कवियत्री और लेखक दामिनी यादव की कविताएं किसी समीक्षात्मक टिप्पणी की मोहताज नहीं लगतीं. वे इतनी बेलाग और दो-टूक हैं कि पाठक सीधे उनसे जुड़ जाता है. उनकी एक कविता ‘माहवारी’ तब बहुत चर्चा में रही- बल्कि इस कविता को कई लोगों ने अपने नाम से सोशल मीडिया में डाल दिया. इसको लेकर भी एक दौर में ख़ासा विवाद हुआ था. दामिनी को बार-बार बताना पड़ता था कि यह कविता उनकी है.
अब उनका नया संग्रह ‘रफ़ कॉपी‘ पढ़ते हुए नए सिरे से खयाल आता है कि ये कविताएं इस बेबाक़ी से लिखी गई हैं कि कई बार वे कविताएं नहीं लगतीं- लेकिन फिर भी उन्हें कविता की तरह पढ़ने की इच्छा होती है, क्योंकि एक उद्वेलित करता हुआ काव्य तत्व वहां अपरिहार्यतः उपस्थित रहता है.
अगर इस काव्य तत्व को कोई नाम देना हो, अगर देखना हो कि दामिनी की कविताओं का बीज-भाव क्या है, तो वह असंदिग्ध तौर पर क्रोध लगता है- एक खौलता हुआ गुस्सा जो इन कविताओं को अलग तरह की गति और तीव्रता देता है.
संग्रह की पहली ही कविता ‘समर-संवाद’ में वे समर से- युद्ध से- शुरुआत करती हैं- ‘भुला दी गईं वे कविताएं/जिनमें प्रेमियों के विरह/और प्रेमिकाओं के चुंबन लिखे थे/ताज़ा और जीवंत रहा बस वह लावा/जो लहू में बहता/लहू को जिलाए रखने में रहा कामयाब/धूर्त का ज्ञान साबित हुए वे सारे प्रवचन/जो भगोड़ों द्वारा व्यासगद्दियों पर बैठ कर दिए गए थे/याद रहा तो बस/नमक का बढ़ता दाम/और सिर छुपाए रखने का जुटान.’
ऐसी कविताएं संग्रह में हैं कि लगता है, जैसे दामिनी बिल्कुल खौलते हुए सच को खौलते हुए सच की तरह ही रखने पर आमादा हैं. ऐसा लगता है कि ये कविताओं की रफ़ कॉपी है. फिर ख़याल आता है कि यह ज़िंदगी की रफ़ कॉपी है- बहुत सारे विचारों और अनुभवों की काटपीट के बीच ज़िंदगी का समीकरण समझने की कोशिश से बनी कॉपी.
बरसों पहले रघुवीर सहाय ने अपनी मशहूर कविता ‘आने वाला ख़तरा’ में हालांकि क्रोध की महिमा कुछ कम कर दी जब लिखा था कि ‘क्रोध होगा, मगर विरोध नहीं’, लेकिन क्रोध फिर भी रचनात्मक उद्यमों में बचा नहीं रह पाता- बल्कि कई बार वह उनकी प्रेरणा और उनका स्रोत बन जाता है.
दामिनी की कविताओं में यह क्रोध बिल्कुल जगह-जगह बिखरा है. इस क्रोध के कई रूप हैं. कई बार वह करुणा में ढलता है. कई बार व्यंग्य की भाषा ग्रहण करता है. कई बार आत्मनिरीक्षण तक जाता है. इस क्रोध के केंद्र में क्या है?
ज़्यादातर स्त्रियों के साथ होने वाला अमानवीय, अलोकतांत्रिक और असमानता भरा व्यवहार. संग्रह की ज़्यादातर कविताएं इस एहसास की अभिव्यक्ति हैं कि इस दुनिया में- और हमारे समाज में- स्त्रियां लगातार दमन और उत्पीड़न की शिकार हैं. ख़ास बात यह है कि दामिनी बहुत स्पष्टता से पहचान पाती है कि दमन और भेदभाव झेलने का अभ्यास लड़कियों को बिल्कुल बचपन से कराया जाता है. उनकी एक कविता का शीर्षक ही है- शोषण का पूर्वाभ्यास.
वे लिखती हैं- ‘मां/मुझे गुड़िया और भैया को गन लाकर दी थी/तुमने जिस पल/लड़के और लड़की का भेद तो हो गया था/उसी पल उत्पन्न/मेरे उछलने पर तुमने कहा था कि/अच्छी लड़कियां छलांगें मार कर नहीं चलतीं/अच्छी लड़कियों के सीने से चुन्नी कभी नहीं ढलती/अच्छी लड़कियों के सांस लेने की आवाज़ नहीं होती है/अच्छी लड़कियां सोते हुए भी कपड़ों का होश नहीं खोती हैं/और मैं अच्छी लड़की बन/अबला जनम को संस्कारित करने के प्रशिक्षण में जुट गई.’
साफ है कि जो क्रोध है, वह गहरी पीड़ा से निकला है- और इस क्रोध से भी गहरी पीड़ा ही निकलती है.
तो कह सकते हैं कि यह संग्रह दर्द और गुस्से की साझा संतान है. संग्रह की कई कविताओं के केंद्र में प्रेम है. कहीं-कहीं उनमें कोमलता चली आती है, लेकिन ज़्यादातर जगहों पर इस प्रेम के साथ बगावत का एहसास शामिल है, अपनी पहचान और अपनी वैयक्तिकता की अभिव्यक्ति भी है और उस छल-कपट को समझने का उद्यम है जो प्रेम के नाम पर किया जाता है. जाहिर है, मर्दवाद को इसकी चाबुक झेलनी है.
‘रफ़ कॉपी’ लेकिन यहीं तक सीमित नहीं है. उसमें अपने समय के सामाजिक-राजनीतिक विद्रूप को लेकर भी गुस्सा है. राजनीति के पाखंड, भ्रष्टाचार और इन दिनों व्याप्त सांप्रदायिकता की वे कस कर ख़बर लेती हैं.
संग्रह से गुज़रते हुए लगातार अपने समय की विडंबनाओं को लक्षित किया जा सकता है. सत्ता की दुराभिसंधि के साथ बिकी हुई कलमों पर भी वे निशाना साधती हैं- ‘बिकी हुई कलम के दाम बहुत होते हैं/पर बिकी हुई कलम के काम भी बहुत होते हैं/बिकी हुई कलम को कीचड़ का कमल कहना होता है/बिकी हुई कलम को क़ातिल को सनम कहना होता है/बिकी हुई कलम को मौक़े पर खामोश रहना होता है/और बेमौक़े सरकार की जय कहना होता है.’
हमारा समय दरअसल कई विडंबनाओं का मारा है. राजनीति में व्याप्त भ्रष्टाचार, समाज में मौजूद लिजलिजा क़िस्म का भेदभाव और पाखंड, सार्वजनिक आचरण का दोहरापन, स्त्री को लेकर सतत सक्रिय आखेटक दृष्टि, दलितों-पिछड़ों-अल्पसंख्यकों के प्रति गहरी अवमानना और उपेक्षा का भाव- इन सबको कविता में समेटना आसान नहीं है, लेकिन दामिनी लगभग कविता की क़ीमत पर यह काम करती हैं.
कभी-कभी उनके स्वर में निराशा भी दिखती है, लेकिन हम याद कर सकते हैं कि यह भी कर्तव्य की ओर प्रस्थान जैसा है- लोहिया कहते ही थे कि निराशा के भी कर्तव्य होते हैं. तो सूचनाओं के इस युग में उनका बेमानीपन पकड़ती दामिनी कहती हैं- ‘अचानक से मुझे सारी जानकारियां/बेमानी-सी लगने लगी हैं / सड़ांध, ऊब और बासीपन से भरी/लगने लगी हैं सारी ख़बरें/ये ख़बरें या तो धमकी लगती हैं या झूठे सपने/ये या तो डराती हैं अब/या लगती हैं सच को ढंकने / इन खबरों में बस ऐसी ही ख़बरें मिलती हैं/जिनका वजूद मेरे वजूद के लिए मायने नहीं रखता/चांद पर पानी मिलने से/क्या बदल जाएगा?/मेरी प्यास मोहल्ले के नल अगर आया तो/वही पानी बुझा पाएगा.’
कवयित्री की मुखरता प्रशंसनीय है, हालांकि यहीं से कुछ सवाल भी पैदा होते हैं. यह कहना ज़रूरी लगता है कि इन कविताओं में कथ्य जितना ताक़तवर है, उनके शिल्प को थोड़ा और नरम और मज़बूत होने की ज़रूरत है, जिसकी संभावनाएं दामिनी के लेखन में भरपूर है.
बहुत सारी कविताएं बहुत क्रूर और निर्दयी हो गई हैं. वे राजनीतिक नारों में बदल गई हैं. कुछ कविताएं बहुत अच्छी शुरुआत के बाद सवालों के जंगल में अचानक भटक जाती है. कई कविताओं में स्फीति का संकट दिखाई पड़ता है- यानी एक ही बात के दोहराव की स्थिति.
इस संग्रह की अधिकांश कविताएं बहुत लंबी हैं, जिसने ठहर-ठहरकर पढ़ने और फिर समझने की ज़रूरत है. लगता है, जैसे कवयित्री बिल्कुल तात्कालिक घटनाओं पर अपनी प्रतिक्रिया जताने को बेचैन है. यह चीज़ संग्रह को कुछ प्रभावित करती है. बेशक, सोशल मीडिया के इस हड़बड़ाए दौर में ऐसी कविताएं बहुत से पाठकों को अपनी ओर आकर्षित करें, लेकिन इनमें पाठकीय धैर्य की कमी महसूस हो सकती है.
हालांकि अंतिम निष्कर्ष के तौर पर यह तो कहना ही होगा कि जिस समय बहुत सारे लोग सच के बयान से बच रहे हैं, वहीं दामिनी बिल्कुल निडरता से अपने समय का सच बयान कर रही हैं.
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)
