नई दिल्ली: एक हालिया विश्लेषण के अनुसार, केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने जुलाई 2023 और मई 2026 के बीच वन भूमि पर 28 लाख से ज़्यादा पेड़ काटने की मंज़ूरी दी.
डाउन टू अर्थ के विश्लेषण में पाया गया कि मंत्रालय को वन भूमि के दूसरे इस्तेमाल (डायवर्जन) के लिए 288 अलग-अलग प्रस्ताव मिले थे, जिनमें से उसने 242 को मंज़ूरी दी.
बैठकों के रिकॉर्ड का विश्लेषण
डाउन टू अर्थ ने वन (संरक्षण एवं संवर्धन) अधिनियम, 1980 के तहत बनाई गई सलाहकार समिति की बैठकों के मिनट्स का विश्लेषण किया, जिन्हें मंत्रालय ने प्रकाशित किया है. उन्होंने समिति के सामने आए वन डायवर्जन प्रस्तावों की संख्या गिनी; इसमें हर प्रस्ताव को सिर्फ़ एक बार गिना गया, चाहे वह समिति के सामने कितनी भी बार आया हो.
कुल 288 अलग-अलग वन डायवर्जन प्रस्तावों में से समिति ने 242 को मंज़ूरी दी: यानी मंज़ूरी की दर 80% से ज़्यादा रही.
रिपोर्ट के अनुसार, रिकॉर्ड से यह भी पता चला कि 22,000 हेक्टेयर से ज़्यादा वन भूमि को खनन (माइनिंग), पनबिजली (हाइड्रोपावर) और ट्रांसमिशन लाइनों जैसे गैर-वानिकी प्रोजेक्ट्स के लिए डायवर्ट किया गया.
हालांकि इन तीन सालों में 27 सेक्टरों में वन भूमि को डायवर्ट किया गया, लेकिन माइनिंग परियोजनाओं के तहत सबसे ज़्यादा पेड़ काटने की मंज़ूरी दी गई या काटे गए – इनकी संख्या 13.5 लाख थी. इसके बाद हाइड्रोपावर परियोजना का नंबर आता है, जिनमें 9.3 लाख पेड़ काटने की मंजूरी मिली. पुनर्वास (रिहैबिलिटेशन) परियोजना में 2.3 लाख पेड़ शामिल थे.
रिपोर्ट में कहा गया है, ‘डाउन टू अर्थ द्वारा विश्लेषण किए गए वन डायवर्जन प्रस्तावों में दर्ज कुल पेड़ कटाई में इन तीनों सेक्टरों की हिस्सेदारी लगभग 90 प्रतिशत थी.’
क्षेत्रफल के हिसाब से देखें तो, वन भूमि डायवर्जन के 288 प्रस्तावों में से 139 प्रस्ताव 0 से 10 हेक्टेयर के दायरे में पेड़ काटने से संबंधित थे, 55 प्रस्तावों में 11 से 100 हेक्टेयर ज़मीन शामिल थी, और 35 प्रस्तावों में 101 से 500 हेक्टेयर ज़मीन शामिल थी. नौ परियोजनाएं 501 से 1,000 हेक्टेयर वन भूमि डायवर्जन से संबंधित थे, और चार परियोजनाओं में 1,000 हेक्टेयर से ज़्यादा वन भूमि का डायवर्जन शामिल था.
छत्तीसगढ़ सबसे आगे
इन तीन सालों में पेड़ काटने की मंज़ूरी पाने वाले पेड़ों की संख्या के मामले में छत्तीसगढ़ सबसे आगे रहा.
रिपोर्ट के मुताबिक, समिति ने सरगुजा डिवीज़न में ‘केते एक्सटेंशन ओपनकास्ट कोल माइनिंग और पिट-हेड कोल वॉशरी प्रोजेक्ट’ के लिए 4 लाख से ज़्यादा पेड़ों को काटने की मंज़ूरी दी. इस परियोजना का स्थानीय समुदायों ने ज़मीन और जंगल के अधिकारों के दावों को लेकर काफ़ी विरोध किया था.
वहीं, विश्लेषण में यह भी पाया गया कि कम से कम 84 परियोजनाओं में पेड़ काटने का कोई मामला सामने नहीं आया. 14 परियोजनाओं की बैठकों के मिनट्स में पेड़ काटने के आंकड़ों का कोई ज़िक्र नहीं था.
इसमें ओडिशा का सिजीमाली बॉक्साइट माइनिंग परियोजना भी शामिल था, जहां लगभग 700 हेक्टेयर वन भूमि को दूसरे काम के लिए इस्तेमाल किया जाना है. खदान चलाने वाले वेदांता ग्रुप ने 2024 में बॉक्साइट खदान के लिए 708.204 हेक्टेयर वन भूमि को साफ़ करने का प्रस्ताव दिया था.
डाउन टू अर्थ की रिपोर्ट के अनुसार, हालांकि बैठकों के मिनट्स में यह माना गया था कि पेड़ों की गिनती की जा रही है और उस इलाके में पेड़ काटने से संभावित असर पड़ सकता है, लेकिन इसमें पेड़ों की सटीक संख्या का ज़िक्र नहीं था.
रिपोर्ट के मुताबिक, इस परियोजना के मिनट्स में दावा किया गया था कि पेड़ काटने से पर्यावरण पर असर ‘बहुत कम’ होगा, क्योंकि पठार का मौजूदा इकोसिस्टम ‘सीमित जैव-विविधता को सहारा देता है, और ज़्यादातर प्रजातियां जीवित रहने के लिए घाटी की वनस्पतियों पर निर्भर हैं.’
इसके उलट, उन्हीं मिनट्स में यह भी कहा गया था कि घाटी वाले इलाकों के पास पेड़ काटने से वन्यजीवों के आवास पर असर पड़ सकता है, प्रजातियां विस्थापित हो सकती हैं, मिट्टी का कटाव बढ़ सकता है और आस-पास के जल-स्रोतों में गाद जमा हो सकती है.
2019 में डाउन टू अर्थ ने रिपोर्ट दी थी कि 2016 और 2019 के बीच मंत्रालय ने 69.4 लाख पेड़ काटने की मंज़ूरी दी थी. यह जानकारी उस साल संसद में पर्यावरण राज्य मंत्री द्वारा दिए गए आंकड़ों पर आधारित थी.
