(पत्रकारिता में सवालों के महत्त्व पर दो लेखों की श्रृंखला का यह पहला भाग है.)
माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय के कुलपति रहे और कभी ‘सबकी ख़बर ले, सबकी ख़बर दे’ वाले अख़बार में सबकी ख़बर लेते और सबकी ख़बर देते रहे वरिष्ठ पत्रकार जगदीश उपासने का हेले ल्यूंग प्रकरण में असंतुलन केवल सत्ता-भक्त की प्रतिक्रिया नहीं; भारतीय पत्रकारिता की आत्मा में आई गहरी थकान, डर, रुग्णता और सत्ता-भक्ति का चिंताजनक लक्षण है.
जो आजीवन पत्रकारिता के विद्यार्थियों और पाठकों को समझाता रहा कि पत्रकारिता पांच डब्ल्यू और एक एच यानी कौन, क्या, कब, कहां, क्यों और कैसे पर टिके प्रश्नों का देदीप्यमान पुंज है, वह आज प्रधानमंत्री से पूछे गए एक सामान्य प्रश्न पर इतना विचलित कैसे हो सकता है? जिस पत्रकारिता का स्वभाव ही सत्ता से प्रश्न करना है, उसी के संपादक-कुलपति का प्रश्नकर्ता महिला पत्रकार की निजी तस्वीरों तक बहस को ले जाना पत्रकारिता की मर्यादा, स्त्री-गरिमा और बौद्धिक ईमानदारी के मर्म पर की गई चोट उसी कुल की पीड़ा है, जैसी दुर्योधन और दु:शासन ने भरे दरबार द्रोपदी के हृदय से कराह के रूप में गूंजी थी.
प्रश्न यह नहीं कि हेले ल्यूंग ने क्या पहना; प्रश्न यह है कि उन्होंने सत्ता से प्रश्न क्यों किया? उस प्रश्न से हमारे भीतर बैठे चाटुकार इतने असहज क्यों हो गए? एक सामान्य ट्रोल ऐसा करे तो भी निंदनीय है; लेकिन पत्रकारिता विश्वविद्यालय का कुलपति रह चुका प्रख्यात पत्रकार प्रश्न का उत्तर तर्क के बजाय प्रश्नकर्ता की निजी छवि से दे तो यह केवल पतन नहीं, पत्रकारिता-शिक्षा के भविष्य के लिए चेतावनी है.
पत्रकारिता का पहला धर्म सत्ता से प्रेम नहीं, प्रश्न है. वह राजसभा की वंदना नहीं, जनसभा की बेचैनी है. वह प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, मंत्री, उद्योगपति, कुलपति, न्यायाधीश आदि किसी भी शक्ति-केंद्र के सामने हाथ जोड़कर खड़ी शिष्ट प्रार्थना नहीं; समाज की ओर से उठी वह प्रतापी उंगली है, जो पूछती है : क्यों, कैसे, कब, कहां, किसके लिए, किस कीमत पर?
सवालों की नींव पर खड़ा पेशा
पत्रकारिता का पूरा व्याकरण ही पांच डब्ल्यू और एक एच पर खड़ा है. Who, What, When, Where, Why और How केवल कक्षा में रटाए जाने वाले सूत्र नहीं; वे लोकतंत्र की श्वसन-क्रिया का हिस्सा हैं. जिस दिन पत्रकार का ‘क्यों’ असभ्यता कहलाने लगे, उसी दिन लोकतंत्र का ‘क्यों’ भी देशद्रोह कहलाने लगेगा.
नॉर्वे में हेले ल्यूंग स्वेंडसन ने 18 मई 2026 को ओस्लो में प्रधानमंत्री मोदी और नॉर्वे के प्रधानमंत्री योनास गार स्तूरे की संयुक्त प्रेस-कॉन्फ्रेंस के बाद प्रधानमंत्री मोदी से यही पूछा कि वे ‘दुनिया की सबसे स्वतंत्र प्रेस’ से कुछ प्रश्न क्यों नहीं लेते. यह प्रश्न न तो साज़िश थी, न राजकीय अपमान. यह पत्रकारिता का सबसे सामान्य, सबसे वैध, सबसे बुनियादी कर्म था. हेले ‘दाग्स-अवीसेन’ से जुड़ी पत्रकार हैं और उन्होंने नॉर्वे के प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में प्रथम तथा भारत के 157वें स्थान का संदर्भ दिया था.
पत्रकार का प्रश्न हमेशा ड्राइंगरूम की चाय जैसा ज़ायकेदार नहीं होता. वह कभी-कभी दरवाज़े पर अचानक पड़ी दस्तक और कभी-कभी सबसे अधिक दुखती रग पर थोड़ा ज़ोर से दबा देना भी होता है. लोकतंत्र इसी पीड़ा से ही क्रीड़ा कर पाता है.
सरकार के पास जवाब था: यह औपचारिक प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं थी. दूतावास अलग ब्रीफिंग के लिए बुला सकता है. अधिकारी चाहते तो भारत के लोकतांत्रिक ढांचे का बचाव कर सकते थे. यह सब वैध है. पर प्रश्न पूछने वाली पत्रकार को ‘हिट जॉब’, ‘विदेशी एजेंट’, ‘स्टंटबाज़’ या ‘चरित्रहीन’ घोषित करना पत्रकारिता नहीं, सत्ता-भक्ति से उपजा पतित और असुरक्षित क्रोध है.
डिजिटल और वैश्विक युग में पत्रकारिता किसी एक राष्ट्रवादी चश्मे में बंद नहीं हो सकती. पत्रकारिता की पहली निष्ठा सत्य से और पहली वफादारी नागरिकों से है; पत्रकारिता की आत्मा सत्यापन और सत्ता से स्वतंत्रता में है. मीडिया की नैतिकता सदा से ही सत्य, अहिंसा और मानवीय गरिमा के सिद्धांतों पर टिकी रही है.
स्त्री-द्वेषी निगाह
पत्रकारिता विश्वविद्यालय के कुलपति रहे जगदीश उपासने जैसे वरिष्ठ पत्रकार से अपेक्षा यह थी कि वे प्रश्न की भाषा, प्रसंग, समय या शिष्टाचार पर आलोचना करते. वे पूछ सकते थे कि क्या यह मंच प्रश्न के लिए उपयुक्त था. वे हेले के स्रोत, रिपोर्टिंग रिकॉर्ड या तथ्यात्मक दावों की पड़ताल कर सकते थे. पर बहस का केंद्र प्रश्न से हटाकर पत्रकार की निजी छवि, उसके अंतर्वस्त्र, उसके सोशल मीडिया फॉलोअर, उसके ब्लू टिक, उसकी पुरानी गतिविधि या उसकी निजी तस्वीरों की ओर मोड़ दिया जाता है तो यह पत्रकारिता नहीं, चरित्र-हनन की भीड़ वाली मानसिकता है.
और अगर इस मानसिकता से एक प्रख्यात पत्रकार और एक विश्वविद्यालय का कुलपति का मन-मस्तिष्क भी प्रदूषित हो रहा है तो फिर जनसामान्य को तो सब दोष माफ हैं.
सबसे बड़ा नैतिक प्रश्न है, किसी महिला पत्रकार की बिकिनी या निजी तस्वीर का पूछे गए प्रश्न से क्या संबंध है? वह रिपोर्टिंग के दौरान क्या पूछती है, यह पत्रकारिता का विषय है. लेकिन वह छुट्टी के दिन झील किनारे क्या पहनती है, यह पत्रकारिता का विषय नहीं है.
यह वही पुराना स्त्री-विरोधी हथकंडा है, जिसमें स्त्री के तर्क का उत्तर उसके शरीर से दिया जाता है. पुरुष पत्रकार प्रश्न पूछे तो उसे आक्रामक, तेज, निर्भीक कहा जाता है; महिला पत्रकार प्रश्न पूछे तो उसकी फोटो खोजी जाती है. यह मिसोजिनी (स्त्री-द्वेष) नहीं तो क्या है?
यह प्रसंग इसलिए और गंभीर है; क्योंकि पत्रकारिता का शिक्षक हमारी पीढ़ियों की नैतिक कल्पना गढ़ता है. उसके विद्यार्थी देखते हैं कि उनके गुरु प्रश्न पूछने वाली महिला पत्रकार के साथ कैसा व्यवहार करते हैं. वे सीखते हैं कि सत्ता से असहमति का जवाब तथ्य से देना है या फोटो से. वे समझते हैं कि आलोचना का अर्थ विश्लेषण है या अपमान.
सवालों से असहज होती पत्रकारिता: दशकभर का हासिल!
पत्रकारिता विश्वविद्यालय का कुलपति, पूर्व कुलपति, शिक्षक या वरिष्ठ पत्रकार एक सामान्य प्रश्न से असहज हो जाए तो समस्या व्यक्ति की नहीं; संस्था की आत्मा में प्रवेश कर जाती है.
विडंबना देखिए; जिस पत्रकारिता की परंपरा में ‘सबकी ख़बर ले, सबकी ख़बर दे’ जैसा वाक्य जीवित था, उसी परंपरा से निकले लोग कभी-कभी ‘सत्ता की ख़बर मत लो, प्रश्न पूछने वाले की ख़बर लो’ तक पहुंचते हैं.
यह परिवर्तन अचानक नहीं आया. पिछले एक दशक में पत्रकारिता के बड़े हिस्से में एक नई मानसिकता चली आई है : सत्ता से प्रश्न पूछना ‘विरोध’ है और विपक्ष से प्रश्न पूछना ‘राष्ट्रवाद’. पत्रकारिता केवल प्रिय नेता की रक्षा और अप्रिय आवाज़ों की निंदा बन जाए तो वह सूचना नहीं, प्रोपेगैंडा है.
भारत की ओर से विदेश मंत्रालय के अधिकारी सिबी जॉर्ज ने भी ब्रीफिंग में भारत की संवैधानिकता, लोकतंत्र, महिलाओं के मताधिकार और मीडिया के विशाल ढांचे का बचाव किया. लेकिन प्रेस स्वतंत्रता का प्रश्न केवल यह नहीं है कि देश में कितने टीवी चैनल हैं. संख्या स्वतंत्रता का प्रमाण नहीं होती. यदि सौ चैनल एक ही भय, एक ही दबाव, एक ही मौन या एक ही महिमामंडन में बंद हो जाएं तो सौ स्क्रीन भी एक ही तरह का गाढ़ा अंधेरा ही उलीचते हैं.
आरएसएफ के 2026 सूचकांक में नॉर्वे पहले स्थान पर और भारत 157वें है. आरएसएफ ने भारत के लिए हिंसा, ओनरशिप कन्सनट्रेशन (कुछ मालिकों में मीडिया संगठनों का केंद्रीकरण) और राजनीतिक गुटबंदी जैसी चिंताओं का भी उल्लेख किया है. यह किसी को बताने की ज़रूरत नहीं कि जब मीडिया का मालिकाना कुछ बड़े कॉरपोरेट हाथों में सिमट जाता है तो संपादकीय स्वतंत्रता भी धीरे-धीरे मालिक की व्यावसायिक और राजनीतिक सुविधा की बंधक बनने लगती है.
यह घटना भारतीय पत्रकारिता के लिए आईना है. आईने से नाराज़ होने से चेहरा नहीं बदलता.
अगर प्रधानमंत्री से सवाल पूछना अपमान है तो फिर पत्रकारिता विश्वविद्यालयों में क्या पढ़ाया जाएगा? प्रेस नोट का संपादन? सरकारी विज्ञप्ति की भाषाई त्रुटियों का सुधार? नेता का मुस्कान वर्णन? पत्रकारिता का विद्यार्थी अगर यह देखे कि एक विदेशी पत्रकार ने प्रश्न पूछा और वरिष्ठ पत्रकारों ने उसके प्रश्न की जांच के बजाय उसके व्यक्तित्व पर हमला शुरू कर दिया तो वह क्या सीखेगा? यही न कि सत्ता से दूर रहो, ट्रोलिंग से पास. यही पत्रकारिता की मृत्यु है.
असली फ्रस्ट्रेशन यहीं है. प्रश्न से डरने वाला समाज भीतर से आश्वस्त नहीं होता. जो व्यवस्था सचमुच मज़बूत होती है, प्रश्नों की बौछार को झेलती है. जो नेता आत्मविश्वासी है, कठिन प्रश्नों से भागता नहीं, उन्हें अपने अनुभवों के पैने नश्तर से उड़ा देता है. जो पत्रकार सचमुच नैतिक होता है, वह अपने प्रिय नेता की रक्षा भी तथ्यों से करता है, न कि प्रश्न पूछने वाली स्त्री की देह को सार्वजनिक बहस में घसीटकर.
लोकतंत्र में प्रधानमंत्री की आलोचना असामान्य नहीं; असामान्य यह है कि आलोचना सुनते ही पत्रकारिता का एक हिस्सा पुलिस, अभियोजन और ट्रोल-सेना में बदल जाए.
जगदीश उपासने जैसे वरिष्ठ व्यक्ति का मामला इसलिए प्रतीकात्मक है. इंडियन एक्सप्रेस समूह की प्रश्नाकुल पत्रकारिता वाला पत्रकार भी अगर एक प्रश्न से इतना विचलित हो कि बहस को निजी हमले का रूप देने लगे तो यह केवल व्यक्तिगत असहजता नहीं, पेशेवर स्मृति का दुखद लोप है. उपासने प्रसार भारती रिक्रूटमेंट बोर्ड से भी जुड़े रहे हैं तो ऐसे व्यक्ति से अपेक्षा अधिक होती है, इसलिए निराशा भी अधिक होती है.
सही पत्रकारिता सत्ता से घृणा नहीं करती; पर सत्ता से प्रेम में भी अंधी भी नहीं होती. वह राष्ट्र से प्रेम करती है, इसलिए सरकार से प्रश्न करती है. वह नागरिकों के प्रति वफादार होती है, इसलिए नेता से जवाब मांगती है. वह सत्य से प्रेम करती है, इसलिए अफवाह, ट्रोलिंग और चरित्र-हनन से दूरी रखती है. यही इस पेशे की वैश्विक नैतिकता है, यही नागरिक धर्म है, यही मानवीय गरिमा है.
हेले ल्यूंग का प्रश्न इतिहास में बहुत बड़ा न भी हो, पर उस पर भारत की प्रतिक्रिया पत्रकारिता के चरित्र की परीक्षा अवश्य है. पत्रकारिता सचमुच जीवित है तो उसे इस तीसरे उत्तर से विद्रोह करना होगा. क्योंकि जिस दिन पत्रकार प्रश्न पूछने वाले की देह, कपड़ा, जाति, धर्म, देश, फॉलोअर और निजी जीवन में उत्तर खोजने लगेंगे, उस दिन समाचार कक्ष नहीं बचेंगे; सिर्फ़ डिजिटल चौपालें बचेंगी, जहां सत्य की जगह तमाशा होगा और पत्रकारिता की जगह भीड़ का शोर.
सवाल पूछना पत्रकारिता का अपराध नहीं; सवाल से घबराना पत्रकारिता का पतन है. लेकिन सच तो ये है कि विज्ञान ने निर्वस्त्र पुरुष के ‘यूरेका’ को सिद्धांत मानकर दुनिया में क्रांति कर दी और हमारी पत्रकारिता प्रश्न पूछती स्त्री के वस्त्र नापने बैठकर अब उसे उलटने की कोशिश कर रही है. नहीं?
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)
