पंडवानी कला-मूर्धन्य तीजन बाई का लंबी बीमारी के बाद देहावसान भारतीय कला जगत् की और हमारे एक कालजयी महाकाव्य ‘महाभारत’ की परंपरा की भी क्षति है. तीजन ने ग़रीबी और वंचित परिवार में जन्म लिया था- वे समाज के निचले तबके से आने वाली स्त्री थीं. उन्होंने अद्भुत जीवट और गहन संघर्ष से अपनी कला में अपना सामाजिक और कलात्मक उन्नयन अर्जित किया.
तीजन से पहले पंडवानी को देश-विदेश में शायद ही कोई जानता था. तीजन ने उदग्र निर्भीकता और अदम्य कल्पनाशीलता से उसमें नवाचार किया और अपनी प्रस्तुतियों से एक क्लासिक को हमारे लिए फिर से प्रासंगिक बना दिया.
अगर महान् आधुनिक रंगकर्मी पीटर ब्रुक ने हमारे ‘महाभारत’ को अपनी नाट्य-प्रस्तुति द्वारा एक महान् मानवीय गाथा के रूप में विश्व-प्रतिष्ठित किया, तो तीजन बाई ने उसी महाभारत को भारत में नई प्रासंगिकता और प्रतिष्ठा दिलवाई.
यह सिर्फ़ ‘महाभारत’ की नहीं, लोक परंपरा और एक साहसी स्त्री की महिमा की गाथा भी साथ-साथ बनी.
उनका गायन अभिनय के साथ होता था और वह एक कद्दावर जोश और ऊर्जा से भरी स्त्री का गायन था: उसमें कोमलता, वात्सल्य से लेकर हिंसा, प्रहार, अवसाद आदि अनेक भाव बारी-बारी से आते-जाते रहते थे- तीजन बाई का व्यक्तित्व, उनका कद और काठी इस गायन और अभिनय को, उनकी नाटकीय मुद्राओं को, उनके इकतारे को कभी वाद्य-यंत्र और कभी गदा बनाने के कल्पनाशील उपक्रम को विन्यस्त करते थे.
यह सिर्फ़ कथा-गायन नहीं था- महाभारत की अपनी कथा-वृत्ति के अनुरूप, तीजन बाई मूल कथा से अलग आज की सामाजिक और राजनीतिक स्थिति पर तीख़ी टिप्पणियां भी करती चलती थीं, जो उनकी कला को एक तरह की तीख़ी-पैनी प्रासंगिकता भी देता था.
महाभारत के कई चरित्रों, स्त्री-पुरुष दोनों का, अभिनय वे जिस सहजता से करती थीं वह विस्मयकारी था. तीजन बाई की कला उस सर्जनात्मकता का साक्ष्य थी कि एक सजग स्त्री महाकाव्य के परिसर में और लोकव्यवहार के आयाम में कितना कुछ अप्रत्याशित तात्कालिकता और सुघर संयम से कर सकती थी. एक गहरे अर्थ में तीजन बाई की अदम्यता हमारे समय में स्त्री की अदम्यता का एक लोक-रूपक था. वे शास्त्र और लोक की लगभग रूढ़ हो गई दूरी और द्वैत को रौंद देती थीं.
उनके जीवन में, सामुदायिक जीवन और निजी जीवन दोनों में, बहुत कठिनाइयां रहीं, पर यह उनका कमाल था कि इन्हें उन्होंने अपने कलाकर्म को बाधित नहीं करने दिया. मंच पर ही नहीं, उससे अलग भी उनकी बेबाकी के क़िस्से हम सुनते रहे हैं.
सबसे स्मरणीय यह है कि उन्होंने दशकों पहले पेरिस में, वहां के अत्यंत प्रतिष्ठित अख़बार ‘ल मोंद’ में, एक इंटरव्यू दिया था. उसमें यह पूछे जाने पर कि वे फ्रेंच स्त्रियों के बारे में क्या सोचती थीं, तीजन बाई ने कहा था कि वे सुंदर हैं पर इतनी सपाट छातियों वाली हैं. इसने पेरिस के भद्रलोक में तहलका मचा दिया था जिसका पता मुझे चित्रकार सैयद हैदर रज़ा से चला था जिन्होंने मूल फ्रेंच में उस इंटरव्यू को पढ़ा था.
ऐसा नहीं लगता कि उनकी कला संदेशवाहक कला थी- लोककलाएं जब-तब सीख भी देती होंगी पर उनका मूल स्वभाव आनंद देना और प्रश्नवाचकता जगाना रहा. शायद तीजन बाई ने अपने समाज में स्त्री की स्थिति और उसकी स्वतंत्रता, उसके साहस और बेबाकी को स्थापित किया.
मंदिर सुधार
अयोध्या के राम मंदिर में जो करोड़ों की लूट हुई है उससे एक बार फिर इस बात की पुष्टि हुई है कि हमारे मंदिरों के पास अपार धन है जो उन्हें लोगों से दान या चढ़ावे के रूप में मिलता रहता है और उसका दुरुपयोग पुजारी-पुरोहित-पंडे और प्रबंधक लगातार करते रहते हैं. इस संपदा का बहुत कम उपयोग स्वयं हिंदू धर्म के चिंतन और अध्यात्म की समझ बढ़ाने के लिए होता है.
इन दिनों हर क्षेत्र में सुधार पर बड़ा आग्रह व्यापक रूप से किया जा रहा है. समय आ गया है कि मंदिरों के प्रबंधन और उनकी संपदा के नियमन में कुछ बुनियादी सुधार किए जाएं.
सुझाव यह है कि मंदिर की व्यवस्था, दैनिक पूजा-अर्चा, सुरक्षा आदि पर ख़र्च की सीमा निर्धारित की जाए- पूरे चढ़ावे और दान-राशि का अधिक से अधिक एक चौथाई यानी पच्चीस प्रतिशत हिस्सा इस पर ख़र्च किया जा सकता है. दस से पंद्रह प्रतिशत राशि मंदिर की स्थायी निधि में जमा की जा सकती है. बाक़ी राशि मंदिर के अंचल में शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वच्छता, बाल पोषण आदि पर ख़र्च करना अनिवार्य किया जाना चाहिए.
यह राशि मंदिर या तो स्वयं सीधे ख़र्च करे या राज्य सरकार एक मंदिर कोष बनाए जिसे निरपवाद रूप से इन्हीं क्षेत्रों में ख़र्च किया जाना चाहिए, अधिकांशतः ग़रीब और वंचित इलाकों में. अगर हिंदू धर्म की एक प्रसिद्ध मान्यता यह है कि ईश्वर दीनदयालु है- उसकी दीनदयालुता मंदिर द्वारा एकत्र की जा रही धनराशि के ऐसे ख़र्च किए जाने से ठोस रूप से प्रगट होगी.
उत्तर भारत के अधिकांश मंदिरों में या तो बेसुरी आरती या बेसुरे भजन गाए जाते हैं. इस कोष से यह व्यवस्था की जा सकती है कि हर मंदिर के लिए संगीत में प्रशिक्षित गायक-वादक अपनी सेवाएं दें. सिखों से इस मामले में और सेवा के व्यापक व्यसन की शिक्षा ली जा सकती है. जैसे गुरुद्वारों में होता वैसे ही हिंदू मंदिरों में, बिना जात-पांत या धर्म की कोई बंदिश लगाए, सभी के लिए नियमित रूप से खुली और स्वच्छ भोजन-व्यवस्था की जाए. आस्थावान् हिंदुओं को भी प्रेरित किया जाना चाहिए कि भंडारे-रतजगे अपने घर-मुहल्ले में करने के बजाय मंदिरों में ही करें. खाते-पीते लोगों के बजाय ग़रीब और वंचित लोगों को भोजने कराने से अधिक पुण्य मिल सकता है.
कुछ वर्ष पहले किसी अर्थशास्त्री ने यह अनुमान लगाया था, कुछ बड़े मंदिरों में आने वाली धनराशि को हिसाब में लेते हुए कि भारत के सारे मंदिरों में जितनी धनराशि जमा हो और बढ़ रही है, उसके आधे हिस्से से देश भर में उच्च स्तर तक मुफ़्त शिक्षा और स्वास्थ्य की व्यवस्था की जा सकती है और सरकार को उन पर टैक्स का पैसा ख़र्च नहीं करना पड़ेगा. समय आ गया है कि इन बातों पर विचार करें और मंदिर-सुधार के लिए क़दम उठाएं.
यह भी स्पष्ट है कि भाजपा और संघ परिवार ऐसे सुधार नहीं करेगा या कर सकता क्योंकि उन्होंने तो मंदिरों को धर्म का कम, अपनी राजनीति का केंद्र बना रखा है. निर्णय हिंदू समाज को करना है.
देर-सबेर
हम प्रायः हर रोज़ हो रहे उन हमलों से आक्रांत रहते हैं जो संविधान, क़ानून-व्यवस्था, सामाजिक समरसता, अर्थ-व्यवस्था, ज्ञान, परंपरा, इतिहास, शिक्षा, पर्यावरण, अधिकार, संस्कृति आदि क्षेत्रों में वर्तमान सत्ता रूढ़ राजनीति कर रही है. हर दिन कुछ ऐसा फ़रमान-सा जारी होता है जो सामान्य नागरिकों को किसी न किसी लाइन मे कुछ पाने या करवाने के लिए खड़ा होना पड़ता है. न जाने कितने फॉर्म भरने पड़ते हैं और फिर जो कार्ड आदि मिलते हैं उनके बारे में फ़तवा जारी होता है कि वे वोट के अधिकार या नागरिकता के लिए पर्याप्त नहीं हैं!
लोकतांत्रिक नागरिकता को छेंकने-थामने-बाधित करने आदि का एक सुनियोजित, क़ानून-समर्थित अभियान ही चल रहा है. हर दिन भारतीय नागरिक कुछ और लाचार, कुछ और निहत्थे होते जाते हैं. यह देश तितर-बितर, घायल और क्षतविक्षत हो रहा है.
देर-सबेर हालात बदलेंगे और हमें भारत में पुनर्निर्माण के काम में लगना पड़ेगा. सजग नागरिकों, लेखकों, बुद्धिजीवियों, विशेषज्ञों के एक देशव्यापी समूह ने इस पुनर्निर्माण के लिए एक व्यापक, ठोस, सुचिंतित प्रारूप पर काम करना शुरू किया है. उसके लिए सभी ब्यौरे, प्रासंगिक डेटा, संविधान और क़ानून के प्रावधानों आदि का अनुशीलन किया जा रहा है. इस प्रयत्न में कई वरिष्ठों के अलावा कई युवा अध्येता भी शामिल हैं.
इन सभी को इस बात का तीख़ा अहसास है कि भारत में उदार, समावेशी और संवेदनशील लोकतंत्र का पुनर्वास आसान नहीं होने वाला, भले ही वह कितना ही अभीष्ट क्यों न हो. इस लिए जो भी क्षेत्र अनुसंधान और संभावना के लिए चुने गए हैं उनमें वास्तविकता का निर्मम-वस्तुनिष्ठ विस्तृत आकलन अनिवार्यतः किया जा रहा है. इसका भी ख़याल रखा जा रहा है कि भारत में जो बहुलता है उसके रहते हर अंचल के लिए कोई एकरूप उपाय व्यावहारिक नहीं होंगे.
यह बात भी अलक्षित नहीं जा रही है कि हमारी परिस्थिति में राजनीति अक्सर एकरूपता आरोपित करना चाहती है जबकि संस्कृति का इसरार बहुलता पर होता है. इनके बीच के तनाव को हिसाब में लिया जा रहा है. समाज के एक बड़े और प्रभावशाली हिस्से ने जब उन्हें अनावश्यक मान लिया है तब भारत की वाद-विवाद-संवाद, असहमति और प्रश्नवाचकता की परंपरा को फिर सामाजिक व्यवहार और नागरिक आचरण में प्रचलित करना बहुत कठिन होगा. यह बात भी नहीं भूली जा रही है कि हमारी कई विकृतियों का इतिहास पुराना है.
पर यह उम्मीद का एक स्वप्नशील प्रयत्न होने जा रहा है. उसके पीछे यह विश्वास है कि भारतीय जन की परिवर्तन के लिए ललक और आकांक्षा नष्ट नहीं हुई और परिवर्तन की संभावना में उसका यक़ीन बचा हुआ है. अंततः यह प्रमाण होगा कि अंधेरे समय में हमने बेहतर का, उदार समावेश, समता और न्याय, बंधुता और समरसता का सपना देखना छोड़ा नहीं है.
(लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं.)
