शिकागो से नोएडा तक: क्या भारत फिर श्रमिक अधिकारों के दमन के दौर में लौट रहा है?

शिकागो के हे मार्केट आंदोलन से लेकर नोएडा के हालिया मज़दूर प्रदर्शनों तक, श्रमिक अधिकारों की लड़ाई नए रूप में जारी है. यह लेख बताता है कि कैसे श्रम क़ानूनों, कम मज़दूरी, ठेका प्रथा और दमनात्मक कार्रवाई के बीच मज़दूर फिर ‘जीने लायक वेतन’ और सम्मानजनक कामकाजी अधिकारों की मांग कर रहे हैं.

नोएडा: उत्तर प्रदेश के गौतम बुद्ध नगर जिले के नोएडा में मजदूरी बढ़ाने की मांग को लेकर प्रदर्शन के दौरान एक मजदूर को पीटता सुरक्षाकर्मी, सोमवार, 13 अप्रैल 2026. (पीटीआई फोटो)

आज से लगभग 140 वर्ष पहले अमेरिका के शिकागो शहर में मजदूरों ने 1 मई 1886 को ‘8 घंटे काम, 8 घंटे आराम और 8 घंटे मनोरंजन’ के अधिकार की मांग को लेकर हड़ताल शुरू की थी. यह आंदोलन उस समय के कठोर श्रम परिस्थितियों के खिलाफ एक ऐतिहासिक संघर्ष था, जिसमें मजदूर अत्यधिक लंबे समय तक काम करने को मजबूर थे.

इसी आंदोलन के दौरान 4 मई 1886 को शिकागो के हे मार्केट चौक पर एक सभा के दौरान बम विस्फोट की घटना हुई, जिसके बाद पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच हिंसक टकराव हुआ और कई मजदूरों की मृत्यु हो गई तथा अनेक मजदूरों और उनके नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया.

गिरफ्तार किए गए लोगों में से चार मजदूर नेताओं- अगस्त स्पाइस, अल्बर्ट पार्सन्स, एडॉल्फ फिशर और जॉर्ज एंजेल- को बम फेंकने का आरोप साबित हुए बिना ही फांसी दे दी गई. इन घटनाओं ने मजदूर आंदोलन के इतिहास में एक गहरी छाप छोड़ी. हे मार्केट में बहा खून इस विचार का प्रतीक बन गया कि ‘मनुष्य केवल मशीन नहीं है’ और उसे सम्मानजनक जीवन और अधिकारों के साथ जीने का हक है. इन शहीद मजदूर नेताओं की कुर्बानी आगे चलकर मजदूर संघर्षों का प्रतीक बन गया.

इसके संबंध में लेनिन ने कहा कि मजदूर दिवस केवल एक उत्सव नहीं है, बल्कि यह मजदूरों के संघर्ष, एकता और अधिकारों के लिए निरंतर संघर्ष का प्रतीक है. इसी ऐतिहासिक संघर्ष और शहादत से प्रेरित होकर पूरी दुनिया के मजदूरों ने संगठित होकर ‘8 घंटे काम, 8 घंटे आराम और 8 घंटे मनोरंजन’ के अधिकार को प्राप्त किया, जो आगे चलकर कई देशों में श्रम कानूनों का आधार बना.

भारत में भी 20वीं सदी की शुरुआत (1900–1920) में ही कारखानों, रेल और बंदरगाहों के मजदूरों ने शोषण और कम मजदूरी के खिलाफ आवाज उठानी शुरू कर दी थी. इसका औपचारिक आगाज़ 1918 में महात्मा गांधी के नेतृत्व में हुए अहमदाबाद कपड़ा मिल मजदूरों की हड़ताल से हुआ. इसके बाद 1920–30 के दशक में लाला लाजपत राय और जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस (एटक) की स्थापना के साथ संगठित मजदूर आंदोलनों को गति मिली, जिसने अंग्रेजी शासन के आर्थिक शोषण के पहियों की रफ्तार धीमी करनी शुरू कर दी. इसी दौर में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने मजदूरों को संगठित कर बॉम्बे टेक्सटाइल मिल जैसी बड़ी हड़तालों के ज़रिए ब्रिटिश साम्राज्य को आर्थिक मोर्चे पर गंभीर चुनौती दी.

बाद के दौर में मजदूर आंदोलनों ने असहयोग आंदोलन, सविनय अवज्ञा आंदोलन और भारत छोड़ो आंदोलन जैसे राष्ट्रीय संघर्षों में सक्रिय भागीदारी कर एक ओर ब्रिटिश आर्थिक ढांचे को कमजोर करना जारी रखा, तो दूसरी ओर 1946 के नौसैनिक विद्रोह जैसे संघर्षों को व्यापक समर्थन देकर ब्रिटिश सत्ता की आर्थिक और राजनीतिक ताकत को निर्णायक शिकस्त के मोड़ तक पहुंचा दिया.

इस प्रकार भारतीय मजदूर आंदोलनों ने स्वतंत्रता आंदोलन के जनाधार का विस्तार किया और काम के घंटे, वेतन तथा श्रमिक अधिकारों को राष्ट्रीय बहस के केंद्र में लाकर आज़ादी की लड़ाई को व्यापक जनसमर्थन और शक्ति प्रदान की- जिसके बिना भारत में ब्रिटिश साम्राज्य की हार संभव न थी.

आज़ादी के बाद डॉ. भीमराव आंबेडकर ने बार-बार इस बात पर जोर दिया कि लोकतंत्र केवल राजनीतिक अधिकारों तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि इसके साथ आर्थिक और सामाजिक समानता भी आवश्यक है, तभी मजदूरों और श्रमिकों का वास्तविक जीवन बेहतर हो सकता है.

उन्होंने श्रमिक हितों की रक्षा के लिए संविधान और श्रम नीतियों में ऐसे प्रावधानों को शामिल करने पर बल दिया, जिनमें 8 घंटे कार्य दिवस, साप्ताहिक अवकाश, सवैतनिक अवकाश और मातृत्व अवकाश जैसे अधिकारों की दिशा में मजबूत आधार तैयार हुआ.

उनका दृष्टिकोण था कि श्रमिकों की गरिमा और सुरक्षा के बिना लोकतंत्र अधूरा है. पंडित जवाहरलाल नेहरू का मानना था कि किसी भी राष्ट्र की प्रगति उसकी श्रमिक शक्ति और मेहनतकश वर्ग की स्थिति पर निर्भर करती है. इसलिए उन्होंने उचित वेतन, सुरक्षित कार्य परिस्थितियों और सामाजिक सुरक्षा को आवश्यक माना.

स्वतंत्र भारत में नेहरू के नेतृत्व वाली सरकार ने संगठित क्षेत्र में श्रम कानूनों और श्रमिक कल्याण नीतियों को लागू करने की दिशा में कई कदम उठाए, जिससे श्रमिकों के अधिकारों को संस्थागत आधार मिला. लेकिन आज गणतंत्र लागू होने के 76 वर्ष बाद परिस्थितियाँ पूरी तरह से उलट गई हैं.

मार्क्स ने कहा था कि इतिहास अपने आप को दोहराता ज़रूर है- एक बार यथार्थ के साथ, तो दूसरी बार छलावे के साथ. आज 140 साल पहले के शिकागो का इतिहास नोएडा में अपने आप को छलावे के साथ दोहरा रहा है.

आज के भारत में चार लेबर कोड लागू करके मजदूरों से यूनियन बनाने का, हड़ताल करने, 8 घंटे से अधिक काम न करवाने व न्यूनतम वेतन पाने के अधिकार छीन लिए गए हैं. और जब मजदूर नोएडा सहित देश के अलग-अलग शहरों की सड़कों पर उतरकर न्यूनतम मजदूरी को 26,000 रुपये –30,000 रुपये /- प्रति माह करने, ठेका प्रथा ख़त्म करने और श्रम संहिताओं को रद्द करने की आवाज़ उठा रहे हैं, जो उनके ज़िंदा रहने की न्यूनतम शर्त है, तो उन्हें लाठी और जेल मिल रही है. उनके आंदोलन को पाकिस्तान-प्रायोजित कहकर उन्हें देशद्रोही बनाया जा रहा है.

जैसे शिकागो के मजदूर नेताओं पर बम फेंकने का आरोप साबित किए बिना उन्हें फांसी पर लटका दिया गया था, वैसे ही आज नोएडा मजदूर आंदोलन के नेताओं पर बिना कोई आरोप साबित हुए साज़िशकर्ता बताकर संगीन धाराओं में जेलों में ठूंस दिया गया है और उन्हें बर्बर यातनाएं दी जा रही हैं. 300 से अधिक लोगों को दंगा, हिंसा और आगज़नी से संबंधित आपराधिक धाराओं के तहत गिरफ्तार किया गया है, तो ढेर सारे लोग लापता भी हैं.

मई दिवस के शहीद अल्बर्ट पार्सन्स की पत्नी लूसी पार्सन्स ने न्यायालय में खड़े होकर उस समय के अमेरिकी शासकों से कहा था कि यह समाज तुम्हारा है और तुमने ही इसे बनाया है, जहां एक औरत अपना शरीर बेचने को मजबूर होती है क्योंकि भूख से मरना उससे भी बदतर है. एक व्यक्ति चोर बनता है क्योंकि व्यवस्था उसे ऐसा बनने पर मजबूर करती है, और जब मजदूर रोटी के लिए लड़ते हैं तो उन्हें जेल भेज दिया जाता है. लूसी पार्सन्स के ये शब्द आज के नोएडा आंदोलन के संदर्भ में पूरी तरह से सही प्रतीत होते हैं.

हाल के मजदूर आंदोलनों के बाद उत्तर प्रदेश और हरियाणा की सरकारों को श्रमिकों की मजदूरी में कुछ सीमित बढ़ोतरी करने के लिए मजबूर होना पड़ा, जिसका विवरण इस प्रकार है:

तालिका दिखाती है कि उत्तर प्रदेश में मजदूरी में कुल बढ़ोतरी लगभग 2,300 रुपये प्रति माह के आसपास हुई, जबकि हरियाणा में यह वृद्धि लगभग 3,500 रुपये से 5,000 रुपये प्रति माह तक दर्ज की गई. ऐसे में सवाल है कि राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में, जहां एक व्यक्ति के रहने और खाने का न्यूनतम खर्च ही अनुमानत: लगभग 15,000 रुपये – 20,000 रुपये प्रति माह है, वहां 13,600 रुपये से 19,500 रुपये प्रति माह की मजदूरी में कोई श्रमिक कम से कम चार सदस्यों वाले अपने परिवार का भरण-पोषण कैसे कर पाएगा?

इस तरह देखा जाए तो बढ़ी हुई मजदूरी भी इतनी अपर्याप्त है कि वह मजदूरों को जीवनयापन की न्यूनतम गरिमापूर्ण स्थिति से काफी पीछे छोड़ देती है.

इस मजदूरी को निर्धारित करने में न तो मजदूरों से कोई बात की गई और न ही उनके ज़िंदा रहने के लिए ज़रूरी सामग्री की कीमतों को जोड़ा गया. आज़ादी से पहले सुई से लेकर जहाज़ तक अधिकांश वस्तुएं भारत में इंग्लैंड से आयात होती थीं. देश के मजदूर वर्ग ने अपनी अथक मेहनत से सड़क, पुल, रेलवे, बांध, ऊंची इमारतों और स्मार्ट सिटी जैसे इन्फ्रास्ट्रक्चर का निर्माण किया. साथ ही, कारखानों और मिलों में काम करके उन्होंने औद्योगिक उत्पादन को गति दी और आर्थिक विकास को आज तक आगे बढ़ाया है.

भारत का भविष्य इन करोड़ों कामगारों के हाथों में है, जो अपने खून-पसीने से देश को निरंतर आगे बढ़ा रहे हैं. इसके बावजूद, जब वेतन निर्धारण और उनके जीवन से जुड़े अन्य महत्वपूर्ण फैसलों का समय आता है, तो सरकारों द्वारा निर्णय-प्रक्रिया में उनकी हिस्सेदारी को शून्य कर दिया जाता है.

मई 1886 के शिकागो आंदोलन को भले ही तत्कालीन समय में कुचल दिया गया था, लेकिन उसके विचारों ने पूरी दुनिया के मजदूरों को ऐसी शक्ति दी कि वे उस आंदोलन की मांगों को अधिकार के रूप में हासिल करने में सफल हुए. इसी तरह, आज के भारत के मजदूर आंदोलन को भी यहां के शासक भले ही इसे कुचलने में सफल दिख रहे हों, तो भी यह न्यूनतम मजदूरी तय कराने, ठेका प्रथा समाप्त करने और श्रमिक-विरोधी चारों श्रम संहिताओं को रद्द कराने की दिशा में एक महत्वपूर्ण शुरुआत बन चुका है.

यह आंदोलन ‘जीने लायक वेतन के बिना जिंदगी नहीं’ के विचार का प्रतीक बन गया है. आने वाले समय में मजदूर वर्ग को इन अधिकारों को हासिल करने के लिए एक व्यापक संघर्ष की ओर बढ़ना ही होगा.

(लेखक सामाजिक विकास पेशेवर और शोधकर्ता हैं, जो श्रमिक अधिकार, भूमि-अधिकार और सामाजिक न्याय से जुड़े मुद्दों पर लंबे समय से काम और लेखन कर रहे हैं.)