चुनाव को ‘अच्छाई बनाम बुराई’ की सरल कथा में बदल देना लोकतंत्र के जटिल विज्ञान का अपमान है

राजनीति की सबसे बड़ी भूल यह है कि वह अक्सर विजय को ही सत्य मान लेती है. जैसे चुनावी मैदान कोई जैविक जंगल हो, जहां जो बच गया वही श्रेष्ठ है, जो गिर गया वही अयोग्य. यह निष्कर्ष जल्दबाज़ी है. प्रकृति में भी जीवित रहना और नैतिक होना एक ही बात नहीं. कोई रणनीति क्षणिक रूप से सफल हो सकती है, लेकिन दीर्घकाल में विनाशकारी सिद्ध हो सकती है.

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'नाज़ी जर्मनी ने भी दिखाया कि चुनावी सफलता और जनसमर्थन किसी राजनीति को नैतिक नहीं बना देते. लोकतांत्रिक रास्तों से उभरी शक्ति भी मनुष्यता-विरोधी हो सकती है, यदि समाज अपनी आलोचनात्मक चेतना खो दे.' (इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रवर्ती/द वायर)

बंगाल के परिणाम ने फिर वही पुराना प्रश्न सामने रख दिया है: क्या जीत अपने-आप अच्छाई और सच्चाई का प्रमाण है और क्या हार अपने-आप किसी विचार, व्यक्ति या दल की नैतिक पराजय? चुनाव सत्ता का रास्ता खोलते हैं; लेकिन वे जम्हूरियत की रूह का एक्स-रे नहीं होते. वे बताते हैं कि किसने संख्या पा ली; वे यह नहीं बताते कि किसने सत्य पा लिया.

रिचर्ड डॉकिन्स ने ‘दॅ सेल्फिश जीन’ की अपनी प्रसिद्ध वैचारिक दुनिया में एक विलक्षण उलटबांसी रखी थी, ‘नाइस गाईज़ फिनिश फ़स्ट. ‘ यह उस लोकप्रिय कहावत का प्रत्युत्तर था, जिसमें कहा जाता है कि ‘ नाइस गाईज़ फिनिश लास्ट ‘ यानी भले लोग अंत में छूट जाते हैं.

पुराने लोगों का तर्क कि ‘अंतत: सत्य की विजय होती है’ या ‘आख़िरकार अच्छे लोग ही अंत तक डटे रहते हैं’ भावुक नैतिकता नहीं था. वे यह नहीं कह रहे थे कि प्रकृति दयालु है या जीवन किसी संत-सभा की तरह चलता है. उनका संकेत अधिक सूक्ष्म था: जीवन के लंबे खेल में, जहां जीव बार-बार मिलते हैं, एक-दूसरे को पहचानते हैं, धोखे को याद रखते हैं और सहयोग को पुरस्कृत करते हैं, वहां भलमनसाहत कई बार मूर्खता नहीं, सबसे परिपक्व रणनीति सिद्ध होती है.

जीव-विज्ञान की उस दुनिया में ‘नाइस’ होने का अर्थ निष्क्रिय होना नहीं है. वह भोलापन नहीं है. वह दंतहीन सदाचार नहीं है. वह एक ऐसी रणनीति है, जो पहले सहयोग करती है, धोखे का उत्तर देती है, लेकिन स्थायी घृणा में नहीं फंसती. गेम थ्योरी की प्रसिद्ध ‘टिट फ़ॉर टैट’ शैली इसी बात को रोचक ढंग से समझाती है. पहले भरोसा करो, धोखा मिले तो जवाब दो, लेकिन अवसर मिले तो फिर सहयोग की ओर लौटो. इसीलिए डॉकिन्स की यह बात राजनीति के लिए भी एक गहरी रूपकात्मक चेतावनी है.

जीवन केवल पंजे और दांत का खेल नहीं है. स्मृति, पारस्परिकता, भरोसा और दीर्घकालिक संबंध भी उतने ही शक्तिशाली तत्व हैं.

राजनीति की सबसे बड़ी भूल यह है कि वह अक्सर विजय को ही सत्य मान लेती है. जैसे चुनावी मैदान कोई जैविक जंगल हो, जहां जो बच गया वही श्रेष्ठ है, जो गिर गया वही अयोग्य. लेकिन डॉकिन्स की दुनिया से ही सीखें तो यह निष्कर्ष जल्दबाज़ी है. प्रकृति में भी जीवित रहना और नैतिक होना एक ही बात नहीं. कोई रणनीति क्षणिक रूप से सफल हो सकती है, लेकिन दीर्घकाल में विनाशकारी सिद्ध हो सकती है. कोई आक्रामकता तत्काल लाभ दे सकती है, लेकिन समुदाय के भरोसे को नष्ट कर सकती है. कोई छल पहली बाज़ी जीत सकता है, लेकिन बार-बार खेले जाने वाले खेल में अपनी विश्वसनीयता खो देता है. यहीं से राजनीति का मूल प्रश्न शुरू होता है: क्या चुनाव जीतना अच्छाई की गारंटी है? नहीं.

चुनाव जीतना यह बताता है कि किसी दल, नेता या विचार ने किसी विशेष समय में उपलब्ध संसाधनों, सामाजिक समीकरणों, संगठन, प्रचार, नेतृत्व-छवि, भावनात्मक माहौल और चुनावी व्यवस्था को अपने पक्ष में कर लिया. यह बड़ी राजनीतिक उपलब्धि हो सकती है. इसे कम करके नहीं आंकना चाहिए. लेकिन यह नैतिक श्रेष्ठता का प्रमाणपत्र नहीं है.

और इसी का उलटा भी उतना ही सच है: हार का अर्थ यह नहीं कि हारने वाला बुरा ही था. कई बार हार केवल यह बताती है कि विचार अपने समय से आगे था, संगठन कमजोर था, संदेश सही भाषा में नहीं पहुंचा, संसाधन कम थे या जनता उस क्षण किसी दूसरे भाव से संचालित थी.

राजनीति में अच्छे लोग हारते हैं, बुरे लोग जीतते हैं; और कई बार इसके विपरीत भी होता है. इसलिए किसी भी चुनाव को ‘अच्छाई बनाम बुराई’ की सरल कथा में बदल देना लोकतंत्र के जटिल विज्ञान और समाजशास्त्र का अपमान है. चुनाव परिणाम नहीं, प्रक्रिया का फल होते हैं. उसमें जाति होती है, धर्म होता है, क्षेत्र होता है, वर्ग होता है, उम्मीदवार की स्थानीय पकड़ होती है, बूथ-प्रबंधन होता है, मीडिया-कथा होती है, लाभार्थी मनोविज्ञान होता है, भय होता है, उम्मीद होती है, नाराज़गी होती है, और कभी-कभी गहरी थकान भी होती है.

मतदाता केवल नीति-पत्र पढ़कर मतदान नहीं करता. वह अपनी स्मृति, भूख, जातीय पहचान, धार्मिक चेतना, रोज़गार की चिंता, स्थानीय नेता की उपलब्धता, घर की चर्चा, मोहल्ले की हवा और टीवी स्क्रीन की चमक के साथ मतदान केंद्र तक पहुंचता है. इसलिए किसी की जीत को ईश्वरीय स्वीकृति और किसी की हार को नैतिक दंड मान लेना खतरनाक है.

लोकतंत्र में जीत वैधता देती है; वह शासन का अवसर देती है. लेकिन जीत किसी को सर्वज्ञ नहीं बनाती. वह आलोचना से मुक्ति नहीं देती. वह संविधान से ऊपर नहीं उठाती. वह यह अधिकार नहीं देती कि विजेता कहे, चूंकि जनता ने मुझे चुना है, इसलिए अब मेरे हर निर्णय में न्याय है. इतिहास ऐसे भ्रमों से भरा पड़ा है. एथेंस ने सुकरात को दंडित किया था. बहुमत था, प्रक्रिया थी, निर्णय था.

लेकिन क्या इससे सुकरात झूठे सिद्ध हो गए? नहीं. इतिहास ने बाद में बहुमत की उस बेचैनी को समझा और सुकरात को प्रश्न पूछने की मानवीय गरिमा का प्रतीक माना.

नाज़ी जर्मनी ने भी दिखाया कि चुनावी सफलता और जनसमर्थन किसी राजनीति को नैतिक नहीं बना देते. लोकतांत्रिक रास्तों से उभरी शक्ति भी मनुष्यता-विरोधी हो सकती है, यदि समाज अपनी आलोचनात्मक चेतना खो दे. विंस्टन चर्चिल ने युद्धकाल में ब्रिटेन का नेतृत्व किया, लेकिन युद्ध के बाद चुनाव हार गए. क्या इससे उनका ऐतिहासिक महत्व समाप्त हो गया? नहीं.

अब्राहम लिंकन ने अपने राजनीतिक जीवन में कई हारें देखीं. क्या उन हारों ने उन्हें छोटा कर दिया? नहीं. डॉ. भीमराव आंबेडकर चुनाव हारे, लेकिन भारतीय संविधान, सामाजिक न्याय, प्रतिनिधित्व और नागरिक गरिमा पर उनका प्रभाव अनगिनत विजेताओं से कहीं बड़ा सिद्ध हुआ. महात्मा गांधी आधुनिक अर्थ में सत्ता-चुनाव जीतने वाले नेता नहीं थे, लेकिन नैतिक राजनीति की ऐसी शक्ति बने कि साम्राज्य की लोहे की संरचना तक कांप गई. यही इतिहास की धीमी अदालत है.

चुनाव जल्दी फैसला देते हैं; इतिहास देर से. मतगणना रात में होती है; नैतिक मूल्यांकन पीढ़ियों में. चुनाव बताते हैं कि किसे सीट मिली. इतिहास पूछता है, उस सीट पर बैठकर आपने मनुष्य के साथ क्या किया?

लोकतंत्र को इसलिए केवल चुनाव तक सीमित कर देना उसकी आत्मा को छोटा करना है. लोकतंत्र में चुनाव हैं, पर केवल चुनाव नहीं. उसमें संविधान है, स्वतंत्र संस्थाएं हैं, न्यायपालिका है, प्रेस है, नागरिक अधिकार हैं, अल्पसंख्यकों की सुरक्षा है, असहमति का सम्मान है, और सत्ता की सीमा है. अगर चुनाव जीतकर कोई इन सबको अपने जनादेश के नीचे कुचलना चाहे तो वह लोकतंत्र की देह का उपयोग करके उसकी आत्मा को घायल करता है.

लोकतंत्र में संख्या दरवाज़ा खोलती है, लेकिन न्याय उस घर को रहने योग्य बनाता है. केवल बहुमत से सरकार बनती है; संवैधानिक मर्यादा, करुणा और न्याय से गणराज्य बनता है.

‘नाइस गाइज फिनिश फ़र्स्ट’ को इसलिए राजनीति में भावुक नारा नहीं, बल्कि दीर्घकालिक नैतिक विज्ञान की तरह समझना चाहिए. अच्छे लोग हमेशा चुनाव नहीं जीतते. कई बार वे हारते हैं. कई बार उन्हें कुचला जाता है. कई बार उनका मज़ाक उड़ाया जाता है. लेकिन यदि उनका विचार न्याय, गरिमा, स्वतंत्रता और मनुष्यता को आगे बढ़ाता है, तो वे सत्ता की दौड़ हारकर भी इतिहास की लंबी दौड़ में आगे निकल सकते हैं.

दूसरी ओर, जो राजनीति केवल जीतना जानती है, पर भरोसा नष्ट करती है; जो केवल विरोधी को हराना जानती है, पर समाज को जोड़ना नहीं; जो केवल भीड़ जुटाना जानती है, पर नागरिक बनाना नहीं; जो केवल नारों से जनादेश लेती है, पर न्याय से उसका निर्वाह नहीं करती- वह चुनाव जीतकर भी भीतर से हारना शुरू कर देती है.

उसकी हार तुरंत नहीं दिखती. वह संस्थाओं के क्षरण में दिखती है, संवाद की मृत्यु में दिखती है, नागरिकों के डर में दिखती है और इतिहास की ठंडी नोटबुक में धीरे-धीरे दर्ज होती है.

इसलिए बंगाल हो या कोई और प्रदेश, भारत हो या अमेरिका, प्राचीन एथेंस हो या आधुनिक संसद- हर चुनाव के बाद नागरिक का पहला कर्तव्य परिणाम स्वीकार करना है, और दूसरा कर्तव्य उस परिणाम की पूजा करने से इनकार करना है.

विजेता को शासन का अवसर मिला है, सत्य पर एकाधिकार नहीं. पराजित को आत्मालोचना करनी चाहिए, आत्महत्या नहीं. जनता ने आज जिसे चुना है, वह कल बदला भी जा सकता है. यही लोकतंत्र की सुंदरता है कि वह विजेता को भी अस्थायी रखता है और पराजित को भी वापस आने का अधिकार देता है. अंततः राजनीति में ‘फ़र्स्ट’ कौन आता है, यह केवल मतगणना नहीं तय करती.

अगर ऐसा होता तो इतिहास में सारे विजेता देवता और सारे पराजित अपराधी होते. पर इतिहास इससे अधिक बुद्धिमान है. वह देखता है कि किसने सत्ता पाकर मनुष्य को छोटा किया और किसने हारकर भी मनुष्य की गरिमा बचाए रखी. वह देखता है कि किसने संख्या को अहंकार बनाया और किसने पराजय को विचार में बदला. वह देखता है कि किसने भीड़ बनाई और किसने नागरिक बनाए.

जीत अच्छी हो सकती है, पर हर जीत अच्छाई नहीं. हार बुरी हो सकती है, पर हर हार बुराई नहीं. चुनाव सत्ता तय करते हैं; लेकिन इतिहास, न्याय और मनुष्यता मिलकर तय करते हैं कि कौन सचमुच जीता था. यही लोकतंत्र का सबसे कठिन, सबसे सुंदर और सबसे जरूरी पाठ है.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)