नेपाल में सर्वसत्तावाद की ओर उन्मुख ‘हुकुमी सरकार’

डेढ़ महीने के कार्यकाल में बालेन शाह सरकार की प्रवृत्तियां नेपाल में सत्ता के अत्यधिक केंद्रीकरण, संवैधानिक संस्थाओं पर नियंत्रण, लोकतंत्र और सार्वजनिक बहस-विमर्श पर अंकुश, सेना की बढ़ती भूमिका, स्थानीय व राज्य सरकारों के अधिकार क्षेत्र में दख़ल, एकेडमिक आज़ादी में हस्तक्षेप की ओर दिख रही हैं. इससे लोकतंत्र, इंसाफ़ और सामाजिक न्याय की ताक़तों में सरकार के प्रति गंभीर संदेह उत्पन्न हो रहा है.

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बालेंद्र शाह. (फोटो: पीटीआई)

नेपाल में डेढ़ महीने पहले प्रचंड बहुमत लेकर सत्ता में आई राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी के कामकाज सवाल के घेरे में आ गए हैं. काठमांडू में बेघरों की बस्तियों को सेना-पुलिस लगाकर बुलडोजर से उजाड़ने, संसद का सत्र टालकर आठ अध्यादेशों के जरिए शक्तियों के केंद्रीकरण, वरिष्ठता की अनदेखी कर सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश का चयन और श्रमिक संगठनों और छात्र संगठनों पर रोक के इरादे से लोगों के अंदर ‘हुकुमी शासन’ का भय होने लगा है.

जेन ज़ी आंदोलन के बाद मार्च के पहले सप्ताह में हुए चुनाव में महज चार वर्ष पहले बनी राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (रास्वपा) को शानदार जीत हासिल हुई. पार्टी अध्यक्ष रवि लामिछाने और प्रधानमंत्री पद के चेहरे काठमांडू के मेयर बालेंद्र शाह की अगुवाई में पार्टी ने 275 सदस्यीय प्रतिनिधि सभा में 182 सीट जीत ली. रास्वपा ने 125 सीट प्रत्यक्ष निर्वाचन से और 57 सीट समानुपातिक प्रतिनिधित्व के जरिए हासिल की.

चुनाव से पहले विभाजित हुए नेपाली कांग्रेस को 38, नेकपा एमाले को 25, नेकपा पूर्व में नेकपा माओवादी को 17 सीट मिली. चुनाव पूर्व बनी धरान के मेयर हार्क संपांग की पार्टी श्रम संस्कृति पार्टी को सात और राजा समर्थक राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी पांच सीट जीतने में कामयाब रही. एक स्थान पर निर्दलीय प्रत्याशी चुनाव जीता.

वाम का विकल्प रास्वपा और रवि लामिछाने

नेपाल के संसदीय चुनाव के 67 वर्ष के इतिहास में इस चुनाव में वाम दलों का सबसे कमजोर प्रदर्शन देखने को मिला. सभी वाम दलों को करीब 21.9 फीसदी मत मिले. नेपाल में कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना 76 वर्ष पहले हुई थी. पहले आम चुनाव में पार्टी ने 7.2 फीसदी वोट प्राप्त करते हुए चार सीट जीती थी. इसके बाद वाम दल आगे ही बढ़ते रहे. उन्हें नेपाल में राजशाही का खात्मा कर गणतंत्र स्थापित करने का श्रेय जाता है. उन्होंने नेपाल को निर्वाचित संविधान सभा के जरिए नया संविधान दिया जिसके जरिए नेपाल ‘ धर्मनिरपेक्ष, समाजवाद उन्मुख, संघीय लोकतांत्रिक गणराज्य ’ बना.

पहले और दूसरे संविधान सभा के चुनाव में जनता ने दोनों बड़े वाम दलों नेकपा एमाले और नेकपा माओवादी को विपुल समर्थन दिया लेकिन संविधान बनने और लागू होने के बाद वाम दल नेपाली जनता की अपेक्षा के अनुरूप नया नेपाल नहीं बना पाए. उल्टे उन्होंने येन केन सत्ता में रहने के लिए हर तिकड़म किए, भ्रष्टाचार को पनपने दिया. पिछले दो दशक से लगातार सत्ता में बने रहने के बावजूद वाम दल नेपाली जनता के उम्मीदों के अनुरूप बदलाव लाने में विफल रहे.

नेपाल में रास्वपा की जीत को सभी पुराने दलों से नाराज और निराश लोगों द्वारा नए विकल्प की तलाश के तौर पर देखा गया.

सत्ता में आई रास्वपा 2022 में बनी थी. टेलीविजन पत्रकार रवि लामिछाने ने इसकी स्थापना की. रवि लामिछाने वर्ष 2013 में न्यूज 24 में लगातार 62 घंटे का टॉक शो प्रसारित करने की वजह से चर्चा में आए थे.

पिछले चुनाव में इस पार्टी को प्रतिनिधि सभा में 21 सीटें मिल गई. रवि लामिछाने प्रचंड सरकार में उपप्रधानमंत्री और गृहमंत्री बन गए. लेकिन उन्हें अमेरिका और नेपाल की एक साथ नागरिकता रखने का आरोप लगा और सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उन्होंने उचित प्रक्रिया का पालन किए बिना नेपाल की नागरिकता प्राप्त की है. सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें सभी पदों से हटाने का आदेश दिया.

नेपाल की नागरिकता फिर से प्राप्त कर वह दुबारा चुनाव लड़े और जीत कर सांसद बने. वे फिर कई तरह के विवादों में घिर गए. उन पर एक पत्रकार को आत्महत्या के लिए उकसाने का आरोप लगा. उन्हें कई को-ऑपरेटिव समितियों के ऋण गबन और मनी लॉन्ड्रिंग के केस में अप्रैल 2025 में जेल जाना पड़ा. यह केस आज भी विचाराधीन है.

जेन ज़ी आंदोलन के दौरान बिना रिहाई के वह नक्खू जेल से निकलकर घर आ गए थे. व्यापक आलोचना के बाद वे फिर जेल चले गए.

चुनाव की घोषणा के बाद उन्हें जमानत मिल गई और उन्होंने काठमांडू के मेयर बालेंद्र शाह (बालेन शाह) से चुनावी समझौता किया. उन्होंने बालेंद्र शाह को प्रधानमंत्री पद का चेहरा घोषित किया.

बालेन शाह (चश्मे में) के साथ चुनाव प्रचार के दौरान रवि (बाएं , स्लेटी कमीज़ में). (फोटो: पीटीआई)

बालेन शाह की राजनीति

बालेंद्र शाह ने भारत में स्ट्रक्चरल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की. रैपर गायक के रूप में उन्हें खूब लोकप्रियता मिली. वर्ष 2022 के स्थानीय चुनाव में वे काठमांडू से स्वतंत्र उम्मीदवार के बतौर मेयर का चुनाव लड़े और विजयी हुए. मेयर रहते हुए उनकी लोकप्रियता में और इजाफा हुआ हालांकि इस दौरान गरीब फुटपाथियों और अतिक्रमण के नाम पर झुग्गियों को हटाने को लेकर उनके कठोर रवैए की आलोचना भी हुई.

बालेंद्र शाह ने चुनाव में अपनी मधेशी पहचान को आगे किया जबकि इसके पहले वह कभी भी मधेशियों के लिए न तो कुछ कहा न उनके आंदोलन में शिरकत की. उन्होंने चुनाव अभियान की शुरुआत जनकपुर धाम के दर्शन से की और पूरे चुनाव में मठ-मंदिरों के दर्शन कर अपनी खास धार्मिक रुझानों को प्रदर्शित किया. प्रधानमंत्री पद के शपथ ग्रहण में 108 बटुकों और 16 बौद्ध लामाओं की उपस्थिति में धार्मिक अनुष्ठान हुए लेकिन इस्लाम, ईसाई धर्म व अन्य मतावलंबियों को इससे दूर रखा गया. यह भी उनके आगे की राजनीतिक दिशा की एक झलक थी.

चुनाव में बालेंद्र शाह ने पूर्व प्रधानमंत्री केपी ओली के खिलाफ उनके क्षेत्र झापा से चुनाव लड़ा और वे विजयी हुए. रास्वपा के अध्यक्ष रवि लामिछाने अपनी पुराने क्षेत्र चितवन-2 से चुनाव लड़े और जीते.

बालेंद्र शाह का रैपर से मेयर और फिर प्रधानमंत्री पद तक पहुंचना एक चमत्कारिक घटना की तरह दिखती है लेकिन अब प्रधानमंत्री के बतौर फैसले से उनके विचार तो सामने आ ही रहे हैं, उन्हें समर्थन दे रही शाक्तियों के चेहरे भी खुलने लगे हैं.

9 सितंबर, 2025 को सरकार विरोधी प्रदर्शनों के दौरान प्रदर्शनकारियों द्वारा आग लगाए जाने के बाद नेपाल के संसद परिसर से उठता धुआं. (फोटो: पीटीआई)

बालेंद्र शाह ने जेन ज़ी आंदोलन का समर्थन किया लेकिन आंदोलन में वे कहीं नहीं दिखे. तोड़फोड़ व आगजनी के दौरान भी वे निष्क्रिय बने रहे. उन्होंने शांति की अपील तो की, लेकिन धू धू जल रहे संसद भवन, सुप्रीम कोर्ट, सिंह दरबार की आग बुझाने के लिए काठमांडू नगर महापालिका के दमकल को नहीं भेजा. उन्होंने जेन ज़ी आंदोलनकारियों के सेनाध्यक्ष से बातचीत का समर्थन किया और संसद के विघटन की मांग पर अड़े रहने के लिए प्रोत्साहित किया. अंतरिम सरकार के मुखिया के बतौर सुशीला कार्की उनकी पसंद थी.

इस दौरान वह खुलकर सामने नहीं आए लेकिन जेन ज़ी आंदोलन के बाद अंतरिम सरकार का गठन से लेकर चुनाव तक वैसा ही हुआ जैसा वह चाहते थे. उन्हें राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी ने प्रधानमंत्री पद का चेहरा बना दिया. चर्चा है कि रास्वपा अध्यक्ष रवि लामिछाने और बालेंद्र शाह के बीच सात सूत्री समझौते के पीछे सेना की भूमिका महत्वपूर्ण रही.

हिंदुत्व की छाप

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) नेपाल में हिंदू स्वयंसेवक संघ के नाम से काम करता है. हिंदू स्वयंसेवक संघ से करीबी रूप से जुडे़ कुमार बेन (कुमार व्यञ्जनकार) प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह के मुख्य सलाहकार बनाए गए हैं. हिंदू स्वयंसेवक संघ से जुड़ा एक संगठन जेन ज़ी आंदोलन में सक्रिय रहा है. हिंदू स्वयंसेवक संघ से जुड़े एक और संगठन ‘नेपाल प्रथम राष्ट्रीय अभियान’ ने चुनाव के दौरान सभी दलों के चुनावी घोषणा पत्र पर चर्चा आयोजित की और अपनी तरफ से प्रतिबद्धता पत्र देकर उसे लागू करने की मांग की.

प्रतिबद्धता पत्र में इतिहास से वर्तमान तक नेपाल के निर्माण में गौरवशाली, ऐतिहासिक योगदान देने वाले महापुरुषों, वीर योद्धाओं, आध्यात्मिक व सामाजिक व्यक्तित्व को उच्च सम्मान देने, संतुलित विदेश नीति अपनाने, शिक्षा प्रणाली में समग्र सुधार करने की मांग को प्रमुखता से रखा गया था. इस संगठन की यह भी मांग रही है कि शिक्षा क्षेत्र को दलीय प्रभाव से मुक्त किया जाए.

रास्वपा की सरकार बनने के बाद इस संगठन ने अपने एजेंडे को लागू कराने के लिए शिक्षा मंत्री से भी मुलाकात की है. बालेंद्र सरकार ने अपनी 100 सूत्री एजेंडे में पार्टीगत छात्र संगठनों पर रोक लगाने की मंशा जाहिर की है. यह इरादा नेपाल प्रथम राष्ट्रीय अभियान के मुद्दे से प्रभावित दिखता है. बालेंद्र शाह का स्लोगन ‘नेपाल फर्स्ट, नेपाली फर्स्ट ’ का स्लोगन भी भारत की धुर दक्षिणपंथी राजनीति से उसकी साम्य को दिखाता है.

नेपाल में रास्वपा का उदय तो भारत में आम आदमी पार्टी की उभार की तरह दिखता है लेकिन बालेंद्र सरकार की डेढ़ महीने की कार्यप्रणाली पर भारत के मोदी सरकार की बहुत बड़ी छाप साफ तौर पर दिख रही है.

लोकतंत्र या तानाशाही?

जेन ज़ी आंदोलन में हुए दमन, तोड़फोड़-आगजनी व हिंसा की जांच के लिए पूर्व जज गौरी बहादुर कार्की के नेतृत्व में आयोग बनाया गया था. आयोग की रिपोर्ट को बालेंद्र शाह सरकार ने लागू करने का निर्णय लिया. कमीशन ने तत्कालीन प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली, गृह मंत्री रमेश लेखक और उस समय के आईजीपी के खिलाफ जांच कर कार्यवाही करने की संस्तुति की थी. इसके अलावा आंदोलनकारियों के दमन के लिए सुरक्षा अधिकारियों, सुरक्षाकर्मियों और नेपाली सेना के उन अफसरों के खिलाफ कार्यवाही की सिफारिश की थी जिन्हें सिंह दरबार, संसद भवन आदि की सुरक्षा में तैनात किया गया था.

नई सरकार ने आनन-फानन में सिर्फ पूर्व प्रधानमंत्री और पूर्व गृह मंत्री के खिलाफ पूरी प्रक्रिया पूरी किए बिना गिरफ्तार किया लेकिन अफसरों के खिलाफ कार्यवाही में रुचि नहीं दिखाई. जेन ज़ी आंदोलन के बाद हुई व्यापक तोड़फोड़, आगजनी व हिंसा के जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्यवाही में भी वह कोई तेजी नहीं दिखा रही है.

पीएम द्वारा आधी रात को काठमांडू के थापथली सहित कई झुग्गी झोपड़ियों को बुलडोजर लगाकर उजाड़ देने की कार्यवाही भारत में चल रहे बुलडोजर राज की तरह की ही शुरुआत है बल्कि इससे भी कहीं अधिक खतरनाक है. इसलिए कि भूमिहीनों की झुग्गियों को उजाड़ने के लिए पुलिस के साथ-साथ सेना का भी इस्तेमाल किया गया.

यह निर्णय अकेले प्रधानमंत्री बालेन शाह का था और उनकी सरकार और पार्टी को भी इसकी जानकारी नहीं थी. सरकार और पार्टी के प्रवक्ता इस बारे में कुछ भी बता पाने की स्थिति में नहीं थे.

भूमिहीनों की झुग्गियों को उजाड़ने का निर्णय नेपाल में लोकतंत्र दिवस के एक दिन पहले लिया गया. इससे सरकार की लोकतंत्र के प्रति प्रतिबद्धता का पता चलता है. यही नहीं जब सरकार की इस कार्यवाही की व्यापक आलोचना हुई तो सेना और सरकार की ओर से इस बारे में आ रही खबरों को भ्रामक सामग्री बताते हुए चेतावनी जारी की गई कि ‘अव्यवस्थित और अराजक गतिविधियों की निगरानी की जा रही है और ऐसे लोग कानून के दायरे में लाए जाएंगे.’

काठमांडू की झुग्गियों से बेदखल करने की क्रूर कार्यवाही में दो व्यक्तियों की जान भी गई है. बेदखल किए गए भूमिहीनों को होल्डिंग सेंटर में रखा गया है जहां की रिपोर्टिंग करने पर भी रोक लगाई गई है.

अप्रैल के आखिरी सप्ताह में काठमांडू की एक झुग्गी बस्ती में ध्वस्तीकरण कार्रवाई. (फोटो साभार: रातोपाती)

किया था आवास देने का वादा

रास्वपा ने अपने चुनाव घोषणापत्र में भूमिहीन दलितों, बेघरों की पहचान कर उन्हें घर देने का वादा किया था लेकिन ठीक उल्टा काठमांडू के बाद पूरे देश में भूमिहीनों और बेघरों की बस्तियों को उजाड़ने की धमकी दी जा रही है. काठमांडू के बाद सेना की ओर से कई स्थानों पर प्रशासन ने अवैध झुग्गियों-बस्तियों के बारे में जानकारी मांगी गई है.

यह कार्यवाही स्थानीय नगर व महानगर पालिकाओं के अधिकारों की अवहेलना कर संचालित की जा रही है. यहां तक कि लैंड प्राब्लम रेजोल्यूशन कमीशन के कामकाज में भी दखलंदाजी की जा रही है. आयोग के अनुसार नेपाल में 98502 भूमिहीन दलित, 180293 भूमिहीन कब्जेदार और 930790 असंगठित बस्तियां हैं.

काठमांडू में भूमिहीनों की झुग्गियों को उजाड़ने की कार्यवाही का एशियन डेवलपमेंट बैंक (एडीबी) का कनेक्शन भी सामने आया है. एडीबी ने बागमती नदी बेसिन सुधार प्रोजेक्ट को वित्तपोषित किया है और परियोजना के लिए नदी किनारे की इन बस्तियों को हटाने के लिए लगातार जोर दिया जा रहा था.

काठमांडू का मेयर रहते हुए बालेन शाह ने इन बस्तियों पर बुलडोजर चलाने का प्रयास किया था लेकिन व्यापक विरोध के चलते वह सफल नहीं हो पाए लेकिन प्रधानमंत्री बनते ही उन्होंने इसे सेना-पुलिस और बंदूक के दम कर लिया.

भूमिहीनों और बेघरों के खिलाफ इस कार्यवाही की जोरदार भर्त्सना हुई है. लेखकों-कलाकारों ने भी प्रतिरोध जताया है. नेपाल के सम्मानित कवि विनोद विक्रम केसी ने आधी रात की बुलडोजर कार्यवाही पर ‘उठी बास’ शीर्षक मार्मिक कविता लिखी. इस कविता को गायक अंजन बाबू ने गाया जो पूरे देश में खूब देखा-सुना जा रहा है.

जन्मेपछि यो धर्तीमा मेरो पनि निस्सा हुन्छ
एक मुट्ठी माटोमा सुन मेरो पनि हिस्सा हुन्छ
डोजर लगाई जरै किन नखनून
मेरो पनि अस्तित्वको किस्सा हुन्छ
हाम्रै हातले बनाएका हुन्छ बिल्डिङ ठूलठूला
खाली पेट रित्ता आङ उदास हाम्रा चुला
छोरी जन्मी छोरो जन्म्यो यही किनारमा
दुनियाँ मेरो भन्नु केवल यही सेरोफेरो
मध्यरातमा थाङ्ना भोटा फालिदिने को हो
सास्ती दिने घाती कदम चालिदिने को हो
दुःखको गुणन आँसुको भागा हिसाबकिताब
राख्नेछौ हामी एक एक घाउ छामी छामी.

(पैदा होने के बाद, इस धरती पर मेरी भी एक जगह है
एक मुट्ठी मुट्ठी में मेरा भी हिस्सा है
तुम बुलडोजर से हमारी जड़ क्यों खोद रहे हो
यहां मेरा भी अस्तित्व है
मैंने अपने हाथों से तमाम इमारतें बनायी हैं
मेरा पेट खाली है, आंखे रिक्त हैं, चूल्हा उदास है
इसी नदी किनारे मेरी बेटी और बेटे का जन्म हुआ
मेरी दुनिया बस इसी के आस-पास है
घोर अंधेरी आधी रात में कुर्ता, बिछौना फेंकने वाला कौन है?
हमें रौंदने वाले घाती कदम किसके हैं?
दुखों का गुणन, आंसुओं का हिसाब रखेंगे
एक-एक जख्म सहेजकर रखेंगे)

शाह, संसद और मुख्य न्यायाधीश

भूमिहीनों और बेघरों के खिलाफ सरकार की कार्यवाही संविधान के आर्टिकल 37, 40 और 42 का उल्लंघन भी लेकिन बालेन सरकार को इसकी कोई परवाह नहीं. पूर्व की सरकारों की निर्मम आलोचना करने वाले बालेन शाह प्रधानमंत्री बनते ही वह सब करने लगे हैं जिसकी वह आलोचना करते थे. वे संसद को भी दरकिनार करने लगे हैं.

आठ अप्रैल को अधिसूचना जारी की गई कि 17 अप्रैल से संसद का सत्र शुरू होगा लेकिन दो दिन बाद ही संसद सत्र का अधिवेशन टाल दिया गया. इसके बाद एक-एक कर आठ अध्यादेश राष्ट्रपति को जारी करने के लिए भेजे गए. इनमें संवैधानिक परिषद द्वारा अध्यक्ष सहित चार सदस्यों की उपस्थिति पर कोरम पूरा माने जाने और मौजूदा सदस्यों के बहुमत से फैसला लेने वाला अध्यादेश भी शामिल था.

राष्ट्रपति ने इस अध्यादेश को पुनर्विचार के लिए वापस कर दिया लेकिन कैबिनेट ने इसे हूबहू लागू करने के लिए फिर से राष्ट्रपति को भेज दिया. राष्ट्रपति के पास इसे जारी करने के अलावा कोई विकल्प नहीं था.

संवैधानिक परिषद नेपाल के संवैधानिक संस्थाओं की नियुक्ति करता है और इसमें प्रधानमंत्री, विपक्षी दल का नेता, सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश प्रतिनिधि सभा के स्पीकर, डिप्टी स्पीकर और राष्ट्रीय सभा के स्पीकर होते हैं.

नेपाल में परंपरा के मुताबिक, वरिष्ठतम जज को मुख्य न्यायाधीश बनाया जाता रहा है. नेपाल के न्यायिक इतिहास में सिर्फ एक बार राणा शासनकाल में इसका उल्लंघन हुआ. अब इस परंपरा को तोड़ने के लिए बालेन्द्र शाह का नाम राणा शासन के साथ लिया जाएगा.

संवैधानिक परिषद संबधी आदेश लागू होते ही पीएम शाह ने इसकी बैठक बुलाकर सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के लिए न्यायाधीश मनोज कुमार शर्मा के नाम की सिफारिश कर दी. मनोज कुमार शर्मा वरिष्ठता क्रम में तीन वरिष्ठ न्यायाधीशों के बाद आते है.

डॉ. मनोज कुमार शर्मा. (फोटो साभार: नेपाल सुप्रीम कोर्ट)

परिषद की बैठक में विपक्ष के नेता भीष्मराज आङ्देम्बे और राष्ट्रीय सभा के अध्यक्ष नारायणप्रसाद दाहाल ने मुखालफत की और लिखित विरोध जताया.

इसके बावजूद मनोज कुमार शर्मा को मुख्य न्यायाधीश बनाए जाने की संस्तुति को संसदीय समिति को भेज दिया गया. संसदीय समिति से सहमति मिलने के बाद श्री शर्मा अगले छह वर्ष के लिए मुख्य न्यायाधीश बन जाएंगे.

सरकार ने अपने इस निर्णय के बचाव में कहा है कि उसने परंपरा के अनुपालन के बजाय योग्यता व कार्यक्षमता को तरजीह दी है लेकिन इस निर्णय की तीखी प्रतिक्रिया हुई. विपक्षी दलों सहित हर तबके से इसके विरोध में आवाज उठी है.

पूर्व मुख्य न्यायाधीश व अंतरिम सरकार की प्रधानमंत्री रहीं सुशीला कार्की ने इस फैसले का विरोध करते हुए कहा कि इसके गंभीर परिणाम होंगे.

नेकपा एमाले के महासचिव शंकर पुखरेल ने कहा कि ‘सरकार तीन सीनियर जजों को नजरअंदाज करके मनोज कुमार शर्मा का नाम मुख्य न्यायाधीश के लिए सिफारिश करना कोई आम बात नहीं है. इससे यह साफ संदेश गया है कि सरकार न्यायपालिका को एक स्वतंत्र संस्था के बजाय अपने असर के दायरे में रखने की कोशिश कर रही है. सरकार न्यायपालिका से अपने लिए पक्षधरता चाहती है.’

नेपाली कांग्रेस ने इसे अलोकतांत्रिक और स्वेच्छाचारी कदम बताया है. नेपाल बार एसोसिएशन ने भी विरोध जताया है.

अपने शपथ ग्रहण समारोह में तत्कालीन अंतरिम प्रधानमंत्री सुशीला कार्की के साथ बालेन शाह. (फोटो: पीटीआई)

सवालों के घेरे में शाह शासन

सरकार द्वारा जारी शासकीय सुधार हेतु 100 सूत्री कार्यसूची में डिलीवरी बेस्ड गवर्नेंस, संस्थागत सुधार, निर्वाचन प्रणाली में सुधार के लिए संविधान संशोधन, प्रशासनिक सुधार, पुनर्सरचना, मितव्ययिता, सुशासन, परिवर्तनशीलता, प्राइवेट सेक्टर को प्रोत्साहन व संरक्षण, डिजटलीकरण आदि को करने के प्रति प्रतिबद्धता दिखाई गई है. इस एजेंडा के जरिए सरकार ने ट्रेड यूनियन, छात्र-युवा संगठनों के प्रति नकारात्मकता दिखाई है.

नैतिकता और भ्रष्टाचार के मुद्दे को सर्वोच्च प्राथमिकता बताने वाली रास्वपा सरकार के दो मंत्रियों- गृहमंत्री सधन गुरूंग और श्रम मंत्री दीपक साह को सरकार बनने के 26 दिन के अंदर इस्तीफा देना पड़ा है. सुधन गुरूंग को मनी लॉन्ड्रिंग के केस में जांच का सामना कर रहे व्यापारी दीपक भट्ट से बिजनेस कनेक्शन के प्रमाण सामने आने पर पद छोड़ना पड़ा. इसके पहले श्रम मंत्री दीपक साह को इस्तीफा देना पड़ा था क्योंकि उन्होंने अपनी पत्नी को स्वास्थ्य बीमा बोर्ड में नियुक्ति करायी थी.

डेढ़ महीने के कार्यकाल में बालेन शाह सरकार की प्रवृत्तियां नेपाल में सत्ता के अत्यधिक केंद्रीकरण, संवैधानिक संस्थाओं पर नियंत्रण, लोकतंत्र और सार्वजनिक बहस-विमर्श पर अंकुश, सेना की बढ़ती भूमिका, स्थानीय व राज्य सरकारों के अधिकार क्षेत्र में दखल, एकेडमिक आजादी में दखल की ओर दिख रही हैं. इससे लोकतंत्र, इंसाफ और सामाजिक न्याय की ताकतों में सरकार के प्रति गंभीर संदेह उत्पन्न हो रहा है.

हाल में नेपाल के नागरिक समाज के प्रमुख लोगों द्वारा जारी एक पत्र में बालेन सरकार को सर्वसत्तावाद की ओर उन्मुख ‘हुकुमी सरकार’ की संज्ञा दी गई है.

पत्र में कहा गया है कि ‘सरकार को तुरंत तानाशाही शासन का तरीका बंद करना चाहिए. न्यायालय में दखल बढ़ाने के इरादे से अध्यादेश लाने की कोशिश पर हमारा ध्यान गया है. इसी तरह, फेडरल सरकार का प्रांतीय और लोकल सरकारों के अधिकार क्षेत्र को फेडरलिज्म को नियंत्रित करने का सीधा निर्देश यह दिखाता है कि वह केंद्रीकृत शासन की ओर ले जाने की कोशिश कर रही है. बालेंद्र शाह की लीडरशिप वाली राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी सरकार के हाल के कामों, जिनके पास लगभग दो-तिहाई बहुमत है, ने एक बार फिर नेपाली डेमोक्रेसी के तरीके पर सवाल खड़े कर दिए हैं. बंदूक की नोक पर अवैध बस्तियों में रहने वाले नागरिकों को अचानक बेदखल करना, पार्लियामेंट को बायपास करके आर्डिनेंस के जरिए राज करने की कोशिश, और एसोसिएशन और आर्गनाइजेशन पर बैन लगाने का फैसला यह दिखाता है कि सरकार तानाशाही की ओर बढ़ रही है.’