भारत में कुल आत्महत्याओं में 8.5 प्रतिशत छात्र, एक दशक में स्पष्ट वृद्धि: रिपोर्ट

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो द्वारा जारी ‘एक्सीडेंटल डेथ्स एंड सुसाइड्स 2024’ रिपोर्ट के अनुसार, देशभर के शिक्षण परिसरों में 14,488 छात्रों ने आत्महत्या की. यह संख्या भारत में दर्ज कुल 1,70,746 आत्महत्याओं का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है.

(प्रतीकात्मक फोटो साभार: pixabay/public domain)

नई दिल्ली: राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की ताज़ा रिपोर्ट छात्र समुदाय की मानसिक स्थिति की गंभीर तस्वीर पेश करती है. छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य को सुधारने के लिए केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा लगातार प्रयास किए जाने के बावजूद देश में दर्ज कुल आत्महत्याओं में 8.48 प्रतिशत हिस्सेदारी छात्रों की है. पिछले एक दशक में इसमें स्पष्ट वृद्धि दर्ज की गई है.

न्यू इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, 7 मई को जारी ‘एक्सीडेंटल डेथ्स एंड सुसाइड्स 2024’ रिपोर्ट के अनुसार, देशभर के शिक्षण परिसरों में 14,488 छात्रों ने आत्महत्या की. यह संख्या भारत में दर्ज कुल 1,70,746 आत्महत्याओं का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है.

2014 के आंकड़ों से तुलना करने पर पता चलता है कि उस वर्ष 8,068 छात्र आत्महत्याएं हुई थीं, जो कुल आत्महत्याओं का 6.1 प्रतिशत थीं. पिछले आंकड़े बताते हैं कि औसतन हर साल कम-से-कम 13,000 छात्रों ने आत्महत्या जैसा कदम उठाया. 2021 में यह संख्या 13,089 थी, 2022 में 13,044 और 2023 में 13,892 रही.

हालांकि इस सप्ताह जारी रिपोर्ट में राज्यों का विस्तृत आंकड़ा उपलब्ध नहीं था, लेकिन दुनियाभर के स्कूलों में पेशेवर काउंसलिंग विभाग स्थापित करने में मदद करने वाली गैर-लाभकारी संस्था ‘द आईसी3 इंस्टीट्यूट’ ने अगस्त 2024 में जारी अपनी रिपोर्ट ‘द स्टूडेंट सुसाइड्स: एन एपिडेमिक स्वीपिंग इंडिया’ में बताया था कि महाराष्ट्र, तमिलनाडु और मध्य प्रदेश छात्र आत्महत्याओं के मामले में सबसे अधिक प्रभावित राज्य हैं. इन तीनों राज्यों को मिलाकर देश की कुल आत्महत्याओं का एक-तिहाई हिस्सा बनता है.

पिछले आंकड़ों से यह भी पता चलता है कि दक्षिणी राज्य और केंद्र शासित प्रदेश मिलकर देश की लगभग एक-तिहाई आत्महत्याओं में योगदान देते हैं.

उच्च शिक्षा में नीति अनुसंधान केंद्र के पूर्व निदेशक प्रोफेसर एनवी वर्गीज़ ने अखबार से कहा, ‘छात्र आत्महत्याओं के तीन प्रमुख कारण हैं. कई छात्र खुद को नीट या जेईई जैसी प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं को पास करने योग्य नहीं मानते या उनमें रुचि नहीं रखते, लेकिन माता-पिता उन पर दबाव डालते हैं.’

उन्होंने कहा, ‘उम्मीदों का बोझ पूरा न कर पाने के कारण छात्र अत्यधिक तनाव महसूस करते हैं और यह उन्हें आत्महत्या जैसे कदम उठाने के लिए मजबूर करता है. कोटा में बार-बार होने वाली छात्र आत्महत्याएं इसका उदाहरण हैं, जहां ऐसे परीक्षाओं की कोचिंग देने वाले संस्थानों की भरमार है.’

शिक्षाविद् के अनुसार, सामाजिक रूप से वंचित समूहों (एसडीजी) से आने वाले छात्रों को दूसरों द्वारा अपमानित किया जाना भी उन पर भारी मानसिक दबाव बनाता है.

उन्होंने कहा, ‘यदि आप केरल में हाल में हुई एक छात्र की आत्महत्या को देखें, तो प्रशासन द्वारा छात्र को भारी अपमान का सामना करना पड़ा था, जिसने उसे आत्महत्या के लिए मजबूर कर दिया.’

वर्गीज़ ने एक अन्य कारण बताते हुए कहा कि आर्थिक रूप से संपन्न छात्रों जैसी जीवनशैली अपनाने का साथियों का दबाव भी छात्रों पर भारी पड़ता है.

सरकार द्वारा इस समस्या के समाधान के लिए बड़े पैमाने पर प्रयास किए जाने के बावजूद आत्महत्याओं में वृद्धि का यह रुझान जारी है.

सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त राष्ट्रीय कार्यबल ने अगस्त 2025 में मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के समाधान के लिए एक समर्पित पोर्टल शुरू किया था. 2022 में राष्ट्रीय आत्महत्या रोकथाम रणनीति शुरू की गई थी, जिसका उद्देश्य देशभर में आत्महत्या से होने वाली मौतों में 10 प्रतिशत की कमी लाना है.

शिक्षा मंत्रालय ने छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने के लिए ‘मनोदर्पण’ जैसी पहल और टेली-मानस कार्यक्रम के तहत टोल-फ्री हेल्पलाइन 14416 शुरू की. राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य नीति 2014 और मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम 2017 इस क्षेत्र के महत्वपूर्ण कानूनी प्रावधान हैं.

पिछले कुछ महीनों में आईआईटी संस्थानों में लगातार हुई आत्महत्याओं के बाद कारणों की पहचान करने और ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए एक समिति भी गठित की गई थी.

हाल ही में पश्चिम बंगाल स्थित आईआईटी-खड़गपुर परिसर के एक छात्रावास के कमरे में चौथे वर्ष के एक इंजीनियरिंग छात्र ने कथित तौर पर आत्महत्या कर ली.

टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, पिछले 15 महीनों में आईआईटी-खड़गपुर परिसर में यह नौवें छात्र की मौत है, जबकि पिछले 10 दिनों के भीतर परिसर में यह दूसरी मौत है.

(अगर आप किसी ऐसे व्यक्ति को जानते हैं– दोस्त या परिजन– जो मानसिक रूप से परेशान हैं और आत्महत्या का जोखिम है, तो कृपया उनसे संपर्क करें. सुसाइड प्रिवेंशन इंडिया फाउंडेशन के पास उन फोन नंबरों की एक सूची है जिन पर कॉल करके वे गोपनीयता से बात कर सकते हैं. टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज द्वारा संचालित परामर्श सेवा, आईकॉल ने देश भर के चिकित्सकों/थेरेपिस्ट की एक क्राउडसोर्स्ड सूची तैयार की है. आप उन्हें नज़दीकी अस्पताल भी ले जा सकते हैं.)