2025-26 में मनरेगा कार्यदिवसों में गिरावट, रोज़गार के प्रमुख संकेतकों में लगातार कमी दर्ज: रिपोर्ट

नरेगा संघर्ष मोर्चा और लिबटेक द्वारा जारी एक ताजा अध्ययन में यह सामने आया है कि वर्ष 2025-26 के दौरान मनरेगा के दायरे और पहुंच में तेज़ गिरावट दर्ज की गई है. लिबटेक ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि ‘100 दिन का काम पूरा करने वाले परिवारों की संख्या वित्त वर्ष 2024-25 में 0.37 करोड़ से घटकर 2025-26 में 0.22 करोड़ रह गई, जो 40.5% की गिरावट है.’

मनरेगा के तहत तालाब निर्माण कार्य में लगी महिलाएं. (फोटो: यूएन वीमेन/गगनजीत सिंह)

नई दिल्ली: महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) के दायरे और पहुंच में वर्ष 2025-26 के दौरान तेज गिरावट दर्ज की गई है. यह जानकारी 8 मई को नरेगा संघर्ष मोर्चा और लिबटेक द्वारा जारी एक ताजा अध्ययन में सामने आई है.

द हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक, इस अध्ययन में मनरेगा के तहत रोजगार और मजदूरी से जुड़े कई अहम संकेतकों में कमी दर्ज की गई है.

‘वित्त वर्ष 2025-26 में मनरेगा के तहत घटता रोजगार और आय’ शीर्षक वाली 14 पन्नों की इस रिपोर्ट, जिसकी एक प्रति द वायर ने देखी है, में कहा गया है, ‘राष्ट्रीय स्तर पर वित्त वर्ष 2025-26 में मनरेगा के प्रमुख रोजगार संकेतकों में लगातार गिरावट देखी गई. पिछले वर्ष की तुलना में उत्पन्न मानव-दिवसों (पर्सनडेज़) में 21.5% की बड़ी कमी आई है.’ 

इंजीनियरों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और सामाजिक वैज्ञानिकों के समूह लिबटेक ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि ‘100 दिन का काम पूरा करने वाले परिवारों की संख्या वित्त वर्ष 2024-25 में 0.37 करोड़ से घटकर 2025-26 में 0.22 करोड़ रह गई, जो 40.5% की गिरावट है.’

रिपोर्ट के मुताबिक, तमिलनाडु में मानव-दिवसों में सबसे अधिक 42.8% की गिरावट दर्ज की गई. इसके अलावा हरियाणा में 41.7%, हिमाचल प्रदेश में 41% और तेलंगाना में 40.2% की गिरावट देखी गई.

नरेगा संघर्ष मोर्चा और लिबटेक ने अपनी प्रेस विज्ञप्ति में कहा कि आधिकारिक मनरेगा एमआईएस डेटा पर आधारित इस रिपोर्ट में पाया गया कि ‘यह गिरावट भौगोलिक रूप से व्यापक थी. जिन 20 प्रमुख राज्यों का अध्ययन किया गया, उनमें से 15 राज्यों में मानव-दिवसों की संख्या में कमी दर्ज की गई.’

दिसंबर 2025 में ग्रामीण परिवारों को 100 दिन का रोजगार उपलब्ध कराने वाली योजना मनरेगा (महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम), जिसे यूपीए सरकार ने लागू किया था, संसद में निरस्त कर दी गई थी. इसकी जगह लाए गए नए कानून ‘वीबी-जीराम जी बिल’ (विकसित भारत गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण) बिल) की आलोचना इस आधार पर हो रही है कि इसमें योजना चलाने का वित्तीय बोझ राज्यों पर डाल दिया गया है.

द वायर में प्रकाशित अपने एक लेख में लेखक एसएन साहू ने लिखा था कि ‘इस तरह का केंद्रीकृत संचालन, जिसमें पूरी विवेकाधीन शक्ति केंद्र सरकार के पास हो, मनरेगा की मूल भावना और सार को खत्म कर देता है.’

ताजा अध्ययन जारी होने के बाद नरेगा संघर्ष मोर्चा ने केंद्र सरकार से मांग की है कि ‘वीबी-जीराम जी में बदलाव की प्रक्रिया को लेकर नागरिक समाज संगठनों और मजदूर समूहों के साथ संरचित संवाद किया जाए.’

समूह ने यह भी मांग की है कि रोजगार पाने में मजदूरों के सामने आने वाली तकनीकी बाधाओं को हटाया जाए और नई व्यवस्था में पारदर्शिता सुनिश्चित की जाए.