सीजेआई ‘कॉकरोच’ टिप्पणी: अधिवक्ता संघ व वकीलों ने जताई नाराज़गी, मुख्य न्यायाधीश ने स्पष्टीकरण दिया

सीजेआई सूर्यकांत द्वारा बेरोज़गार युवाओं को ‘कॉकरोच’, ‘परजीवी’ बताए जाने पर चौतरफ़ा आलोचना के बीच शनिवार (16 मई) को उन्होंने अपने बयान पर सफाई देते हुए कहा कि मीडिया के एक वर्ग ने एक तुच्छ मामले की सुनवाई के दौरान उनके द्वारा दिए गए मौखिक बयान को ग़लत तरीके से प्रस्तुत किया है. सीजेआई ने आगे कहा कि भारत का हर युवा उन्हें प्रेरित करता है.

भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत. (फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने शुक्रवार (15 मई) को वरिष्ठ वकील का दर्जा दिए जाने की मांग संबंधी एक वकील की याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि समाज में कुछ परजीवी हैं, जो व्यवस्था पर हमला करते हैं. उन्हें रोज़गार नहीं मिलता और पेशेवर ज़िंदगी में कोई जगह नहीं मिलती. उनमें से कुछ मीडिया बन जाते हैं, कुछ सोशल मीडिया पर सक्रिय हो जाते हैं, कुछ आरटीआई कार्यकर्ता बन जाते हैं और फिर हर किसी पर हमला शुरू कर देते हैं.

सीजेआई की इस टिप्पणी पर अखिल भारतीय अधिवक्ता संघ ने कड़ा विरोध व्यक्त करते हुए एक बयान जारी कर कहा कि भारत के मुख्य न्यायाधीश द्वारा कोर्ट रूम में कथित रूप से कही गई यह बात अत्यंत आपत्तिजनक, अस्वीकार्य और बेहद निंदनीय है.

संघ ने आगे कहा कि यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि ऐसा बयान हमारी न्यायपालिका के प्रमुख की ओर से आया है. यह अत्यंत अलोकतांत्रिक है और उन युवा कार्यकर्ताओं का अपमान है जो लोकतंत्र के विकास में अपना योगदान देते हैं.

अखिल भारतीय अधिवक्ता संघ के अनुसार, समाज और उसके मूल्यों को हमारी संवैधानिक भावना के अनुरूप आगे बढ़ाने में युवाओं की अहम भूमिका होती है, खासकर तब जब हमारी प्रतिष्ठित संस्थाएं विफल हो जाती हैं. सीजेआई का संवैधानिक पद और गरिमा यह मांग करती है कि वे स्थितियों से निपटते समय अधिक संयम बरतें और बिना किसी ठोस आधार के किसी बात को बढ़ा-चढ़ाकर सामान्यीकरण न करें.

संघ ने आगे कहा कि किसी युवा व्यक्ति या युवा वकील के गैर-जिम्मेदाराना कृत्य के कारण इस तरह का अपमानजनक बयान नहीं दिया जाना चाहिए; बेरोज़गारी युवाओं की गलती नहीं है- यह तो सरकार और राज्य द्वारा अपनाए गए विकास के रास्ते और नीतियों की गलती है; युवा तो इसके पीड़ित हैं. एक्टिविज्म (Activism) कोई पूरी तरह से शुद्ध या दोषमुक्त चीज़ नहीं है, लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं है कि यह बचकाना या बुरा है.

अपने बयान के आखिर में संघ ने कहा है, ‘हमें पूरी उम्मीद है कि माननीय सीजेआई अपने इस बयान पर स्पष्टीकरण देंगे और इसे वापस ले लेंगे; अन्यथा, इससे न्यायपालिका और पूरे समाज को एक बेहद गलत संदेश जाएगा.’

वहीं, व्यक्तिगत तौर पर भी वकीलों द्वारा इस बयान की कड़ी आलोचना देखने को मिली है. सोशल मीडिया मंच एक्स पर कई वकीलों और कार्यकर्ताओं ने सीजेआई को लोकतंत्र और संविधान की याद दिलाते हुए युवाओं की भूमिका को देश की प्रगति के लिए बेहद जरूरी बताया है.

इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने कहा, ‘सीजेआई की ओर से युवाओं को लेकर की गई यह टिप्पणी बेहद दुर्भाग्यपूर्ण और कुछ हद तक सामान्यीकृत लगती है. मैं मानता हूं कि उनके सामने मौजूद युवक ग़ैर-ज़िम्मेदार हो सकता है.’

उन्होंने आगे कहा, ‘लेकिन इस तरह की आम टिप्पणी एक्टिविस्टों के प्रति उनके विरोध को दिखाती है, जो मौजूदा फासीवादी सत्ताधारी व्यवस्था की सोच से भी मेल खाती है. इससे ग़लत संदेश जाता है. उन्हें इस पर माफ़ी मांगनी चाहिए और सफ़ाई देनी चाहिए.’

वकील गौतम भाटिया ने सीजेआई की टिप्पणियों का ज़िक्र किए बिना कॉकरोच के पारिस्थितिक महत्व पर एक लेख का लिंक पोस्ट किया, ताकि प्रकृति में उनकी भूमिका को उजागर किया जा सके.

लेख का हवाला देते हुए उन्होंने लिखा, ‘कॉकरोच की 5,000 ज्ञात प्रजातियों में से ज़्यादातर, और शायद उतनी ही और प्रजातियां जिनका अभी तक वर्णन नहीं किया गया है, का बहुत बड़ा पारिस्थितिक महत्व है.’

वहीं, वकील ऋषभ रंजन (Rishav) ने कहा कि आरटीआई एक वैधानिक अधिकार है. शायद सीजेआई यह नहीं समझते कि ज़िम्मेदार नागरिक ही अपने वैधानिक अधिकारों का इस्तेमाल करते हैं. कल्याणकारी राज्य की न्याय-व्यवस्था को विकसित होने में वर्षों का संघर्ष लगा है.

उन्होंने आगे कहा, ‘अगर युवा वकील सहमत हों, तो हम सीजेआई के समक्ष इन चिंताओं का ज़िक्र करेंगे. क्या बार के पदाधिकारी इसमें हमारा साथ देंगे?’

वहीं, पीपल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज़ (पीयूसीएल) की अध्यक्ष कविता श्रीवास्तव ने कहा, ‘सीजेआई ने बेरोज़गार युवाओं, कार्यकर्ताओं और सोशल मीडिया यूज़र्स को ‘कॉकरोच-परजीवी’ कहा है. बेरोज़गारी या ‘मोदीनॉमिक्स’-जिससे अमीर और अमीर हो रहे हैं और गरीब न्यूनतम मज़दूरी से भी कम पर गुज़ारा करने को मजबूर हैं -पर पीएम से सवाल करने के बजाय, उन्होंने भारत के युवाओं का अपमान किया है.’

इस संबंध में अधिवक्ता बी. कार्तिक नवायन ने सीजेआई की टिप्पणई को गहरी अवमानना ​​और नफ़रत को उजागर करने वाली बताया, जो न्यायपालिका के कुछ वर्गों के मन में इस देश के आम नागरिकों के प्रति है.

उन्होंने कहा, ‘बेरोज़गार युवा समस्या नहीं हैं; असली समस्या तो वह टूटी-फूटी और असमान व्यवस्था है, जो लोगों को उनका सम्मान और रोज़गार देने से वंचित रखती है.’

उनके अनुसार, ‘आलोचकों को केवल ‘कीड़े-मकोड़े’ कहकर ख़ारिज करना, इस बात को और भी पुख़्ता करता है कि इस तरह के व्यवस्थागत बदलाव की कितनी तत्काल आवश्यकता है.’

सीजेआई की टिप्पणी पर ट्रांसपेरेंसी एक्टिविस्ट श्रीनिवास कोडली ने कहा, ‘जब भारत के मुख्य न्यायाधीश को लगता है कि उनका काम व्यवस्था की रक्षा करना है, लोगों की नहीं, तो वे लोगों पर ही हमला करना शुरू कर देते हैं.’

वकील शोमोना खन्ना ने कहा, ‘सीजेआई द्वारा इस्तेमाल की गई भाषा से मैं बेहद विचलित हूं; यकीनन उन्हें इसके इतिहास की जानकारी होगी. ‘परजीवी’ (Parasite) – इस शब्द का इस्तेमाल हिटलर ने यहूदियों के लिए किया था. ‘कॉकरोच’ (Cockroach) – इस शब्द का इस्तेमाल रेडियो रवांडा ने तुत्सी लोगों के लिए किया था. दोनों ही मामलों में इसका नतीजा एक भयानक नरसंहार के रूप में सामने आया.’

गौरतलब है कि इस बीच सीजेआई सूर्यकांत ने अपने बयान पर सफाई देते हुए कहा कि मीडिया के एक वर्ग ने एक तुच्छ मामले की सुनवाई के दौरान उनके द्वारा दिए गए मौखिक बयान को गलत तरीके से प्रस्तुत किया है.

सीजेआई ने स्पष्ट किया कि उनकी टिप्पणी उन लोगों के बारे में थी, जो फर्जी और जाली डिग्री के सहारे वकालत जैसे पेशों में प्रवेश कर रहे हैं.

उन्होंने कहा, ‘ऐसे लोग मीडिया, सोशल मीडिया और अन्य प्रतिष्ठित पेशों में भी घुसपैठ कर चुके हैं, और इस मायने में वे परजीवी जैसे हैं.’

सीजेआई सूर्यकांत ने साफ कहा कि यह कहना पूरी तरह गलत और निराधार है कि उन्होंने देश के युवाओं की आलोचना की.

उन्होंने कहा, ‘मुझे देश के वर्तमान और भविष्य के मानव संसाधन पर गर्व है. भारत का हर युवा मुझे प्रेरित करता है. यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि भारतीय युवाओं में मेरे प्रति सम्मान है, और मैं उन्हें एक विकसित भारत के स्तंभ के रूप में देखता हूं.’

वहीं, समाचार एजेंसी पीटीआई को दिए इंटरव्यू में जिस मामले में सीजेआई ने यह टिप्पणी की थी, उसके याचिकाकर्ता वकील संजय दुबे ने वरिष्ठ दर्जा देने में गड़बड़ियों का आरोप लगाया.

उन्होंने कहा, ‘असल में यह मामला हाईकोर्ट में सीनियर दर्जे से जुड़ा है. 2014 में सीनियर दर्जे के लिए एक नोटिफ़िकेशन जारी हुआ था और मैं भी उम्मीदवार था. प्रक्रिया में कुछ गड़बड़ियां थीं. सुधीर नंद्राजोग कमिटी के सदस्य थे और उन्होंने भी गड़बड़ियां देखने के बाद इस्तीफ़ा दे दिया था.’

उन्होंने कहा, ‘इसके बाद हमने प्रक्रिया को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में रिट याचिका दायर की. जस्टिस ओक ने भी इस मामले में निर्देश जारी किए थे. गड़बड़ी यह थी कि कुछ अयोग्य लोगों को सीनियर दर्जा दे दिया गया जबकि योग्य उम्मीदवारों को नज़रअंदाज़ किया गया. फ़ैसला लेते समय सही प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया और रिकॉर्ड्स को भी अनदेखा किया गया.’

उन्होंने कहा कि ‘सीनियर दर्जा देने के दौरान मैरिट को संज्ञान में नहीं लिया गया.’