भारतीय जनता पार्टी की सरकार अगर यह सोच रही है कि सोनम वांगचुक को सार्वजनिक पटल से अदृश्य करके अब वह शिक्षा व्यवस्था में
बदइंतजामी के सवाल से छुटकारा पा गई है तो वह ग़लतफ़हमी में है. हो सकता है कि इस बार देश के विद्यार्थी और नौजवान वांगचुक के साथ किए गए बर्ताव को अपने साथ किया गया अन्याय मानें.
वे सड़क पर आएं या न आएं लेकिन सरकार ने अपने इस एक कदम से ख़ुद को उन लोगों की निगाह में हमेशा के लिए गिरा लिया है जो अब तक उसे समय देने को तैयार थे. उनके सामने यह सवाल तो रहेगा ही कि वांगचुक कोई सरकार का इस्तीफ़ा तो नहीं मांग रहे थे. वे एक निकम्मे शिक्षा मंत्री की जवाबदेही तय करने की बात कर रहे थे. उस पर विचार करना तो दूर, उसकी मांग करने वाले वांगचुक के साथ ही ज़ुल्म किया गया.
लेकिन जनता के इस विचार को संगठित करना और उसके इर्द-गिर्द गोलबंदी करना एक लंबा और मेहनत का काम है. क्या कॉकरोच जनता पार्टी के लोग यह करना चाहते हैं? या उनकी कोई ऐसी तैयारी है?
ऐसा नहीं लगता क्योंकि सोनम वांगचुक के जंतर मंतर से उठाए जाने के फ़ौरन बाद एक भावुक क्षण में कॉकरोच जनता पार्टी के नेता अभिजीत दिपके ने ख़ुद उपवास की घोषणा कर दी है. लेकिन क्या उनका उपवास वांगचुक के उपवास की भरपाई कर पाएगा? इस सवाल पर हम वापस आएंगे.
सोनम वांगचुक को उनके अनशन के दिल्ली पुलिस ने जबरन उठा लिया है. यह उसी तरह हुआ जैसा तीन दिन पहले ‘द लेंस’ वेबसाइट के अपने लेख में एस. विक्रम ने बताया था: ‘जब वह क्षण आएगा, न्यायपालिका के आदेश पर स्वास्थ्य रक्षा के लिए किए गए हस्तक्षेप के नाम पर उपवास तोड़ दिया जाएगा, ताकि सरकार सत्याग्रह को बिना मान्यता दिए ख़त्म कर दे.’
यह बात एकदम ठीक है. सरकार ने इस सत्याग्रह को मान्यता नहीं दी है. 20 रोज़ तक सोनम वांगचुक के अनिश्चितकालीन उपवास पर एक शब्द भी कहना उचित नहीं समझा. वह उपवास जिस मांग को लेकर था, उस पर सरकार ने कुछ कहना उचित नहीं समझा. सरकार की पुलिस ने कहा कि उसने अदालत के कहने पर सोनम वांगचुक की जान बचाने के लिए उन्हें हस्पताल में दाखिल कर दिया है.

सरकार ने दिल्ली पुलिस के इस कदम से ख़ुद को चतुराई से अलग कर लिया है. एक दिन पहले दिल्ली के पुलिस प्रमुख को बदला गया और नए प्रमुख ने आते ही पहला काम किया सोनम वांगचुक को जंतर मंतर से हटाने का.
सरकार का रुख़ यह है कि वह भले ही सोनम वांगचुक की मांग को ध्यान देने योग्य नहीं समझती है, उसे किसी भी दूसरे इंसान की तरह उनकी जान की फ़िक्र है.
वह भले ही एक अनुचित मांग सोनम वांगचुक के प्राण किसी तरह बच जाएं, इसकी दुहाई उनके आंदोलन के सहयोगी भी बार-बार कर रहे थे. उनके स्वास्थ्य बिगड़ने की खबर सुनकर अलग-अलग राजनीतिक दल के नेता भी उनसे उपवास तोड़ने की अपील लेकर पहुंचने लगे थे. पूरी दुनिया से अपील की जा रही थी कि वे अपना उपवास तोड़ दें.
ख़ुद उन्होंने कहा था कि उन पर उपवास तोड़ने के लिए दबाव डालने की जगह लोगों को सरकार को उनकी मांग पर विचार करने के लिए कहना चाहिए. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. लोग इस सरकार को इस कदर बेहिस मानते हैं कि उससे कोई मांग करना व्यर्थ मानते हैं. इसलिए वे वांगचुक को ही कहने लगे कि आप नाहक जान न दें.
क्या इसकी वजह कुछ आंदोलन और वांगचुक के रवैये में भी खोजी जा सकती है?
उपवास के बीच घोषणा हुई कि 20 जुलाई को संसद का मनसून सत्र शुरू होने पर एक जुलूस निकाला जाएगा. वांगचुक ने कहा कि उस दिन वे उस मुद्दे को संसद के सुपुर्द कर देंगे. इससे लगने लगा कि अब इस उपवास से निकालने का रास्ता खोजा जा रहा है. यानी उपवास एक समस्या बन गया जिसका कोई समाधान आंदोलनकर्ताओं के पास न था.
उपवास का एक लाभ अवश्य हुआ. तीन-चार रोज़ पहले तक जंतर मंतर पर लोगों की आमद बहुत कम थी. लेकिन जैसे-जैसे वांगचुक के स्वास्थ्य में गिरावट की खबर फैलने लगी, उसकी फ़िक्र से पैदा हुई सहानुभूति के कारण लोग वहां आने लगे. एक तरह से विरोधस्थल में जान आ गई. लेकिन यह वांगचुक के उपवास के कारण हुआ. उपवास ने सरकार पर नहीं लेकिन जनता पर ज़रूर कुछ असर डाला.
राजनीतिक दलों के नेता भी मानवीयता के कारण आए. बावजूद इसके कि इस विरोध आंदोलन के नेता अभिजीत दिपके ने शुरू में कह दिया था कि यहां राजनीतिक दलों का स्वागत नहीं है. बल्कि कॉकरोच जनता पार्टी तो बनी ही इसलिए है कि ये सारे दल विफल रहे हैं. उनके इस अहंकारपूर्ण कथन को नज़रअंदाज़ करके राजनीतिक दल वांगचुक के साथ सहानुभूति प्रदर्शित करने आए और उनसे उपवास समाप्त करने की अपील की.
इस तरह सरकार की जगह वांगचुक केंद्र में आ गए. जंतर-मंतर पर आल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन के सदस्य भी उपवास पर थे. लेकिन वे वांगचुक की छाया में चले गए. सरकार ने देखा कि जंतर मंतर पर वांगचुक के कारण जनता इकट्ठा हो रही है. उन्हें हटा देने पर आकर्षण का केंद्र ही ख़त्म हो जाएगा.
सरकार ने अपने गणित से निर्णय किया है. वांगचुक अब वहां नहीं हैं. उनकी अनुपस्थिति में बाक़ी लोगों को हटाना इतना कठिन नहीं. लेकिन सरकार को उसकी क़ीमत भी देनी पड़ सकती है. लेकिन वह जो सोच रही है उसके ठीक उलटा भी हो सकता है.
हो सकता है कि 20 तारीख़ को विपक्षी राजनीतिक दल शिक्षा में बदहाली और बदइंतज़ामी के लिए सरकार की जवाबदेही मांगते हुए एक बड़ा विरोध प्रदर्शन आयोजित करें. हो सकता है कि वे इस पूरे संसद सत्र को ही शिक्षा के सवाल पर विचार करने का मौक़ा बना लें. हो सकता है कि देश भर से नौजवान जंतर-मंतर पहुंचने लगें. यह सब हो सकता है. लेकिन यह अपने आप नहीं होगा.
जनता को असमंजस, उलझन, जड़ता से निकलना पड़ता है. उसे जानकारी देनी पड़ती है, गोलबंद करना पड़ता है और तब वह सक्रिय होती है. क्रोध स्वतःस्फूर्त होता है, आंदोलन श्रमसाध्य संगठन के बिना संभव नहीं.
(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाते हैं.)
