सवालों से बचने को लेकर जुनूनी रही सरकार के 12 वर्षों के बाद भारतीय मीडिया की आवाज़ दबाना अब एक सामान्य बात की तरह स्थापित हो चुका है. कभी आंकड़ों से साफ इनकार करके, तो कभी उन्हें सार्वजनिक रूप से उपलब्ध न कराकर सवालों से बचने की कोशिश की गई है. इसकी पराकाष्ठा यह है कि प्रधानमंत्री ने अब तक एक भी प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं की है- जो स्वतंत्र भारत के इतिहास में पहली बार हुआ है.
लेकिन कुछ ऐसे क्षण भी आते हैं, जब यह स्थिति अचानक बहुत साफ तरीके से सामने आ जाती है और इस माहौल का भ्रम टूटता दिखाई देता है. ऐसा अक्सर उन लोकतंत्रों में होता है, जहां प्रेस सीमाओं को चुनौती देने और सत्ता से कठिन सवाल पूछने का साहस रखती है.
नॉर्वे के अखबार दगसावीसेन की टिप्पणीकार और पत्रकार हेले ल्यूंग ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से सवाल पूछने की कोशिश की. इसमें कोई संदेह नहीं कि मोदी और उनके साथ मौजूद लोगों ने उनके सवाल सुने, लेकिन उन्हें पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया.
ऐसे प्रधानमंत्री के लिए, जिन्होंने शीर्ष पद पर लगभग 13 साल बिताने के बावजूद अब तक एक भी प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित नहीं किया है, ल्यूंग के सवालों का जवाब देना लगभग अकल्पनीय था. यह तब है, जबकि उन्हें एक बेहद लोकप्रिय नेता के रूप में पेश किया जाता है और वे ऐसे नेता माने जाते हैं जो जनता के जनादेश के आधार पर सत्ता में आते और लौटते हैं.
ल्यूंग ने कहा कि उन्होंने सवाल इसलिए पूछा क्योंकि, ‘नॉर्वे में जब विदेशी नेता आते हैं, तो आमतौर पर प्रेस को सवाल पूछने का मौका मिलता है. बहुत ज्यादा नहीं, लेकिन कुछ सवाल पूछे जा सकते हैं. मोदी के मामले में आज ऐसा नहीं हुआ और कल भी नहीं होगा.’

बाद में भारतीय दूतावास ने सोशल मीडिया पर सार्वजनिक रूप से ल्यूंग को राजनयिकों की एक प्रेस ब्रीफिंग में आमंत्रित किया. हालांकि यह प्रधानमंत्री की प्रेस कॉन्फ्रेंस से बिल्कुल अलग चीज थी. ल्यूंग वहां पहुंचीं और जब उन्होंने पूछा कि मानवाधिकारों की स्थिति को देखते हुए नॉर्वे भारत पर भरोसा क्यों करे, तो उन्हें हैरानी भरा जवाब मिला कि भारत योग की भूमि है, उसने कोविड संकट से अच्छी तरह निपटा है और वह दुनिया को वैक्सीन तथा दवाइयां निर्यात करता है.
अपने लंबे जवाब में राजनयिक ने ल्यूंग के दूसरे सवाल का कोई उत्तर नहीं दिया. उनका दूसरा सवाल था, ‘क्या भविष्य में कभी प्रधानमंत्री भारतीय मीडिया के आलोचनात्मक सवालों का जवाब देना शुरू करेंगे?’
यह क्यों महत्वपूर्ण है?
मोदी का उन सामान्य लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं का पालन न करना या उनसे बचना, जैसे किसी दूसरे देश के प्रमुख के साथ प्रेस से बात करना, अब भारत में लगभग सामान्य बात बन चुका है. इसकी एक वजह यह भी है कि प्रधानमंत्री से सवाल पूछने के मौके लगभग खत्म हो चुके हैं. तस्वीरें और सार्वजनिक कार्यक्रम बेहद सावधानी से तैयार किए जाते हैं, लेकिन संवाद और सवाल-जवाब गायब रहते हैं.
ल्यूंग के सवाल के जवाब में राजनयिक ने कहा था कि भारत ने जी-20 शिखर सम्मेलन की मेजबानी की थी. लेकिन यहां भी विडंबना साफ दिखाई देती है. जब तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन मोदी के घर आए थे, तब अमेरिकी पत्रकारों को एक सामान्य सवाल-जवाब सत्र, जिसे ‘पूल स्प्रे’ कहा जाता है, की अनुमति नहीं दी गई थी.
यह दिखाता है कि भारत का मीडिया माहौल उन लोकतांत्रिक मानकों से कितना अलग होता जा रहा है, जिनकी बात भारत खुद करता है, खासकर जब विदेशों में उसके प्रतिनिधि देश को ‘जीवंत लोकतंत्र’ बताते हैं.
अगर पत्रकार सवाल नहीं पूछ पाएंगे, तो धीरे-धीरे जानकारी हासिल करने, घटनाओं को समझने, चिंताओं और आपत्तियों को सामने रखने के रास्ते कम होते जाएंगे.
लोकतंत्र सिर्फ एक बार वोट डालने और फिर चुप रहने का नाम नहीं है. यह एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है, जो किसी भी सरकार के पूरे कार्यकाल तक बनी रहती है.
पत्रकारिता को उन सवालों को देश के सर्वोच्च पदों तक पहुंचाने का माध्यम माना जाता है. यही मीडिया की भूमिका है और उसे अपना काम करने की अनुमति मिलनी चाहिए.
सवाल लेना (भले ही उनके जवाब न दिए जाएं) इस बात को रेखांकित करेगा और सुनिश्चित करेगा कि इतनी केंद्रीकृत सरकार चलाने वाले प्रधानमंत्री जवाबदेह बने रहें.
हाल ही में बंगाल चुनावों तक उन्होंने कहा था कि लोगों का वोट सीधे उनके लिए था. अगर सत्ता का आनंद लेते हैं, तो उसके साथ बड़ी जिम्मेदारी भी आती है – स्पाइडरमैन के मशहूर कथन को याद करें. प्रधानमंत्री को सवालों से असहजता इसलिए है क्योंकि यह उनके खुद को ‘नॉन बायोलॉजिकल’ बताने या अपने पद को किसी दैवीय स्वरूप से जोड़ने वाले दावों के साथ सहज नहीं बैठता. सवाल वर्तमान और वास्तविक परिस्थितियों से जुड़े होते हैं. उनसे बचना या उनके लिए उपलब्ध न होना, खुद को बहस और जवाबदेही से ऊपर रखने जैसा है.
लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति जवाबदेही के बिना व्यवस्था कैसी होगी? कार्यपालिका सीधे संसद के प्रति जवाबदेह होती है, लेकिन एक स्वस्थ लोकतंत्र में उसे कई स्वतंत्र संस्थाओं के प्रति भी जवाबदेह होना पड़ता है- जिनमें मीडिया भी शामिल है, जिसका काम सवाल पूछना और जवाब मांगना है. यदि यह अधिकार छीन लिया जाए, तो इसका मतलब कार्यपालिका को बिना रोक-टोक काम करने की छूट देना होगा.
मीडिया का काम सरकार की तयशुदा बातों को जस का तस दोहराना नहीं, बल्कि सवाल पूछना है. सरकार की बातों का प्रचार करना उसके प्रवक्ताओं का काम है. इस मामले में हेले ल्यूंग बिल्कुल सही कहती हैं, जब वह कहती हैं, ‘पत्रकारिता कभी-कभी टकरावपूर्ण होती है. हम जवाब तलाशते हैं. अगर कोई व्यक्ति, खासकर सत्ता में बैठा व्यक्ति, मेरे सवाल का जवाब नहीं देता, तो मैं उसे रोककर अधिक स्पष्ट और केंद्रित जवाब लेने की कोशिश करूंगी. यही मेरा काम और जिम्मेदारी है. मुझे जवाब चाहिए, केवल तयशुदा बातें नहीं.’
अगर मीडिया केवल प्रचार का माध्यम बन जाए, तो नागरिक सही जानकारी के आधार पर अपने फैसले कैसे करेंगे? अगर नागरिकों को भेड़ों में नहीं बदलना है या हमेशा के लिए चुप नहीं कर देना है, तो सवाल जरूरी हैं. प्रधानमंत्री और सरकारों को सवालों का सामना करना चाहिए. इसमें हमारी सरकार भी शामिल है.
अंत में, जिस तरह सरकार समर्थकों और उन लोगों द्वारा हेले ल्यूंग को व्यक्तिगत रूप से ट्रोल किया जा रहा है, जो बिना प्रेस कॉन्फ्रेंस वाली व्यवस्था का समर्थन करते हैं, वह मानो उसी बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है. 2023 में भी ऐसा हुआ था, जब एक अमेरिकी महिला पत्रकार ने मोदी से उनकी सरकार के अल्पसंख्यकों के प्रति रवैये पर सवाल पूछा था. उसके बाद भारत के बदनाम, अश्लील और अभद्र ट्रोल्स ने उनके खिलाफ हमले शुरू कर दिए थे, और स्थिति ऐसी बनी कि ह्वाइट हाउस को उनके बचाव में आगे आना पड़ा. सिर्फ यह घटना ही भारत के सार्वजनिक विमर्श की गंभीर समस्याओं को दिखाने के लिए काफी थी.
यहां ट्रोल केवल ट्रोल नहीं हैं, बल्कि उनमें से कई को देश के बड़े नेताओं का संरक्षण और समर्थन भी मिलता है, और उनके विचार कई निर्वाचित प्रतिनिधियों की सोच से मेल खाते हैं. यही असली समस्या है.
स्थिति को और गंभीर यह पहलू बनाता है कि विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में नॉर्वे पहले स्थान पर है, जबकि भारत 180 देशों में 157वें स्थान पर है.
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