नई दिल्ली: भारत में ईसाइयों के खिलाफ हिंसा पर पीपुल्स ट्रिब्यूनल, जिसे कारवां-ए-मोहब्बत और जागरूक नागरिकों के एक समूह ने 1 जून को आयोजित किया, ने देश के विभिन्न राज्यों में ईसाई समुदाय को निशाना बनाकर की जा रही हिंसा और भेदभाव में चिंताजनक वृद्धि पर चिंता व्यक्त की है.
इस कार्यक्रम में देश भर में ईसाइयों पर हमलों में व्यापक हिंसा, सामाजिक बहिष्कार और संस्थागत मिलीभगत के साक्ष्य पेश किए गए. यह न्यायाधिकरण एक व्यापक जांच प्रक्रिया का समापन था, जिसके अंतर्गत अप्रैल 2026 में छत्तीसगढ़ और मई 2026 में ओडिशा में क्षेत्रीय दौरे और जन-सुनवाइयां आयोजित की गई थीं.
इन दौरों के दौरान न्यायाधिकरण के सदस्यों ने सैकड़ों प्रभावित लोगों से मुलाकात की और ईसाई समुदायों – विशेषकर आदिवासी और दलित आबादी -द्वारा झेली जा रही हिंसा, सामाजिक बहिष्कार और संवैधानिक अधिकारों से वंचित किए जाने के पैटर्न का दस्तावेजीकरण किया गया.
एक जून को दिल्ली स्थित कॉन्स्टिट्यूशन क्लब में आयोजित न्यायाधिकरण में उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, गुजरात और ओडिशा से आए प्रतिनिधियों और पीड़ितों ने अपने अनुभव साझा किए. कार्यवाही के दौरान पूजा स्थलों, पादरियों और धार्मिक नेताओं पर हमलों, सामाजिक और आर्थिक बहिष्कार, दफनाने के अधिकार से वंचित किए जाने, गांवों से निष्कासन, हिंदुत्व संगठनों की भूमिका तथा राजनीतिक नेताओं, पुलिस और न्यायिक संस्थाओं के आचरण की समीक्षा की गई.
वक्ताओं ने धर्मांतरण विरोधी कानूनों के संचालन और कानूनी उपाय चाहने वाले पीड़ितों को होने वाली कठिनाइयों के बारे में भी चिंताएं व्यक्त कीं.
कार्यक्रम में वरिष्ठ पत्रकार और मानवाधिकार कार्यकर्ता जॉन दयाल ने ईसाइयों के खिलाफ समकालीन हिंसा को एक व्यापक ऐतिहासिक संदर्भ में रखते हुए गुजरात में हुए हमलों, ओडिशा में ग्राहम स्टेन्स और उनके दो बेटों की हत्या, कंधमाल हिंसा के दौरान बड़े पैमाने पर हुए विस्थापन और विनाश को याद किया. उन्होंने आगाह किया कि अंतरात्मा की स्वतंत्रता, धर्म और समान नागरिकता की संवैधानिक गारंटियां अब तेज़ी से खतरे में पड़ रही हैं.
वहीं, एसी माइकल ने प्रार्थना सभाओं और पूजा स्थलों के प्रति बढ़ती शत्रुता के सामान्यीकरण पर चिंता व्यक्त की. उन्होंने कहा कि शांतिपूर्ण धार्मिक उपासना को लगातार सार्वजनिक व्यवस्था और राष्ट्रीय हित के लिए खतरे के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है. साथ ही उन्होंने कानूनी अल्पसंख्यक संस्थाओं में ईसाई प्रतिनिधित्व की कमी पर भी चिंता जताई.
सामाजिक बहिष्कार के मुद्दे पर बात करते हुए सिजू थॉमस ने ईसाइयों के सामाजिक और आर्थिक बहिष्कार, निष्कासन और समाज से अलग-थलग किए जाने पर ज़ोर दिया – खास तौर पर उन परिवारों और स्वतंत्र समुदायों के सदस्यों के मामले में जिन्होंने हाल ही में ईसाई धर्म अपनाया है. उन्होंने बताया कि सामुदायिक संसाधनों तक पहुंच से वंचित करना, सामाजिक अलगाव, विस्थापन और दफनाने के अधिकार पर प्रतिबंध अब दबाव और नियंत्रण के साधन बन चुके हैं.
उन्होंने आगे यह भी बताया कि आदिवासी समुदायों की सुरक्षा के लिए बनाए गए कानूनों, जिनमें ‘पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम’ (पेसा) भी शामिल है, का किस तरह गलत इस्तेमाल करके ईसाई आदिवासियों को निशाना बनाया जा रहा है और उनके अधिकारों को सीमित किया जा रहा है.
छत्तीसगढ़ से आए डिग्री चौहान ने हिंसा के वास्तविक पैमाने और सरकारी प्रतिक्रिया के बीच मौजूद अंतर पर प्रकाश डाला. उन्होंने कहा कि हर वर्ष सैकड़ों घटनाएं सामने आने के बावजूद दर्ज एफआईआर की संख्या बहुत कम है. उन्होंने जांच में देरी, पुलिस की निष्क्रियता और पीड़ितों को न्याय दिलाने में संस्थागत विफलताओं पर चिंता व्यक्त की. उनके अनुसार समस्या केवल हिंसा नहीं, बल्कि राज्य संस्थाओं की प्रभावी कार्रवाई करने में अक्षमता या अनिच्छा भी है.
जन सुनवाई के दौरान पीड़ितों ने प्रार्थना सभाओं पर हमलों, धर्मांतरण-विरोध कानूनों के तहत मनमानी गिरफ्तारियों, धमकियों, सामाजिक बहिष्कार, जबरन विस्थापन, पूजा स्थलों को बंद कराने, आर्थिक बहिष्कार और संगठित समूहों द्वारा भय पैदा करने से संबंधित अनुभव साझा किए.
वरिष्ठ पत्रकार और बुद्धिजीवी पामेला फिलिपोज़ ने कहा, ‘सुनवाई में पेश गवाहियां हमारे समय की गहरी विडंबनाओं और चिंताओं को दर्शाती हैं.’ उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि बढ़ती नफरत और बहिष्कार का मुकाबला सार्वजनिक सहभागिता और एकजुटता से किया जाना चाहिए.
वहीं, इरफान अली इंजीनियर ने कहा कि ‘घर वापसी’ और धर्मांतरण से जुड़े विमर्शों का अक्सर दबाव और भेदभाव को वैध ठहराने के लिए इस्तेमाल किया जाता है.
सैयदा हमीद ने खासकर ईसाइयों को बार-बार दफनाने के अधिकार से वंचित किए जाने पर गहरी चिंता व्यक्त की. उन्होंने इसे सबसे अमानवीय और अपमानजनक भेदभाव में से एक बताया.
हर्ष मंदर ने कहा कि ये घटनाएं एक सुनियोजित बहिष्करण अभियान की ओर संकते करती हैं. खासकर दफनाने के अधिकार से वंचित करने, सामाजिक बहिष्कार, जबरन विस्थापन और धार्मिक उपासना स्थलों पर हमलों से संबंधित गवाहियों का जिक्र करते हुए उन्होंने चेतावनी दी कि संविधान द्वारा दिए गए मूलभूत स्वतंत्रताएं लगातार कमजोर ही रही हैं.
वक्ताओं ने चिंता व्यक्त की कि हाल के दशकों में हुए न्यायिक और विधायी घटनाक्रम, कई मामलों में कमज़ोर अल्पसंख्यकों को पर्याप्त सुरक्षा प्रदान करने में विफल रहे हैं. उन्होंने बहुसंख्यकवादी असहिष्णुता के सामान्यीकरण और धार्मिक स्वतंत्रता तथा लोकतांत्रिक नागरिकता के लिए सिकुड़ते दायरे के प्रति आगाह किया.
