भाजपा शासित राज्यों ने वीबी-जी राम जी की लागत-साझेदारी व्यवस्था पर जताई आपत्ति

विकसित भारत–गारंटी फॉर रोज़गार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण) (वीबी-जी राम जी) के तहत राज्यों को कुल ख़र्च का 40% वहन करना होगा, जबकि केंद्र 60% ख़र्च करेगा. मनरेगा में मज़दूरी का 100% खर्च केंद्र सरकार वहन करती थी. अब तीन राज्यों- जिनमें दो भाजपा शासित हैं, ने राज्यों पर बढ़ने वाले वित्तीय बोझ को लेकर चिंता जताई है.

(प्रतीकात्मक फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: देश के कम-से-कम तीन राज्यों, जिनमें दो भाजपा शासित हैं, ने विकसित भारत–गारंटी फॉर रोज़गार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण) (वीबी-जी राम जी) के तहत राज्यों पर बढ़ने वाले वित्तीय बोझ को लेकर चिंता जताई है.

ज्ञात हो कि यह नई योजना 1 जुलाई 2026 से लागू होगी और महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) का स्थान लेगी.

वीबी-जी राम जी के तहत अधिकांश राज्यों को योजना के कुल खर्च का 40% वहन करना होगा, जबकि केंद्र 60% खर्च करेगा. यह मनरेगा से काफी अलग है. मनरेगा में मजदूरी का 100% खर्च केंद्र सरकार वहन करती थी, जबकि राज्यों को केवल सामग्री (मटेरियल) लागत का एक हिस्सा देना पड़ता था, जो कुल बजट का लगभग 10% होता था.

द हिंदू की रिपोर्ट के अनुसार, नेशनल कैंपेन फॉर पीपुल्स राइट टू इन्फॉर्मेशन (एनसीपीआरआई) को सूचना के अधिकार (आरटीआई) के तहत मिली जानकारी के अनुसार, बिहार, मध्य प्रदेश और झारखंड ने स्पष्ट रूप से इस नई वित्तीय साझेदारी व्यवस्था पर पुनर्विचार करने की मांग की है.

इसमें वित्तीय हिस्सेदारी काफ़ी बड़ी है. बिहार का मौजूदा आवंटन 4,477 करोड़ रुपये है, जो सीमित दिनों के काम के लिए ही काफ़ी है. 125 दिनों के काम के लिए फंड देने पर राज्य पर वित्तीय बोझ बढ़कर 15,939 करोड़ रुपये हो जाएगा.

इसी तरह, मध्य प्रदेश का मौजूदा हिस्सा 4,168 करोड़ रुपये है, लेकिन 125 दिनों की ज़रूरत के हिसाब से यह आंकड़ा बढ़कर 20,037 करोड़ रुपये हो जाएगा.

झारखंड के मामले में मौजूदा हिस्सा 1,804 करोड़ रुपये है. 125 दिनों के लिए यह बढ़कर 9,293 करोड़ रुपये हो जाएगा. झारखंड ने परामर्श के दौरान साफ़ तौर पर कहा कि 40% हिस्सेदारी का खर्च उठाना मुश्किल होगा.

द हिंदू के अनुसार, केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय ने यह जानकारी एक आरटीआई आवेदन के जवाब में दी, जिसमें 13 राज्यों की प्रतिक्रियाएं शामिल थीं.

इनमें से पांच राज्यों ने मजदूरी दरों में संशोधन की मांग करते हुए कहा कि वर्तमान मनरेगा मजदूरी बाजार दरों से कम है. वहीं चार राज्यों ने उस प्रावधान पर आपत्ति जताई, जिसके तहत कृषि के व्यस्त मौसम में योजना के तहत 60 दिनों के लिए कार्य स्थगित कर दिया जाएगा. अधिकांश राज्यों ने मजदूरी और सामग्री भुगतान में लगातार होने वाली देरी का मुद्दा उठाया और बकाया राशि का समय पर भुगतान सुनिश्चित करने की मांग की.

यहां तक कि 90:10 लागत-साझेदारी व्यवस्था वाले राज्यों – जैसे सिक्किम और उत्तराखंड – ने भी कुछ प्रावधानों की समीक्षा की मांग की. उत्तराखंड ने अपने पर्वतीय भूभाग से जुड़ी चुनौतियों का हवाला देते हुए मजदूरी का 100% खर्च केंद्र सरकार द्वारा वहन किए जाने की मौजूदा व्यवस्था जारी रखने की मांग की.

वीबी-जी राम जी का उद्देश्य हर ग्रामीण परिवार को हर वर्ष 125 दिनों का अकुशल शारीरिक श्रम उपलब्ध कराना है, जबकि मनरेगा में यह गारंटी 100 दिनों की थी. यह केंद्र प्रायोजित योजना के तहत चलती है, जिसमें मानक आवंटन केंद्र सरकार तय करती है. अगर कोई राज्य इस निर्धारित आवंटन से अधिक खर्च करता है, तो अतिरिक्त व्यय का भार संबंधित राज्य सरकार को खुद उठाना होगा.

कानून के लागू होने से पहले विपक्ष सुप्रीम कोर्ट जाने की तैयारी में

केंद्र सरकार द्वारा 1 जुलाई से नई ग्रामीण रोजगार योजना विकसित भारत–गारंटी फॉर रोज़गार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण) अधिनियम लागू किए जाने की तैयारी के बीच विपक्षी दलों और ग्रामीण अधिकार संगठनों ने इसका विरोध तेज कर दिया है.

उनका कहना है कि नई व्यवस्था से निर्णय लेने की प्रक्रिया का केंद्रीकरण होगा, राज्यों पर वित्तीय बोझ बढ़ेगा और मनरेगा के तहत मिलने वाली कानूनी गारंटी कमजोर पड़ जाएगी.

न्यू इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, जहां ग्रामीण मजदूर संगठनों ने 1 जुलाई को वीबी-जी राम जी के खिलाफ देशव्यापी विरोध-प्रदर्शन का ऐलान किया है, वहीं कांग्रेस ने रविवार को कहा कि कई राज्यों ने नई योजना को लेकर गंभीर आपत्तियां दर्ज कराई हैं.

कांग्रेस शासित तेलंगाना सरकार इस कानून को चुनौती देने के लिए सुप्रीम कोर्ट जाने पर विचार कर रही है. राज्य सरकार ने कहा है कि वह कर्नाटक और केरल से भी बातचीत करेगी ताकि यह पता लगाया जा सके कि क्या तीनों राज्य अपने वित्तीय हितों की रक्षा के लिए साझा कानूनी रणनीति अपनाने को तैयार हैं.

कांग्रेस के महासचिव जयराम रमेश ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर एक पोस्ट में कहा कि मध्य प्रदेश, बिहार और उत्तराखंड जैसे भाजपा शासित राज्यों ने भी इस योजना के तहत राज्यों पर पड़ने वाले अतिरिक्त वित्तीय बोझ का विरोध किया है.

रमेश ने कहा, ‘चार अन्य राज्य सरकारों ने भी कृषि के व्यस्त मौसम के दौरान योजना में प्रस्तावित ‘ब्लैकआउट अवधि’ (कार्य बंद रखने की अवधि) का विरोध किया है.’ उन्होंने आरोप लगाया कि केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान के गृह राज्य मध्य प्रदेश ने भी इस योजना को लेकर चिंता व्यक्त की है.