‘लव जिहाद’ का ज़हर एक समुदाय तक सीमित नहीं, स्त्री की पसंद का कोई मूल्य नहीं

जहां एक तरफ़ हिंदुत्व से जुड़े संगठन और भाजपा सरकारें 'लव जिहाद' के नफ़रती नैरेटिव का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल करके मुस्लिम पुरुषों के ख़िलाफ़ नफ़रत और कभी-कभी हिंसा भड़का रही हैं, वहीं दूसरी तरफ़ इसका असर दूसरे धार्मिक कट्टरपंथी समुदायों- सिख और ईसाई पर भी पड़ रहा है. इन सभी के बीच समानता यह है कि इन्हें भरोसा नहीं है कि संविधान के अनुसार वयस्क महिलाएं अपनी पसंद से साथी चुन सकती हैं और उससे विवाह कर सकती हैं.

(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रवर्ती/द वायर)

(यह लेख ‘लव जिहाद’ के नाम पर हो रही ज़्यादतियों को दर्ज करने वाले चार लेखों की श्रृंखला का दूसरा भाग है. पहला भाग यहां पढ़ें.)

आज के भारत में हिंदुत्व के प्रोजेक्ट में न्यूरेम्बर्ग, जिम क्रो के अमेरिका और रंगभेद वाले दक्षिण अफ्रीका की कई झलकें मिलती हैं. दबदबे वाले समूह (कथित ऊंची जाति के हिंदू) के पुरुष, दबे-कुचले समूहों के पुरुषों को लेकर एक अजीब तरह का यौन भय दिखाते हैं; वे इन पुरुषों को यौन शिकारी के तौर पर पेश करते हैं. इसमें मुस्लिम पुरुष तो शामिल हैं ही, साथ ही दलित पुरुष भी शामिल हैं.

दूसरी ओर, दबदबे वाले समूह की महिलाओं को बेचारी और बेबस मान लिया जाता है, दबे-कुचले समुदाय के पुरुष जिन्हें अपना शिकार बना सकते हैं और अपवित्र कर सकते हैं. उन्हें इस बात की आजादी नहीं दी जाती है कि वे अपने समुदाय के बाहर अपना जीवनसाथी चुन सकें.

भारतीय गणराज्य के निर्माण के दौरान कभी भी पूरी तरह से भारतीय धर्मनिरपेक्षता का पालन नहीं किया गया. शुरू से ही, मगर ख़ास तौर पर 1964 में भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के निधन के बाद, नई दिल्ली और अलग-अलग राज्यों की राजधानियों में बनी सरकारों ने कई मौक़ों पर धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र के संवैधानिक सिद्धांतों के साथ अलग-अलग तरीक़े से समझौता किया है.

लेकिन, इन सब के बावजूद, धर्मनिरपेक्षता की कमज़ोर पड़ चुकी इमारत इन हमलों के सामने टिकी रही. बीते कुछ सालों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में इस पर बेहद गंभीर और ज़ोरदार हमले हुए हैं. कई लोग इस बात से चिंतित हैं कि भारत असल में एक धार्मिक राज्य- एक ‘हिंदू राष्ट्र’- में बदल चुका है, भले ही संविधान की प्रस्तावना में धर्मनिरपेक्ष (और समाजवादी) लोकतंत्र के वादे अब भी मौजूद है.

मोदी के शासन में भारत की धर्मनिरपेक्ष-लोकतांत्रिक इमारत पर हुए हमलों में सबसे अहम है आरएसएस से जुड़े लोगों का एक ज़हरीला अभियान- जिसे केंद्र द्वारा तथा भाजपा-शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों द्वारा बढ़ावा दिया जाता है. इस अभियान में यह आरोप लगाया जाता है कि मुस्लिम पुरुष एक ख़तरनाक ‘लव जिहाद’ चला रहे हैं, जिसका मक़सद भोली-भाली और नासमझ हिंदू महिलाओं को फंसाकर उनके साथ यौन संबंध बनाना और शादी करना है.

नफ़रत से भरा ऐसा दुष्प्रचार किया जाता है कि जो वयस्क महिलाएं मुसलमानों के साथ रिश्ते बनाती हैं वे नासमझ होती हैं और उन्हें किसी बहादुर (हिंदू) पुरुष द्वारा बचाया जाना ज़रूरी है.

अध्ययन बताते हैं कि भारत में लगभग 90 प्रतिशत लोग एक ही शादी कर रहे हैं, अपने से विपरीत लिंग वाले से कर रहे हैं, और ये शादियां उनके परिवार द्वारा अपने ही धर्म और जाति के भीतर कराई जाती हैं. 2 प्रतिशत से भी कम शादियां अलग-अलग धर्मों के बीच होती हैं, और इनमें से भी ज़्यादातर शादियां वयस्क आपसी सहमति से करते हैं.

फिर भी, देश के विभाजन के पहले से ही हिंदुत्ववादी दक्षिणपंथी गुट यौन शिकारी के रूप में मुस्लिम पुरुष की एक भावनात्मक मनगढ़ंत छवि प्रस्तुत करता रहा है, जो मुस्लिम आबादी बढ़ाने के लिए हिंदू महिलाओं को हवस का शिकार बनाता है और उन्हें ‘चुराता’ है. इस मिथक का सबसे नया रूप ‘लव जिहाद’ का व्यापक दुष्प्रचार है.

प्यू रिसर्च सेंटर द्वारा 2019-20 में किए गए एक सर्वेक्षण में एक आशाजनक बात सामने आई: सर्वेक्षण में शामिल 84 प्रतिशत लोगों ने कहा कि ‘सही मायने में भारतीय’ होने के लिए, सभी धर्मों का सम्मान करना बहुत ज़रूरी है. लगभग 80 प्रतिशत भारतीयों ने कहा कि अपने ख़ुद के धार्मिक समुदाय का सदस्य होने के लिए दूसरे धर्मों का सम्मान करना बेहद ज़रूरी है.

(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रवर्ती/द वायर)

फिर भी, हैरानी की बात यह है कि बहुत से भारतीय अंतरधार्मिक शादियों के ख़िलाफ़ पाए गए. मोटे तौर पर दो-तिहाई या 67 प्रतिशत हिंदुओं का मानना था कि महिलाओं को अपने धर्म के बाहर शादी करने से रोकना ज़रूरी है, और 65 प्रतिशत लोग हिंदू पुरुषों के लिए ऐसा ही मानते थे. मुसलमानों के भीतर अंतरधार्मिक शादियों को लेकर विरोध और भी ज़्यादा था. सर्वे के मुताबिक़, मुसलमानों के लिए ये आंकड़े 80 प्रतिशत और 76 प्रतिशत हैं.

प्यू सर्वे के नतीजे मोटे तौर पर इंडिया टुडे के पहले ‘2025 ग्रॉस डोमेस्टिक बिहेवियर सर्वे’ के नतीजों से मेल खाते हैं. इस सर्वे में शामिल 61 प्रतिशत लोगों ने अंतरधार्मिक शादियों का विरोध किया, जबकि 56 प्रतिशत लोग अंतरजातीय शादियों के ख़िलाफ़ थे. बेशक, अलग-अलग राज्यों में अलग तरह के जवाब मिले. उदाहरण के लिए, अंतरधार्मिक शादियों के मामले में केरल के लोग सबसे सहज थे, जहां सर्वे में शामिल 94 लोगों ने इनका समर्थन किया.

लेकिन दक्षिणी भारत के ही राज्य, कर्नाटक, में ही 94 प्रतिशत लोगों ने ऐसी शादियों का विरोध किया. उत्तर प्रदेश में किए गए सर्वे में 84 प्रतिशत लोगों ने अंतरजातीय शादियों का विरोध किया.

लंबे समय से इस देश में उन जोड़ों के लिए रहना ख़तरनाक रहा है, जो दूसरे धर्मों या ‘निचली’ जातियों के लोगों से शादी करने या उनके साथ रहने का फ़ैसला करते हैं. ऐसे सामाजिक बंधनों को तोड़ने वाले पुरुषों और महिलाओं की हत्या उनके अपने ही परिवार वाले कर देते हैं, और इस घटना को ग़लत तरीक़े से ‘ऑनर किलिंग’ (इज़्ज़त के नाम पर हत्या) का नाम दिया गया है.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से जुड़े संगठनों द्वारा ‘लव जिहाद’ का ज़हरीला प्रोपगैंडा फैलाने के बाद से ऐसे जोड़ों के लिए ख़तरा कई गुना बढ़ गया है. यह एक झूठा दावा है कि मुस्लिम पुरुषों को प्रशिक्षित किया जाता है कि वे हिंदू महिलाओं को प्यार और यौन संबंधों के जाल में फंसाकर उनसे शादी कर ले. जिसका मकसद उन्हें इस्लाम में धर्मांतरित करना और एक ‘जनसांख्यिकीय साज़िश’ के तहत बड़ी संख्या में मुस्लिम बच्चे पैदा करना होता है.

मुस्लिम पुरुषों को मासूम और भोली-भाली हिंदू और सिख लड़कियों का शिकार करने वाले ‘यौन शिकारी’ के रूप में पेश करने की यह नफ़रती सोच कोई नई नहीं है: इसकी जड़ें देश के बंटवारे के समय हुए दंगों में ही नहीं, बल्कि उससे भी काफ़ी पहले से दिखाई पड़ती हैं. इतिहासकार चारु गुप्ता इस बात की पुष्टि करती हैं कि भले ही यह शब्द नया हो, लेकिन ‘लव जिहाद’ या मुस्लिम पुरुषों द्वारा हिंदू महिलाओं का शिकार करने का विचार बंटवारे के समय हुई हिंसा से भी कहीं ज़्यादा पुराना है.

1920 के दशक में, मुस्लिम पुरुषों द्वारा हिंदू महिलाओं के कथित ‘अपहरण’ के ख़िलाफ़ एक अभियान चलाया गया था. उस समय भी, हिंदू महिला को एक ऐसे असहाय पीड़ित के रूप में दिखाया जाता था, जो किसी ‘ख़तरनाक’ मुस्लिम पुरुष का शिकार बन गई हो. उस समय भी इस बात को सिरे से नकार दिया गया था कि वह अपनी मर्ज़ी से कोई फ़ैसला ले सकती है- ठीक वैसे ही, जैसे आज भी इस बात को नकारा जाता है.

‘लव जिहाद’ शब्द की शुरुआत 2000 के दशक की शुरुआत में हुई थी. कुछ लोग एक अख़बार की रिपोर्ट को इस शब्द को सबसे पहले इस्तेमाल करने का श्रेय देते हैं. कहा जाता है कि ‘श्री राम सेना’ नाम के एक ‘उपद्रवी’ हिंदुत्व संगठन के नेता प्रमोद मुतालिक ने 2005 के आस-पास ‘लव जिहाद’ शब्द का इस्तेमाल किया था. इसे सबसे पहले तटीय कर्नाटक के ज़िलों – दक्षिण कन्नड़ और उडुपी – में ‘हिंदू जनजागृति समिति’ जैसे अन्य हिंदुत्व संगठनों ने अपनाया, और उसके बाद बजरंग दल तथा आरएसएस ने.

यह दुख की बात है कि जो वयस्क महिलाएं अपने धर्म या जाति की सीमाओं से बाहर जाकर अपना जीवनसाथी चुनने की हिम्मत करती हैं, उन पर उनके परिवारों और समुदायों द्वारा दबाव डाला जाना सामान्य-सी बात है; और इसमें पुलिस, अदालतें और राजनेता भी उनका साथ देते हैं. इन महिलाओं पर दबाव डाला जाता है कि वे अपने दिल की न सुनें बल्कि अपने परिवारों की कट्टर सोच का अनुसरण करें.

उनके पुरुष जीवनसाथियों पर – जो अक्सर ऐसे धर्मों और जातियों से होते हैं जिन्हें समाज में बुरा माना जाता है – अपहरण, बलात्कार और ‘लव जिहाद’ जैसे मनगढ़ंत आरोपों के तहत केस चलाए जाते हैं, और उन्हें अक्सर जेल में डाल दिया जाता है. अगर ये जोड़े इसका विरोध करते हैं तो उनके अपने ही परिवार के पुरुष उनकी हत्या कर सकते हैं, या फिर ग़ुस्से से भरी भीड़ उन्हें पीट-पीटकर मार सकती है.

‘लव जिहाद’ की भावनात्मक नफ़रत भरी अवधारणा इस सदी के शुरुआत में तटीय कर्नाटक और केरल में गढ़ी गई थी. 2013 के बाद पूरे देश में फैले हिंदुत्व संगठनों ने, और नीति-निर्धारक हलक़ों में भाजपा नेताओं (जिनमें मुख्यमंत्री भी शामिल थे) ने इसे तेज़ी से प्रचारित किया. उनका दावा था कि मदरसों में इस तरह के जिहाद के लिए अच्छे दिखने वाले मुस्लिम लड़कों को ख़ास तौर पर चुना जाता है.

उन्हें इस तरह प्रशिक्षित किया जाता है कि वे हिंदू लड़कियों को प्रेम संबंधों में फंसा सकें, और उन्हें ऐसी चीज़ें भी दी जाती हैं जो उन्हें लड़कियों की नज़र में ज़्यादा आकर्षक बनाती हैं- जैसे मोटरसाइकिल, स्मार्टफोन और ख़ूब सारा पैसा. हिंदुत्व की इस मनगढ़ंत कहानी के अनुसार जो मुस्लिम पुरुष हिंदू लड़कियों के साथ रिश्ते बनाते हैं, उनके दिलों में कोई प्यार नहीं होता, वे तो बस हिंदू लड़कियों के साथ एक क्रूर और धूर्ततापूर्ण खेल खेलते हैं.

उन्हें झूठे प्यार के जाल में फंसाते हैं, उनको इस्लाम में धर्मांतरित कराकर उनसे शादी कर लेते हैं. यह बिना प्यार की शादी हिंदू महिलाओं के लिए जीवन भर की तकलीफ़ की वजह बन जाती है.

(प्रतीकात्मक फोटो: पीटीआई)

नफ़रत फैलाने वाला यह मनगढ़ंत दुष्प्रचार यह भी मानकर चलता है कि जो वयस्क हिंदू (और सिख व ईसाई) महिलाएं ऐसे रिश्तों के लिए तैयार होती हैं वे नासमझ और भोली-भाली होती हैं; इसलिए उन्हें हिंदुत्व संगठनों के ‘बहादुर’ और ‘मर्दाना’ कार्यकर्ताओं द्वारा बचाया जाना ज़रूरी है. अगर ये सब बातें इतनी ज़हरीली और ख़तरनाक न होतीं, तो हंसी का पात्र होतीं.

यह मुस्लिम पुरुषों की एक ऐसी रूढ़िवादी छवि गढ़ता है, जिसमें उन्हें धोखेबाज़, चालाक और प्यार से रहित ‘यौन शिकारी’ के रूप में दिखाया जाता है; वहीं हिंदू महिलाओं को कमज़ोर ‘पीड़ित’ के तौर पर पेश किया जाता है- जिनमें अपनी मर्ज़ी से फ़ैसला लेने की कोई क्षमता नहीं होती, जिनमें सही-ग़लत की पहचान करने की कोई समझ नहीं होती, और जिन्हें यह चुनने का कोई अधिकार नहीं होता कि वे अपनी ज़िंदगी किसके साथ बिताना चाहती हैं या वे किस धर्म का पालन करना चाहती हैं.

पत्रकार बेतवा शर्मा और अहमर ख़ान ने इस ज़हरीले हिंदुत्व मिथक के इर्द-गिर्द बुनी गई कुछ झूठी कहानियों को एक साथ दर्ज किया है. इनमें ये दावे शामिल हैं-

‘मुस्लिम पुरुष हिंदू नाम और धार्मिक प्रतीकों का इस्तेमाल करके हिंदू होने का नाटक करते हैं. मुस्लिम महिलाएं हिंदू महिलाओं से दोस्ती करती हैं ताकि उन्हें अपने ‘जिहादी’ भाइयों से मिलवा सकें. मुस्लिम दुकानदार, ख़ासकर जो मोबाइल फोन की दुकान चलाते हैं, इलाके की हिंदू महिलाओं पर नज़र रखते हैं. स्थानीय मस्जिदें युवा पुरुषों को हिंदू महिलाओं का पीछा करने के लिए पैसे देती हैं और उनसे सफलतापूर्वक शादी करने और उनका धर्म परिवर्तन कराने पर उन्हें इनाम देती हैं- जाति जितनी ऊंची होती है, पैसे उतने ही ज़्यादा मिलते हैं. मुस्लिम लोग हिंदू घरों में ड्राइवर और रसोइए के तौर पर नौकरी ढूंढ़ते हैं, अक्सर अपने हिंदू साथियों की तुलना में कम वेतन पर काम करते हैं, ताकि वे परिवार की महिलाओं को अपनी जाल में फंसा सकें.’

नए तथा और भी ज़्यादा अजीब दावे करके इस मिथक को लगातार फैलाया जा रहा है. उदाहरण के लिए, ‘ब्यूटी पार्लर’ जिहाद को लीजिए, जिसमें मुस्लिम पुरुष हिंदू महिलाओं के साथ नज़दीकी संपर्क बनाने के लिए ब्यूटी पार्लरों में नौकरी करते हैं.

इसी तरह ‘मेहंदी’ जिहाद है, जिसमें मुस्लिम पुरुष हिंदू महिलाओं के हाथों पर मेहंदी लगाते हैं, और सबसे हालिया ‘जिम जिहाद’ है, जो जिम को एक और ऐसी जगह के तौर पर दिखाता है जहां मुस्लिम पुरुष हिंदू महिलाओं के के साथ शारीरिक संपर्क बना सकते हैं, और फिर वे महिलाएं उनकी शारीरिक बनावट की वजह से उनकी ओर खिंची चली जाती हैं.

दावे ये भी हैं कि मदरसे, जहां धार्मिक शिक्षा दी जाती है, असल में ऐसी जगह हैं जहां मुस्लिम लड़कों को लव जिहाद की ट्रेनिंग दी जाती है, मोटर साइकिल, मोबाइल फोन और कपड़े जैसी ज़रूरी चीज़ें खरीदने के लिए मुस्लिम युवाओं को पैसे दिए जाते हैं जो खाड़ी देश से आता है, जो हिंदू महिलाओं को आकर्षित करने के लिए ज़रूरी हैं. इन रिश्तों में कभी भी सच्चा प्यार नहीं होता. इसका मक़सद हिंदू पुरुषों से हिंदू महिलाओं की ‘संपत्ति’ छीनना और उनके शरीर का इस्तेमाल करके ढेर सारे मुस्लिम बच्चे पैदा करना होता है.

‘लव जिहाद’ मिथक के कुछ सबसे बढ़ा-चढ़ाकर पेश किए गए संस्करण- जिन्हें ‘केरल फ़ाइल्स’ जैसी फिल्मों के ज़रिए काफ़ी असरदार तरीक़े से फैलाया गया है- ये हैं कि जो महिलाएं शादी के लिए इस्लाम अपनाती हैं, उनका इस्तेमाल बाद में अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी संगठनों में आत्मघाती हमलावर के तौर पर शामिल होने के लिए किया जाता है. यही वजह है कि ‘हिंदुओं को अपने घरों में मुसलमानों को काम पर नहीं रखना चाहिए’ (ऐसी बात सुनते ही न्यूरेम्बर्ग क़ानून की याद आ जाती है, जिसके तहत यहूदी परिवार कम उम्र की आर्यन महिलाओं को अपने घर काम पर नहीं रख सकते थे).

इन बेबुनियाद दावों के मुताबिक, फिर वे ‘स्कूलों, कॉलेजों, बसों, कॉफ़ी शॉप्स, जिम, होटलों, सिनेमा हॉल, अदालतों और स्कूल के बाद ट्यूशन के लिए कोचिंग सेंटरों’ में मुख़बिरों का एक विशाल नेटवर्क बनाते हैं, जो अलग-अलग धर्मों के लोगों के बीच प्रेम संबंधों की रिपोर्ट दे सकें. कई बार, ‘हिंदू अपने ही परिवारों की महिलाओं की मुख़बिरी करते हैं. यहां तक कि कुछ हिंदू समुदायों में शादी करवाने वाले अधिकारी भी महिला के माता-पिता को जानकारी दे देते हैं.’

केबी नीलसन और एजी नीलसन अपनी किताब Love Jihad and the Governance of Gender and Intimacy in Hindu Nationalist Statecraft में उन लक्ष्यों की पहचान करते हैं, जिनकी आज के भारत में हिंदुत्व की राजनीति और राजकाज में ‘लव जिहाद’ की इस्लाम-विरोधी साज़िश में भूमिका है. इसका एक हिस्सा लैंगिक शासन की एक ऐसी व्यवस्था को मज़बूत करना है, जो महिलाओं को सुरक्षा का पात्र समझता है- और विशेष रूप से राज्य और राष्ट्र द्वारा सुरक्षा के पात्र- और यह भारतीय समाज में गहरे तक पैठी पितृसत्तात्मक सोच से मेल खाता है.

दूसरा लक्ष्य, भाजपा-शासित राज्यों में हिंदुत्व के स्वयंभू रक्षकों द्वारा की जाने वाली ग़ैर-क़ानूनी हिंसा को क़ानून का दर्जा देकर उसे वैध ठहराना है. और तीसरा लक्ष्य, मुसलमानों को भारतीय राष्ट्र और उसके बहुसंख्यक हिंदू नागरिकों के दुश्मन के रूप में पेश करना है.

(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रबर्ती/द वायर)

K. Frøystad अपनी किताब Sound Biting Conspiracy: From India with ‘Love Jihad’ में ‘लव जिहाद’ की इस साज़िशी थ्योरी की लोकप्रियता की पड़ताल करते हैं- यह थ्योरी मानती है कि मुस्लिम पुरुष, भारत की धार्मिक बनावट को बदलने और राजनीतिक क़ब्ज़े की रणनीति के तहत, हिंदू महिलाओं को शादी के लिए फंसाने की साज़िश रचते हैं- और यह थ्योरी रूढ़िवादी हिंदुओं के बीच काफ़ी लोकप्रिय है.

सबसे पहले, यह हिंदुओं की दो पुरानी चिंताओं को इकट्ठा कर देती है. पहली चिंता है बेटियां अपने माता-पिता की मर्ज़ी के ख़िलाफ़ शादी कर रही हैं, और दूसरी चिंता धार्मिक बनावट में आ रहे प्रतिकूल बदलावों को लेकर है.

दूसरी बात, कोई भी मुस्लिम पुरुष जो किसी युवा हिंदू महिला की तरफ़ नज़र उठाकर भी देखता है उसके इरादों को एक ख़तरनाक राजनीतिक क़ब्ज़े की साज़िश समझा जाता है.

‘लव जिहाद’ सिर्फ़ हिंदुत्व का ही नैरेटिव नहीं

जहां एक तरफ़ हिंदुत्व से जुड़े संगठन और भाजपा सरकारें ‘लव जिहाद’ के नफ़रती नैरेटिव का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल करके मुस्लिम पुरुषों के ख़िलाफ़ नफ़रत और कभी-कभी हिंसा भड़का रही हैं, वहीं दूसरी तरफ़ इसका असर दूसरे धार्मिक कट्टरपंथी संगठनों पर भी पड़ रहा है – जैसे ईसाई और सिख संगठन.

इस बात पर विवाद है, लेकिन कुछ लोगों का मानना ​​है कि ‘लव जिहाद’ शब्द का इस्तेमाल पहले केरल की बिशप काउंसिल ने किया था. उनका आरोप था कि ईसाई लड़कियां उन मुस्लिम पुरुषों से शादी कर रही हैं जिनके पास खाड़ी देशों से आया हुआ पैसा है.

आर्टिकल 14 की रिपोर्ट के मुताबिक़, दुनिया के दूसरे सबसे बड़े पूर्वी कैथोलिक चर्च, ‘सीरो-मालाबार चर्च’ ने जनवरी 2020 में यह आरोप लगाया था कि 12 ईसाई महिलाओं को ‘लव जिहाद’ के ज़रिए धर्म परिवर्तन करवाकर सीरिया ले जाया गया था. चर्च ने दावा किया कि ‘लव जिहाद’ असल में ‘इस्लामिक स्टेट’ (IS) के एक बड़े एजेंडे का हिस्सा था, जिसका मक़सद ‘केरल की धार्मिक और सामाजिक एकता को ख़तरा पहुंचाना’ था. चर्च के वरिष्ठ पादरियों ने तो इस मुद्दे को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने भी उठाया था.

केरल के अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक ने बताया कि उन्होंने चर्च के आरोपों की विस्तार से जांच की और पाया कि ‘लड़कियां बालिग़ थीं जिन्होंने अपनी मर्ज़ी से शादी करने का फ़ैसला किया था और शादी के लिए किसी भी तरह का कोई ज़ोर-ज़बरदस्ती या दबाव नहीं डाला गया था.’

सिर्फ़ ईसाई पादरियों के एक समूह की ही ऐसी प्रतिक्रिया नहीं थी. 2021 में, सिख नेताओं और शिरोमणि अकाली दल के समर्थकों ने भी यही बात कही थी, जब कुछ वयस्क कश्मीरी सिख औरतों ने मुस्लिम मर्दों से शादी करने और इस्लाम अपनाने का फ़ैसला किया था. पंजाब से शिरोमणि अकाली दल के सिख नेताओं ने इस घटना पर अपना रोष व्यक्त किया और इसे ‘लव जिहाद’ का क्रिमिनल केस बताया. अब सिर्फ़ हिंदू और ईसाई औरतों को ही नहीं, बल्कि उनकी सिख बहनों को भी ‘लव जिहाद’ का शिकार बताया जा रहा था. (यह वाक्य मैंने 2021 में इस विषय पर लिखे अपने लेख से लिया है).

इनमें से एक 18 साल की सिख महिला, मनमीत कौर थी, जिसने इस्लाम अपना लिया और 29 साल के एक मुस्लिम युवक, शाहिद भट से उसकी नज़दीकियां हो गईं. उन्होंने गुपचुप तरीक़े से शादी कर ली– बताया जाता है कि इसे साबित करने के लिए निकाह के दस्तावेज़ भी मौजूद हैं. लेकिन पुलिस ने इस जोड़े का पता लगा लिया और उनके बयान दर्ज करवाने के लिए उन्हें श्रीनगर ज़िला अदालत ले गई. अदालत के बाहर एक हुजूम जमा हो गया, जो ग़ुस्से में था, जिसमें ज़्यादातर सिख पुरुष थे. इस भीड़ में बडगाम और श्रीनगर ज़िला गुरुद्वारा समितियों के अध्यक्ष, संतपाल सिंह और जसपाल सिंह भी शामिल थे. संतपाल ने दावा किया कि वह युवती ‘मानसिक रूप से अस्थिर’ है, और यह कि ‘वह एक सिख है. यह तो बस ‘लव जिहाद’ का एक तरीक़ा है, जिसके ज़रिए धर्मांतरण करवाया जा रहा है.’ भीड़ ने कई घंटों तक अदालत का दरवाज़ा रोके रखा, और यह मांग की कि उस महिला को ‘कम से कम एक हफ़्ते के लिए’ ‘समुदाय को वापस सौंप दिया जाए’ – मानो वह चोरी की गई कोई बेजान चीज़ हो.

यह पता लगाना मुश्किल है कि मनमीत कौर ने कोर्ट में क्या बयान दिया, लेकिन रिपोर्ट्स से पता चलता है कि उन्होंने कहा कि अपनी मर्ज़ी से उन्होंने इस्लाम अपनाया और अपनी मर्ज़ी से भट से शादी की. इस बात के सबूत के तौर पर भट के परिवार के पास उनके दस्तख़त वाले हलफ़नामे भी हैं.

ख़बरों के मुताबिक़, आख़िरकार, जब वह कोर्ट से बाहर निकली को उन्हें भट के परिवार के साथ नहीं जाने दिया गया. बजाय इसके, ‘अंधेरा होने के बाद कथित तौर पर उन्हें घसीटकर एक बड़ी-सी सफ़ेद गाड़ी में डाल दिया गया’. भट को पुलिस हिरासत में ले लिया गया. यह लेख लिखे जाने तक वह जेल में बंद थे.

कई रिपोर्ट्स में बताया गया है कि दो अलग धर्मों के बीच हुई इस शादी को लेकर स्थानीय लोगों में जो ग़ुस्सा भड़का, उसकी वजह शिरोमणि अकाली दल के नेता और दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के प्रमुख मनजिंदर सिंह सिरसा थे.

पहले भारतीय जनता पार्टी में रह चुके सिरसा ने आरोप लगाया कि मनमीत कौर का यह रिश्ता ‘लव जिहाद’ का एक मामला है. उन्होंने दावा किया कि मनमीत कौर को झूठे तरीक़े से ‘बंदूक़ की नोक पर अग़वा किया गया और एक 60 साल के [मुस्लिम] आदमी से शादी करवा दी गई’.

बाद में यह ख़बर आई कि तीन दिन बाद दक्षिणी कश्मीर के पुलवामा के एक गुरुद्वारे में एक सिख व्यक्ति से मनमीत कौर की (दोबारा) शादी करा दी गई. सिरसा ने इस दोबारा शादी को (जिसकी क़ानूनी वैधता पर सवाल उठ सकते हैं, क्योंकि उनका अपने पहले पति से क़ानूनी तौर पर तलाक़ नहीं हुआ था) गुरुद्वारे में इकट्ठा हुए सिख समुदाय द्वारा लिया गया एक फ़ैसला बताकर इसकी ख़ूब तारीफ़ की. बताया जाता है कि दिन-रात गुरुद्वारे में लंगर और गुरुद्वारे की देखरेख में मदद करने वाले एक व्यक्ति ने ख़ुद आगे बढ़कर शादी करने की पेशकश की.

सिरसा ने जोश से कहा, ‘आप ऊपरवाले के आशीर्वाद को देखकर हैरान रह जाएंगे, वहां बैठा गुरु का एक सिख जो दिन-रात भगवान की सेवा करता है, जिसने अमृत छका है, जो हर दिन भगवान का नाम लेता है, खड़ा हुआ और बोला: ‘यह सिखी [सिख धर्म और समुदाय] का मामला है. आप जो भी सेवा चाहें, मैं उसे करने के लिए तैयार हूं’.’

जिस दिन (दोबारा) शादी हुई (29 जून, 2021) उसी दिन सिरसा दूल्हे-दुल्हन और उसके माता-पिता के साथ दिल्ली आ गए. जब ​​वे एयरपोर्ट पर पहुंचे तो वहां पहले से भारी संख्या में टेलीविज़न न्यूज़ रिपोर्टर अपने कैमरे के साथ मौजूद थे. सिरसा ने दावा किया कि मनमीत कौर ने पहले (भट के साथ) कोई शादी नहीं की थी, और उन्होंने अपनी मर्ज़ी से इस सिख व्यक्ति से शादी की है. उसी दिन, उन्होंने दिल्ली के एक गुरुद्वारे में इकट्ठा हुए लोगों के सामने इस बात पर गर्व किया कि उन्हें कश्मीर में फिर से सिख गौरव जागता हुआ महसूस हुआ.

उन्होंने गर्व से कहा, ‘श्रीनगर जैसी जगह में जहां किसी को नहीं पता कि बम और गोलियां कब चल जाएंगी… पूरा शहर थम गया. प्रशासन घुटनों पर आ गया और एसएसपी और आईजीपी मौक़े पर पहुंचे. उन्होंने कहा कि हमें थोड़ा समय दीजिए. हमने कहा कि आज आप समय ले लीजिए, लेकिन हमें (लेफ़्टिनेंट) गवर्नर से ‘हां’ या ‘नहीं’ में जवाब चाहिए.’

उन्होंने दावा किया कि लेफ़्टिनेंट गवर्नर मनोज सिन्हा ने प्रशासन को निर्देश दिया कि ‘कुछ भी करो, लेकिन इस तरह की अराजकता यहां नहीं चलेगी.’ उन्होंने लेफ़्टिनेंट गवर्नर से अपील की कि वे धर्मांतरण और ‘लव जिहाद’ को रोकने के लिए उत्तर प्रदेश की तर्ज़ पर एक धर्मांतरण-विरोधी क़ानून पारित करें.

हालांकि – जैसा कि मैंने बताया है – इस बात की कोई पक्की जानकारी नहीं है कि मनमीत कौर ने हाईकोर्ट में एक मुस्लिम व्यक्ति के साथ अपने रिश्ते के बारे में क्या कहा था, लेकिन इसी विवाद में फंसी दूसरी महिला, दानमीत कौर ने एक सेल्फ़ी-वीडियो जारी करके अपनी बात ज़ोरदार तरीक़े से सबके सामने रखी. उसके माता-पिता ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी, जिसमें उन्होंने उसके पति, 30 साल के मुज़फ़्फ़र पर अपनी बेटी को अगवा करने का आरोप लगाया था.

उसने इस वीडियो में अपने मां बाप द्वारा लगए गए आरोपों से इनकार किया और ज़ोर देकर कहा कि वह एक ‘बालिग़ और पढ़ी-लिखी लड़की’ है. उसने आगे कहा, ‘मुझे अपने अधिकारों की जानकारी है और मैं सही-ग़लत में फ़र्क़ कर सकती हूं.’

वह अपने माता-पिता का घर छोड़कर चली गई थी और उनसे कहा था कि वे उसे ढूंढ़ने की कोशिश न करें. लेकिन उसके माता-पिता द्वारा पुलिस में शिकायत दर्ज कराने के महज़ छह घंटे के अंदर ही दानमीत कौर ने बताया कि पुलिस ने उसे ‘पकड़ लिया’ और उसके माता-पिता के हवाले कर दिया. उसने गवाही दी कि 2012 में अपनी मर्ज़ी से उसने इस्लाम अपना लिया था और 2014 में अपने बैचमेट मुज़फ़्फ़र से शादी कर ली थी, और उसके पास इस बात को साबित करने के लिए सभी ज़रूरी दस्तावेज़ मौजूद थे. इसके बावजूद, उसके पति को श्रीनगर सेंट्रल जेल में ही रखा गया था.

वीडियो में दानमीत कौर ने कहा कि जब उन्हें उनके माता-पिता को ‘हवाले कर दिया गया’, तो वे उन्हें पहले जम्मू ले गए और वहां से पंजाब. वहां कई संगठनों ने उनसे मुलाक़ात की और उनका ‘ब्रेनवॉश’ करने की कोशिश की ताकि वो अपने ‘क़ानूनी पति’ के ख़िलाफ़ एक वीडियो बयान रिकॉर्ड करें, लेकिन उन्होंने साफ़ मना कर दिया. दानमीत कौर ने दावा किया कि उन संगठनों ने उन्हें डराया और चेतावनी दी कि उनकी हत्या की जा सकती है या उन पर तेज़ाब से हमला किया जा सकता है.

उन्होंने अपने वीडियो में ‘कुछ लोगों’ की इस कोशिश पर अफ़सोस जताया कि वे उनकी मर्ज़ी से की गई शादी और धर्म परिवर्तन को ‘(कश्मीरी) अल्पसंख्यकों पर हमले’ का मुद्दा बनाकर पेश कर रहे हैं, और साफ़ तौर पर कहा कि वे ‘राजनीतिक कारणों से प्रोपेगैंडा फैला रहे हैं’.

इससे पहले मई में एक और सिख महिला, वीरान पाल कौर ने सुरक्षा की गुहार लगाते हुए हाईकोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया था. हाईकोर्ट के सामने उसने कहा कि जनवरी में अपनी मर्ज़ी से एक मुस्लिम व्यक्ति से शादी की थी, लेकिन वे ख़ानाबदोशों की तरह ज़िंदगी बिताने पर मजबूर थे, क्योंकि उनके माता-पिता पुलिस के साथ मिलकर इस जोड़े को परेशान कर रहे थे.

हाईकोर्ट ने उनके इस अधिकार को सही ठहराया कि वे ‘अपनी मर्ज़ी के हिसाब से अपनी शादीशुदा ज़िंदगी जी सकते हैं और भारत के संविधान ने उन्हें इस बात की गारंटी दी है.’

साथ ही, कोर्ट ने पुलिस से यह सुनिश्चित करने को कहा कि उनके माता-पिता या कोई भी अन्य व्यक्ति इस जोड़े को परेशान न करे, उन पर हमला न करे, उनका अपहरण न करे या उन्हें किसी भी तरह का नुक़सान न पहुंचाए.

ज़ोया, जो पहले सिख लड़की मनमीत कौर थीं, कहती हैं, ‘मैंने एक साल पहले इस्लाम अपना लिया और शाहिद भट से शादी कर ली. मेरा परिवार मुझे परेशान कर रहा है, एसएचओ रैनावारी राकेश पंडिता ने भी मुझे परेशान किया और मुझे प्रताड़ित किया. अगर उन्होंने मुझे और अधिक प्रताड़ित किया या मेरे पति शाहिद को हाथ भी लगाया, तो मैं आत्महत्या कर लूंगी.’

इस बीच, जम्मू-कश्मीर, दिल्ली और पंजाब के सभी दलों के राजनेता इस मामले में कूद पड़े. शिरोमणि अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल ने अपनी ‘सिख बेटियों’ के अपहरण और ज़बरदस्ती शादी पर हैरानी जताई, ख़ासकर श्रीनगर में ‘किसी दूसरे समुदाय के एक बुज़ुर्ग आदमी’ से मनमीत कौर की शादी होने पर. बादल ने कहा कि उन्होंने ही मनजिंदर सिंह सिरसा से ‘तुरंत वहां जाकर पीड़ित परिवार को इंसाफ़ दिलाने’ के लिए कहा था.

(प्रतीकात्मक फोटो: पीटीआई)

भाजपा नेताओं ने जबरन धर्म परिवर्तन के ख़िलाफ़ एक क़ानून बनाने की मांग की, जिस तरह का क़ानून उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश की भाजपा सरकारों ने बनाया है. उन्होंने आरोप लगाया कि पंजाब में भी ऐसे धर्म परिवर्तन हो रहे हैं, जहां सिख लड़कियों को ‘पैसे और फ़ायदों का लालच देकर’ धर्म बदलने के लिए उकसाया जा रहा है. यहां तक कि जम्मू-कश्मीर कांग्रेस ने भी इस घटना की सार्वजनिक रूप से निंदा की और सख़्त पुलिस कार्रवाई की मांग की.

लेकिन जम्मू और कश्मीर की कई महिलाओं ने भी खुलकर अपनी नाराज़गी ज़ाहिर की कि सिख परिवारों में जन्मी इन महिलाओं की शादी के चुनाव के मामले को लेकर उनके परिवारों, धार्मिक और राजनीतिक संगठनों, अदालतों और पुलिस ने जिस तरह का रवैया अख़्तियार किया वह सही नहीं था. उदाहरण के लिए, नवनीत कौर ने कहा, ‘एक सिख महिला होने के नाते, और वह भी जम्मू और कश्मीर से, मैं (मनमीत कौर के माता-पिता द्वारा जल्दबाज़ी में एक सिख पुरुष से उनकी शादी कराने के) पक्ष में नहीं हूं. अगर उस लड़की को बचा भी लिया गया था, तो उसे थोड़ी राहत देने के बजाय, जानवर की तरह जल्दबाज़ी में उसे किसी और खूंटे से बांध दिया गया. महिलाएं भी इंसान हैं, वे किसी की कोई चीज़ नहीं हैं.’

‘मेरी पहचान’ नामक एक महिला क्लब की संस्थापिका जम्मू की संध्या गुप्ता ने पूछा, ‘उस महिला को अपनी बात ख़ुद कहने का मौक़ा क्यों नहीं दिया गया? हमें नहीं पता कि असल में हुआ क्या है. अब आप देखेंगे कि राजनीतिक पार्टियां अपने फ़ायदे के लिए इस घटना का इस्तेमाल कैसे करेंगी. और उस महिला का क्या? हमें सच में नहीं पता. अब समय आ गया है कि जम्मू और कश्मीर की महिलाएं अपनी आवाज़ उठाएं. ख़ासकर इस राज्य में, बहुत-सी महिलाओं के लिए यह घटना भावनात्मक रूप से परेशान करने वाली रही है.’

कश्मीर की एक मुस्लिम महिला, इफ़रा जान ने कहा कि महिलाओं के साथ ‘सामुदायिक संपत्ति’ जैसा बर्ताव किया जा रहा है. उन्होंने आगे कहा, ’21वीं सदी में भी महिलाओं के पास अभी भी अपनी पसंद रखने का अधिकार नहीं है और उन्हें सामुदायिक संपत्ति समझा जाता है, जिसे पितृसत्तात्मक समाज का मुखिया अपनी मर्ज़ी से अपने पास रखता है या किसी और के हवाले कर देता है.

कथित लव जिहाद के खिलाफ हुआ एक प्रदर्शन. (फाइल फोटो: पीटीआई)

जम्मू और कश्मीर में कोई भी महिला अपनी मर्ज़ी से कोई फ़ैसला लेने की हिम्मत नहीं कर सकती, क्योंकि जैसा कि इस मामले से ज़ाहिर होता है, पुलिस और अदालतें हमारे मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए हमारे साथ खड़ी नहीं होंगी, बल्कि वे पुरुषों की मर्ज़ी के आगे अपनी इच्छा से, दबकर और बेशर्मी से झुक जाएंगी.’

लेखकों, विद्वानों, कवियों, कलाकारों और सांस्कृतिक कार्यकर्ताओं (जिनमें यह लेखक भी शामिल है) के एक समूह ने एक बयान जारी कर ‘हाल की उस कार्रवाई’ की कड़ी निंदा की, जिसमें ‘इन तथाकथित सामुदायिक सिख नेताओं के सीधे आदेश पर एक युवती का अपहरण करके, चौबीस घंटे के भीतर ही उसकी शादी एक ऐसे अजनबी से करवा दी गई, जिसकी एकमात्र योग्यता यह थी कि वह उसी समुदाय का था.’

इस समूह ने इस कार्रवाई को ‘पूरी तरह से निंदनीय’ बताया. यह कार्रवाई ‘न केवल ग़ैर-क़ानूनी’ थी, बल्कि एक ऐसा कृत्य भी था जो ‘एक वयस्क महिला द्वारा अपनी मर्ज़ी से लिए गए उस वैध फ़ैसले को तुच्छ साबित करता है, जिसमें उसने स्वेच्छा से अपना धर्म बदलकर अपने जीवनसाथी का धर्म अपनाते हुए एक नई जीवनशैली चुनने का फ़ैसला किया था.’

उन्होंने आगे कहा, ‘हमारा मानना ​​है कि दोस्ती, प्यार और शादी के लिए किसी व्यक्ति की पसंद का अधिकार, और अपनी आस्था के हिसाब से धर्म का पालन करने का अधिकार, एक ऐसा अधिकार है जिसे छीना नहीं जा सकता; और हमारी महिला नागरिकों को भी समान रूप से यह अधिकार प्राप्त है. हम ‘लव जिहाद’ जैसी साज़िश की कहानियों को पूरी तरह से ख़ारिज करते हैं, क्योंकि ये समाज को बांटने वाली झूठी ख़बरों पर आधारित है, जो अलग-अलग धार्मिक समुदायों के बीच नफ़रत और शक पैदा करने के लिए बनाई गई हैं; और हम कश्मीर या देश में कहीं भी धर्मांतरण-विरोधी क़ानून की मांग का ज़ोरदार विरोध करते हैं. ऐसे क़ानूनों ने केवल सांप्रदायिक खाई को और गहरा किया है, मुसलमानों में डर पैदा किया है और अलग-अलग धर्म को लोगों को अपनी पसंद से एक दूसरे का चुनाव करने से लगभग रोक दिया है.’

उन्होंने कहा कि धर्मांतरण-विरोधी क़ानूनों की यह बाढ़ ‘साफ़ तौर पर सांप्रदायिक है… और अक्सर इसका इस्तेमाल उन युवा मुस्लिम पुरुषों को अपराधी ठहराने के इरादे से किया जाता है, जो दूसरे धर्मों की महिलाओं के साथ रिश्तों में हैं. इस क़ानून की असली शिकार महिलाएं हैं, क्योंकि यह क़ानून जीवनसाथी चुनने के उनके संवैधानिक अधिकार का उल्लंघन करता है.’

इस खुले पत्र को लिखने वालों ने ‘उन सभी लोगों के साथ अपनी एकजुटता’ ज़ाहिर की, जो ‘अपना जीवनसाथी और जीवन जीने का तरीक़ा ख़ुद चुनना चाहते हैं,’ और उन्होंने ‘उन लोगों को अपना समर्थन देने का वादा किया, जिन्हें समुदाय के नेताओं और परिवारों द्वारा सताया जा रहा है, जो धार्मिक मूल्यों को बचाने के नाम पर उनकी आज़ादी छीनना चाहते हैं.’

(हर्ष मंदर सामाजिक कार्यकर्ता और लेखक है.)

(शोध सहायता के लिए सुमैय्या फ़ातिमा और सैयद रूबील हैदर ज़ैदी का आभार.)

(मूल अंग्रेज़ी से ज़फ़र इक़बाल द्वारा अनूदित. ज़फ़र भागलपुर में हैंडलूम बुनकरों की ‘कोलिका’ नामक संस्था से जुड़े हैं.)