत्महत्या कर लें.

वह कहते हैं कि इस बात को पाकिस्तानी फिल्म ख़ामोश पानी’ (Silent Waters) में बहुत ही शानदार ढंग से दिखाया गया है. (संयोग से ख़ामोश पानीकी कहानी मेरे माता-पिता के गांव की घटना पर आधारित है. 1947 में उन्हें अपना गांव छोड़कर भागना पड़ा था. उस घटना के बाद पुरुषों ने अपने ही परिवारों की महिलाओं की हत्या कर दी थी या उन्हें कुएं में कूदकर अपनी जान देने पर मजबूर कर दिया था).

अपनी किताब ‘Quarantined: Women and the Partition’ में देबाली मुखर्जी-लियोनार्ड विस्तार से बताती हैं कि 1947 के बंटवारे के दौरान और उसके बाद महिलाओं के साथ कैसा बर्ताव किया गया. हिंसा के उस दौर में उन्हें अग़वा किया गया, उन्हें बेघर होना पड़ा, या उन्हें उनके परिवारों से अलग कर दिया गया. बंटवारे के बाद भारत और पाकिस्तान, दोनों ही देशों में इन महिलाओं को बचानेऔर उन्हें उनके मूल परिवारों तथा समुदायों तक वापस पहुंचाने के लिए बचाव अभियानचलाए गए.

वापस लौटने के बाद इनमें से कई महिलाओं को उनके अपने ही परिवारों और समुदायों द्वारा सामाजिक रूप से बहिष्कृत कर दिया गया. उन्हें अपवित्रमाना गया, क्योंकि दूसरेसमुदाय के पुरुषों द्वारा की गई हिंसा ने उनकी इज़्ज़त को तार-तार कर दिया था. भले ही उन्हें ज़बरदस्ती अग़वा किया गया था और उनके साथ बलात्कार हुआ था, फिर भी अक्सर देखा गया कि परिवार वाले इन जीवित बची महिलाओं पर ही दोष मढ़ते थे और यह कहकर उन्हें ठुकरा देते थे कि उन्होंने परिवार, समुदाय और राष्ट्र की इज़्ज़त को कलंकित किया है.

राष्ट्रीय सम्मानऔर सांप्रदायिक पहचान की इसी सोच के चलते अक्सर इन जीवित बची महिलाओं को समाज द्वारा ठुकरा दिया जाता था. न केवल परिवार और समुदाय, बल्कि स्वयं राज्य ने भी ऐसा ही सुलूक किया. मुखर्जी-लियोनार्ड सीमा के दोनों ओर, तीनों धार्मिक समुदायोंहिंदू, सिख और मुस्लिम– समुदायों की इन महिलाओं द्वारा सहे गए सामाजिक और मनोवैज्ञानिक आघात का ब्योरा देती हैं.

उनका तर्क है कि इन महिलाओं के साथ लगभग ‘क्वारंटाइन’ किए गए लोगों जैसा बर्ताव किया गयाराज्य द्वारा उन्हें नियंत्रित किया गया, उन पर नज़र रखी गई और उनकी सहमति के बिना उन्हें एक जगह से दूसरी जगह भेजा गया.

सरकारें स्वयं महिलाओं के निजी अधिकारों और इच्छाओं के लिए नहीं बल्कि सामुदायिक सम्मान और राष्ट्रीय पहचान को बहाल करने को लेकर कहीं अधिक चिंतित थीं.

महिलाओं के चयन के अधिकार के बारे में संविधान सभा की चर्चाएं

विभाजन के दौरान इज़्ज़तके नाम पर अनगिनत महिलाओं के ख़िलाफ़ हुई उस भयानक सामूहिक हिंसा और उन्हें चयन करने तथा अपनी मर्ज़ी से काम करने के अधिकार से वंचित किए जाने की पृष्ठभूमि में संविधान के मसौदे को तैयार करते समय दो बहुत ही महत्वपूर्ण चर्चाएं शुरू हुईं. इन दोनों चर्चाओं का समर्थन मसौदा समिति की दो नारीवादी महिला सदस्योंहंसा मेहता और राजकुमारी अमृत कौरने किया था.

जाने-माने फिल्मकार श्याम बेनेगल ने संविधान नाम से टीवी शृंखला बनाई, जिसमें अभिलेखीय रिकॉर्ड के आधार पर संविधान सभा की बहसों को फिर से जीवंत किया गया है. इसी शृंखला में एक ऐसे प्रस्ताव को दर्शाया गया है जिसे हंसा मेहता और राजकुमारी अमृत कौर ने पेश किया था.

इस प्रस्ताव में यह मांग की गई थी कि संविधान के मौलिक अधिकारवाले अध्याय में महिलाओं को अपने होने वाले जीवनसाथी का चुनाव करने और उस पर अपनी सहमति देने का अधिकार भी शामिल किया जाए. मसौदा समिति के पुरुष सदस्यों में से केवल एक सदस्य ने ही इस प्रस्ताव का समर्थन किया था.

दूसरा प्रस्ताव प्रसिद्ध समाजवादी नेता मीनू मसानी ने पेश किया था, जो पारसी थे और बंबई से चुने गए थे. इस प्रस्ताव का संदर्भ यह था कि ब्रिटिश भारत में औपनिवेशिक क़ानून, विशेष विवाह अधिनियम III, 1872, के तहत अलग-अलग धार्मिक आस्थाओं वाले दो व्यक्ति भारत के भीतर तभी विवाह कर सकते थे जब दोनों में से कोई एक अपनी आस्था त्याग दे. यदि दोनों में से कोई भी ऐसा करने को तैयार नहीं होता था, तो उनके पास एकमात्र विकल्प यही बचता था कि वे भारत के बाहर अपने विवाह का पंजीकरण करवाएं.

मीनू मसानी ने प्रस्ताव दिया कि मौलिक अधिकारों वाले अध्याय में निम्नलिखित खंड जोड़ा जाए: ‘केवल धर्म के अंतर के आधार पर नागरिकों के बीच विवाह में कोई भी बाधा नहीं होनी चाहिए.’ यह खंड स्विस संविधान के अनुच्छेद 54 पर आधारित था.

हंसा मेहता, राजकुमारी अमृत कौर और डॉ. बीआर आंबेडकर ने उनके प्रस्ताव का समर्थन किया. लेकिन जब इस पर मतदान हुआ तो यह प्रस्ताव 5 के मुकाबले 4 मतों के बहुत मामूली से अंतर से ख़ारिज हो गया. मसानी, कौर और मेहता ने अपने असहमति-नोट में इस बात पर खेद व्यक्त किया कि यह अधिकार संविधान के मसौदे में शामिल नहीं हो पाया.

उन्होंने कहा कि इस तरह की बाधाएं साझी राष्ट्रीयताके दावे के साथ मेल नहीं खातीं और उन्होंने सदस्यों से आग्रह किया कि इसे संविधान में शामिल किया जाए: ‘दो भारतीयों के बीच विवाह में इस तरह की बाधा हमारी साझी राष्ट्रीयताके दावे पर एक प्रश्नचिह्न है.

26 फरवरी 1947 को महात्मा गांधी ने एक प्रार्थना सभा में अलग-अलग धार्मिक आस्थाओं वाले व्यक्तियों के बीच विवाह के विचार का समर्थन किया था, जिसमें दोनों व्यक्ति बिना किसी बाधा के अपने-अपने धर्म का पालन करते रहें. दुर्भाग्य से आज भारत में ऐसे विवाह संपन्न नहीं किए जा सकते.

मुझे पता है कि विद्वान और इतिहासकार, इतिहास पर विचार करते समय पर्यवेक्षकों को ‘क्या होता अगर…’ जैसे सवालों से बचने की सलाह देते हैं. लेकिन फिर भी मैं इस सवाल पर विचार किए बिना नहीं रह पाता कि अगर भारत के संविधान के मौलिक अधिकारों वाले अध्याय में ये दो खंड शामिल किए गए होते, तो क्या प्रधानमंत्री मोदी के कार्यकाल के दौरान भाजपा-शासित राज्यों में धर्म और जाति के बाहर शादी करने को अपराध बनाने वाले क़ानूनों की जो बाढ़-सी आ गई है क्या वह संवैधानिक रूप से स्वीकार्य होती?

 

न्यूरेम्बर्ग, अमेरिकी जिम क्रो और अफ़्रीकी रंगभेद की यादजैसे-जैसे भारतीय राज्य धर्म और जाति की सीमाओं को तोड़कर किए जाने वाले प्रेम को लेकर क़ानून बन रहे हैं तो ऐसा लगता है मानो 1935 के न्यूरेम्बर्ग, जिम क्रो के अमेरिका और रंगभेद वाले दक्षिण अफ्रीका के तूफ़ानी बादल आज अशुभ रूप से भारतीय आसमान पर मंडरा रहे हैं.

नाज़ी दौर में न्यूरेम्बर्ग का ख़ास महत्व था, शायद इसकी एक वजह यह रही हो कि यह शहर जर्मनी के केंद्र में था. न्यूरेम्बर्ग क़ानूनों की घोषणा एडॉल्फ़ हिटलर ने सितंबर 1935 में की थी. यह घोषणा न्यूरेम्बर्ग में आयोजित एक विशाल विजय रैली के बाद हुई थी. जर्मनी में नाज़ी शासन के दौरान राइखस्टैग की बर्लिन के बाहर एकमात्र बैठक इसी शहर में आयोजित हुई थी.

न्यूरेम्बर्ग क़ानूनों ने न केवल यहूदी जर्मनों से उनकी नागरिकता के अधिकार छीन लिए, बल्कि अलग-अलग धर्मों के लोगों के बीच होने वाले विवाह और यौन संबंधों को भी अपराध घोषित कर दिया. राइख नागरिकता क़ानूनके तहत केवल जर्मन लोगों को ही राइख नागरिकताके लिए पात्र समझा गया. बाक़ी सभी लोगोंजिनमें मुख्य रूप से यहूदी शामिल थे, लेकिन साथ ही सिंती, रोमा और अश्वेत लोग भी थेको राज्य की प्रजाके रूप में वर्गीकृत किया गया और उन्हें नागरिकता के किसी भी अधिकार से वंचित कर दिया गया.

इससे भी पहले 1933 में हिटलर ने यहूदी व्यवसायों के राष्ट्रीय बहिष्कार की घोषणा कर दी थी; साथ ही, क़ानून बनाकर तथाकथित ग़ैर-आर्योंको सिविल सेवाओं और वकालत व अध्यापन जैसे पेशों से भी प्रतिबंधित कर दिया था.

दूसरा न्यूरेम्बर्ग क़ानून था जर्मन रक्त और जर्मन सम्मान की सुरक्षा का क़ानून‘, जिसने यहूदियों और आर्यनजर्मनों के बीच शादी और यौन संबंधों को ग़ैर-क़ानूनी घोषित कर दिया था. इसका उल्लंघन करने वालों को जेलों और यातना शिविरों में क़ैद कर दिया जाता था, वहां उनसे कठोर श्रम भी करवाया जाता था, जिसकी वजह से अक्सर बहुत से लोगों की मौत हो जाती थी.

इस क़ानून का उद्देश्य उस चीज़ को रोकना था जिसे जर्मन महिलाओं और लड़कियों का ‘नस्लीय अपवित्रीकरण’ माना जाता था. यहूदियों और ‘आर्यनों’ के बीच संबंधों को ग़ैर-क़ानूनी घोषित करने से ही ‘शुद्ध जर्मन जनता’ का अस्तित्व सुनिश्चित हो सकता था.

एक अख़बार के वरिष्ठ संपादक जूलियस स्ट्रीचर ने एक पोस्टर के माध्यम से इस क़ानून की आवश्यकता को समझाते हुए यह सवाल उठाया: ‘यहूदी, जर्मन महिला को नस्लीय अपवित्रीकरण के लिए इतने व्यवस्थित तरीक़े से और बड़े पैमाने पर क्यों उकसाता है?’

इस तरह, यहूदी पुरुषों को एक यौन शिकारी के रूप में और आर्यन महिलाओं को असुरक्षित महिलाओं के रूप में चित्रित किया गया. इस क़ानून के बाद यहूदी अपने घरों में काम करने के लिए 45 वर्ष से कम उम्र की आर्यन महिलाओं को नहीं रख सकते थे.

नस्लीय यौनिक भय किसी भी तरह से सिर्फ़ नाज़ी जर्मनी तक ही सीमित नहीं था. बहुत से शोध इस बात की पुष्टि करते हैं कि 1900 के आस-पास के दशकों में अमेरिका के दक्षिणी हिस्सों में अफ़्रीकी-अमेरिकियों की लिंचिंग (भीड़ द्वारा हत्या) से जुड़ी बयानबाज़ी और वास्तविक घटना, दोनों के केंद्र में गोरे लोगों के भीतर का नस्लीय और यौनिक भय ही था.

उदाहरण के लिए, मैटियस स्मैंग्स ने अपनी किताब Race, Gender, and the Rape-Lynching Nexus in the U.S. South, 1881-1930 में लिंचिंग की 11 घटनाओं का अध्ययन किया है और इस बात की पुष्टि की है कि गोरे लोगों की नस्ल और लिंग से जुड़ी चिंताएं मिलकर नस्लीय और यौनिक भय का रूप ले लेती थीं.

इस प्रकार के यौनिक भय की वजह से अश्वेत पुरुष ‘यौन शिकारी’ नज़र आने लगे, और इसी वजह से अश्वेत पुरुषों की लिंचिंग सबसे ज़्यादा हुई. जैसे-जैसे गोरी महिलाएं अधिक संख्या में स्कूल जाने लगीं और वयस्क अश्वेत पुरुषों में साक्षरता बढ़ी, वैसे-वैसे ये डर और भी ज़्यादा बढ़ता गया.

इसी तरह, एनएम कार्टर ने अपनी किताब Intimacy without Consent: Lynching as Sexual Violence में यह सुझाव दिया है कि लिंचिंग को एक तरह की नस्लीय और यौनिक हिंसा के तौर पर समझा जा सकता है, जो ख़ास तौर पर अश्वेत पुरुषों को नुक़सान पहुंचाती है. उनका कहना है कि ‘अश्वेत पुरुष बलात्कारी’ होते हैं जैसा नैरेटिव उस समय बहुत ज़्यादा प्रचलित हुआ था.

20वीं सदी में भी अमेरिका के कई राज्यों में अलग-अलग नस्लों के लोगों के बीच शादी (ख़ास तौर पर गोरे और अफ़्रीकी-अमेरिकियों के बीच) पर क़ानूनन रोक लगी हुई थी. द क्विंट हमें याद दिलाता है कि हिटलर के पराजय तक, और उसके काफ़ी समय बाद तक भी 16 अमेरिकी राज्यों में ऐसे क़ानून लागू थे. होंडुरास या हैती जैसे देशों से आए पुरुष (जो अमेरिकी नागरिक नहीं थे) अगर गोरी महलाओं से रिश्ता बना लेते थे तो अमेरिकी अदालतें उन्हें सज़ा देती थीं.

ज़ाहिर है, नस्लीय अलगाव का मुद्दा इतना अहम था कि यह उन अश्वेत पुरुषों पर भी लागू होता था, जो अमेरिकी नागरिक नहीं थे. आख़िरकार 1967 में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने Loving vs Virginia मामले में इन क़ानूनों को रद्द कर दिया. अदालत ने अलग-अलग नस्लों के लोगों के बीच रिश्तों को रोकने के पीछे के ‘छद्म विज्ञान’ (नक़ली विज्ञान) को सिरे से ख़ारिज कर दिया और शादी के मामले में अपनी पसंद से चयन के मौलिक अधिकार को मान्यता दी.

रंगभेद के दौर वाले दक्षिण अफ्रीका में चार नस्लीय वर्गों (गोरे, कलर्ड, भारतीय और अश्वेत) के लोगों का आपस में शादी करना ग़ैर-क़ानूनी था, और इस क़ानून को तोड़ने वालों के लिए कड़ी आपराधिक सज़ा का प्रावधान था.

मशहूर टीवी होस्ट और कॉमेडियन ट्रेवर नोआ ने रंगभेद वाले दक्षिण अफ्रीका में अपने बचपन और जवानी के दिनों के बारे में एक दिल छू लेने वाला संस्मरण लिखा है. उन्होंने इसका नाम बॉर्न अ क्राइम‘ (Born a Crime) रखा है, क्योंकि उनकी माँ अश्वेत थीं और पिता गोरे थे, और रंगभेद वाले दक्षिण अफ्रीका में इसे एक अपराध माना जाता था.

(हर्ष मंदर सामाजिक कार्यकर्ता और लेखक है.)

(शोध सहायता के लिए सुमैय्या फ़ातिमा और सैयद रूबील हैदर ज़ैदी का आभार.)

(मूल अंग्रेज़ी से ज़फ़र इक़बाल द्वारा अनूदित. ज़फ़र भागलपुर में हैंडलूम बुनकरों की ‘कोलिका’ नामक संस्था से जुड़े हैं.)