नई दिल्ली: संयुक्त राष्ट्र (यूएन) के एक जांच आयोग ने आरोप लगाया है कि इज़रायल गाज़ा में फ़िलिस्तीनियों के खिलाफ नरसंहार (जेनोसाइड) जारी रखे हुए है और इसके लिए फ़िलिस्तीनी बच्चों को जानबूझकर निशाना बनाया जा रहा है.
आयोग का कहना है कि फ़िलिस्तीनी नाबालिगों को ‘जानबूझकर निशाना बनाकर मारा गया’ है और ऐसे हमले नरसंहार की मंशा साबित करने के लिए अहम हैं.
मंगलवार (23 जून) को जारी एक रिपोर्ट में संयुक्त राष्ट्र के ‘ऑक्यूपाइड फ़िलिस्तीनी टेरिटरी’ (जिसमें पूर्वी यरूशलेम भी शामिल है) और इज़रायल पर बने स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय जांच आयोग ने कहा कि उसे यह मानने के पर्याप्त आधार मिले हैं कि ‘इज़रायली सुरक्षा बलों ने बच्चों को निशाना बनाते हुए जानबूझकर घातक बल का प्रयोग किया है. यह अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार कानून और अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून के तहत मनमाने ढंग से जान लेने और नागरिकों को निशाना बनाने पर लगी रोक का उल्लंघन है. ये कृत्य जानबूझकर हत्या के युद्ध अपराध तथा विनाश के मानवता-विरोधी अपराध की श्रेणी में आते हैं.
‘बच्चों की हत्या और उन्हें गंभीर रूप से घायल करने का सिलसिला जारी’
रिपोर्ट के साथ जारी बयान में आयोग के अध्यक्ष श्रीनिवासन मुरलीधर ने कहा, ‘सबूत बताते हैं कि इज़रायली सुरक्षा बलों ने फ़िलिस्तीनी बच्चों को जानबूझकर निशाना बनाया और मारा है.’
उन्होंने कहा कि अक्टूबर 2025 में युद्धविराम के बाद भी बच्चों की ‘हत्या और उन्हें गंभीर रूप से घायल करने का सिलसिला जारी है, क्योंकि इज़रायल युद्धविराम और अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत फ़िलिस्तीनी बच्चों की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी की लगातार अनदेखी कर रहा है.’
94 पेज की आयोग की इस रिपोर्ट का शीर्षक है ‘बचपन का मूल तत्व नष्ट हो गया है.’ (The essence of childhood has been destroyed). इसमें 7 अक्टूबर 2023 से 31 मार्च 2026 के बीच फिलिस्तीनी बच्चों के खिलाफ हुए उल्लंघनों की जांच की गई है.
रिपोर्ट में बताया गया है कि युद्ध के शुरुआती दो सालों में गाज़ा में कम से कम 20,179 बच्चे मारे गए और 44,143 घायल हुए, जो कुल मौतों का लगभग एक-तिहाई हिस्सा है. आयोग ने कहा कि मरने वालों की संख्या इससे कहीं ज़्यादा हो सकती है, क्योंकि माना जा रहा है कि हज़ारों बच्चे अभी भी मलबे के नीचे दबे हुए हैं.
जांच में पाया गया कि इज़रायली सेना ने जानबूझकर बच्चों को निशाना बनाया था और यह एक ‘स्पष्ट पैटर्न’ था. साथ ही, यह तर्क भी दिया गया कि ऐसा व्यवहार नरसंहार की मंशा साबित करने के लिए अहम था.
रिपोर्ट में कहा गया, ‘फ़िलिस्तीनी बच्चों को निशाना बनाना गाज़ा में व्यापक फ़िलिस्तीनी समुदाय को नष्ट करने की इज़रायली अधिकारियों और सुरक्षा बलों की नरसंहारकारी मंशा साबित करने के लिए अहम है. बच्चे केवल आबादी का हिस्सा नहीं हैं; उनका अस्तित्व फ़िलिस्तीनी समुदाय की निरंतरता और भविष्य के लिए जरूरी है.’
आयोग ने आगे कहा कि ‘फ़िलिस्तीनी बच्चों की हत्या तथा उन्हें गंभीर शारीरिक और मानसिक नुकसान पहुंचाना गाज़ा में फ़िलिस्तीनी समुदाय की जैविक निरंतरता और भविष्य के अस्तित्व को नष्ट करने की रणनीति का हिस्सा था.’
आयोग ने अपने पहले के निष्कर्ष को दोहराते हुए कहा कि इज़रायल ने ‘समूह के सदस्यों, जिनमें फ़िलिस्तीनी बच्चे भी शामिल हैं, की हत्या और उन्हें गंभीर शारीरिक या मानसिक नुकसान पहुंचाकर’ नरसंहार किया है.
उधर, इन निष्कर्षों को खारिज करते हुए कि जिनेवा में संयुक्त राष्ट्र में इज़रायल के स्थायी मिशन ने रिपोर्ट को ‘अपनी पिछली रिपोर्टों की तरह ही एक अपमानजनक प्रोपेगैंडा’ बताया और आयोग पर आरोप लगाया कि यह ‘बुनियादी तौर पर एक दोषपूर्ण तंत्र है जिसका मकसद सच का पता लगाने के बजाय इज़रायल को अलग-थलग और बदनाम करना है.’
मिशन ने कहा कि आयोग ने ‘हमास द्वारा बेरहमी से मारे गए, अपहरण किए गए और निशाना बनाए गए इज़रायली बच्चों को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया है.’ साथ ही उसने आरोप लगाया कि रिपोर्ट हमास द्वारा फ़िलिस्तीनी बच्चों को ‘मानव ढाल’ और ‘युद्ध के मोहरे’ के रूप में इस्तेमाल किए जाने की बात को भी अनदेखा करती है. मिशन ने यह भी दावा किया कि आयोग के पास अपने आरोपों की पुष्टि के लिए ‘कोई विश्वसनीय सत्यापन तंत्र’ नहीं है.
पांच साल से कम उम्र के कम से कम 5,031 बच्चे मारे गए
यह रिपोर्ट आयोग द्वारा पिछले साल जारी किए गए कानूनी विश्लेषण पर आधारित है, लेकिन इस बार इसमें बच्चों को जांच के केंद्र में रखा गया है. इसमें तर्क दिया गया है कि इज़रायली सैन्य अभियानों का असर युद्ध के मैदान में होने वाली मौतों से कहीं ज़्यादा है और इसमें भुखमरी, प्रजनन संबंधी नुकसान, विकलांगता, अनाथ होना, विस्थापन, हिरासत और मनोवैज्ञानिक आघात जैसी चीज़ें शामिल हैं.
आयोग के अनुसार, इज़राइली सैन्य अभियानों के कारण गाजा में बच्चों की मौत और घायल होने की संख्या अभूतपूर्व स्तर पर पहुंच गई है. अक्टूबर 2023 और अक्टूबर 2025 के बीच पांच साल से कम उम्र के कम से कम 5,031 बच्चे मारे गए, जिनमें 1,000 से ज़्यादा शिशु और लगभग 420 नवजात बच्चे शामिल थे.
रिपोर्ट में बताया गया है कि संघर्ष के दौरान मारे गए लोगों में बच्चों की हिस्सेदारी लगभग 30% थी, जो गाजा में हुए पिछले युद्धों की तुलना में काफ़ी ज़्यादा है.
आयोग ने इस बात का भी दस्तावेज़ीकरण किया कि स्नाइपर फ़ायर, ड्रोन और दूसरे हथियारों के ज़रिए बच्चों को सीधे निशाना बनाया गया.
आयोग ने यह निष्कर्ष निकाला कि इज़रायली सेना ने ‘जानबूझकर बच्चों के ख़िलाफ़ जानलेवा बल का इस्तेमाल किया’ और ये कृत्य जानबूझकर हत्या करने के युद्ध अपराध और लोगों को खत्म करने के मानवता के ख़िलाफ़ अपराध की श्रेणी में आती हैं.
रिपोर्ट में जिन मामलों का ज़िक्र किया गया, उनमें नवंबर 2025 में खान यूनिस के पास जलाऊ लकड़ी इकट्ठा कर रहे 10 और 9 साल के दो भाइयों की हत्या का मामला भी शामिल है. बाद में इज़रायली सेना ने इन लड़कों को ‘संदिग्ध’ बताया जो सैनिकों के पास आ गए थे. आयोग ने इस स्पष्टीकरण को खारिज कर दिया और कहा कि बच्चे साफ तौर पर नाबालिग लग रहे थे और उनसे कोई तत्काल खतरा नहीं था.
आयोग ने कहा कि यह मामला एक बड़े ‘सिस्टमैटिक पैटर्न’ को दिखाता है, जिसमें फिलिस्तीनी लड़कों को आतंकवादी बताकर उनकी मौत को सही ठहराया जाता था.
जांच में यह भी पाया गया कि अक्टूबर 2025 के युद्धविराम के बाद भी बच्चों की मौतें जारी रहीं. रिपोर्ट में दिए गए यूनिसेफ़ के आंकड़ों के मुताबिक, युद्धविराम लागू होने के बाद 100 से अधिक बच्चों की मौत हुई. जांचकर्ताओं ने इनमें से कुछ मौतों का संबंध ‘येलो लाइन’ नाम के मिलिट्री डिमार्केशन ज़ोन से जोड़ा, जहां बच्चों समेत आम नागरिकों को ठीक से निशान न लगी सीमाओं को पार करने पर गोली मार दी गई थी.
21,000 बच्चों में स्थायी विकलांगता
रिपोर्ट का एक हिस्सा बच्चों की सेहत और विकास पर इज़रायली सैन्य अभियानों के दीर्घकालिक प्रभावों पर केंद्रित है.
आयोग ने कहा कि हज़ारों बच्चे दर्दनाक तरीके से अंग कटने, रीढ़ की हड्डी में चोट, अंधेपन, सुनने की क्षमता खोने और बुरी तरह जलने जैसी समस्याओं का शिकार हुए. आयोग ने अनुमानों का हवाला देते हुए बताया कि संघर्ष के दौरान 21,000 से ज़्यादा बच्चे शारीरिक रूप से अक्षम हो गए और कहा कि गाज़ा दुनिया में अंग गंवाने वाले बच्चों की सबसे ज़्यादा संख्या वाले इलाकों में से एक बन गया है.
जांचकर्ताओं ने अस्पतालों और नवजात शिशुओं की देखभाल वाली सुविधाओं पर हुए हमलों की भी जांच की. उनका तर्क है कि हेल्थकेयर इंफ्रास्ट्रक्चर के नष्ट होने और दवा, उपकरण व ईंधन की कमी के कारण बच्चों पर गंभीर असर पड़ा, जिनमें वे नवजात शिशु भी शामिल हैं जिन्हें खास देखभाल की ज़रूरत होती है. इसके अलावा, रिपोर्ट में गर्भपात, समयपूर्व जन्म, कम वजन वाले शिशुओं और जन्मजात विकृतियों की भी समीक्षा की गई है, जिन्हें प्रजनन संबंधी हिंसा और नवजातों को होने वाली क्षति के संदर्भ में देखा गया है.
आयोग ने आगे आरोप लगाया कि इज़रायल ने गाज़ा में फ़िलिस्तीनियों के विनाश का कारण बनने वाली जीवन-परिस्थितियां जानबूझकर थोपी है.
इसमें कहा गया है, ‘गाज़ा में फ़िलिस्तीनी लोगों (जिनमें बच्चे भी शामिल हैं) पर इज़रायल द्वारा थोपे गए हालात, जानबूझकर और सुनियोजित तरीके से नुकसान पहुंचाने वाले हैं. इनका मकसद गाज़ा के फ़िलिस्तीनियों को एक समूह के तौर पर शारीरिक रूप से खत्म करना है.’ इसमें नाकेबंदी, मानवीय सहायता पर रोक और आम लोगों के लिए ज़रूरी बुनियादी ढांचे को नष्ट करने का ज़िक्र किया गया है.
हिरासत में फ़िलिस्तीनी बच्चे
रिपोर्ट का एक अन्य महत्वपूर्ण हिस्सा इज़रायली हिरासत केंद्रों में बंद फ़िलिस्तीनी बच्चों से संबंधित है.
जांचकर्ताओं ने गंभीर दुर्व्यवहार के एक पैटर्न का दस्तावेज़ीकरण किया, जिसमें जबरन कपड़े उतरवाना, लंबे समय तक आंखों पर पट्टी बांधकर रखना, मारपीट, नींद से वंचित करना, भोजन और पानी न देना, अपर्याप्त चिकित्सा सुविधा तथा बच्चों को वयस्कों के साथ हिरासत में रखना शामिल है.
रिपोर्ट में बच्चों के ख़िलाफ़ यौन और लिंग-आधारित हिंसा को उजागर किया गया है
रिपोर्ट में कहा गया है, ‘आयोग ने फ़िलिस्तीनी बच्चों पर व्यवस्थित रूप से किए गए गंभीर और जानबूझकर दुर्व्यवहार के एक पैटर्न की पहचान की है.’
रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि यह व्यवहार यातना और अन्य अमानवीय कृत्यों के बराबर है, जो युद्ध अपराध और मानवता-विरोधी अपराध दोनों की श्रेणी में आते हैं.
रिपोर्ट में बच्चों के खिलाफ यौन और लैंगिक आधारित हिंसा के मामलों का भी उल्लेख किया गया है, जिसमें ज़बरदस्ती सबके सामने नंगा करना, यौन उत्पीड़न, जननांगों पर हिंसा और यौन धमकियां शामिल हैं.
इसमें कहा गया है, ‘आयोग का मानना है कि फ़िलिस्तीनी बच्चों के ख़िलाफ़ यौन हिंसा, सशस्त्र संघर्ष के दौरान बच्चों के अधिकारों का गंभीर उल्लंघन है और इसलिए यह युद्ध अपराध की श्रेणी में आता है.’
पूर्वी यरुशलम सहित कब्जे वाले वेस्ट बैंक में जांचकर्ताओं को उन साक्ष्यों का पता चला है जो उनके अनुसार फिलिस्तीनी बच्चों के खिलाफ गैरकानूनी हत्याओं, मनमानी हिरासत और बसने वालों (सेटलर्स) की हिंसा का एक पैटर्न दर्शाते हैं.
आयोग ने कहा कि जिन मामलों की उसने जांच की, उनमें कई बार इज़रायली बलों ने जानबूझकर फ़िलिस्तीनी बच्चों को निशाना बनाया. जांचकर्ताओं द्वारा दस्तावेजीकरण किए गए साक्ष्यों में भारी हथियारों का इस्तेमाल, मेडिकल मदद देने में देरी और घावों के पैटर्न का ज़िक्र किया गया. आयोग ने निष्कर्ष निकाला कि इज़रायली बल बच्चों की हत्या ‘पूर्ण दंडमुक्ति’ के साथ करते हैं और राज्य फ़िलिस्तीनी बच्चों के खिलाफ ‘व्यवस्थित गैर-कानूनी काम’ को मान लेती है.
आयोग के अध्यक्ष श्रीनिवासन मुरलीधर ने कहा, ‘भले ही गाज़ा और वेस्ट बैंक में बम और बंदूकें शांत हो जाएं, फ़िलिस्तीनी बच्चे रातोंरात सामान्य नहीं हो पाएंगे. उनके स्वास्थ्य, शिक्षा और विकास को जो क्षति पहुंची है, वह अपूरणीय है.’
आयोग ने इज़रायल से बच्चों और नागरिक बुनियादी ढांचे पर हमले रोकने, नाबालिगों की मनमानी हिरासत समाप्त करने, बाल बंदियों के बारे में जानकारी सार्वजनिक करने और गाज़ा में निर्बाध मानवीय सहायता पहुंच की अनुमति देने का आह्वान किया.
साथ ही, आयोग ने देशों से ऐसे हथियारों की सप्लाई रोकने का आग्रह किया जिनका इस्तेमाल अंतरराष्ट्रीय अपराधों वाले ऑपरेशनों में हो सकता है, और घरेलू अदालतों व अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय के ज़रिए जवाबदेही तय करने को कहा.
रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि जांच के दौरान आयोग ने इज़रायली सरकार को जानकारी या पहुंच उपलब्ध कराने के लिए 13 अनुरोध भेजे, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला. दूसरी ओर, फ़िलिस्तीनी प्राधिकरणों और गाज़ा के स्वास्थ्य मंत्रालय ने जांचकर्ताओं को आवश्यक जानकारी उपलब्ध कराई.
