नई दिल्ली: कई नगा नागरिक समाज संगठनों ने संयुक्त रूप प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से तत्काल हस्तक्षेप अपील की. उनका आरोप है कि मणिपुर और भारत-म्यांमार सीमा पर सक्रिय कुकी उग्रवादी समूह नगा गांवों पर हमले कर रहे हैं.
खबरों के अनुसार, 9 मई को नई दिल्ली में सौंपे गए एक ज्ञापन में संगठनों ने जारी हिंसा को नगाओं के खिलाफ ‘प्रॉक्सी युद्ध’ बताया और आरोप लगाया कि यह 3 अगस्त 2015 को भारत सरकार और नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालिम (एनएससीएन) के बीच हुए इंडो-नगा फ्रेमवर्क एग्रीमेंट की भावना का उल्लंघन है.
यह ज्ञापन संयुक्त रूप से यूनाइटेड नगा काउंसिल (यूएनसी), नगा वीमेंस यूनियन (एनडब्ल्यूयू) और ऑल नगा स्टूडेंट्स एसोसिएशन, मणिपुर (एएनएसएएम) द्वारा सौंपा गया. इस पर यूएनसी अध्यक्ष एनजी लोरहो, एनडब्ल्यूयू अध्यक्ष सीएच. प्रिसिला थिउमाई और एएनएसएएम अध्यक्ष अंगतेशांग मारिंग के हस्ताक्षर है.
द हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक, केंद्र सरकार से सस्पेंशन ऑफ ऑपरेशंस (एसओओ) व्यवस्था के तहत सक्रिय कुकी सशस्त्र समूहों पर नियंत्रण करने का आग्रह करते हुए संगठनों ने प्रधानमंत्री से इंडो-नगा शांति प्रक्रिया के ‘सम्मानजनक और समावेशी समाधान’ को शीघ्र पूरा कराने में मदद मांगी.
हस्ताक्षरकर्ताओं ने आरोप लगाया कि म्यांमार स्थित कुकी नेशनल आर्मी-बर्मा (केएनए-बी) के उग्रवादियों ने एसओओ समूहों की सहायता से मणिपुर के उखरुल, कामजोंग और अन्य पहाड़ी जिलों में नगा गांवों पर बार-बार हमले किए हैं.
उन्होंने दावा किया कि 7 मई को ज़ेड, चोरो, नामली-वांगली और काका गांवों पर हुए हमले – जिनमें कई घर जला दिए गए और निवासियों को विस्थापित होना पड़ा – सामान्य जातीय संघर्ष नहीं, बल्कि सीमा पार से किया गया सैन्य हमला था.
तीनों संगठनों ने कहा कि ड्रोन, रॉकेट लॉन्चर और अन्य सैन्य स्तर के हथियारों का इस्तेमाल, साथ ही भारत-म्यांमार सीमा पार कर बड़ी संख्या में सशस्त्र उग्रवादियों के प्रवेश की खबरें, एक सुनियोजित विदेशी समर्थन प्राप्त हमले की ओर संकेत करती हैं.
ज्ञापन में सरकार पर 2015 के फ्रेमवर्क एग्रीमेंट की भावना को बनाए रखने में विफल रहने का आरोप लगाया गया. इस समझौते में नगा लोगों के विशिष्ट इतिहास और राजनीतिक अधिकारों को मान्यता दी गई थी.
ज्ञापन में कहा गया कि नगा बस्तियों पर कथित हमलों के बावजूद कुकी उग्रवादी समूहों को लगातार संरक्षण देना शांति प्रक्रिया की विश्वसनीयता और संविधान के अनुच्छेद 355 के तहत राज्यों को बाहरी आक्रमण से बचाने की केंद्र की जिम्मेदारी को कमजोर करता है.
संगठनों ने केंद्र सरकार से मांग की कि वह तत्काल अभियान चलाकर केएनए-बी, पीपुल्स डेमोक्रेटिक फोर्स (म्यांमार का जुंटा-विरोधी समूह) और एसओओ कैडरों को नगा क्षेत्रों से बाहर निकाले; यह सुनिश्चित करे कि कोई भी प्रशासनिक व्यवस्था नगा पैतृक क्षेत्रों को प्रभावित न करे; मणिपुर के राजमार्गों पर निर्बाध आवाजाही बहाल करे; तथा हालिया हमलों और कथित सुरक्षा चूकों की समयबद्ध न्यायिक जांच कराए.
संगठनों ने कहा कि केंद्र सरकार द्वारा ‘कुकी सशस्त्र समूहों का लगातार तुष्टीकरण’ उन लोगों के खिलाफ ‘प्रॉक्सी युद्ध’ के समान है, जिनके साथ उसने ऐतिहासिक फ्रेमवर्क एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर किए थे. उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी से अनुरोध किया कि वे नगाओं के साथ शांति प्रक्रिया को उसके ‘तार्किक और स्वीकार्य’ अंजाम तक पहुंचाने में मदद करें.
उन्होंने कहा, ‘नगा लोगों ने शांति का मार्ग चुना है’, और जोड़ा कि पूर्वी सीमा और भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए एक न्यायसंगत राजनीतिक समाधान जरूरी है.
