श्रमिक आंदोलन: जिस व्यक्ति से संबंध के दावे पर हुई कार्यकर्ता की गिरफ़्तारी, उसे दो हफ़्ते में मिली ज़मानत

नोएडा मज़दूर आंदोलन से जुड़े मामले में बीते महीने डीयू के एक छात्र कार्यकर्ता योगेश मीणा की गिरफ़्तारी हुई और मीडिया में आई ख़बरों में पुलिस ने योगेश के ख़िलाफ़ कार्रवाई का एक आधार इसी मामले में गिरफ़्तार एक व्यक्ति अनिल कुमार के साथ उनके कथित संबंध से जोड़ा था. अब एक स्थानीय कोर्ट ने अनिल को ज़मानत देते हुए कहा है कि हिंसक घटनाओं में उनकी प्रत्यक्ष संलिप्तता दिखा सके, ऐसा कोई साक्ष्य उसके समक्ष पेश नहीं किया गया.

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पुलिस द्वारा गिरफ़्तार किए जाने के बाद ड्राइवर अनिल कुमार (बाएं), छात्र कार्यकर्ता योगेश मीणा. (फोटो: अरेंजमेंट)

नई दिल्ली: बीते दिनों द वायर हिंदी ने एक रिपोर्ट में बताया था कि मई महीने के अंत में यूपी पुलिस ने दिल्ली विश्वविद्यालय के फैकल्टी ऑफ लॉ के छात्र योगेश मीणा को गिरफ्तार किया था और वे फ़िलहाल न्यायिक हिरासत में हैं.  

बताया गया था कि उनकी गिरफ़्तारी नोएडा मजदूर आंदोलन से जुड़े मामले में हुई है और उनका संबंध इसी मामले में गिरफ्तार किए गए एक ड्राइवर अनिल कुमार से जोड़ा गया था. मीडिया संस्थानों को दिए गए बयानों में पुलिस ने योगेश को अनिल कुमार से कथित संबंधों के आधार पर मामले से जुड़ा बताया था. 

अब इन्हीं अनिल कुमार को गौतमबुद्ध नगर की एक अदालत ने जमानत दे दी है.

अदालत ने अपने आदेश में कहा है कि केस डायरी में अनिल कुमार के एक वॉट्सऐप ग्रुप से जुड़े होने और कथित रूप से ऑडियो संदेश प्रसारित करने का उल्लेख है, लेकिन हिंसक घटनाओं में उसकी प्रत्यक्ष संलिप्तता को दर्शाने वाला कोई विशिष्ट साक्ष्य उसके समक्ष प्रस्तुत नहीं किया गया.

एक फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट-2 के अपर सत्र न्यायाधीश संदीप चौधरी की अदालत ने 3 जून को अनिल कुमार की जमानत याचिका स्वीकार करते हुए उन्हें 50,000 रुपये के निजी मुचलके और इतनी ही राशि के एक जमानतदार पेश करने की शर्त पर जमानत दे दी. आदेश में अदालत ने यह भी दर्ज किया कि अनिल कुमार मूल एफआईआर में नामजद आरोपी नहीं थे और वह 20 मई से जेल में बंद हैं, तथा मामले के 3 अन्य सह-अभियुक्तों को पहले ही जमानत मिल चुकी है.

कार्यकर्ताओं ने लगाए थे आंदोलन भटकाने के आरोप

अनिल कुमार का नाम पहली बार अप्रैल में उस समय चर्चा में आया था जब नोएडा की ऋचा ग्लोबल कंपनी में मजदूरों के आंदोलन के दौरान बनाए गए वॉट्सऐप ग्रुप में उनके जुड़े होने की बात सामने आई थी.

मजदूर आंदोलन से जुड़े कई कार्यकर्ताओं ने बाद में आरोप लगाया कि अनिल कुमार और उत्तर प्रदेश पुलिस की एक सब-इंस्पेक्टर बीना कौर ने मजदूरों के वॉट्सऐप ग्रुपों में घुसपैठ कर आंदोलन को भटकाने और उकसाने का प्रयास किया था. इन आरोपों को मजदूर आंदोलन के संबंध में गिरफ़्तार कार्यकर्ताओं की याचिकाओं में सुप्रीम कोर्ट के समक्ष भी सबूत के तौर पर रखा और प्रेस कॉन्फ्रेंस भी आयोजित किए गए.

द वायर ने अपनी एक रिपोर्ट में यह सत्यापित किया था कि 13 अप्रैल को अनिल कुमार ने ‘ऋचा ग्लोबल’ नामक वॉट्सऐप ग्रुप में एक वॉयस नोट भेजा था, जिसमें वह कह रहे थे कि ‘प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आ रहे हैं बायपास का उद्घाटन करने, कल पूरा रोड जाम करना चाहिए.’

ऋचा ग्लोबल वॉट्सऐप ग्रुप का स्क्रीनशॉट, जिसमें सबसे नीचे अनिल कुमार का वॉयस नोट देखा जा सकता है.

अप्रैल में द वायर से बातचीत में अनिल कुमार ने बताया था कि वह केंद्रीय गृह मंत्रालय में संविदा पर ड्राइवर के रूप में कार्य करते हैं और पहले ऋचा ग्लोबल कंपनी में काम कर चुके हैं. 

गौरतलब है कि दो अख़बारों- हिंदुस्तान और दैनिक भास्कर के अनुसार, अनिल कुमार के साथ बातचीत यूपी पुलिस द्वारा दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र और छात्र कार्यकर्ता योगेश मीणा की गिरफ्तारी का एक आधार बनाई गई है. 

दैनिक भास्कर ने यूपी पुलिस के हवाले से लिखा था कि ‘जांच में सामने आया कि अनिल और योगेश मीणा के बीच लगातार संपर्क था. हिंसा वाले दिन भी दोनों के बीच बातचीत हुई थी.’

30 मई को दिल्ली विश्वविद्यालय के नॉर्थ कैंपस से योगेश मीणा को गिरफ्तार किया गया था. पुलिस ने उन्हें एफआईआर संख्या 169/2026 में आरोपी बनाया है. योगेश के साथी और मामले से जुड़े लोगों का दावा है कि पुलिस जांच में योगेश को अनिल कुमार से जोड़ रही है. नोएडा मजदूर आंदोलन मामले में सक्रिय याचिकाकर्ता केशव आनंद का कहना है कि पुलिस का आरोप है कि योगेश और अनिल कुमार के बीच लगातार संपर्क था. 

द वायर हिंदी ने नोएडा फेज 2 थाने के एसएचओ से यह पुष्टि करने कि कोशिश की कि क्या योगेश को अनिल के साथ संपर्क होने के आधार पर गिरफ्तार किया है, हालांकि रिपोर्ट प्रकाशित होने तक हमे पुलिस का जवाब नहीं मिल पाया है. इस एफआईआर संख्या से जुड़े दस्तावेज़ पर जहां इस मामले के जांच अधिकारी (आईओ) का नंबर दर्ज होना चाहिए, वहां 9 अंकों के एक नंबर दर्ज है, जिसके चलते उनसे संपर्क नहीं हो सका. 

योगेश के वकील और साथियों को अभी तक योगेश की गिरफ्तारी का आधार नहीं बताया गया है. योगेश के साथियों का कहना है कि पुलिस की यह कहानी मामले में मौजूद तथ्यों से मेल नहीं खाती. उनका कहना है कि आंदोलन से जुड़े लोग लंबे समय से अनिल कुमार की भूमिका पर सवाल उठाते रहे हैं.

केशव आनंद का कहना है कि उपलब्ध चैट रिकॉर्ड से पता चलता है कि योगेश ने अनिल कुमार द्वारा ग्रुप पर भेजे गए कथित भड़काऊ संदेशों पर सवाल उठाए थे. उनके अनुसार, योगेश ने अनिल कुमार को महज एक बार फोन किया था, वह भी यह पूछने के लिए कि वह इस तरह के संदेश ग्रुप पर क्यों भेज रहा है.

केशव के अनुसार, हालांकि योगेश की बात अनिल से नहीं हो पाई थी. 

‘पुलिस के पास कोई साक्ष्य नहीं’

अनिल कुमार को जमानत देने की पैरवी करते हुए बचाव पक्ष ने अदालत से कहा कि अनिल कुमार को झूठा फंसाया गया है. उनका नाम मूल एफआईआर में नहीं है और उनके खिलाफ कोई प्रत्यक्ष साक्ष्य मौजूद नहीं है.

बचाव पक्ष ने यह भी कहा कि जिस घटना का जिक्र किया जा रहा है वह 13 अप्रैल की है, जबकि एफआईआर 23 अप्रैल को दर्ज की गई थी और इस विलंब का कोई स्पष्ट कारण नहीं बताया गया है. साथ ही यह भी तर्क दिया गया कि आरोपी का कोई आपराधिक इतिहास नहीं है और वह जांच में सहयोग कर रहे हैं.

अनिल के वकील मनोज भाटी का कहना है कि उनके मुवक्किल को मुख्य रूप से एक वॉट्सऐप ग्रुप से जुड़े होने के आधार पर आरोपी बनाया गया, जिससे वे कंपनी (ऋचा ग्लोबल) में काम करने के दौरान जुड़े थे, लेकिन बाद में नौकरी छोड़ दी थी.

वकील ने दावा किया कि पुलिस ने उस ग्रुप में मौजूद लोगों के नंबरों के आधार पर आरोपियों की पहचान की; अनिल का घटनास्थल से कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं था और न ही पुलिस ने उनके खिलाफ किसी प्रत्यक्ष भूमिका का साक्ष्य प्रस्तुत किया.

वहीं, पुलिस ने अदालत के समक्ष कहा कि अनिल कुमार एक वॉट्सऐप ग्रुप से जुड़े थे और उसने समूह में भड़काऊ ऑडियो संदेश भेजे थे. पुलिस के अनुसार, इन गतिविधियों का संबंध उस हिंसा से था जो अप्रैल में नोएडा के मजदूर आंदोलन के दौरान हुई थी.

अदालत ने अपने आदेश में कहा कि ‘उपलब्ध केस डायरी में यह विदित है कि अभियुक्त के बारे में यह आरोप है कि वह एक वॉट्सऐप ग्रुप से जुड़ा था और वहां भड़काऊ ऑडियो संदेश साझा किया था, और हिंसात्मक घटनाओं को अंजाम देने के लिए लोगों का आह्वान किया था. लेकिन हिंसक घटनाओं में उसकी प्रत्यक्ष भूमिका स्थापित करने के लिए कोई विशिष्ट साक्ष्य नहीं दिखाया गया है.’

हालांकि, पुलिस इस मामले में गिरफ्तार अन्य कार्यकर्ताओं और योगेश के मामले में ऐसा क्या सबूत पेश कर पाई है, जिनसे हिंसक घटनाओं में कार्यकर्ताओं की प्रत्यक्ष भूमिका स्थापित होती हो, यह अभी तक स्पष्ट नहीं है. 

ज्ञात हो कि अधिकांश कार्यकर्ताओं की भी गिरफ्तारी का आधार ऋचा ग्लोबल वॉट्सऐप ग्रुप में जुड़े होने को बताया जा रहा है. 

डीयू के छात्र योगेश मीणा को 30 मई को यूपी पुलिस द्वारा नोएडा प्रदर्शनों के संबंध में हिरासत में लिया गया. (फोटो: अरेंजमेंट)

योगेश मीणा और अनिल कुमार के बीच कथित संपर्क के सवाल पर अनिल के वकील कहते हैं कि यदि दोनों के बीच बातचीत हुई भी हो तो इसे अपने आप में आपराधिक गतिविधि का प्रमाण नहीं माना जा सकता. केवल फोन पर बातचीत या संपर्क होना किसी साजिश में शामिल होने का प्रमाण नहीं है.

वकील ने यह भी दावा किया कि मामले में दर्ज अधिकांश मुकदमों में पुलिस के पास प्रत्यक्ष साक्ष्यों का अभाव है, और अब तक जिन लोगों को गिरफ्तार किया गया है, उनके खिलाफ हिंसा, आगजनी या अन्य आरोपों को लेकर पुलिस अदालत में ठोस संबंध स्थापित नहीं कर पाई है.

नोएडा मजदूर आंदोलन और पुलिस की जांच

यह आदेश इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि नोएडा मजदूर आंदोलन की जांच में पुलिस लगातार ‘साजिश’ और ‘मास्टरमाइंड’ जैसे आरोपों का इस्तेमाल कर रही है. अप्रैल में नोएडा की कई फैक्ट्रियों के मजदूर वेतन वृद्धि, बेहतर कामकाजी परिस्थितियों और श्रम अधिकारों की मांग को लेकर प्रदर्शन कर रहे थे.

13 अप्रैल को आंदोलन के दौरान हिंसा भड़क गई थी. प्रदर्शनकारियों का आरोप था कि पुलिस ने बिना उकसावे के बल प्रयोग किया, जबकि पुलिस का कहना है कि भीड़ हिंसक हो गई थी और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए कार्रवाई करनी पड़ी.

इसके बाद से उत्तर प्रदेश पुलिस ने कई मजदूरों और कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया है. गिरफ्तार लोगों में वरिष्ठ पत्रकार सत्यम वर्मा, छात्र कार्यकर्ता आकृति चौधरी, आदित्य आनंद, रुपेश राय, सृष्टि, हिमांशु, मनीषा और अब योगेश मीणा शामिल हैं. सत्यम वर्मा और आकृति चौधरी पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (एनएसए) भी लगाया जा चुका है.

मजदूर अधिकार संगठनों और ‘कैम्पेन फॉर रिलीज ऑफ वर्कर्स एंड एक्टिविस्ट्स ऑफ नोएडा’ (कारवां) का आरोप है कि पुलिस एक ही घटनाक्रम से संबंधित कई एफआईआर दर्ज कर कार्यकर्ताओं और मजदूर नेताओं को लगातार कानूनी मामलों में उलझा रही है. उनका कहना है कि यह कार्रवाई आंदोलन को कुचलने और असहमति की आवाजों को डराने के लिए की जा रही है. 

योगेश की गिरफ्तारी पर उठे सवाल

23 वर्षीय योगेश दिल्ली विश्वविद्यालय के कैंपस लॉ सेंटर में एलएलबी के छात्र हैं और इससे पहले श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स (एसआरसीसी) से स्नातक कर चुके हैं. उनके वकील और साथी लगातार यह आरोप लगा रहे हैं कि गिरफ्तारी की प्रक्रिया में कानूनी नियमों का पालन नहीं किया गया. उनका कहना है कि गिरफ्तारी के समय न तो गिरफ्तारी के आधार बताए गए और न ही आवश्यक दस्तावेज उपलब्ध कराए गए.

योगेश का केस देख रहे अधिवक्ता अली ज़िया कबीर ने द वायर हिंदी को बताया कि पुलिस ने अभी तक योगेश के मामले में अरेस्ट मेमो, ग्राउंड ऑफ अरेस्ट, एफआईआर कॉपी इत्यादि कागजात उपलब्ध नहीं कराए हैं, जो सुप्रीम कोर्ट के आदेश का उल्लंघन है.

ज्ञात हो कि पंकज बंसल बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (2023) के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि किसी भी व्यक्ति को गिरफ्तार किए जाने की स्थिति में उसे गिरफ्तारी के आधार लिखित रूप में उपलब्ध कराना अनिवार्य है, चाहे उस पर किसी भी प्रकार के अपराध का आरोप क्यों न हो.

अधिवक्ता अली ज़िया कबीर ने कहा, ‘कानून इस मामले में बिल्कुल स्पष्ट है. सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों, जिनमें विहान कुमार और डीके बसु मामले शामिल हैं, उनमें कहा गया है कि गिरफ्तारी के आधार लिखित रूप में उपलब्ध कराए जाने चाहिए. यह साबित करने की जिम्मेदारी पुलिस की है, न कि आरोपी की, कि उसने ऐसा किया है. यदि इस प्रक्रिया का उल्लंघन होता है, तो आरोपी को ‘एक सेकेंड के लिए भी’ हिरासत में नहीं रखा जा सकता. इसके अलावा संबंधित पुलिस अधिकारियों के खिलाफ अवमानना, विभागीय कार्रवाई और आवश्यक होने पर आपराधिक कार्रवाई भी की जा सकती है.’

‘रचा गया है मामला’

योगेश के साथी कार्यकर्ताओं का कहना है कि अन्य गिरफ्तार कार्यकर्ताओं की रिहाई के लिए चलाए जा रहे अभियानों में सक्रिय रहने और मजदूर आंदोलन के समर्थन में आवाज उठाने के कारण वह पुलिस के निशाने पर आए.

अनिल की ज़मानत को लेकर पीएचडी शोधार्थी और कार्यकर्ता श्रीजा कहती हैं कि यूपी पुलिस ने पूरे मामले को वॉट्सऐप ग्रुप की बातचीत के इर्द-गिर्द खड़ा किया है और लगातार यह दावा किया है कि मजदूरों का विरोध प्रदर्शन स्वतः नहीं हुआ था, बल्कि विभिन्न वॉट्सऐप ग्रुपों के माध्यम से रची गई एक साजिश का हिस्सा था.

उन्होंने कहा, ‘हर सुनवाई में हम पुलिस से यह मांग करते रहे हैं कि वह कार्यकर्ताओं द्वारा भेजा गया एक भी भड़काऊ संदेश या कथित साजिश का कोई ठोस सबूत पेश करे, लेकिन अब तक ऐसा कोई साक्ष्य अदालत के सामने नहीं रखा गया है.’

श्रीजा ने कहा कि दूसरी ओर अनिल कुमार, जिसका कथित भड़काऊ ऑडियो संदेश 17 अप्रैल से सार्वजनिक रूप से उपलब्ध है, उसे गिरफ्तारी के कुछ ही दिन बाद जमानत मिल गई.

उन्होंने आरोप लगाया, ‘वहीं छात्र, कलाकार और कार्यकर्ता, जो मजदूरों से शांतिपूर्ण ढंग से हड़ताल करने और किसी भी प्रकार की हिंसा से दूर रहने की अपील कर रहे थे, अब भी जेल में हैं और उन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बताया जा रहा है.’

उन्होंने आगे कहा कि अनिल कुमार की गिरफ्तारी में हुई देरी, सुप्रीम कोर्ट द्वारा उत्तर प्रदेश सरकार को नोटिस जारी किए जाने के बाद ही उनकी गिरफ्तारी होना, जमानत सुनवाई के दौरान पुलिस की ओर से मजबूत विरोध न किया जाना और उन्हें जल्दी जमानत मिल जाना… ये सभी ऐसे तथ्य हैं जो उनकी भूमिका और संबंधों को लेकर सवाल खड़े करते हैं. 

इस बारे में यूपी पुलिस से फोन कॉल और ईमेल के ज़रिये संपर्क किया गया है, जिसका जवाब इस रिपोर्ट के प्रकाशन के समय तक नहीं मिला है. यदि उनका उत्तर प्राप्त होता है तो उसे ख़बर में जोड़ा जाएगा.