सामाजिक न्याय एवं शिक्षा मंत्रालय (एमओएसजेई) द्वारा पेश किया गया ट्रांसजेंडर व्यक्तियों का संरक्षण संशोधन अधिनियम, 2026 कहता है कि यह ‘केवल उनकी सुरक्षा के लिए, जिन्हें ऐसे शारीरिक कारणों- जिसमें उनकी कोई गलती नहीं होती और न ही उनके पास कोई विकल्प होता है- के चलते गंभीर बहिष्करण का सामना करना पड़ता है.’
हालांकि यह कानून ट्रांसजेंडर वर्ग को निर्धारित करने का जिम्मा ‘जीव विज्ञान’ पर रखता है और इसे ‘सामाजिक-सांस्कृतिक वर्गों’ तक सीमित रखने के साथ-साथ ‘वास्तव में उत्पीड़ित’ ट्रांस व्यक्तियों के लिए काम करने के अपने सुरक्षात्मक विज़न को लागू करने के लिए अधिनियम के दंड प्रावधान का भी विस्तार करता है.
ट्रांसनेस (transness) यानी ट्रांस होने की एक संकीर्ण परिभाषा और ‘आत्म-पहचान’ या स्वयं-पहचान वाली श्रेणी को हटा देना निगरानी और अपराधीकरण के माध्यम से ट्रांसजेंडर समुदायों के अधिकारों के वंचन का एक तरीका है.
आपराधिक जनजातियां अधिनियम, 1871 का समर्थन
आपराधिक जनजातियां अधिनियम, 1871 ‘हिजड़ों की समस्या’ से जुड़ा गहरा डर व्यक्त करता है. यह ‘हिजड़ा बनाने की एक आम कुप्रथा को रोकने के लिए कानून’ को एक ठोस रूप देने की कोशिश थी. लोगों के मन में यह डर था कि कथित रूप से ‘बधिया’ करने की प्रकिया को आगे बढ़ाने के माध्यम से हिजड़ा समुदाय लड़कों को ‘हिजड़ा’ बनाता है.
यह ऐसा कहने जैसा है कि कोई ट्रांस व्यक्ति के शारीरिक रूप से पास होने से ट्रांस बन सकता है. एक दर्ज केस में मूला नाम का एक लड़का जो 12 साल का था और ‘बधिया नहीं था’ एक ‘हिजड़े’ के साथ रहता पाया गया था. कोई भी कानूनी सबूत न होने के बावजूद यह मान लिया गया कि मूला के साथ अप्राकृतिक सेक्स किया गया और उसे सुधार गृह में भेज दिया गया.
अब, 2026 का कानून कहता है किसी व्यक्ति को जबरदस्ती ट्रांस व्यक्ति के रूप में सामने आने के लिए मज़बूर करने के लिए कारावास और भारी जुर्माने का दंड दिया जा सकता है. यह शुद्धता के ऐतिहासिक मानदंडों को दोहराता है और हिजड़ा-ट्रांस समुदायों को निगरानी रखे जाने का कानूनी और जैविक निशाना बनाए जाने को सामान्य बना देता है.
ऐसा और भी इसलिए कि, 2026 के कानून में एक मुख्य श्रेणी ‘एक ऐसे व्यक्ति की है जिसे अंग-भंग, विपुंसन, बधियाकरण, सर्जरी, रसायनिक और हॉरमोन वाली प्रक्रियाओं’ के द्वारा ट्रांस पहचान अपनाने के लिए मज़बूर किया जाता है. ट्रांस होने को हमेशा जबरदस्ती या मज़बूरी के साथ जोड़कर कानून औपनिवेशिक युग के संस्कृतिक डर – ‘हिजड़ा गिरोह’ जवान लड़कों को जबरदस्ती उठा लेते हैं और बधिया कर देते हैं – से जुड़ा हुआ है. ये ऐसी कहानियां हैं जो 19वीं सदी में कथित ऊंची जाति के नेतृत्व वाले क्षेत्रीय अखबारों और आलेखों में भरी रहती थीं.
2026 का कानून ट्रांसजेंडर व्यक्ति की परिभाषा को ‘किन्नर, हिजड़ा, अरावनी, या जोगता जैसी सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान वाले व्यक्ति;’ ‘इंटरसेक्स विविधताओं वाले व्यक्ति;’ या ‘जबरदस्ती, आकर्षण, उकसावे से, धोखे से, या अनुचित प्रभाव के माध्यम से कोई भी जो खुद को ट्रांस के रूप में पेश कर रहा है’ – के रूप में और भी संकीर्ण बना देता है. इसका उद्देश्य उन लोगों को हटा देना है जो ‘खुद महसूस की गई’ पहचान के आधार पर ट्रांसजेंडर हैं.
शारीरिक बनावट के आधार पर ट्रांस होने के तर्क को इस तथ्य से समर्थन मिलता है कि ट्रांस व्यक्ति को पहचान पत्र मिलने से पहले ‘मेडिकल बोर्ड’ को शारीरिक जांच के बाद जिला मजिस्ट्रेट को सिफ़ारिश भेजना अनिवार्य है. यह एक अपमानजनक ढांचे का निर्माण करता है जो बेरोकटोक सरकार प्रायोजित यौन हिंसा को संभव बना सकता है.
कुल मिलाकर, यह सब चीजें ऐतिहासिक रूप से औपनिवेशिक ‘हिजड़ों के रजिस्टर’ की याद दिलाती हैं जिसमें हिजड़ा समुदायों के जननांगों का विवरण रखा जाता था. यह ट्रांस जीवन को नीचा दिखाने और नियंत्रण करने के तरीके के रूप में सर्जरी और बायोडेटा रखने की सदियों पुरानी चिकित्सा, लिंग संबंधी सनक थी.
तर्क संबंधी भ्रांतियां और ब्राह्मणवादी मिथक
इसके अलावा, खुद को ट्रांस मानने वालों की तुलना में इन समुदायों में से किसी से भी संबंध रखने वाले ट्रांसजेंडर व्यक्ति यह कैसे साबित करेंगे कि वे उस ‘सामाजिक-सांस्कृतिक’ पहचान से जुड़े हुए हैं?
ऐसा कोई विशिष्ट सिस्टम नहीं है, और कानून के ऊपर अधिकांश मौजूदा आलोचनाओं ने अभी भी यह प्रश्न नहीं उठाया है कि व्यक्ति के ‘हिजड़ा होने’ को साबित करने के लिए कौन सी कानूनी प्रक्रिया है. प्रावधान असपष्ट है और ट्रांस होने के सभी रूपों, ‘सामाजिक-सांस्कृतिक’ और अन्य के आकलन को ‘मनमाने’ और ‘निरंकुश’ नौकरशाही विवेक की दया पर छोड़ देते हैं.
किन्नर/हिजड़ा/अरावनी/जोगता और ‘खुद को ट्रांस मानने वाले’ लोगों के बीच एक झूठी बाइनरी बनाए रखना इस बात को भी नज़रअंदाज़ करता है कि ‘सामाजिक-सांस्कृतिक’ समूह और पीढ़ियों से चले आ रहे ट्रांस रिश्ते-नाते खुद भी ‘खुद की पहचान’ के माध्यम से ही बनते हैं. (भले ही ऐसा करते हुए कई समुदायों जैसे कि तिरुनंगई, नुपी मानबी, ख्वाजा सिरा; ट्रांस पुरुषों के सभी समुदायों- उदाहरण के लिए नुपी मानबा और तिरुनंबी; और साथ ही उत्तर भारतीय मुख्यधारा से बाहर की कई क्षेत्रीय ट्रांस पहचानों के नाम छूट जाते हैं.)
आखिर में यह एक बार फिर से इस अस्पष्ट धारणा को मज़बूत करता है कि ऐसे समुदायों को अपनी ‘सामाजिक-सांस्कृतिक’ पहचान कभी भी अपनी पसंद से नहीं केवल जबरदस्ती से या जन्म से मिलती है. असल में, इन पहचान समूहों ‘का हिस्सा होने’ के सच को बस व्यावहारिक, जबरदस्ती, इत्तेफाक से होने वाले, श्रेणीबद्ध के तौर पर नहीं समझा जा सकता, जिस तरह से कानून इशारा करता है.
इसके उलट, इन पहचानों को जटिल, क्षेत्रीय, और अंतरपीढ़ीगत रिश्तों के ढांचे के अंदर रखा जाना चाहिए. ये ढांचे ऐतिहासिक रूप से कई ट्रांस लोगों के लिए बेहद ज़रूरी रहे हैं – खासकर तब, जब उन्हें सिस-समाज की हर तरफ से होने वाली हिंसा और अपने जन्म के परिवार से मिले अकेलेपन का सामना करना पड़ा हो.
इसके साथ ही, इन ढांचों पर लगातार सही तरीके से बातचीत और सवाल भी उठते रहे हैं, क्योंकि कई बार ट्रांस रिश्तों के ये ताने-बाने भी अपने अंदर ऊंच-नीच, जातिगत भेदभाव और सत्ता की पकड़ को बनाए रखते हैं.
कुल मिलाकर, कानून एक जाल बिछा रहा है, जहां अंग्रेजी बोलने वाले, पढ़े-लिखे, जाति और वर्ग विशेषाधिकारों वाले ट्रांस लोग ‘आत्म-पहचान’ के रूप में अपनी एजेंसी का फायदा ले पाएंगे (इस तरीके से, जो विरोधाभासी रूप से, उनको पूरी तरीके से कानूनी मान्यता से दूर करता है और परिणाम स्वरूप अधिकारों से वंचित करता है.)
हालांकि, विशेष रूप से, काम करने वाला वर्ग और जाति-उत्पीड़न का शिकार हिजड़ा-ट्रांस समुदाय हिंदू राष्ट्र की व्यवस्था के अधीन हैं (वे ऐसे निष्क्रिय पीड़ित हैं, जिन्हें निगरानी और अपराधीकरण की व्यवस्थाओं के माध्यम से सरकार के परोपकारी हस्तक्षेप की ज़रूरत होती है) जिनकी अपनी कोई ताकत या कहें एजेंसी नहीं है. खास तौर से ‘किन्नरों’ को तो अब भी ‘देवत्व’ के संकीर्ण नज़रिये से देखा जाता है, जो उन्हें हिंदुत्व के धार्मिक कार्यों में एक कमज़ोर जगह देता है. उस पर ट्रांस महिलाओं के ‘भारत किन्नर अखाड़ा’ जैसे भाजपा-समर्थक समूह, और राम मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा और महाकुंभ जैसे आयोजनों में उनकी उपस्थिति आधिकारिक रूप से दिव्य ट्रांस स्वरूप को दक्षिणपंथी सह-विकल्प के तौर पर वैधता देती है.
‘सामाजिक-सांस्कृतिक’ समुदायों को असाधारण से नाम देने का तरीका संभवतः हिंदुत्ववादी सरकार की उस रणनीति के तालमेल में है जिसका उद्देश्य भारतीय पौराणिक अतीत से जुड़ी प्रतीकात्मक मान्यताओं को बनाए रखना है; इस अतीत में कुछ खास पहचानें (खासकर ‘किन्नर’ और अब अप्रचलित हो चुके ‘अरावनी’) ब्राह्मणवादी व्यवस्था के लिए बहुत अहम थीं, और कई बार तो वे इस व्यवस्था के साथ मिलकर भी काम करती थीं.
इसके साथ ही यह पक्का किया जाता है कि ट्रांस समुदायों के खिलाफ होने वाले उत्पीड़न और हिंसा की मौजूदा स्थिति में कोई अड़चन न आए; इसके लिए इन समुदायों के सदस्यों को (खासकर जो जाति और वर्ग के आधार पर हाशिए पर हैं) रोज़मर्रा की निगरानी और अपराधीकरण के अलग-अलग स्तरों का सामना करने के लिए मज़बूर किया जाता है. ऐसा करके, यह कानून एक पुरानी रणनीति को ही दोहराता है- जिसके तहत हिजड़ा और ट्रांस लोगों को एक ही समय पर ‘अलौकिक’ (ब्राह्मणवादी पौराणिक कथाओं की दुनिया में) और (वास्तविक दुनिया में) ‘इंसान से भी नीचे’ के रूप में पेश किया जाता है.
यह उस व्यापक प्रवृत्ति का ही एक सशक्त उदाहरण है, जिसमें सरकार ने एक तरफ तो हाशिए के अधिकाधिक समुदायों को कुछ शर्तों के साथ हिंदू जाति-व्यवस्था में शामिल कर लिया है, और दूसरी तरफ, उनसे गरिमापूर्ण जीवन जीने के किसी भी अर्थपूर्ण अधिकार को छीन लिया है.
निगरानी का डिजिटल ढांचा
कानून के स्वास्थ्य देखभाल और अपराधीकरण के प्रस्तावित ढांचे को धारा 7 में संशोधण के जरिये सफल बनाया गया है. धारा 7 चिकित्सा संस्थानों के लिए यह ज़रूरी करती है कि वे ‘उस व्यक्ति, जिसने जेंडर बदलने (चाहे पुरुष के रूप में या महिला के रूप में) के लिए सर्जरी करवाई है, से जुड़ा विवरण जिला मजिस्ट्रेट और अधिकारी को, निर्धारित प्रारूप और तरीके से उपलब्ध कराएं.’
हालांकि इस जानकारी को साझा करने के लिए निर्धारित फॉर्म और तरीका अभी भी स्पष्ट नहीं है, लेकिन अपने आप में यह प्रावधान, इस स्वास्थ्य डेटा, जिसमें व्यक्ति कि निजी मेडिकल जानकारी शामिल है, पर गंभीर सवाल उठता है कि भारतीय सरकार और कॉरपोरेट द्वारा इसे कैसे जमा किया जाएगा, साझा किया जाएगा और संभव है पैसे बनाए जाएंगे.
खास तौर पर डेटा की सुरक्षा के लिए मौजूदा कानूनी ढांचा काफी कमज़ोर है – डिजिटल निजी डेटा सुरक्षा (डीपीडीपी) अधिनियम 2023 – जो सरकार की अलग-अलग शाखाओं के बीच डेटा साझा करने की इजाज़त देता है. इसमें पुलिस के साथ-साथ निजी कंपनियां भी शामिल हैं. यह कल्पना करना मुश्किल नहीं है कि जिला मजिस्ट्रेट/जिला कलेक्टर (किसी भी ज़िले में शासन की मुख्य इकाई) के साथ डेटा साझा करना, और साथ ही भारत में डेटा साझा करने के लिए ज़रूरी ‘आपसी तालमेल’ (इंटरऑपरेकानूनिटी) के सिद्धांत को मिलाना, कैसे अलग-अलग ज़िलों और नतीजतन, पूरे देश में सर्जरी करवा रहे किसी भी ट्रांस व्यक्ति की ‘360-डिग्री प्रोफ़ाइल’ बनाने में मदद कर सकता है.
मेडिकल हिस्ट्री साझा करना, एचआईवी-पॉज़िटिव ट्रांस व्यक्ति को ज़रूरत से ज़्यादा सबके सामने लाने और उन पर नज़र रखने के मामले में खास तौर पर नुकसानदायक हो सकता है- जिन्हें पहले से ही हमेशा ‘सेक्स वर्कर’ के तौर पर लांछित किया जाता रहा है, और जिन्हें एक ऐसे ‘संक्रमण’ का प्रतीक माना जाता है जिसे आम सिसजेंडर आबादी से दूर रखना ज़रूरी है.
सरकार का ब्राह्मणवादी पारिवारिक व्यवस्था के साथ जो गहरा जुड़ाव है, उसे देखते हुए, ऐसी कौन सी चीज़ है जो जन्म से जुड़े रिश्तेदारों को ट्रांस स्वास्थ्य डेटा तक पहुंचने से, या इसके लिए ज़िला कार्यालय से स्वेच्छा से गुहार लगाने से रोक सके? और ऐसा होने पर, ऊपर बताए गए ट्रांस लोगों पर ज़बरदस्ती और उनके अपहरण से जुड़े प्रावधानों का दुरुपयोग और भी ज़्यादा बढ़ सकता है. खासकर 21 मार्च को सामाजिक न्याय और शिक्षा मंत्रालय (एमओएसजेई) और ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की राष्ट्रीय परिषद के बीच हुई बैठक के संदर्भ में, जहां यह कहा गया था कि हिंसक जन्मदाता परिवार ‘आखिरकार माता-पिता ही होते हैं’ और अपने ट्रांस बच्चों के खिलाफ किए गए अपराधों के लिए अधिकारियों द्वारा उन्हें कभी सज़ा नहीं दी जाएगी.
यह सब मिलकर ट्रांस लोगों के लिए जीवन बचाने वाली स्वास्थ्य सेवाएं पाने में एक बड़ी रुकावट का काम करता है. खास तौर पर, ट्रांस और हिजड़ा समुदाय द्वारा चलाए जा रहे फ्रंटलाइन हेल्थकेयर नेटवर्क, समुदाय-आधारित संगठन, और केसवर्कर्स के अनौपचारिक/औपचारिक समूह, जिन्होंने लंबे समय से चली आ रही सरकारी उपेक्षा के बावजूद, जेंडर-पुष्टि करने वाली स्वास्थ्य सेवाएं (जेंडर-अफ़र्मिंग हेल्थकेयर) उपलब्ध कराने के लिए सालों तक बिना थके मेहनत की है, इन डेटा साझा करने के आदेशों और साथ ही ऊपर बताए गए ‘ज़बरदस्ती’ वाले अतिरिक्त प्रावधान का सबसे ज़्यादा और बेरहमी से शिकार बनने की आशंका रखते हैं.
निजी कंपनियों के साथ इस डेटा को साझा करने की संभावना, ‘मेडिकल-इंडस्ट्रियल कॉम्प्लेक्स’ के नव-उदारवादी रूप से मज़बूत होने के ज़रिए, सरकार के पूरी तरह से निजीकरण (जो ‘सार्वजनिक-निजी भागीदारी’ से भी आगे है) को और बढ़ा देती है. सरकार और निजी कंपनियों के बीच डेटा के आपसी लेन-देन का उदाहरण तब देखने को मिला था, जब टेलीकॉम कंपनियों ने ‘आदतन अपराधियों’ की रोज़ाना की गतिविधियों पर नज़र रखने के लिए पुलिस के साथ कॉल रिकॉर्ड का डेटा साझा किया था. यह एक मिसाल बन सकता है, खासकर सोशल मीडिया कंपनियों के लिए, ताकि वे भी इस संदर्भ में ऐसा ही करें; ऐसा इसलिए है क्योंकि इस कानून में ‘अनुरोध’ (solicitation) को लेकर जांच-पड़ताल बढ़ा दी गई है, और साथ ही ट्रांस लोगों को ऐतिहासिक रूप से निशाना बनाया जाता रहा है, जिनकी ऑनलाइन ज़िंदगी अक्सर यौन आत्म-अभिव्यक्ति, और डिजिटल अंतरंगता व यौन श्रम के विभिन्न रूपों के बीच ही कटती है.
2019 के अधिनियम में ही इस बात को जिस तरह से स्वीकार किया गया था, उसमें पहले से ही बहुत कुछ अधूरा रह गया था- जैसे कि स्माइल पोर्टल पर ट्रांसजेंडर आईडी कार्ड के लिए रजिस्ट्रेशन के केस में डेटा गोपनीयता की सुरक्षाएं संदिग्ध थीं, या लगभग न के बराबर थीं. कुल मिलाकर, यह उस ‘निगरानी के डिजिटल ढांचे’ की नींव तैयार करता है, जिसे ट्रांस लोगों के लिए बनाया गया है.
इस तरह से अधिकारों में शामिल करना और शरीरों की निगरानी करना- ये हमेशा से ही दो ऐसे जुड़वां एजेंडे रहे हैं, जिन्हें सरकार एक साथ आगे-पीछे करके इस्तेमाल करती आई है. और यह साफ़ है कि इन एजेंडों को किसी भी पल बदला जा सकता है, वापस लिया जा सकता है, या फिर से सक्रिय किया जा सकता है, ताकि एक तरफ समुदायों को पहचान देने का वादा करते हुए ही दूसरी तरफ उन्हें अपराधी भी ठहराया जा सके.
इस कानून के कारण दस्तावेज़ों में जो अनोखे दोष पैदा होंगे, वे जाति-उत्पीड़ित और मुस्लिम ट्रांस लोगों के लिए अनोखी असुरक्षाएं खड़ी करते हैं; इससे उनके जेल जाने, देश-निकाला, अपराधीकरण और यहां तक कि नागरिक न होने का खतरा और भी बढ़ जाता है. विशेष रूप से सीएए/एनआरसी के बाद के दौर और जाति प्रमाण पत्र हासिल करने में आ रही लगातार हिंसक रुकावटों को देखते हुए, यह कानून पहचान की उन पहले से ही दोषपूर्ण व्यवस्थाओं के साथ मिलकर काम करने का खतरा पैदा करता है, जिनका मकसद इन समुदायों को उनके अधिकारों से वंचित करना है.
ठीक इसी कारण से, जाति-विरोधी ट्रांस आंदोलन की सबसे पुरानी और अब तक अनसुनी मांग शिक्षा और रोज़गार में ‘क्षैतिज आरक्षण’ (Horizontal Reservations) की रही है; यह आरक्षण ट्रांस समुदाय के भीतर मौजूद इन ढांचागत असमानताओं को दूर करने की दिशा में कारगर साबित हो सकता है.
‘स्वदेशी’ श्रेणियों के ज़रिए ‘कानून को औपनिवेशिक प्रभाव से मुक्त करने’ की बात का इस्तेमाल लगातार किया गया है- जैसे कि 2023 में नए आपराधिक कानूनों को लागू करते समय किया गया था, ताकि अपराध की श्रेणी में आने वाली चीज़ों का दायरा बढ़ाया जा सके.
सरकार अक्सर ‘सबसे ज़्यादा दमित’ लोगों की पहचान तय करने के लिए उसी ‘क्रीमी लेयर’ वाले तर्क का इस्तेमाल करती है, जिस पर आरक्षण के मामलों में अक्सर भरोसा किया जाता है; ऐसा करके उसका मकसद आखिरकार 2019 के कानून के दायरे को सीमित करना होता है. ऐसा करते हुए यह कानून ट्रांसजेंडर आंदोलन के भीतर जाति, वर्ग और क्षेत्रीय पहचान के आधार पर मौजूद पुरानी दरारों को और भी उभार देता है.
हालांकि, तुलना करने के चक्कर में जेंडर, जाति और धर्म जैसी अलग-अलग राजनीतिक श्रेणियों को आपस में न मिलाने का ध्यान रखना ज़रूरी है, लेकिन इन प्रस्तावित संशोधनों के पीछे के तर्कों को विशेष कानूनों के लंबे इतिहास के संदर्भ में देखना बेहद महत्वपूर्ण है- जैसे कि ‘अत्याचार निवारण अधिनियम’ – जिन्हें भी इसी तरह कमज़ोर किया गया है; इसके लिए ‘कानून के दुरुपयोग’ की आड़ लेकर ‘आदर्श पीड़ित’ की धारणा को एक हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया गया.
2026 का संशोधन ‘आदर्श (ट्रांस) पीड़ित’ की एक नई श्रेणी बनाकर एक तीर से कई निशाने लगाने की कोशिश करता है, ताकि वह अपना मनचाहा मकसद – यानी, पहले से ही कमज़ोर स्थिति में मौजूद ट्रांस अधिकारों को बड़े पैमाने पर नकार देना – हासिल कर सके.
(जैस्मीन डी* (परिवर्तित नाम) लेखक और एक ट्रांस महिला हैं. निकिता सोनवणे वकील, कानूनी रिसर्चर और आपराधिक न्याय और पुलिस जवाबदेही प्रोजेक्ट की सह-संस्थापक हैं.)
(मूल रूप से अंग्रेज़ी में आउटलुक पर प्रकाशित इस आलेख को सुनीता भदौरिया द्वारा अनूदित किया गया है.)
