हर 10 में से 4 बच्चे उच्च माध्यमिक शिक्षा पूरी किए बिना ही स्कूल छोड़ देते हैं: नीति आयोग रिपोर्ट

भारतीय स्कूली शिक्षा व्यवस्था को लेकर नीति आयोग द्वारा जारी एक रिपोर्ट में बताया गया है कि माध्यमिक स्तर पर छात्रों को शिक्षा में बनाए रखने के मामले में देश को महत्वपूर्ण चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है. इसके अलावा स्कूलों में बिजली-पानी और शौचालय तक की उचित व्यवस्था नहीं है.

(प्रतीकात्मक फोटो: संतोषी मरकाम/द वायर)

नई दिल्ली: नीति आयोग ने हाल ही में भारत की स्कूली शिक्षा व्यवस्था पर एक महत्वपूर्ण रिपोर्ट जारी की है, जिससे पता चलता है कि माध्यमिक स्तर पर छात्रों को शिक्षा में बनाए रखने के मामले में देश को महत्वपूर्ण चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है.

द हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक, ‘स्कूल एजुकेशन सिस्टम इन इंडिया: टेम्पोरल एनालिसिस एंड पॉलिसी रोडमैप फॉर क्वालिटी एन्हांसमेंट’ शीर्षक वाली इस रिपोर्ट को नीति आयोग के उपाध्यक्ष सुमन बेरी और मुख्य कार्यकारी अधिकारी निधि छिब्बर ने बीते 6 मई 2026 को जारी किया. इसमें शिक्षा तक पहुंच, नामांकन, बुनियादी ढांचा, समानता, समावेशन और सीखने के स्तर जैसे प्रमुख पहलुओं का अध्ययन किया गया है.

रिपोर्ट में स्कूली शिक्षा में उच्च चरणों में आने वाली बड़ी बाधाओं को उजागर किया गया है, साथ ही इसके ‘पिरामिडनुमा’ समस्या पर प्रकाश डाला गया है. आयोग के अनुसार, वर्तमान शिक्षा व्यवस्था एक तीक्ष्ण पिरामिड (sharp pyramid) के समान है, जिसमें 14.71 लाख स्कूल और 24.69 करोड़ छात्र हैं. हालांकि, प्राथमिक स्तर पर स्कूलों की संख्या 7.3 लाख है, जबकि उच्च माध्यमिक स्तर पर यह घटकर 1.64 लाख रह जाती है.

रिपोर्ट से पता चलता है कि शिक्षा व्यवस्था में प्रवेश करने वाले प्रत्येक 10 में से चार बच्चे उच्च माध्यमिक शिक्षा पूरी करने से पहले ही पढ़ाई छोड़ देते हैं. इसके अलावा अखबार ने रिपोर्ट के हवाले से बताया है कि इस संरचनात्मक बिखराव के कारण केवल 5.4% स्कूल ही कक्षा 1 से 12 तक निरंतर शिक्षा प्रदान करते हैं. अधिकांश छात्रों को अपनी आगे की पढ़ाई के लिए कई बार संस्थान बदलना पड़ता है – यह एक ऐसी चुनौती है जो उच्च ड्रॉपआउट दर का कारण बनती है.

इसमें आगे कहा गया है, ‘शिक्षा प्रणाली में प्राथमिक, माध्यमिक और उच्चतर माध्यमिक स्तर के स्कूलों के बीच कोई आपस में कड़ी नहीं होने के चलते छात्रों को महत्वपूर्ण चरणों में अपनी पढ़ाई जारी रखने के लिए बार-बार स्कूल बदलने पड़ते हैं, जिससे छात्रों के स्कूल में बने रहने की दर में और गिरावट आती है और उच्च शिक्षा में आगे बढ़ने की संभावना सीमित हो जाती है.’

बिहार, मेघालय, नगालैंड और असम जैसे राज्यों की हालत खराब

रिपोर्ट बताती है कि प्राइमरी लेवल पर ड्रॉपआउट रेट (स्कूल छोड़ने की दर) केवल 0.3 प्रतिशत है लेकिन 10वीं कक्षा तक आते आते यह आंकड़ा बढ़कर 11.5 प्रतिशत हो जाता है. 11वीं और 12वीं कक्षा में दाखिले का राष्ट्रीय औसत भी महज 58.4 प्रतिशत है.

बिहार, मेघालय, नगालैंड और असम जैसे राज्यों की हालत इस मामले में सबसे ज्यादा खराब है. बताया गया है कि पैसों की कमी, जल्दी काम पर लगने का दबाव और सामाजिक कारणों से बड़ी तादाद में बच्चे 10वीं के बाद पढ़ाई छोड़ने को मजबूर हैं.

इसके अलावा देशभर में लगभग 7,993 स्कूलों में छात्रों का नामांकन शून्य दर्ज किया गया है, जिनमें पश्चिम बंगाल (3,812) और तेलंगाना (2,245) में ऐसे स्कूलों की संख्या सबसे अधिक है.

रिपोर्ट में कहा गया है, ‘हालांकि ये स्कूल प्रशासनिक रिकॉर्ड में सक्रिय दिखते हैं, लेकिन इनमें अब कोई छात्र नहीं पढ़ते हैं. रिकॉर्ड अपडेट न होने के कारण नामांकन शून्य होने के बावजूद, इन स्कूलों को वित्तीय और मानव संसाधन मिलते रहते हैं, जो जमीनी हकीकत और योजना के बीच के अंतर को दर्शाता है.’

रिपोर्ट में इस तथ्य पर भी प्रकाश डाला गया है कि उच्च नामांकन के बावजूद, कक्षा 8 में पढ़ने की दक्षता में गिरावट आई है. जहां 2014 में कक्षा 8 के 74.7% छात्र कक्षा 2 के पाठ को पढ़ सकते थे; वहीं 2024 तक यह आंकड़ा घटकर 71.1% रह गया.

नीति आयोग ने अपनी रिपोर्ट में शिक्षकों की कमी को भी एक बहुत बड़ा मुद्दा बताया है. अकेले बिहार के प्राइमरी स्कूलों में 2 लाखसे ज्यादा पद खाली हैं. वहीं पूरे देश में लगभग 1.04 लाख स्कूल ऐसे हैं जो सिर्फ, एक टीचर के भरोसे चल रहे हैं. ये अकेले टीचर बच्चों को पढ़ाने के साथ साथ मिड डे मील और बाकी प्रशासनिक काम भी देखते हैं.

इसके अलावा शिक्षकों की योग्यता पर भी रिपोर्ट में सवाल उठाए गए हैं. टीईटी या सीटीईटी जैसी शिक्षक पात्रता परीक्षा में सिर्फ 10 से 15 प्रतिशत उम्मीदवार ही 60 प्रतिशत से ज्यादा अंक ला पाते हैं. कई शिक्षकों में तो अपने ही विषय के संबंध में सही ज्ञान नहीं है. साथ ही शिक्षकों का 14 प्रतिशत समय चुनाव और सर्वे जैसे गैर शैक्षणिक गतिविधियों में ही बर्बाद हो जाता है.

स्कूलों में बिजली-पानी और शौचालय तक नहीं

रिपोर्ट में सरकारी स्कूलों की खस्ता हालत को लेकर भी खुलासे किए गए हैं. इसमें बताया गया है कि देश में हजारों स्कूल ऐसे हैं, जहां शिक्षक और प्रयोगशाला तो छोड़िए, बिजली-पानी और शौचालय तक नहीं है.

देश के 98,592 स्कूलों में लड़कियों के लिए शौचालय नहीं हैं, जबकि 61,540 स्कूलों में उपयोग योग्य शौचालय नहीं है.

रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले 10 साल में स्कूलों में बिजली की उपलब्धता 55 प्रतिशत से बढ़कर 91.9 प्रतिशत हुई है, लेकिन अभी भी 1.19 लाख स्कूलों में बिजली की सुविधा नहीं है. करीब 14,505 स्कूलों में पानी, 59,829 स्कूलों में हाथ धोने की सुविधा नहीं है.

आयोग ने इस रिपोर्ट में शिक्षा व्यवस्था से जुड़ी 11 प्रमुख चुनौतियों की पहचान की है और उनके समाधान के लिए 13 व्यापक सिफारिशें दी गई हैं. इनमें स्कूल संरचना में सुधार, बुनियादी ढांचे को मजबूत करना, प्रशासनिक सुधार, शिक्षकों की बेहतर तैनाती और प्रशिक्षण, डिजिटल शिक्षा का विस्तार, समानता और समावेशन को बढ़ावा देना शामिल है.

शैक्षणिक स्तर पर रिपोर्ट में शिक्षण पद्धति और मूल्यांकन प्रणाली में बदलाव, छात्रों के समग्र विकास, व्यावसायिक शिक्षा, प्रारंभिक बाल शिक्षा तथा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस  के उपयोग पर जोर दिया गया है.

रिपोर्ट में इन सिफारिशों को लागू करने के लिए 33 कार्यान्वयन मार्ग भी बताए गए हैं, जिन्हें अल्पकालिक, मध्यम अवधि और दीर्घकालिक योजनाओं में विभाजित किया गया है. साथ ही 125 से अधिक प्रदर्शन संकेतक तय किए गए हैं, जिनके जरिए प्रगति की निगरानी की जाएगी.

नीति आयोग की इस रिपोर्ट में केंद्र, राज्यों और जिलों स्तर पर शिक्षा क्षेत्र में अपनाई गई अच्छी पहलों के उदाहरण भी शामिल किए गए हैं.