नई दिल्ली: राइट टू फूड कैंपेन और रीथिंक आधार ने एक फैक्ट फाइंडिंग रिपोर्ट जारी की है, जिसमें उन परिस्थितियों का विवरण दिया गया है जिनके चलते ओडिशा के क्योंझर जिले के डियानाली गांव के आदिवासी जीतू मुंडा को 27 अप्रैल 2026 को अपनी दिवंगत बहन कालरा मुंडा के कंकाल को ओडिशा ग्रामीण बैंक की मल्लीपोशी शाखा तक लेकर जाना पड़ा, ताकि उनकी बहन के खाते में जमा पैसे तक पहुंच प्राप्त की जा सके.
फैक्ट फाइंडिंग टीम ने परिवार, गांव के लोगों, बैंक अधिकारियों और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के कर्मचारियों से मुलाकात के बाद पाया कि यह घटना संस्थागत उपेक्षा, प्रशासनिक उदासीनता और बुनियादी जीवनयापन अधिकारों से वंचित किए जाने की एक लंबी श्रृंखला का परिणाम था, जिसने पहले से ही अत्यंत गरीब परिवार को सरकार द्वारा पूरी तरह उपेक्षित स्थिति में पहुंचा दिया.
चार सदस्यीय फैक्ट फाइंडिंग टीम ने ओडिशा के क्योंझर जिले के डियानाली गांव के दौरे के दौरान पाया कि अपने पति को खो चुकीं कालरा मुंडा भूमिहीन थीं. वे और उनके भाई जीतू मुंडा दोनों बुजुर्ग और बीमार थे – उनकी 19,600 रुपये की बचत, जो उन्होंने अपने दो बैल बेचकर बड़ी मेहनत से जमा की थी, कालरा की बीमारी के कई हफ्तों के दौरान और उनकी मौत के बाद भी नहीं दी गई.
टीम ने पाया कि कालरा मुंडा की 26 जनवरी 2026 के देहांत के बाद स्थानीय अधिकारियों को मृत्यु की जानकारी होने के बावजूद, उनका मृत्यु प्रमाण पत्र तीन महीने से अधिक समय तक रोक कर रखा गया. जीतू मुंडा को भी राशन कार्ड और वृद्धावस्था पेंशन से वंचित कर दिया गया क्योंकि वे अपना बायोमेट्रिक-लिंक्ड आधार पहचान पत्र प्रस्तुत नहीं कर सके, जबकि गांव में उनकी पहचान, निवास, उम्र और दयनीय स्थिति सभी को ज्ञात थी.
घटना के सार्वजनिक होने के कुछ ही दिनों के भीतर मृत्यु प्रमाणपत्र, राशन कार्ड, पेंशन और बैंक संबंधी सहायता की प्रक्रिया पूरी कर दी गई. रिपोर्ट के अनुसार, यह इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण है कि ये सभी कार्य पहले भी किए जा सकते थे, लेकिन जानबूझकर नहीं किए गए.
राइट टू फूड कैंपेन और रीथिंक आधार ने जोर देकर कहा कि यह घटना समाज के सबसे कमजोर नागरिकों तक सामाजिक सुरक्षा, स्वास्थ्य सेवा, बैंकिंग सुविधा और कल्याणकारी संरक्षण पहुंचाने में गंभीर खामियों को उजागर करती है.
मांग की कि राज्यभर में तत्काल ऐसे निर्देश जारी किए जाएं, जिससे राशन कार्ड, पेंशन और अन्य कल्याणकारी लाभ आधार से जुड़ी प्रक्रियात्मक बाधाओं के कारण न रोके जाएं. पेंशनभोगियों, राशन कार्ड धारकों, बुजुर्गों, विधवाओं और कमजोर समुदायों से जुड़े सभी मामलों में सात दिनों के भीतर मृत्यु पंजीकरण और प्रमाणन अनिवार्य किया जाए.
इसके अलावा बिस्तर पर पड़े, बुजुर्ग, अत्यंत गरीब और मृत खाताधारकों के लिए मानवीय बैंकिंग प्रक्रियाएं बनाई जाएं, जिनमें घर-घर बैंकिंग सेवा और कानूनी वारिसों के लिए आसान पहुंच व्यवस्था शामिल हो.
इसमें यह भी मांग की गई है कि उन पुलिसकर्मियों के आचरण की जांच की जाए जिन्होंने जीतू मुंडा की दयनीय स्थिति के बावजूद उनके लिए परिवहन या मानवीय सहायता की व्यवस्था नहीं की.
