इस पर हमारा ध्यान जाना चाहिए कि हमारे देखते-अनदेखते एक नया अनुष्ठान समाज के प्रचलित हो गया है और अब खुलेआम बहुतों के द्वारा बरता जाता है. यह अनुष्ठान चोरी है. तरह-तरह की चोरियां अब हमारे समाज में आम हैं: नोटचारी, वोटचोरी, चढ़ावा चोरी. रघुवीर सहाय की कुछ पंक्तियां हैं ग़रीबी के बारे में जिसमें वे कहते हैं कि ‘अब अपमान उसमें नहीं रह गया है.’
इसी तरह से हम कह सकते हैं कि चोरी करने में अब किसी को शर्म नहीं आती.
चोरी का भूगोल पूरा देश है. जो लोग चोरी करते हैं उनमें बड़ी लोकतांत्रिक बहुलता है. राजनेता, अफ़सर, ठेकेदार, इंजीनियर, व्यापारी आदि तो, लगभग पारंपरिक रूप से, जब मौक़ा मिले, चोरी करते रहे हैं. अब चोरों की जमात में बड़ी संख्या में भक्त, संत-साधु, उपदेशक आदि शामिल हो गए हैं.
मज़े की बात यह है कि इन लोगों को न तो कोई शर्म आती है, न ही उनकी आस्था आहत होती है. चोरी पकड़े जाने पर पहली प्रतिक्रिया तो यह होती है कि कोई चोरी नहीं हुई है. अगर बात कुछ तूल पकड़ जाए तो यही चोरी मिलकर प्रकरण की जांच करने के लिए एक समिति बैठा देते हैं जिसमें अक्सर कुछ दूसरे अधिक चतुर चोर सदस्य होते हैं. वे जांच कर कुछ निचले स्तर के कर्मचारियों को चोर क़रार देकर उनके खिलाफ़ कार्रवाई की सिफ़ारिश कर देते हैं. असली चोर साफ़ बचा लिए जाते हैं क्योंकि वे रसूख़ के लोग होते हैं. हम लोग यह सब लाचार देखते रहते हैं कि फिर एक बार उद्घोष होता है कि चोरी के आरोपियों को बख़्शा नहीं जाएगा. थोड़े दिन बाद यह घटना हमारे ध्यान से उतर जाती है या कि कोई और चोरी उसका स्थान ले लेती है.
जो इमारतें भरभराकर गिर जाती हैं, जो राजमार्ग अपने खोले जाने के कुछ ही दिन बाद धंस जाते हैं, जो पुल उद्घाटन के बाद हस्बेमामूल बनकर जल्दी ही गिरते ही रहते हैं, सभी किसी न किसी चोरी का परिणाम होते हैं. चोरी करने वाले मंत्री-अफ़सर-ठेकेदार आदि अंततः बच ही जाते हैं और अगली चोरी करने में सुरक्षित व्यस्त हो जाते हैं.
राम-कृष्ण की परंपरा में चोरी की क्या जगह है यह अनुसंधान का विषय नहीं है. राम का संबंध कभी किसी तरह की चोरी से नहीं रहा. वे मर्यादा पुरुषोत्तम हैं. अलबत्ता कृष्ण के यहां माखनचोरी से लेकर गोपियों के कपड़ों की चोरी, और तो और उनकी चितचोरी आदि के प्रसंग हैं. पर ये बहुत सीमित चोरियां हैं और इनका कोई सामाजिक परिणाम या क्षति नहीं होते.
हबीब तनवीर के प्रसिद्ध नाटक ‘चरणदास चोर’ में एक उक्ति है ‘एक चोर ने रंग जमाया सच बोलके.’ हमारे समय में बहुत सारे बड़े चोर रंग जमा रहे हैं, झूठ बोलकर. वह समय जा चुका जिसमें चरणदास जैसा अकिंचन चोर सच बोलकर रंग जमा सकता था.
अब तो असली रंग झूठ से ही आता है. चोरी के साथ झूठ भी नया अनुष्ठान है. सामाजिक, चमकता-दमकता हुआ.
एक दशक
विश्वास नहीं होता पर चित्रकार-मित्र सैयद हैदर रज़ा को गए इस महीने एक दशक पूरा होने जा रहा है. वे अपनी बालभूमि मंडला में सर्वत्रपुण्या नर्मदा से कुछ ही दूर एक कब्रगाह में अपनी पिता की कब्र की बगल की कब्र में सोये हुए हैं. बाहर वे अपनी कला में, उसके बढ़ते प्रभाव में, उसकी समझ में और युवा प्रतिभा में अपने अटल विश्वास में जाग रहे हैं.
उनकी कला जीवित है, सारी नश्वरता के बरक़्स वह कालजयी है. वे अपने रंगनयनों से अब भी प्रकृति को देख और रूपायित कर रहे हैं. वह अब भी प्रकृति और पुरुष के युग्म को, स्फुरण और बीज को, आरंभ और स्वस्ति को, बिंदु और आलोक को, शान्ति और मौन को, सुषमा और सौन्दर्य को देख रहे हैं- उनकी आभा में रंगदग्ध हैं.
मंडला और नर्मदा, उसके शहरातियों के समूह, उसके बच्चे-बच्चियां, उसकी घरेलू और कामकाजी स्त्रियां पिछले कुछ वर्षों से, धीरे-धीरे, जानने लगे हैं कि यह मूर्धन्य चित्रकार मंडला से उठा था और उसे और नर्मदा को कभी भूला नहीं. वे पेरिस से भारत कुछ दिनों के लिए हर वर्ष भारत आने के दौरान चुपचाप मंडला आते रहे और नदी तट पर नर्मदाजी को साष्टांग प्रणाम करते रहे.
रज़ा अब, अपनी मृत्यु के दस वर्ष बाद, मंडला में एक उपस्थिति हैं- उनके नाम पर एक मार्ग है और उस पर रज़ा कला वीथिका है जिसे एक कवि-कलेक्टर ने बनवाया था.
क्या अहरह बहती नर्मदा को, जो अपनी पौराणिक प्रशस्ति में, उभयतटीर्था कहलाती है, याद है कि उसके एक तटतीर्थ रज़ा भी हैं? रज़ा अपने जीवन और कला, आधुनिक समय में, दुस्साध्य पवित्रता की तलाश करते रहे हैं. उस पवित्रता का संस्पर्श उन्हें अपने मंडला में नर्मदा के किनारे बिताये बचपन में मिला था.
वे मंडला से उखड़कर दमोह, फिर नागपुर, फिर बंबई और अंतत: पेरिस गए: पर जिस पवित्रता ने उन्हें आरंभ में आक्रांत और आप्लावित किया था, जो मंडलाई और नार्मद पवित्रता थी उसे, वे जीवन भर, जहां भी रहे, खोजते रहे. उनकी कला, अपने अनिवार्य आशय में, पवित्रता की उत्कट खोज है. आधुनिकता में आम तौर पर पवित्रता एक सरोकार नहीं रही है. रज़ा, जिस वैकल्पिक आधुनिकता के आकल्पक हुए, उसमें यह सरोकार हमेशा सक्रिय रहा.
फ्रांस में साठ वर्ष रहते हुए और उसी दौरान भारत में सक्रिय राजनीति में रज़ा का गहरी रुचि थी. पर उनकी कला में इस राजनीति की कोई झलक या अंतर्ध्वनि नहीं है. इतिहास को भी को उन्होंने कभी अपनी कला में प्रगट या हस्तक्षेप नहीं करने दिया. एक अर्थ में उनकी कला इतिहास से मुक्त कला है. वह कला के इतिहास के प्रति सजग है पर व्यापक इतिहास में नहीं. पर यह इतिहास-विमुखता का यह प्रतिफल नहीं रहा कि रज़ा मनुष्य की स्थिति, नियति, विडंबना के प्रति उदासीन थे.
वे सत्व के चितेरे थे. यही सत्व उनकी कला को कालजयी बनाता है. तुलसीदास की एक प्रतीकव्यवस्था का सहारा लेकर हम कह सकते हैं कि रज़ा ने शून्य की भीति पर जो चित्रांकन किया, जो रंगचिह्न उन्होंने इस भीति पर छोड़े, वे अमिट हैं.
झूठों की बाढ़
दिल्ली में पिछले कुछ बरसों से लगता है कि बारिश कम होने लगी है. वर्ष के ज़्यादातर हिस्से में सूखा-सा पड़ा रहता. कई बार बादल घिरते हैं पर बरसते नहीं हैं. लेकिन इस सूखे के बरक़्स पिछले लगभग 15 बरसों से दिल्ली में हर मौसम में झूठों की बाढ़ अविराम आती रहती है.
सबसे ज़्यादा झूठ दिल्ली में ही बरसते हैं और यहीं से फिर देश के बाक़ी हिस्सों में जाते हैं. उन्हें गढ़ने और फैलाने के अनेक माध्यम हैं: उनमें एक तरह की विचित्र लोकतांत्रिकता भी है: राजनेता, नौकरशाह, पत्रकार, धर्मनेता, बाहुबली, बुद्धिजीवी, अभिनेता, खिलाड़ी, व्यापारी, संत, मवाली, चोर-उचक्के, हुड़दंगिए, अपराधी, एंकर, न्यायाधीश, जवान-बूढ़े, चिकने-चुपड़े, ध्वजाधारी, छात्र और अध्यापक, संपादक और प्रकाशक, सुभूषित और बदहाल आदि सभी मौक़ा मिलते ही झूठ बोलते और फैलाते हैं.
हमारे समय में बदहाली-बेकारी-बेरोज़गारी, सांप्रदायिकता और धर्मांधता, विषमता, नई टेक्नोलॉजी की ही तरह झूठ सबसे ज़्यादा बोले-गढ़े और फैलाये गए हैं. झूठ का भूगोल संसद, न्यायालय, लाल क़िले के प्राचीर, पूजास्थलों, अख़बार-टेलीविजन, सिनेमा, कक्षाओं, रैलियों, दंगों, लिंचिंग, बुलडोजिंग पुस्तकों-पत्रिकाओं आदि तक विस्तृत है.
किसी को बल्कि शायद किसी संस्था को पिछले दस वर्ष में कितने झूठ कहां, किसने, कब बोले इसका सुशोधित और प्रामाणिक संकलन करना चाहिए. तब इसका ठोस प्रमाण मिल सकेगा कि हमारे लोकतंत्र में राजनीति, सत्ता, व्यापार, ज्ञान, शिक्षा, विचार, पत्रकारिता, मीडिया, धर्म, खेलकूद, लोक निर्माण, सिनेमा, फ़ैशन आदि क्षेत्रों में किस क़दर झूठ का बोलबाला हो गया है. यह कटूक्ति की जा सकती है कि हमारे लोकतंत्र के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ है कि वह अधिकांशतः झूठ से ही चल रहा है.
ऐसे दृश्य आम हैं जब झूठ-झूठ पर फूल बरसा रहा है, झूठ की आरती झूठ ही उतार रहा है. इसमें ज़रा भी संदेह नहीं किया जा सकता कि झूठ के पास इतनी शक्ति, इतनी सत्ता, इतना व्यापक समर्थन, इतने अनुयायी और भक्त, इतना प्रभाव, इतनी प्रशंसा पहले कभी नहीं हुए. कई बार लगता है कि झूठ ने लोकतंत्र को उसकी जगह से ठेलकर अपना अटल साम्राज्य स्थापित कर लिया है. झूठ के साथ, उसकी फ़ौज़ में घृणा, हिंसा, भेदभाव, अन्याय, अतिचार, भ्रष्टाचार, भय और धमकी आदि सशक्त-सक्रिय वृत्तियां उत्साहपूर्वक शामिल हैं.
यह भी लगता है कि बरसों पहले थिएनमान चौक पर एक अकेले निहत्थे युवक को रौंदने के लिए जैसे अनेक टैंक उसके पीछे चल रहे थे वैसे ही इन दिनों सच को रौंदने के लिए झूठ के टैंक उसे पछिया रहे हैं. अभी तक रौंद नहीं पाए हैं पर उसकी टोह में लगातार लगे हैं. झूठ के आक्रामक घेरे में सच आज ऐसे ही फंसा हुआ है पर है- घायल, लहूलुहान, फिर भी अदम्य और अपराजेय.
(लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं.)
