ट्रंप का इतिहास या इतिहास पर कब्ज़ा? ह्वाइट हाउस की दीवारों पर गढ़ा जा रहा है सत्ता का निजी आख्यान

हर आधुनिक नेता जानता है कि इतिहास केवल अतीत नहीं है. इसलिए सत्ता केवल क़ानून नहीं बदलती; वह पाठ्यपुस्तकें बदलती है, स्मारक बनाती और गिराती है, संग्रहालयों की भाषा बदलती है, राष्ट्रीय नायकों की सूची संशोधित करती है और खलनायकों की पहचान तय करती है. ह्वाइट हाउस के वेस्ट विंग को राष्ट्रपति निवास से जोड़ने वाले एक गलियारे में ट्रंप की लगाई प्रदर्शनी उसी वैश्विक प्रवृत्ति का अमेरिकी संस्करण है.

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यह पूरी प्रदर्शनी लगभग 5,400 शब्दों में फैली है. व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव कैरोलाइन लेविट ने स्वीकार किया कि इनमें से कई पट्टिकाएं राष्ट्रपति ट्रंप ने स्वयं लिखी हैं. (फोटो: एपी/पीटीआई)

द न्यूयॉर्क टाइम्स की रविवार की एक विस्तृत पड़ताल ने अमेरिकी लोकतंत्र के सामने एक असहज प्रश्न रख दिया है. प्रश्न केवल राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का नहीं, उस सीमा का है, जहां सत्ता इतिहास लिखना शुरू कर देती है.

अमेरिका के प्रसिद्ध विश्वविद्यालयों के जाने माने इतिहासविदों लैरी बुकानन, कैरेन योरिश, डग मिल्स, जॉन हुआंग और राज साहा की रिपोर्ट के अनुसार, ह्वाइट हाउस के वेस्ट विंग को राष्ट्रपति निवास से जोड़ने वाले एक व्यस्त गलियारे में ट्रंप ने सोने के अक्षरों वाली पट्टिकाओं के माध्यम से अमेरिका के 47 राष्ट्रपतियों का एक नया आधिकारिक आख्यान गढ़ा है. पहली नज़र में यह एक संग्रहालयीय, सजावटी या शैक्षिक प्रयोग लग सकता है; लेकिन रिपोर्ट बताती है कि यह राष्ट्रपति इतिहास का निष्पक्ष परिचय नहीं, स्मृति पर सत्ता का निजी दावा है.

न्यूयॉर्क टाइम्स ने इन पट्टिकाओं की तस्वीरें लीं और डेमोक्रेटिक तथा रिपब्लिकन राष्ट्रपतियों पर अध्ययन और लेखन कर चुके आठ प्रतिष्ठित इतिहासकारों से उनका मूल्यांकन कराया. निष्कर्ष असहज करने वाले हैं. इतिहासकारों को इनमें तथ्यगत गलतियां, खंडित प्रस्तुतियां, चयनित मौन, अपमानजनक टिप्पणियां, ट्रंप के बारे में अतिशयोक्तियां, लिजलिजा आत्म-प्रचार और शैलीगत विचित्रताएं मिलीं.

प्रिंसटन विश्वविद्यालय के इतिहासकार सीन विलेन्ट्ज़ ने इसे केवल ‘खराब इतिहास’ नहीं, ‘इतिहास-विरोधी’ कहा. यह अंतर मामूली नहीं है. खराब इतिहास गलती कर सकता है; इतिहास-विरोधी लेखन इतिहास की मूल आत्मा- स्रोत, संदर्भ, संतुलन, जटिलता और असुविधाजनक सत्य को ही अस्वीकार कर देता है.

यह पूरी प्रदर्शनी लगभग 5,400 शब्दों में फैली है. ह्वाइट हाउस की प्रेस सचिव कैरोलाइन लेविट ने स्वीकार किया कि इनमें से कई पट्टिकाएं राष्ट्रपति ट्रंप ने स्वयं लिखी हैं. लेकिन जब टाइम्स ने पूछा कि इन विवरणों के लिए किन स्रोतों का इस्तेमाल किया गया तो ह्वाइट हाउस ने कोई स्पष्ट उत्तर नहीं दिया.

इतिहास-लेखन में स्रोत छुपा लेना अपने-आप में एक राजनीतिक संकेत है. यह कहता है: इसे इतिहास की तरह नहीं, घोषणा की तरह पढ़िए.

इस पड़ताल में फ्लोरिडा अटलांटिक यूनिवर्सिटी की निकोल ऐन्सलोवर, रटगर्स यूनिवर्सिटी के डेविड ग्रीनबर्ग, यूनिवर्सिटी ऑफ वर्जीनिया के लैरी सबाटो और मार्क सेल्वरस्टोन, राइस यूनिवर्सिटी के डगलस ब्रिंकली, कोलंबिया यूनिवर्सिटी के टिमोथी नफ्ताली, मॉर्गन स्टेट यूनिवर्सिटी के डैरिल स्कॉट और प्रिंसटन यूनिवर्सिटी के सीन विलेन्ट्ज़ जैसे इतिहासविदों की टिप्पणियां शामिल हैं. इन सबकी आपत्तियों का सार यह है कि ट्रंप ने ह्वाइट हाउस की दीवारों पर इतिहास नहीं लिखा; उन्होंने इतिहास की शक्ल में अपना राजनीतिक आत्ममुग्धता का चित्र टांग दिया है.

इतिहास को हर सत्ता अपने ढंग से पढ़ती है. फर्क इतना है कि लोकतंत्र में इतिहास सत्ता की परीक्षा लेता है; अधिनायकवादी प्रवृत्ति में सत्ता इतिहास को अपनी परीक्षा देने पर मजबूर करती है. ट्रंप की यह राष्ट्रपति-दीर्घा इसी दूसरी प्रवृत्ति का उदाहरण लगती है. इसमें अतीत स्वतंत्र नहीं है. वह वर्तमान राष्ट्रपति की वैधता का सहायक पात्र है. पूर्व राष्ट्रपति अपने समय के जटिल मनुष्य नहीं रह जाते; वे ट्रंप की राजनीतिक पटकथा के चरित्र बन जाते हैं- कोई उपयोगी पूर्वज, कोई वैचारिक सहायक, कोई अपमानित प्रतिद्वंद्वी और कोई ऐसा प्रतीक जिसे वर्तमान सत्ता अपने अर्थ में पुनर्लिखित कर सके.

यहां समस्या किसी एक गलत तारीख़ या किसी एक अतिरंजित विशेषण की नहीं है. समस्या यह है कि पूरी प्रस्तुति का नैतिक ढांचा ही तिरछा, बांका और टेढ़ामेढ़ा है. हाल के राष्ट्रपतियों, विशेषकर जो बाइडेन और बराक ओबामा, के संदर्भ में भाषा अधिक तीखी, कटु और दलगत हो जाती है. पहले के राष्ट्रपतियों के विवरण अपेक्षाकृत शांत दिखते हैं, लेकिन वे भी ट्रंप की प्राथमिकताओं के अनुरूप इतिहास को पुनर्गठित करते हैं. यह इतिहास किसी निष्पक्ष संग्रहालय की दीवार पर कम और चुनावी रैली के बैनर पर अधिक स्वाभाविक लगेगा.

सबसे खुला उदाहरण जो बाइडेन का है. उन्हें एक पूर्व राष्ट्रपति के रूप में नहीं, बल्कि ‘Autopen’ जैसे उपहासात्मक संकेत से चिह्नित किया गया. ऑटोपेन एक ऐसी मशीन है जो दस्तखत कर सकती है. लेकिन किसी राष्ट्रपति को उसके पूरे कार्यकाल, नीतियों, संकटों, निर्णयों और राजनीतिक संदर्भ से अलग करके एक यांत्रिक कटाक्ष में बदल देना इतिहास नहीं, राजनीतिक अवमूल्यन है.

लोकतंत्र में प्रतिद्वंद्वी को चुनाव में हराया जा सकता है; लेकिन सार्वजनिक स्मृति में उसे विकृत करके मिटाना दूसरी चीज़ है.

बराक ओबामा के संदर्भ में भी भाषा का राजनीतिक उपयोग स्पष्ट है. उनके पूरे नाम, विशेषकर मध्य नाम, पर जोर अमेरिकी दक्षिणपंथी राजनीति की पुरानी सांस्कृतिक रणनीति की याद दिलाता है. नाम यहां नाम नहीं रहता; वह संकेत बन जाता है- परायापन, संदेह, धर्म, नस्ल और ‘सच्चे अमेरिकीपन’ के प्रश्नों का संकेत. इतिहास जब नामों को हथियार बना देता है तो वह तथ्य नहीं, भय का भूगोल रचता है.

दूसरी ओर जिन राष्ट्रपतियों से ट्रंप अपनी वैचारिक वंशावली बनाना चाहते हैं, उनके प्रति भाषा अधिक उदार हो जाती है. एंड्रयू जैक्सन इसका स्पष्ट उदाहरण हैं. जैक्सन अमेरिकी पॉपुलिज़्म, मजबूत कार्यपालिका और कठोर राष्ट्रवाद के प्रतीक रहे हैं. वे ट्रंप के लिए उपयोगी पूर्वज हैं. लेकिन जैक्सन का इतिहास मूल निवासियों के विस्थापन, दासप्रथा के युग और राज्यसत्ता की क्रूरता से भी जुड़ा है. यदि इन अंधेरे हिस्सों को कमजोर कर दिया जाए और केवल ‘जनता के राष्ट्रपति’ का चित्र बचाया जाए तो इतिहास नहीं, राजनीतिक वंशावली तैयार होती है.

रोनाल्ड रीगन के साथ भी यही होता है. उन्हें शीतयुद्ध के विजेता की भव्य छवि में रखा गया है और अमेरिकी रूढ़िवादी राजनीति लंबे समय से ऐसा करती भी रही है. लेकिन इतिहास जानता है कि सोवियत संघ का पतन किसी एक राष्ट्रपति की इच्छाशक्ति से नहीं हुआ. उसमें सोवियत अर्थव्यवस्था की थकान, मिखाइल गोर्बाचेव की भूमिका, पूर्वी यूरोप की सामाजिक बेचैनी, वैश्विक दबाव और अमेरिकी नीति- सब शामिल थे. ट्रंपवादी इतिहास को ऐसी जटिलता से तकलीफ है. उसे प्रक्रिया नहीं, विजय चाहिए; संरचना नहीं, नायक चाहिए; इतिहास नहीं, ट्रॉफी चाहिए.

पट्टिकाओं में टैरिफ का 18 बार उल्लेख भी आकस्मिक नहीं है. ट्रंप की आर्थिक राष्ट्रवाद की भाषा में टैरिफ लगभग एक पवित्र राजनीतिक उपकरण बन चुके हैं. इसलिए अमेरिकी इतिहास में भी उन्हें बार-बार ऐसे पेश किया गया है जैसे वे राष्ट्रीय शक्ति और आर्थिक स्वायत्तता की शाश्वत कसौटी हों. इसी तरह मुनरो सिद्धांत की बार-बार प्रशंसा की गई है- वह सिद्धांत जिसे ट्रंप पश्चिमी गोलार्ध में अमेरिकी प्रभुत्व और हस्तक्षेप की अपनी समझ के साथ जोड़ते रहे हैं. इतिहास में जिन प्रसंगों से वर्तमान नीति को वैधता मिलती है, वे रोशन कर दिए जाते हैं. जिनसे असुविधा होती है, वे छाया में रख दिए जाते हैं.

टीपॉट डोम जैसे बड़े घोटाले का छोड़ा जाना और वाटरगेट जैसे प्रसंग का अपर्याप्त स्पष्टीकरण इसी चयन का हिस्सा है. इतिहास में चूक भी भाषा होती है. जो नहीं कहा गया, वह भी उतना ही बोलता है जितना कहा गया. यदि भ्रष्टाचार, सत्ता-दुरुपयोग और संस्थागत संकटों को धुंधला रखा जाए, जबकि शुल्कों, राष्ट्रवाद और मजबूत नेतृत्व की कथाएं बार-बार दोहराई जाएं तो यह संपादन नहीं, विचारधारात्मक कतरब्योंत है.

सबसे विचित्र और शायद सबसे ईमानदार संकेत यह है कि ट्रंप स्वयं छह पूर्व राष्ट्रपतियों के परिचयों में उपस्थित हैं. उनके दूसरे कार्यकाल के पहले वर्ष का विवरण अब्राहम लिंकन और फ्रैंकलिन डी. रूजवेल्ट के संयुक्त सारांश से भी अधिक स्थान लेता है. इतिहास में आकार भी अर्थ रखता है. किसे कितनी जगह मिली, यह बताता है कि लेखक किसे कितना महत्व देता है.

लिंकन ने संघ बचाया, दासप्रथा को चुनौती दी और अमेरिकी लोकतंत्र की नैतिक भाषा को नया आकार दिया. रूजवेल्ट ने महामंदी और विश्वयुद्ध के बीच राज्य, समाज और अर्थव्यवस्था के रिश्ते को बदल दिया. यदि इन दोनों से अधिक स्थान किसी वर्तमान नेता के प्रारंभिक आत्मवर्णन को मिलता है तो यह केवल अनुपात का संकट नहीं, आत्ममुग्धता का स्थापत्य है.

ह्वाइट हाउस का बॉलरूम प्रोजेक्ट भी इसी मानसिकता का उदाहरण है. रिपोर्ट के अनुसार वह अभी निर्माणाधीन है और कानूनी विवाद में उलझा हुआ है, लेकिन पट्टिकाओं में उसे ऐसे वर्णित किया गया है मानो वह पहले ही बन चुका हो. यह इतिहास नहीं, भविष्य को अतीत की तरह लिख देने की प्रवृत्ति है. सत्ता यहां केवल अतीत नहीं बदलती; वह अपूर्ण वर्तमान को भी पूर्ण उपलब्धि घोषित कर देती है.

ह्वाइट हाउस कोई निजी क्लब नहीं है. वह अमेरिकी राष्ट्र-राज्य की प्रतीक-स्थली है. वहां लगी दीवारों, चित्रों और शब्दों का अर्थ किसी होटल लॉबी की सजावट जैसा नहीं होता. वे नागरिकों को बताते हैं कि राष्ट्र स्वयं को कैसे याद करता है. यही कारण है कि इस प्रदर्शनी की समस्या केवल अकादमिक नहीं है. यह सार्वजनिक स्मृति की समस्या है. जब कोई राष्ट्रपति राष्ट्र की स्मृति को अपनी राजनीतिक आत्मकथा में बदल देता है तो सार्वजनिक संस्थान निजी स्मारक बनने लगता है.

हर आधुनिक नेता जानता है कि इतिहास केवल अतीत नहीं है. वह वैधता की मुद्रा है. जो अतीत को नियंत्रित करता है, वह वर्तमान पर नैतिक दावा पेश करता है. इसलिए सत्ता केवल कानून नहीं बदलती; वह पाठ्यपुस्तकें बदलती है, स्मारक बनाती और गिराती है, संग्रहालयों की भाषा बदलती है, राष्ट्रीय नायकों की सूची संशोधित करती है और खलनायकों की पहचान तय करती है. ट्रंप की यह प्रदर्शनी उसी वैश्विक प्रवृत्ति का अमेरिकी संस्करण है.

रूस में द्वितीय विश्वयुद्ध की आधिकारिक स्मृति हो, चीन में क्रांति का नियंत्रित आख्यान, ब्रिटेन में साम्राज्यवादी मूर्तियों पर विवाद हो या भारत में पाठ्यपुस्तकों, स्मारकों, मंदिरों, नामों और राष्ट्रवादी प्रतीकों को लेकर संघर्ष- हर जगह प्रश्न एक ही है: अतीत किसका है? लोकतंत्र का उत्तर स्पष्ट होना चाहिए: अतीत नागरिकों का है, शासक का नहीं.

इतिहास का काम नेता को महान सिद्ध करना नहीं, नागरिक को जटिलता से परिचित कराना है. वह बताता है कि अच्छे निर्णय भी बुरे परिणाम दे सकते हैं; महान नेता भी दोषपूर्ण हो सकते हैं; राष्ट्र गौरव और अपराध दोनों से बनते हैं; और किसी भी राजनीतिक परंपरा को बिना आलोचना के पवित्र बना देना नागरिक बुद्धि के विरुद्ध है. जब इतिहास सत्ता का घोषणापत्र बन जाता है, तो नागरिक विवेक धीरे-धीरे कमजोर होने लगता है.

ट्रंप की सोने के अक्षरों वाली राष्ट्रपति-दीर्घा अंततः एक अनजाने में की गई आत्मस्वीकृति है. वह दिखाती है कि उनके लिए इतिहास बहस का क्षेत्र नहीं, वैधता का मंच है; तथ्य का अनुशासन नहीं, व्यक्तित्व का विस्तार है. उसमें अमेरिका कम दिखाई देता है, ट्रंप अधिक. यह दर्पण है, लेकिन राष्ट्र का नहीं- शासक का.

लोकतंत्रों को ऐसे दर्पणों से सावधान रहना चाहिए. सुनहरे अक्षर इतिहास को अधिक सत्य नहीं बनाते; कई बार वे झूठ को अधिक चमकीला बना देते हैं. इसलिए जब हम देखते हैं कि भारत में बार-बार प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को कमतर आंकने की कोशिश होती है तो साफ़ दिखता है कि मौजूदा दौर में एक विकृत प्रतिध्वनि सब जगह गूंज रही है.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)